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24 April 2011

भ्रम की परतें उधड़ रही हैं

भ्रम की परतों को 
देख रहा हूँ 
एक एक कर उधड़ते हुए 

बहुत गहरे दबा हुआ 
कुचला हुआ 
सड़ा-गला सच
बेचैन है 
बाहर आने को

दूर से ही दिख रहे हैं 
छिन्न भिन्न हो चुके 
अस्थि पंजर 
ऐसा लग रहा है 
मानो निर्ममता पूर्वक 
मारा गया हो 
और फिर मन की 
मिटटी खोद खोद कर 
उसे दबा दिया गया हो 
किसी कोने में

एक भूकंप सा चल रहा है 

भ्रम की बुनियाद पर 
टिका हुआ महल 
खंड खंड हो रहा है

उधड़ती परतों के साथ 
सच का कंकाल 
बाहर आते ही 
शायद जी उठेगा 
फिर से.

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20 April 2011

गिरगिट

(1)
एक गिरगिट
पास  की झाडियों में
खेल रहा था लुकाछिपी
और बदल रहा था
अपना रंग
लगातार
तलाश में था
अपने भोजन को

(2)
हम इंसान भी
गिरगिट ही तो हैं
बदलते पल के साथ
इच्छाएँ भी
बदलती जाती हैं
चाहतें बदलती जाती हैं
और बदल लेते हैं
हम  भी
अपनी पहचान का रंग
कभी अच्छा
कभी बुरा.

18 April 2011

एक बार फिर वंशिका की कुछ ड्राइंग्स

लीजिए एक बार फिर से देखिये वंशिका की कुछ नयी ड्राइंग्स.
इस बार इनकी  फोटो भी है साथ में.
(यही हैं वंशिका )

(सबका है यही सपना,सुन्दर सा हो एक घर अपना)


(काश!मैं भी चिडिया होती ,तो खूब आसमान में उड़ती)

(श्री गणेशाय नमः )

(गर्मियों में इस बार हिल स्टेशन जायेंगे )

(थोडा हंस लो ,थोडा सा मुस्कुरा लो,हमारे संग आप भी कुछ गा लो )



आशा है ये ड्राइंग्स भी आप को पसंद आएँगी और वंशिका आप सबका स्नेह और आशीष पा सकेगी.

वंशिका  की पहले प्रकाशित ड्राइंग्स को आप यहाँ क्लिक करके देख सकते हैं.

[Photo captions-Yashwant Mathur]

17 April 2011

क्षणिका


 उड़ना चाहता हूँ
करना चाहता हूँ
आसमां से 
कुछ बातें 
मैं  भी
अपने मन की. 

15 April 2011

क्या हम प्यार नहीं करते?

सड़क पर जाते हुए
कुछ छोटे इंसानी बच्चे
छेड़ रहे थे
एक नन्हे से
पिल्ले को
फेक रहे थे
उसके ऊपर
कुछ  गिट्टियां
और वो
गिरता पड़ता
कोशिश कर रहा था
बचने की
अपनी भाषा में
मांग रहा था मदद
बचाने  की
और उसकी
आवाज़ सुनकर
आ पहुंची
उसकी माँ
सहलाने लगी
अपनी ममता से
उसके कोमल बदन को

शर्मिंदा हो कर
वो  इंसानी बच्चे
चल निकले
अपनी राह पर
और 
दूर खड़ा  मैं
सोच रहा था 
क्या हम प्यार नहीं करते?

13 April 2011

मैं कौन हूँ?

शायद मुझ को भुला कर
तुमने लगा दिया है
मेरे आस्तित्व पर
प्रश्नचिह्न
और मैं
खुद को
आईने में देख कर
पूछ रहा  हूँ
मैं कौन हूँ?

12 April 2011

ये सपने

हवाई जहाज़ों में उड़ना
शताब्दी में चलना
मोबाइल पर बातें करना
लैपटॉप की शान बघारना
सूट बूट और टाई लगा कर
एसी कार से उतरना
सजी महफ़िलों में
जाम से जाम टकराना
और डूब जाना
अनगिनत रंगीनियों  में

किसी की आदत है
ज़रूरत है,मजबूरी है किसी की
और शायद किसी के लिए
नशा भी है
मगर-

कभी उनका भी हाल ले लो
जो सिर्फ ये सपने देखते हैं
और जूझते रहते हैं
हर शाम को
दो रोटी की जुगाड़ को.


09 April 2011

पी जी का स्टूडेंट

(Photo curtsy-Google)
स्कूल  जाने वाले 
एक छोटे बच्चे से मैंने पूछा  -
कौन सी क्लास में पढते हो ?
वो बोला पी जी में 
जवाब सुनकर 
मेरा तो सर चकराया 
पर तभी 
उसकी मम्मी ने फरमाया 
भैय्या !
ये प्ले ग्रुप में पढता है!

05 April 2011

आज कुछ ड्राइंग्स

आज इस ब्लॉग पर देखिये पारुल की कुछ ड्राइंग्स.कक्षा -7 की छात्रा पारुल मेरी भतीजी हैं और लखनऊ में ही रहती हैं.ड्राइंग-पेंटिंग और गाना गाने में इनकी विशेष रुचि है और क्रिकेट इनका मन पसंद खेल.बड़े होकर डाक्टर बनना चाहती हैं.दुआ कीजिए इनका सपना सच हो और फिलहाल देखिये इनकी बनायी कुछ ड्राइंग्स को -

(यह धरती बहुत सुन्दर है )

(अभी तक तो बस नहीं आई,चलो बहन कुछ इंतज़ार करते हैं )

(Modeling)

(Poem)

(अगर ये पेड़ न रहे तो हम झूला कैसे झूलेंगे ,पेड़ न काटें )

(चूं चूं करती आती  चिड़िया ,बैठ शाख पे गाती चिड़िया )

(चूं चूं करती आती  चिड़िया ,बैठ शाख पे गाती चिड़िया )

(चूं चूं करती आती  चिड़िया ,बैठ शाख पे गाती चिड़िया )

अगर  आपको ये ड्राइंग्स अच्छी लगीं तो बताईयेगा ज़रूर और पारुल को अपना आशीर्वाद भी दीजियेगा!

03 April 2011

ये तो होना ही था

प्यार उसने भी किया था
महसूस उसने भी किया था
सपने उसने भी बुने थे
दिन महकने लगे थे
पर अचानक
एक जोर का झटका
हिला गया उसको
और उसने देखा
शीशे के दिल के
अनगिनत टुकड़े
ज़मीन पर बिखरे पड़े थे
और सहारा देने को
आंसू अपनी बाहें फैलाये
कह रहे थे -
ये तो होना ही था.

01 April 2011

मूर्ख ही तो हैं

फुटपाथों पर जो रहगुज़र किया करते हैं 
सड़कों पर जो घिसट घिसट कर चला करते हैं 
हाथ फैलाकर जो मांगते हैं दो कौर जिंदगी के 
सूखी छातियों से चिपट कर जो दूध पीया करते हैं 
ईंट ईंट जोड़कर जो बनाते हैं महलों को 
पत्थर घिस घिस कर खुद को घिसा करते हैं 
तन ढकने को जिनको चीथड़े भी नसीब नहीं 
कूड़े के ढेरों में जो खुद को ढूँढा करते हैं 
वो क्या जानें क्या दीन क्या ईमान होता है 
उनकी नज़रों में तो भगवान भी बेईमान होता है 
ये जलवे हैं जिंदगी के ,जलजले कहीं तो हैं 
जो इनमे भी जीते हैं, मूर्ख ही तो हैं.
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