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27 December 2010

बदलता ज़माना

वैसे तो यह कविता इस ब्लॉग पर पहले भी प्रकाशित कर चुका हूँ;एक बार फिर से आपकी सेवा में प्रस्तुत है-

फ़िल्मी डांस डिस्को क्लबों में नाच गाना है,
शराब और कवाब का रिश्ता पुराना है
इसी रिश्ते को और मज़बूत बनाना है
भारतीय नहीं हमें तो इंडियन कहलाना है॥

रोटी साग सब्जी दाल चावल नहीं भाता हमें
पूरी और परांठे का गुज़रा ज़माना है
चाउमीन चिकन डोसा इडली और पेटीज बर्गर
यही नए ज़माने का हाईटेक खाना है॥

शास्त्रीय राग छोड़ रॉक पॉप गाइए
कान फोडू संगीत पर ठुमका लगाना है
आशा,रफ़ी,लता,मुकेश,किशोर भूल जाइये
सुरैय्या के सुरों का न पता न ठिकाना है॥

नमस्कार,आदाब,सतश्री अकाल अब कहना नहीं
हेल्लो,हाय गुड बाय कहता ज़माना है
सीता राम,राधा कृष्ण ,प्रभु नाम लेना नहीं
घर-घर में अमिताभ-सचिन का पोस्टर सजाना है॥

दुखी हैं दूसरे के सुख से ,अपने सुख से सुखी न कोई
दौलत के अंधों ने सच्चाई को नहीं जाना है
करेंगे करम खोटे ,रोना पछताना फिर
'यशवन्त यश '  कहता फिरे ज़ालिम ज़माना है॥


25 December 2010

सेंटा क्लॉज़!

सेंटा क्लॉज़!
मुझे यकीन है
तुम आओगे
खुशियों से भरी
अपनी झोली ले कर

मैं जानता हूँ
तुम मेरे पास भी आओगे
हाथ मिलाओगे
मुस्कुराओगे
अपनी बर्फ सी  सफ़ेद दाढी पर
हाथ फिराकर
मुझे भी पकड़ा दोगे
थोड़ी सी खुशियाँ
मगर आज मैं तुम से कहना चाहता हूँ
कुछ
जो सोच कर रखा है मन में
बस इसे प्रार्थना कहो या जो कहो
पर अलविदा कहने से पहले
एक नज़र डाल लेना
तुम्हारी राह में पड़ने वाले
अनगिनत चौराहों पर
जिनके किनारे
रहते हैं वो नन्हे से नंगे मासूम
जो ठिठुर रहे हैं
माँ के आँचल में छुप कर
जाते जाते
एक मुस्कराहट उन्हें दे जाना
दे देना वो ख़ुशी वो हँसी
वो जिसके हकदार हैं
मुझे कर्ज़दार समझ लेना अपना
अगर एक काम और करो तो
पेट में मार दी जाने वाली
सब नारियों को अगर जिला सको तो

सेंटा क्लोज़ !
तुम अगर ये कर सके तो
यही ख़ुशी होगी मेरी
मैं तुम्हारी झोली में बार बार  झाँक रहा हूँ
आज बस यही उपहार मांग रहा हूँ.


 (सभी पाठकों और शुभचिंतकों को क्रिसमस की शुभ कामनाएं.) 

19 December 2010

तस्वीरें

कुछ जानी सी
पहचानी सी
कुछ रंगीन
कुछ श्वेत श्याम
कुछ दीवारों पर
अखबारों पर
बोलती सी
कुछ शांत सी
ये तस्वीरें
अगर न होती तो?

शायद कुछ अधूरे से होते हम
शायद न होती कल्पना
न कविता न कहानी होती
न स्वप्न होते
न कुछ कहते
न सुनते
पता नहीं
क्या होता कैसा होता
इन तस्वीरों के बिना

है सौभाग्य!
इन तस्वीरों के साथ
हम जीते हैं
महसूस करते हैं
भावों को
आभावों को
किसी के गम को
किसी की ख़ुशी को

ये तस्वीरें !

ये तस्वीरें!!

किसी की तकदीर बन जाती हैं
रंक को राजा
राजा को रंक बना देती हैं
ये तस्वीरें
मुर्दों को भी जिला देती हैं
पत्थरों को पिघला देती हैं
कभी सिहरा देती हैं
कभी जमा देती हैं

अपनी असीम ऊर्जा से!

ऊष्मा से!

शीतलता से!

17 December 2010

आवाज़

[फोटो साभार:गूगल इमेज सर्च ]
आधी रात के सन्नाटे में 
घड़ी की टिकटिक और 
सुबह सुबह                                                  
गूंजती मुर्गे की बांग 
आसमां से बाते करती 
चिड़ियों की उड़ान 
कानों से लगती 
सर्द हवा की ठिठुरन 
कंपन करता शरीर और 
दाँतों का किटकिटाना
बगल की लाइन से गुज़रती
रेलों का आना जाना 
सर के ऊपर से जाते
जहाज़ को एकटक निहारना
तिराहों चौराहों पर 
धूंआँ फेकते वाहनों की चिल्लपों
और उनमे  बजता 
एफ एम का सुरीला गाना
कहीं टीवी पर सास बहू सीरियल  
कहीं के बी सी 
कहीं एक्सक्लूसिव न्यूज़ का आना
सड़क पर लगती झाड़ू की सर सर 
किसी का चीखना
किसी का चिल्लाना 
गली के कुत्तों का देखते ही गुर्राना
किसी नन्हे से बच्चे की 
मोहक सी मुस्कान 
और अचानक से उसका खिलखिलाना
पार्क में बने मंदिर से आती 
 घंटों की आवाज़ 
 पीछे की मस्जिद से  
गूंजती  अजान 
सबका अपना अपना बखान 
आपस में बतियाते जाते 
विद्यार्थी
हाथों में  हाथ डाले युगल 
छिड़ी है सबकी तान 
कुछ मीठी 
कुछ तीखी
कुछ मन को भाने वाली 
कुछ दिल को जलाने वाली 

आवाज़ !!!!!

