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31 May 2011

सिगरेट! अगर तू न होती

 आज विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर इस ब्लॉग पर पहले प्रकाशित इस कविता को पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ .

(1)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो बच जाता मैं भी
बगल वाले नेता जी के
मुहं से निकलने वाले
अजीब से
धुंए से
जो मुश्किल कर देता है
जाड़े की गुनगुनी धूप में
दो पल का मेरा बैठना

(2)

सिगरेट! अगर तू न होती
तो कितने ही
कैंसर न पनपते
झोपड़ियों और महलों में
रहने वाले
न रोते,न कलपते

पर तू है!
और तेरा आस्तित्व भी है
कहीं दो कहीं पचास और सौ रुपये में
तू छीन लेती है ईमान
नए किशोरों का
जो भटक जाते हैं
तेरे छलावे में

काश! के कुछ होठों पे
नयी मुस्कान होती

सिगरेट! अगर तू न होती

30 May 2011

आम आदमी की नज़र से...........

एक आम आदमी की नज़र से
मैं भी देखता हूँ
कुछ सपने
कभी हवाई ज़हाज़ में
उड़ने के
कभी 'शताब्दी' में चलने के
मगर मोह
नहीं छोड़ सकता
दो पहिये वाली
अपनी पुरानी
'हीरो जेट' का
'एटलस' का
क्योंकि हम
करते हैं बहुत प्यार
एक दूसरे से.

29 May 2011

सोचा न था--(Post number-200)

सोचा न था
यूँ  चलते चलते
कहीं अचानक
मिल जाओगे
और दिखा दोगे
अपना असली चेहरा

मैं तो मोहित था
तुम्हारे रूप पर
कितनी कल्पनाएँ की थीं
कितने  भ्रम में
जोड़ रहा था
तिनका तिनका
ख़्वाबों को
बुन रहा था
एहसासों  को
या उलझा रहा था
मन के नेह को ?

सोचा  न था
चेहरे के पीछे
तुम एक और
चेहरा लिए घूम रहे हो
एक काला
क्रूर चेहरा
जिससे  नफरत है ..
सख्त नफरत है ...
मुझको

गले में
दोगलेपन की माला डाले
यूँ खेलोगे मुझ से
सोचा न था.


28 May 2011

वाई.नेट कम्प्यूटर्स का एक वर्ष


---विजय  माथुर 

 आज 'वाई. नेट कम्प्यूटर्स ' ने दुसरे वर्ष में प्रवेश कर लिया है.यशवन्त ने गत वर्ष आज ही के दिन अपने व्यवसाय का शुभारम्भ  किया था.वह जब छोटा था अक्सर मेरे साथ बाजार वगैरह चला जाता था.एक बार होम्योपैथिक चिकित्सक डा.खेम चन्द्र खत्री ने उसे देख कर कहा था कि यह बच्चा आपकी तरह नौकरी नहीं करेगा यह अपना बिजनेस करेगा.मैं डा.साहब की दूकान से ही होम्योपैथी दवाएं खरीदता था.वह मुझे अच्छे तरीके से जानते थे. फिर भी कहा कि यह बिजनेस करेगा तो मैं समझा शायद डा. साहब ने व्यंग्य किया होगा.परन्तु उन्होंने कहा कि वह इन्ट्यूशन के आधार पर कह रहे हैं और उनके इन्ट्यूशन कभी गलत नहीं होते हैं.हालांकि उसकी जन्म-कुंडली के हिसाब से भी उसके लिए व्यवसाय ही बनता था परन्तु व्यवहारिक परिस्थितियें विपरीत थीं.

सन२००५ ई. में यशवन्त ने बी.काम.कर लिया परन्तु आर्थिक कारणों से उसे एम्.काम. या दूसरी कोई शिक्षा नहीं दिला सके.सन २००६ ई. में आगरा में पेंटालून का बिग बाजार खुल रहा था उसका विज्ञापन देख कर उसने अपने एक परिचित के कहने पर एप्लाई कर दिया. मैं सेल्स में नहीं भेजना चाहता था उसी लड़के ने मुझ से कहा अंकल यह घूमने  का जाब नहीं है,करने दें.इत्तिफाक से बगैर किसी सिफारिश के उसका सिलेक्शन भी हो गया अतः ज्वाइन न करने देने का कोई मतलब नहीं था.०१ .०६ २००६ से ज्वाइन करने के बाद १२ तक आगरा में ट्रेनिंग चली और १३ ता. को लखनऊ के लिए बस से स्टाफ को भेजा जहाँ १४ ता. से १५ दिन की ट्रेनिंग होनी थी.परन्तु किन्हीं कारणों से यह ट्रेनिंग सितम्बर के पहले हफ्ते तक लखनऊ में चली.

