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05 July 2018

ऑफर,रिटर्न और एक्सचेंज .........

जिंदगी के
खुशनुमा पलों पर
अगर  चल रहा होता ऑफर
एक के साथ एक
या दो फ्री का
तो कितना अच्छा होता
थोड़ी देर को ही सही
हर कोई
कितना सच्चा होता।
या ऐसा होता
कि
लौटा सकते हम
अपने
अनचाहे पलों को
और बदले मे पा सकते
अपने बीते बचपन
और कभी के
बिछुड़े
अपनों को
हर रात देखे
हसीन सपनों को।
लेकिन ....
ज़िंदगी
कोई सुपर मार्केट नहीं
जहाँ
चलती है
हमारी खुद की मर्ज़ी
चीजों को
चुनने,आज़माने
और बदले जाने की। 
ज़िंदगी तो
असल में
स्याह-सफ़ेद परतों की
एक विचित्र
कविता
या कहानी है
खुद ही पढ़ते-झेलते
और
कहते जाने की;
इसमें
संभव नहीं पाना
कोई भी ऑफर
रिटर्न या एक्सचेंज
बस
एक गुंजाइश है
साँसों के चलते
या थमते जाने की ।

-यश©
05/07/2018

02 July 2018

काश! कि न होती ये बारिश

काश!
कि न होती ये बारिश
तो
न मन यूं भीगता
न भीतर ही भीतर
चीखता
मुक्ति पाने को
काले बादलों की तरह
उमड़ते
अनचाहे शब्दों से ।
हाँ !
अनचाहे शब्द
जो तितर-बितर
हो कर
न जाने
किस तरह जुड़ कर 
असपष्ट सा आकार लेते हैं
न जाने क्या समझते हैं
न जाने क्या समझाते हैं।
काश!
कि न होती ये बारिश
तो न जमती
द्वेष और हीनता की
काई और कीचड़
टूटे दिल के
उस एक कोने में
जो लाख समझाने पर भी
मानता नहीं
कि हकीकत
कहीं हटकर होती है
कल्पना से।
काश!
कि न होती ये बारिश
और बना रहता
अस्तित्व
जेठ की तपती दोपहरों का
तो सुकुं मिलता मुझको
सिर्फ यह सोचकर
कि
इस कदर
जलने वाला
अकेला मैं ही नहीं
और भी हैं।

-यश ©
02/07/2018



28 June 2018

वक़्त के कत्लखाने में -13

यूं ही
समय के
इस खालीपन में
खुद से
बातें करता हुआ
अतीत के झरोखों से
अपने
आज को देखता हुआ
कभी-कभी सोचता हूँ
क्या रखा है
धारा के साथ बहने में
या
धारा के विपरीत चलने में
एक आसान है
दूसरा कठिन
मगर चुनना तो है ही
किसी एक को
वक़्त के इस कत्लखाने में
खुद का अस्तित्व
कायम रखने के लिए।

-यश ©
28/06/2018

21 June 2018

ज़िंदगी धोखेबाज है

क्या पता कल था किसका
और किसका यह आज है
ज़िंदगी धोखेबाज है।

कल लिखे थे गीत सुनहरे
कल क्या लिखा जाएगा।

कोई कहेगा कर्कश स्वर में
कोई सुर में गाएगा।

यूं ही अकेले बैठे-ठाले
समय की स्याह कहानी के

टूटे-फूटे हर्फों के ये
पन्ने कौन समझ पाएगा।

ना-मालूम इन राहों पर अब
कैसे चलना आएगा।

थमना जिसने कभी न सीखा
बैठ कहीं सुस्ताएगा।

मिटेगा कोई राम भरोसे
कोई अमर हो जाएगा।

आना-जाना लगा ही रहेगा
सांस तो सिर्फ परवाज़ है
ज़िंदगी धोखेबाज है।


-यश ©
17 जून/2018


15 May 2018

सुनो ताज !


ताज!
सुना है तुम अब वैसे नहीं रहे
जैसा मैं देखा करता था
हाथीघाट* के सहारे चलते हुए
यमुना के उस पार!
तुम
सूरज की तेज रोशनी में
अलग ही चमका करते थे
तुम रात के चटख अंधेरे में भी
चाँदनी की बाट जोहते
दिखा करते थे।
ताज !
सुना है
अब तुम पर
काई की परतें जमने लगी हैं
कालिख से
तुम्हारी दोस्ती
अब कुछ ज़्यादा बढ़ने ही लगी है
क्यों ?
आखिर क्यों ?
क्या यूँ
सदियों से खड़े रह कर
यमुना को
नदी से
नाले में बदलते देख कर
उसकी नीली लहरों को
काली स्याह होते देखकर
अब डोलने लगा है
तुम्हारा आत्मविश्वास ?
या
होने लगा है
तुम्हारे संगमरमरी हुस्न पर
बढ़ती उम्र का असर ?
जो भी हो
तुमको होना ही होगा
बे-रहम
हर उस धुएँ
और गुबार पर
जो अपने आगोश में लेकर
तुमको
बिसरा देना चाहता है
अमर प्रेम के नक्शे से ।
तुमको
खुदका ही हकीम बनकर
करनी होगी
खुद की दवा
क्योंकि
कल हो
या आज
तुम्हीं रहोगे सरताज
बेहिसाब युगलों के
धड़कते दिलों में।

-यश©
11/05/2018
08:57 PM
--------------
15/05/2018
06:58 PM
*हाथीघाट -आगरा शहर में यमुना किनारे की एक जगह जहाँ 2 हाथियों की प्राचीन मूर्तियाँ लगी हैं।


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