बहुत अजीब होती है :)

15 December 2010

परछाई

(Photo Curtsy:Google Image Search)


जब कभी बोझिल सा
महसूस करता हूँ खुद को
देखता हूँ ज़मीं पर
पड़ने वाली परछाई को
दो कदम चलता हूँ
कुछ आगे
कुछ पीछे
ये परछाई
मेरे साथ ही रहती है
मैं बातें करता हूँ
अपनी ही परछाई से
जो मन में आता है
कह देता हूँ  
कभी कुछ अच्छा
कभी कुछ बुरा
जीवन की ऊंची नीची
राहों पर
सच्चे दोस्त की तरह
ये परछाई 
मेरे साथ रहती है
हर सुख में
हर दुःख में
 उन अपनों से बेहतर है
जो साथ छोड़ देते हैं
उगल देते हैं
एक दूसरे के दबे छुपे राज़
ये परछाई
सबसे अच्छी
साथी है  
सबके साथ देती है. 
जीवन के अंत तक

14 December 2010

वो

वो जिनके नाम कर रखी हैं
हमने अपनी साँसें
आज रूठ कर चले गए हैं
न जाने कहाँ
आवाज़
यूँ तो हम उनको
बहुत देर से दे रहे हैं
समझ कर बेवफा वो
रो रहे हैं
है मालूम उन्हें भी  कि
असल मोहब्बत तो वही हैं
फिर भी चाहते हैं
इज़हार हम ही करें
बेचैन  दिल है
और शायद दिमाग भी है
शायद हम ही अब अपनी
वफ़ा खो रहे हैं

12 December 2010

वंशिका की कुछ ड्राइंग्स-कृपया अपना आशीर्वाद दीजिये

लखनऊ में रहने वाली नन्ही सी वंशिका माथुर  मेरी चचेरी बहन हैं जो अभी कक्षा-4 में पढ़ती हैं.पढ़ाई के अलावा पेंटिंग इनका शौक है और खेलकूद में इन्हें सिर्फ सांप-सीढी खेलना पसंद है.मेरा तो मन था कि इनकी फोटो भी लगाता लेकिन अभी उपलब्ध नहीं है.
आप भी देखिये इनकी कुछ ड्राइंग्स और अपना आशीर्वाद भी दीजिये.

(हैप्पी क्रिसमस )

(कितनी सुन्दर है ये धरती )

(ये सब भगवान ने बनाया  है )

(इन्द्रधनुष अम्बर में छाया,बच्चों के मन को भाया )

(यूनिकॉर्न)

(तितली बनकर उड़ उड़ जाऊं )

  Children are my weakness!

10 December 2010

डूबता सूरज

(मोबाइल फोटो:घर की छत से )

 (१)
 
अक्सर जब देखता हूँ
डूबते हुए सूरज को
सोचता हूँ
काश
ये न डूबता
ये यूँ ही रहता
धरती के इसी तरफ
मेरी नज़रों के सामने
काश कि 
रात का घना अँधेरा न होता
काश कि वक़्त ठहरा होता
मगर नहीं
सूरज को डूबना ही है
कहीं और प्रकाश देना ही है
ये चक्र चलना ही है

(२)
 
ये डूबता हुआ सूरज
अँधेरे की निशानी
छोड़ देता है
एक मौका देता है
कुछ सोचने का
कुछ समझने का
ये विश्राम नहीं 
चलना ही है
विचारों का घुमड़ना ही है

(३)

ये डूबता सूरज
बादलों की ओट में
लुक छिपकर
एहसास कराता है
कुछ पाने का
कुछ खोने का

(४)

ये डूबता सूरज
बिछुड़ने का दर्द देता है
लोग देखते हैं
और खुश होते हैं
नज़रों से ओझल होते
डूबते सूरज को देख कर
और फिर सलाम करते हैं
अगली सुबह
उगने वाले नए
सूरज को देख कर

न जाने मुझे क्यों ऐसा लगता है
डूबता हुआ सूरज बहुत अच्छा लगता है

08 December 2010

फिर न वापस आऊंगा.

जी लेने दो
दो पल सुकून के
फिर मैं चला जाऊँगा
तुम ताकोगे राह मेरी
फिर न वापिस आऊंगा

मैं भटकुंगा
तंग गलियों में
दुनिया के शोर शराबे में
मैं चीखूंगा
चिल्लाऊंगा
पर कहीं नज़र न आऊंगा

इस कोलाहल से
गुज़र  कर
पूर्व सुनिश्चित सा
ठिठक कर
थाम लूँगा तन्हाई का हाथ
फिर आगे बढ़ता जाऊँगा

बस कुछ ही क्षण
मैं पास  तुम्हारे
दो पल का सुख लेने दो
अंतहीन सफ़र की है शुरुआत
हाथ थाम
मुझे चूम लेने  दो

ताजी हवा के
इस झोंके में
देखो अब मिल जाऊँगा
तुम ताकोगे राह मेरी
फिर न वापस  आऊंगा.

