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13 September 2018

कुछ लोग -41

विरले ही होते हैं कुछ लोग इस तरह के जो, डूब जाते हैं खुद, पार तिनके को लगा देते हैं।
वो लहरों के साथ-साथ चलते तो नहीं मगर
डगर दुनिया को एक नयी सी दिखा देते हैं ।
उनके आगे क्या अपना– क्या पराया कोई
वो अपनी बातों से हर सोते को जगा देते हैं।
विरले ही होते हैं कुछ लोग इस तरह के जो,
अपनी साँसों से किसी और को जिला देते हैं।

-यश ©
13/09/2018

15 August 2018

अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों .......

अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
इंसान बाज़ारों में बिकता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
बचपन फुटपाथों पर दिखता है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
कोई दर-दर भटकता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
सड़क किनारे सोता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
कठुआ-मुजफ्फरपुर होता है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
इंसानियत का कत्ल होता  है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
अपनी नीयत बदली हुई ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
है आग दहेज की लगी हुई ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
बेड़ियाँ अब भी जकड़ी  हुईं ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
हैं अफवाहें फैली हुईं ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
हैं फिज़ाएँ बदली हुईं?

 -यश©
12/08/2018

05 July 2018

ऑफर,रिटर्न और एक्सचेंज .........

जिंदगी के
खुशनुमा पलों पर
अगर  चल रहा होता ऑफर
एक के साथ एक
या दो फ्री का
तो कितना अच्छा होता
थोड़ी देर को ही सही
हर कोई
कितना सच्चा होता।
या ऐसा होता
कि
लौटा सकते हम
अपने
अनचाहे पलों को
और बदले मे पा सकते
अपने बीते बचपन
और कभी के
बिछुड़े
अपनों को
हर रात देखे
हसीन सपनों को।
लेकिन ....
ज़िंदगी
कोई सुपर मार्केट नहीं
जहाँ
चलती है
हमारी खुद की मर्ज़ी
चीजों को
चुनने,आज़माने
और बदले जाने की। 
ज़िंदगी तो
असल में
स्याह-सफ़ेद परतों की
एक विचित्र
कविता
या कहानी है
खुद ही पढ़ते-झेलते
और
कहते जाने की;
इसमें
संभव नहीं पाना
कोई भी ऑफर
रिटर्न या एक्सचेंज
बस
एक गुंजाइश है
साँसों के चलते
या थमते जाने की ।

-यश©
05/07/2018

02 July 2018

काश! कि न होती ये बारिश

काश!
कि न होती ये बारिश
तो
न मन यूं भीगता
न भीतर ही भीतर
चीखता
मुक्ति पाने को
काले बादलों की तरह
उमड़ते
अनचाहे शब्दों से ।
हाँ !
अनचाहे शब्द
जो तितर-बितर
हो कर
न जाने
किस तरह जुड़ कर 
असपष्ट सा आकार लेते हैं
न जाने क्या समझते हैं
न जाने क्या समझाते हैं।
काश!
कि न होती ये बारिश
तो न जमती
द्वेष और हीनता की
काई और कीचड़
टूटे दिल के
उस एक कोने में
जो लाख समझाने पर भी
मानता नहीं
कि हकीकत
कहीं हटकर होती है
कल्पना से।
काश!
कि न होती ये बारिश
और बना रहता
अस्तित्व
जेठ की तपती दोपहरों का
तो सुकुं मिलता मुझको
सिर्फ यह सोचकर
कि
इस कदर
जलने वाला
अकेला मैं ही नहीं
और भी हैं।

-यश ©
02/07/2018



28 June 2018

वक़्त के कत्लखाने में -13

यूं ही
समय के
इस खालीपन में
खुद से
बातें करता हुआ
अतीत के झरोखों से
अपने
आज को देखता हुआ
कभी-कभी सोचता हूँ
क्या रखा है
धारा के साथ बहने में
या
धारा के विपरीत चलने में
एक आसान है
दूसरा कठिन
मगर चुनना तो है ही
किसी एक को
वक़्त के इस कत्लखाने में
खुद का अस्तित्व
कायम रखने के लिए।

-यश ©
28/06/2018

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