06 December 2010

विविधता में एकता

दिन भर
घर के बाहर की सड़क पर
खूब कोलाहल रहता है
और सांझ ढलते
सड़क के दोनों किनारों पर
लग जाता है मेला
सज जाती हैं दुकानें
चाट के ठेलों की
और कहीं
पटरी पर
पुराने गरम और सूती कपड़ों
की दुकानें
५० रुपये की शर्ट खरीदने को
जुटी हुई भीड़
कहीं कारों से उतरती हुईं
मेम
जो उस पार खड़े ठेले से
खरीद रही हैं
ताज़ी हरी सब्जियां
और उनके साथ वो छोटे बच्चे
अपनी मॉम से 
मचल रहे हैं
बैलून खरीदने  को
और मेरे  बगल में रहने  वाला
नन्हा छोटू
झगड़ रहा है
उस गुब्बारे के लिए
अपने बाबा के साथ 

मैं महसूस करता हूँ
विविधता में एकता को
अँधेरे के गहराने के साथ
सड़क का ये कोलाहल
शांत होने पर
घरों पर 
तेज आवाज़ में चिल्लाते
टीवी के थमने पर  
आखिर सब सो ही तो जाते हैं
कुछ मखमली गद्दों में
और कुछ
आसमां की छत के  नीचे
एक नयी सुबह की आस बांधे

सोना और जगना-
इसमें कोई भेद नहीं है
अमीर गरीब का
जाति औ धर्म का

बस तरीके अलग हैं
सोने और जागने के
कुछ सोते हुए जागते हैं
और कुछ
जागते हुए सोते हैं

आखिर कहीं तो है एकता

विविधता में एकता ! 

04 December 2010

ज़िन्दगी

हंसाती कम, रूलाती ज्यादा है ज़िन्दगी
टूटे कांच के ढेर पर, ठौर सजाती है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी हसीं किताब है, जिसके हर हर्फ़ में शिकवे हैं
पल भर में अर्श को,सिफर बना देती  है जिंदगी

क्या कहूँ कि इतना नादाँ भी नहीं हूँ मैं
समझा यही फलसफा कि बेवफा है ज़िन्दगी.





(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

02 December 2010

फरीदा

फरीदा !
हाँ यही नाम है उसका
मैली सी फ्रॉक पहने
और एक हल्का सा स्वेटर
डाले
वो आती है रोज़ सवेरे
मेरे घर पर
घंटी बजा कर
हम सब को जगाती है
और सारा कूड़ा लेकर
मुस्कुराते हुए
डाल देती है
अपने ठेले पर


और मैं
देखता रह जाता हूँ
कभी उसको
और कभी
सामने की सड़क पर
आते जाते उसके हम उम्र
बच्चों को
जो बन ठन कर
चलते  जाते हैं
विद्या के मंदिर की ओर

और वो भी
एक नज़र डालती है उन पर
और चली जाती है
अगले घर पर दस्तक देने

रोज़ की तरह
हर सुबह सवेरे
छोड़  जाती है
एक प्रश्न चिह्न
?



(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

01 December 2010

सिगरेट! अगर तू न होती

(1)
(चित्र साभार:गूगल इमेज सर्च)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो बच जाता मैं भी
बगल वाले नेता जी के
मुहं से निकलने वाले
अजीब से
धुंए से
जो मुश्किल कर देता है
जाड़े की गुनगुनी धूप में
दो पल का मेरा बैठना

(२)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो कितने ही
कैंसर न पनपते
झोपड़ियों और महलों में
रहने वाले
न रोते,न कलपते

पर तू है!
और तेरा आस्तित्व भी है
कहीं दो कहीं पचास और सौ रुपये में
तू छीन लेती है ईमान
नए किशोरों का
जो भटक जाते हैं
तेरे छलावे में

काश! के कुछ होठों पे
नयी मुस्कान होती
सिगरेट! अगर तू न होती

30 November 2010

तरस जाता हूँ

कभी
हरे भरे ऊंचे पेड़
कुछ आम के
कुछ  नीम के
कुछ बरगद और
गुलमोहर के
दिखाई देते थे
घर की छत से

(फोटो:साभार गूगल)

 सड़क पर चलते हुए
 कहीं से आते हुए
कहीं को जाते हुए
कभी गरमी की
तपती धूप में
कभी तेज बरसते पानी में
या कभी
यूँ ही थक कर
कुछ देर को मैं
छाँव में बैठ जाता था

पर अब
बढती विलासिताओं ने
महत्वाकांक्षाओं ने
कंक्रीट की दीवारों ने
कर लिया है
इन पेड़ों का शिकार

(मोबाइल फोटो:मेरे घर की छत से)

ये अब दिखाई नहीं देते
घर की छत से
और न ही
किसी सड़क के किनारे
अब इन्हें पाता हूँ

दो पल के सुकून को
मैं तरस जाता हूँ.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

28 November 2010

खिल उठें ये कलियाँ

(1)


रोज़ सुबह
मैं देखता हूँ
इन अनखिली कलियों को
पीठ पर
आशाओं का बोझा लादे
चलती जाती हैं
जो
एक फूल बनने का
अनोखा
सपना लेकर

(2)


मैं भी चाहता हूँ
जल्दी से
ये कलियाँ खिल उठें
और मैं
महसूस कर सकूं
नए फूलों की
ताज़ी खुशबू को

उस खुशबू को
जो हर दिशा में फ़ैल कर
करवा दे
अपने होने का
एहसास

ताकि फिर खिल सकें
कुछ और
नयी कलियाँ.






(Photos:Google Image Search)                     (मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

26 November 2010

ज़रा याद कर लो...


(चित्र:साभार गूगल)


याद कर लो भले ही 
जाने और पहचानों को
पर जिनका कोई नाम नहीं
ज़रा याद करो अनजानों को 


मिट गए ज़ख्म,मिट गए निशाँ 
पर दर्द अब भी बाकी है
आओ चल कर देखलो 
सूनी कलाई और मांगों को


हम जहाँ थे हम वहीं हैं 
हम क्या होंगे पता नहीं
करने वाले करते तो हैं
न निभने वाले  वादों को


दो पल मेरा मौन समर्पित 
कुछ जानों को,अनजानों को
मुम्बई के बलिदानों को! 
देश पर मिटने वालों को!


जय हिंद! 


(मुम्बई हमले के शहीदों को मेरा नमन और श्रद्धांजली)




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

25 November 2010

हवा


(चित्र:साभार गूगल इमेज सर्च)


कभी लू का थपेड़ा बन कर
बदन पर चुभती है हवा
कभी सर्द लहर के आगोश में
सर सर थर थराती है हवा

आंधी कभी तूफ़ान
कभी चक्रवात बन जाती है
चिनगारी भी कभी
शोलों सी धधक जाती है

रूमानियत में मीठा सा
एहसास  बन जाती है
तन्हाइयों में भूली हुई
याद बन जाती है

जाते  हुओं को अपनी
अहमियत बताती है हवा
आते हुओं में नयी 
 आस बन जाती है हवा

कभी गम के मारों को
जी भर रूलाती है हवा
खुशबू बन कर फिजा में
कभी छा जाती है हवा.




(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

24 November 2010

ये भी जीवन है

एक तरफ
ऊनी लबादे ओढ़ कर
सर से पैर तक ढके हुए
कृत्रिम गर्मी लेकर
मोटरों में चलने वाले लोग
गलन की ठण्ड का भी
जिन पर
कोई असर दीखता नहीं है

और एक तरफ
वो मासूम
चिथड़ों में लिपटे हुए
थर थर कांपते हुए
नियति का दंश झेलते हुए
जुटे हुए हैं
कूड़े के ढेरों पर
दो वक़्त की
रोटी की तलाश में.

ये भी जीवन है

सच्चाई है
उन्नति के शिखर पर बैठे
मेरे देश की
जिसकी आत्मा बसती है
अशिक्षा और गरीबी में.

23 November 2010

मैं मुस्कुरा रहा हूँ

अच्छा या बुरा जो चाहे वो समझ लो मुझ को,
जो मेरा मन कहे वो करता आ रहा हूँ,
कितने भी तीर चुभो दो भले ही,
मैं मुस्कुरा रहा हूँ


तुमने सोचा होगा,
तुम्हारी कृत्रिम अदाओं का,
कुछ तो असर होगा मगर,
मैं भी मैं ही हूँ, मैं चलता जा रहा हूँ
बे परवाह तुमसे, मैं मुस्कुरा रहा हूँ


मेरी खामोशी को,
न समझ लेना स्वीकृति,
मौन रख कर भी मैं,
कुछ कुछ कहता जा रहा हूँ,
है नहीं कोई भाव - मैं मुस्कुरा रहा हूँ

मैं मुस्कुरा रहा हूँ-
कि मुस्कुराना फितरत है मेरी,
खुद की नज़रों में पल पल,
मैं चढ़ता जा रहा हूँ

मैं मुस्कुरा रहा हूँ

22 November 2010

नए दौर की ओर

शुरू हो गया
फिर एक नया दौर
कुछ आशाओं का
महत्वाकांक्षाओं का
कुछ पाने का
कुछ खोने का
नीचे गिरने का
उठ कर संभलने  का
उसी राह पर
एक नयी चाल चलने का

ये नया दौर
क्या गुल खिलायेगा
कितने सपने
सच कर दिखाएगा
दिल के बुझे चरागों को
क्या नयी रोशनी दिखाएगा

नहीं पता.

नहीं पता -
क्या होगा
क्या नहीं
वक़्त की कठपुतली बना
मैं चला जा रहा हूँ
एक नए दौर की ओर

नए दौर की ओर
जहाँ
पिछले दौर की तरह
चलता रह कर
फिर से इंतज़ार करूँगा
एक और
नए दौर का.





20 November 2010

वाह क्या बात है


(फोटो साभार:गूगल इमेज सर्च)
है मुझमें वो हिम्मत किसी पर भी गुर्रा सकता हूँ
इंसानी शिशुओं को
क्षण भर में थर्रा सकता हूँ


मंत्री, संतरी हो या नेता,कोई फ़कीर
चिथड़ों में कोई लिपटा हो या हो साहब कोई अमीर
सब पर चला सकता हूँ मैं
अबूझ जुबानी तीर

मत कहना मुझे 'कुत्ता'-
ये मेरा अपमान है
मेरा भी है अपना बिस्तर और बैड रूम  
क्योंकि मालिक मेहरबान है
वो मुझ पर कुर्बान है

आवारा गलियों में भटकूँ
पागल बन काटूँ,तो भी मैं ख़ास हूँ
मैं संगमरमरी महलों की
संपन्नता का एहसास हूँ

तुम इन्सान हो !
अरे बता दो ! तुम्हारी क्या बिसात है ?
मैं टॉमी,हैरी,टफी,जैकी या शेरू किसी का 
मेरी भी एक हैसियत 
मेरी भी औकात है 

वाह क्या बात है  




विशेष :-कल के 'हिन्दुस्तान' में "कुत्ते भी अब लगायेंगे डियोड्रेंट" शीर्षक समाचार पढ़ कर यही  विचार मन में आये.

18 November 2010

हमें चाहत ही क्या है (Post No.-100)

(फोटो: साभार गूगल इमेज सर्च )

कोई परवाह नहीं
तुम्हारी कुटिल मुस्कान की
मैं जानता हूँ कि
इसका राज़ क्या है

मेरी छटपटाहट में
तुम्हारी ये खुशी
मैं जान न सका कि
तुम्हारी पहचान क्या है

खता मेरी ही थी
तुम से  दिल लगाने की
मेरी वफ़ा की अब तुझ को
कोई परवाह क्या है

तुम जी लेना खुशी से
खुदपरस्ती  के साये में
तेरे सिवा अब भी
हमें चाहत ही क्या है



17 November 2010

नहीं मिले वो पल


वो पल
जिनमें सुकून होता है
संतुष्टि होती है
जो दिखाते हैं 
आइना 
कुछ पाने का 
जिन से मिलती है प्रेरणा 
कुछ कर गुजरने की 
नहीं मिले 
अब तक -
क्योंकि 
संघर्षों के साथ 
कभी 
चलना है
कभी दौड़ना है  
गिरना है 
संभलना है 
सब कुछ झेलना है
यूँ ही
शायद   
एक अंतहीन समय तक!

16 November 2010

एक प्रश्न ......

क्या यही है हमारी  आधुनिक और रोजगार परक शिक्षा ?

साभार 'हिन्दुस्तान'-लखनऊ-16/11/2010 



आज बस इतना ही...

15 November 2010

ये तो होना ही था

(मोबाइल फोटो)

जो फसल 
लहलहाती थी-
कभी शान से 
स्टाइल में 
लहराती भी थी-
जिसका अपना 
एक रुतबा 
कभी हुआ करता था
जिसे 
शैम्पू और तेल के 
पानी और खाद से 
सींचा करता था 
वो फसल
अब 
गुज़र रही है 
स्थाई पतझड़  के दौर से 
गिन रही है
अपनी अंतिम सासें 
वो मुझ से 
जुदा होने को है

और मुझे 
कोई गम नहीं है 
इस जुदाई का 
क्योंकि 
आज नहीं तो कल 
अंततः 
ये तो होना ही था.

14 November 2010

क्या कहें

(चित्र साभार:गूगल)


 कहने को यूँ तो
बहुत सी बातें हैं मगर
क्या कहें और किस से कहें
कब कहें,कैसे कहें
उठते हैं बहुत से प्रश्न
मन के कोने में
और फिर वही उदासी
छा जाती है
क्योंकि
हर तरफ नज़र आते हैं
वास्तविक से लगने वाले 
वही
आभासी चित्र 
जो खुद भटक रहे हैं 
अपने चरित्र की तलाश में.

13 November 2010

वक़्त का पहिया

(चित्र साभार:गूगल इमेज सर्च)



बड़ा अजीब होता है
ये वक़्त का पहिया
हर दम चलता रहता है
बिना रुके
साँसों के संग

क्या क्या देखता है
क्या क्या दिखाता है
जीवन के अनगिनत
कुछ सदृश
कुछ
अदृश्य रंग.

कभी खेलता है
खुशियों की होली
कभी गम की बारिश में
भीगता है
भिगाता है

बिना रुके हरदम
वक़्त का पहिया
चलता  जाता है.





(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

12 November 2010

फिर वही बात होगी

(चित्र :साभार गूगल )


 फिर वही सुबह
दोपहर,शाम
और रात होगी
घूम फिर कर
फिर  वही
बात होगी

होंगे वही किस्से
कहानियां और कविताएँ
अखबारों,चैनलों में
वही ख़बरें आम होंगी
जो सुनते आ रहे हैं हम
न जाने कब से .

बस होगा तो सिर्फ
नया अंदाज़ ए बयां  होगा
पुरानी नींव पर खड़ा
नया सा ताज होगा

चाहें भले ही भूलना 
मुमताज़ की कहानी को
झांसी की रानी को
मगर
शायद दिल में अब भी
कुछ आस होगी
नयी चाशनी में
पुरानी मिठास होगी.

ये तो वक़्त का पहिया है
घूमता ही रहेगा
चला था जहां से
फिर वहीं पे मिलेगा 

हर अंत से एक
नयी शुरुआत होगी 
घूम फिर कर
फिर वही
 बात होगी.






(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

10 November 2010

ज़िन्दगी

(फोटो:गूगल से साभार )

 ज़िन्दगी
कुछ लोगों के लिए
हसीं किताब होती है
और कुछ लोग
पलटते रहते हैं
काले स्याह पन्नों को
क्योंकि 
सच की कालिख 
कभी मिटती नहीं है.



07 November 2010

धन्यवाद !

जब दीपों से जगमग
हो रहा था अपना घर -आँगन
जब आतिशबाजी से गूँज रहा था
क्या धरती और क्या गगन

जब मुस्कराहट थी हमारे चेहरों पर
उल्लास द्विगुणित तन मन में
द्वारे द्वारे दीप  जले जब
लक्ष्मी पूजन ,अर्चन, वंदन में

तब कोई था जो डटा  हुआ था
घर से बहुत दूर खड़ा हुआ था
सीना ताने अड़ा हुआ था
सीमा पर वो बिछा हुआ था

ओ! भारत के वीर सिपाही
धन्यवाद और तुम को नमन
और कुछ मैं कर नहीं सकता
बस स्वीकार करो ये  अभिनन्दन!


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

03 November 2010

कैसी दीवाली मनाएंगे?

(Image curtsy-Google)

एक तरफ भूखे नंगे
जो चुन चुन अन्न खाएंगे
कूड़े के ढेरो पे बच्चे
अपना भविष्य बनाएँगे

कैसी दीवाली मनाएँगे?

फुटपाथों पे कटती रातें
सहते शीत औ गरमी को
जूठन भी मुश्किल से मिलती
तरसते तन भी ढकने को

ये कैसी समृद्धि हाय!
आज बता दो तुम लक्ष्मी माता
जन गण मन अधिनायक भारत
क्या यही विश्व में विजय पताका?

कब मुस्काएंगे  वो चेहरे
कब हिल मिल खुशी मनाएँगे
झोपड़ियों में जब दिए जलेंगे
नूतन गाथा गाएंगे

कैसी दीवाली मनाएंगे?








अर्श की ओर ले चलो

मैं फर्श पर हूँ
अर्श की ओर ले चलो
संघर्ष कर रहा हूँ
उत्कर्ष  की ओर ले चलो

हो चुका पतन मेरा
अविरल जल रहा हूँ
रहा न अनुराग किसी से
विद्वेष कर रहा हूँ

यह क्यों और कैसे
या स्वाभाविक है
नहीं पता
आस्तित्व खो चुका
चौराहे पर हूँ खड़ा

कोई हाथ थाम मेरा
मुकाम पर ले चलो
मैं फर्श पर हूँ
मुझे अर्श की ओर ले चलो.

30 October 2010

हम तो हैं मुसाफिर....

हम तो हैं मुसाफिर अनजानी राहों के,
ख्वाब देख रहे हैं और चलते जा रहे हैं
पीछे क्या छूटा उसे भूल गए
जो आएगा आगे उसकी परवाह नहीं
होगा जो भी अच्छा तो क़ुबूल कर लेंगे
बुरा जो भी होगा तो झेल लेंगे
कहते तो सदियों से ये लोग आ रहे हैं
कागज़ की कश्ती पे चलते जा रहे हैं
मझधार में आकर तो सिर्फ
साहिल  की चाह में
हिचकोले खाती ज़िन्दगी
सिहरन और आह में
बे मुकम्मल है सब कुछ कि
क्या कहें क्या नहीं 
चौराहे पे खड़े हैं और सोचे जा रहे हैं
किस राह चलें कि ज़िन्दगी
हसीं लगने लगे
हम तो हैं मुसाफिर अनजानी राहों के
ख्वाब देख रहे हैं और बस चलते ही जा रहे हैं








(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

26 October 2010

वो चिड़िया अब नहीं चहकेगी.......

वो नाज़ुक सी कली
वो नन्हीं सी परी
जो हर पल मुस्कुराती थी
माँ के आँचल में
बाबुल के आँगन में
वो चिड़िया
अब नहीं चहकेगी
क्योंकि .......?????

23 October 2010

चलते चलना है.....

(फोटो साभार:गूगल)


ये जीवन है
चलते चलना है
हर राह पर
हर मोड़ पर
ढेरों ढलानों
पर फिसलते हुए
चढ़ाइयों पर चढ़ते हुए
हवा के रुख की तरफ कभी
कभी हवा को धकेलते हुए
बस चलना है
चलते चलना है.......
बहते आंसुओं को पीते हुए
हँसते हुए
दौड़ते हुए
काँटों पर चलते हुए
आग उगलती ज़मीं पर चल कर
कभी यूँ ही ठिठुरते हुए
मीलों दूर
चलना है
चलते चलना है
ठोकरें खानी है
उठना है
संभलना है
नहीं तनिक विश्राम इस पर 
ये जंग ए  ज़िन्दगी की राह है
चलना है
बस चलते चलना है
निरंतर....


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

20 October 2010

तुम्हारी तलाश में.

देख चुका हूँ
हर कहीं
तुम को
ढूंढ चुका हूँ
हर जगह-
पर तुम
कहीं नहीं हो
तो कहाँ हो तुम?
क्यों ये अक्स
तुमने छोड़ रखा
मानस पर
क्यों ये राग तुमने
छेड़ रखा
जीवन साज पर
ये कैसा आकर्षण
तुम्हारे प्रति
ये कैसा चिंतन
तुम्हारे प्रति
प्रति क्षण
तुम्हारे सामीप्य की आस में
भटक रहा हूँ
तुम्हारी तलाश में.


17 October 2010

मैं दीया हूँ.

Photo Curtsy:Google Images

जलता हूँ
रोशनी देता हूँ
दुनिया को
सब कुछ सहता हूँ मैं
मगर
विचलित नहीं होता हूँ
जलता रहता  हूँ
निरंतर
अंतिम सांस तक
मैं दीया हूँ
सब कुछ देता हूँ
सब को
मगर मुझे क्या मिलता है
मन में अंधेरी तन्हाई के सिवा
बाती पे ज़ख्मों के सिवा
और फिर रुसवाई के सिवा
लौ के बुझ जाने के बाद
साँसों के उखड जाने के बाद
मेरी यादें रह जाती हैं
मैं वर्तमान से भूत बन जाता हूँ
किसी कविता या कहानी में छप जाता हूँ
यही है मेरा जीवन
मैं दीया हूँ.


[इस कविता को आप सुन भी सकते हैं मेरी आवाज़ में..]






(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

14 October 2010

बचपन की यादें

हम भी कभी बच्चे थे
हँसते थे मुस्काते थे                                         
कभी लड़ते झगड़ते थे तो
कभी एक हो जाते थे

हाथी घोड़े भालू बन्दर
छुक छुक गाड़ी में बैठे अन्दर
सुन्दर गीत गाते थे

भेदभाव सब भूल हम
मिलजुल खाना खाते थे
एक दूसरे को गले लगा कर
मिल कर गाना गाते थे

वैसे दिन अब कहाँ
वैसी खुशी अब कहाँ
बस्ते में दब रहा है बचपन
वैसा सुकून अब कहाँ

वो बचपन की मीठी यादें
अब भी मन में आती हैं
ख्वाबों में सब सच हो जातीं
सुबह हो धुंधला जाती हैं

कभी न करते कोई बहाना
खुशी खुशी स्कूल को जाते थे
हम भी कभी बच्चे थे
हँसते थे मुस्काते थे.


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

11 October 2010

मन का सूरज


ये जो सूरज है
उगते देखता हूँ जिसे
पहाड़ों के बीच से
पेड़ों की ओट से
ऊंची अट्टालिकाओं के
किसी कोने से
खिलते देखता हूँ
इसकी पहली किरण को

मगर आज
ये सूरज
उग आया है
मेरी हथेली के बीच से
शायद यहीं कहीं छिपा बैठा था
मेरे मन मस्तिष्क में
मैं  जिस को तलाश रहा था
वो मेरे भीतर ही था

मैं भटक रहा था
और वो हंस रहा था
मेरी मूर्खता  पर

मगर आज
मैं भूल चुका हूँ
दुनिया को
और समा चुका हूँ
मैं मिल चुका हूँ
इसी सूरज की
किरणों में कहीं
मैं खो चुका हूँ

लेकिन
भूला नहीं हूँ
अपना अतीत
मैं क्या था
और
क्या हो गया हूँ




किसी अनजान के लिए......

बहारों तुमसे एक तमन्ना है मेरी
मेरे जिस्म के कतरे कतरे पर उनका नाम लिख दो
और उन से कह दो कि
मैं बहुत प्यार करता हूँ  उनको.
वो आते हैं रोज़ ख्यालों में ख़्वाबों में
चूम कर चले जाते हैं मेरे अधरों को
मैं फैलाता हूँ अपनी बाहें
उन्हें समेटने को
मगर छिटक कर कहीं दूर चले जाते हैं वो
ए बहारों ज़रा उन से कह देना ये भी एक बात
जाने क्यों इतना सताया करते हैं वो...
बस यही एक  आखिरी  तमन्ना है ओ  बहारों
जिस राह से वो गुजरें  वहीँ पे बिछ जाया करूँ मैं.


(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

10 October 2010

उड़ना चाहता हूँ

(चित्र:साभार गूगल)

उड़ना चाहता  हूँ
दूर तलक
नीले आसमां में
छूना चाहता हूँ
ऊंचाइयों को


दुनिया से बेपरवाह
अपनी ही धुन में
खामोश आसमां
को गुंजा देना चाहता हूँ
अपनी आवाजों से

मैं उड़ना चाहता हूँ
जाना चाहता हूँ
देखना चाहता हूँ
क्षितिज के उस पार की
अनोखी दुनिया को

कर देना चाहता हूँ
अपने सारे सपनों को सच
मैं
उड़ना चाहता हूँ
दूर तलक
ज़मीं पे रहते हुए





(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

08 October 2010

युव चेत गया

(व्यक्तिगत रूप से मुझे इस कविता में कुछ कमियाँ नज़र आ रही हैं;फिरभी वर्ष 2005 में लिखी गयी इस कविता को आप के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ-)  

आशा किरण हो गयी प्रकट,
युव चेत गया,युग चेतेगा
माँ भारती का,विजय शिखर  
विश्व देख रहा और देखेगा

युग-युग पूर्व का विश्व गुरु
स्वर्ण विहग बन कर चहकेगा
सृष्टि के उपवन में पुनः 
चेतना सुमन अब महकेगा

युव का नेतृत्व,युग की शक्ति
अतुल  मेधा और दिव्य दृष्टि
मुस्कुरा रही सकल प्रकृति
गुल महकेगा, युग देखेगा

युव ही है आधार युग का
युव-युगल पथ प्रदर्शक युग का
युव की असीमित ऊर्जा से
युग दमकेगा,युग देखेगा.

जागो विश्व के युवा समीर
तुम क्यों शांत?क्या कष्ट तुम्हें?
तेरे झोकों  से टकरा कर
हिम पिघलेगा,युग सिहरेगा

आशा किरण हो गयी प्रकट
युव चेत गया,युव देखेगा.



(मैं मुस्कुरा रहा हूँ..)

05 October 2010

कोई तो है

कोई तो है हाँ देखो वो देखो
वो सामने
वो कोई तो है
जो खींच रहा है
अपनी ओर मुझे
मैं देख रहा हूँ बस उसी को
सब कुछ भूल  गया हूँ
दुनिया से अलग थलग
उसके मोह पाश में
मैं मुस्कुरा रहा हूँ
और वो भी
मुस्कुरा रहा है
मुझे देख रहा है
अपनी बाहें फैलाये
मुझे बुला रहा है
और
कह रहा है  मुझ से-
आ गले लग जा!


(जो मेरे मन ने कहा.....)

04 October 2010

मधुशाला

हाय क्यों छीन लिया तुमने
मुझ से मदिरा का प्याला
जिसको पीकर  क्षणिक भूलता
दुनिया का गड़बड़ झाला
एक पल की ये रंग रेलियाँ
फिर दो पल की तन्हाई है
तन्हाई में गले लगाती
मुझ को मेरी मधुशाला

(जो मेरे मन ने कहा.....)

02 October 2010

कल फिर तुझ को भुलाएँगे........

बापू तेरे देश में
हम तेरी बातें भूल गए
तू तो छप गया नोटों पे
हम काले धन में डूब गए

बस आज करेंगे तेरी बातें
खादी पहन चलेगा चरखा
ए.सी.मोटर में आके
हम तेरे गीत गाएंगे.

कल फिर तुझ को भुलाएँगे!

.
(जो मेरे मन ने कहा.....)

30 September 2010

मैं नारी हूँ!

सुनो! ओ पाखंडी-
दुनिया वालों
ध्यान से सुनो!
चाहे जितने भी कांटे
तुम बिछालो मेरी राह में
चाहे जितने भी आंसू
तुम दे दो मुझ को
ये न समझना कि
मैं हार गयी हूँ

हाँ
कुछ पल को रूकती हूँ
ठिठकती हूँ
हंसती हूँ-
तुम्हारी सोच पर
कितने मूर्ख हो तुम
जो अब तक
मुझ को अबला समझते
आ रहे हो

वो बल
वो सामर्थ्य है मुझ में
असीमित दर्द सह कर भी
मैं
दुनिया को-
तुम को -
जन्म देती हूँ

और तुम
तुम मुझ को
मार देते हो
दुनिया में आने से पहले
शायद इसलिए
कि मैं नारी हूँ!


(जो मेरे मन ने कहा.....)

29 September 2010

नहीं चाहता पुनर्जीवन

हाँ
लगता है
सारे सपने कहीं खो गए हैं
जो देखे थे-
एक पल को लगा था
शायद सच होने वाले हैं
और मैं
आज़ाद होने वाला हूँ
एक रोशनी दिखी थी
पर ये नहीं मालूम था
कि एक बार फिर से
अँधेरे में  खो जाऊंगा
और अब
अब तो कोई तमन्ना ही नहीं है
इस सन्नाटे से
इस अँधेरे से
बाहर आने की
लक्ष्य विहीन
एक अंतहीन सोच में डूबा हुआ
मैं
मैं-अब और नहीं चाहता पुनर्जीवन
मैं अपने खोए हुए सपनों
में  कहीं खो जाना चाहता हूँ
फिर वापस न आने के लिए.

(जो मेरे मन ने कहा.....)

27 September 2010

पता नहीं

बड़ी अजीब होती है  
ये जीवन की राह
किस मोड़ पर ले जाए
पता नहीं

मैं आज जहाँ खड़ा हूँ
बड़ा अजीब मोड़ है
हर तरफ गड्ढे ही गड्ढे
क्यों कांटे बिछे हैं
पता नहीं

ये भावनाएं हैं
जो घुमड़ती हैं हर तरफ
चुभती हैं क्यों दिल में
पता नहीं

बड़ी अजीब होती है
ये जीवन की राह
कब खुशी कब गम
पता नहीं.


(जो मेरे मन ने कहा.....)

मिले सुर मेरा तुम्हारा

मिले सुर मेरा तुम्हारा!
भारत की  विविध  एकता और संस्कृति को दिखाते इस गीत को कभी बचपन में मैं दूरदर्शन पर देखा करता था.youtube पर सर्च करते करते अचानक यह वीडियो मिला तो सोचा कि क्यों न अपने ब्लॉग पर आप सब के साथ इसे साझा करूँ.

video


(जो मेरे मन ने कहा.....)

26 September 2010

शायद नहीं!

ये चाँद जो दीखता खूबसूरत है
दूर पृथ्वी से
क्या वाकई
इतना सुन्दर है
क्या चाँद का टुकड़ा
कह देने से
कोई इठला सकता है
अपनी सुन्दरता पर
या
ये एक भ्रमजाल है
छलावा है

ये कैसा आकर्षण?
क्या रूप ही
सब कुछ होता है..
क्या मीठा ही
अच्छा होता है..

शायद नहीं!

(जो मेरे मन ने कहा.....)

24 September 2010

रिश्ते

 कभी कभी दूर के भी
बहुत पास हो जाते हैं
और कभी पास के भी
बहुत दूर हो जाते हैं

जब जुड़े हों तार
दिल से दिल के तो क्या करें
कल के अनजान आज खुद की
शान  बन जाते हैं

ये रिश्ते हैं
इन्हें चाहे कोई भी नाम दे दो
बिन कहे सुने ही सब कुछ
समझ जाते हैं

बहुत कोमल होती है
ये प्यार की डोर
विश्वास अगर टूटे तो
रिश्ते भी बिखर जाते हैं

आओ बातें करें कुछ मन की
बांटे अपने कुछ सपने
रिश्ते वो सपने हैं
जो खुद ही सच हो जाते हैं

कुछ रिश्ते अपने आप बन जाते हैं.


(जो मेरे मन ने कहा....)
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