ढाई माह लखनऊ रहने पर यशवन्त को वह इतना भा गया कि मुझ से कहा आगरा का मकान बेच कर लखनऊ चलिए जो आपका अपना जन्म-स्थान भी है.मैंने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जबकि लखनऊ का आकर्षण भी था.जब जूलाई २००७ में  मेरठ में बिग बाजार की ब्रांच  खुली तो उसने वहां अपना ट्रांसफर करा लिया.वह मुझ से लगातार लखनऊ शिफ्ट करने को कहता रहा.मई २००९ में कानपुर में बिग बाजार की दूसरी ब्रांच खुलने पर वह ट्रांसफर लेकर ०४ जून २००९ को   वहां आ गया और कहा अब लखनऊ के नजदीक आ गए हैं अब तो आप लखनऊ आ जाएँ.

३१ जूलाई से आगरा का मकान बेचने की प्रक्रिया प्रारंभ करके सितम्बर में उसकी रजिस्टरी कर दी और ०९ अक्टूबर को लखनऊ आ गए और नवम्बर में अपना मकान लेकर उसमें शिफ्ट हो गए.लखनऊ में बिग बाजार की तीसरी ब्रांच खुलने पर उसने फिर ट्रांसफर माँगा जहाँ कानपूर और इलाहाबाद के लोगों तक को भेज दिया गया परन्तु उसकी जरूरत कानपूर में है कह कर रोक लिया गया जिसके जवाब में मैंने उससे वहां से रेजिग्नेशन दिलवा दिया.

२८ मई २०१० को यशवन्त की अपनी कुछ बचत और कुछ अपने पास से मदद करके उसके लिए 'वाई.नेट कम्प्यूटर्स' खुलवा दिया. इस एक वर्ष में ज्वलनशील लोगों,रिश्तेदारों के प्रकोप के कारण यद्यपि आर्थिक रूप से इस संस्थान से लाभ नहीं हुआ.परन्तु यशवन्त के सभी ब्लाग्स के अलावा मेरे भी सभी ब्लाग्स इसी संस्थान के माध्यम से चल रहे हैं. हम लोगों को जो सम्मान और प्रशंसा ब्लॉग जगत में मिली है उसका पूरा श्रेय यशवन्त के 'वाई .नेट कम्प्यूटर्स' को जाता है.पूनम और  मैं यशवन्त और उसके संस्थान के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं.

[यह आलेख  क्रान्तिस्वर पर भी उपलब्ध है]

27 May 2011

फिर आया तूफ़ान

फिर आया तूफ़ान
सांय सांय करती
तेज हवा
के  साथ
गिरते  उखड़ते
पेड़
मानो
नष्ट हो रहा हो
धरती का
नख शिख सौंदर्य !

आँखों में चुभती
उड़ती धूल
के  साथ
सब कुछ
अस्त व्यस्त
कुछ पल को
ठहरा सा जीवन
धीमी पड़ती रफ्तार

और -
तूफ़ान के
निकल जाने के बाद
फिर वही दोहराव
फिर वही रफ्तार
कुछ पल ठहरी सोच
कुछ पल का पश्चाताप
तूफ़ान के बाद की
बारिश में
कहीं बह जाता है .

हर बार की तरह
मैं 
समझना नहीं चाहता
इन तूफानों के
अर्थ को.

25 May 2011

अब नहीं....

अब नहीं वो जंगल जिनकी
बचपन में कहानी सुनते थे
दादी माँ की गोद में बच्चे
किस्से सुन सुन सोते थे

अब नहीं वो बब्बर शेर
जिसकी दहाडें डराती थीं
अंगूर खट्टे देख जो लोमड़ी
अक्सर ही हंसाती थी

नहीं रहीं पञ्चतंत्र की बातें
न गोदी है न लोरी है
पांच बरस में बस्ता भारी
जाने कैसी मजबूरी है ?

23 May 2011

एक नया दौर

एक नया दौर
शुरू होगा
आज से

कोई
सीना ताने
छूएगा
नए आसमां को
कोई
आ गिरेगा ज़मीं पर
और कोई
त्रिशंकु बना
ताकेगा
कभी ऊपर
कभी नीचे

एक नया दौर
शुरू होगा
आज से

आत्ममंथन का
नयी अपेक्षाओं का
नए लक्ष्यों का
नयी सोच का

होगा सब कुछ नया
उनके लिए
जिन्होंने
छू लिया आसमान
और जो
ज़मीन पर
अब भी हैं खड़े

एक नया दौर
शुरू होगा
आज से

परिणाम आ चुका है;
परिणाम आने  वाला है

कुछ राहत पा गये
और कुछ की
धडकनें
होती जा रही हैं तेज
सब की
बस एक सोच
क्या हमने किया था 
और  क्या हम को
मिलने वाला है

आज  से
एक नया दौर
शुरू होने वाला है

21 May 2011

क्षणिका

कभी कभी गलती से 
मैं भी देख लेता हूँ 
कुछ सपने
इस उम्मीद के साथ 
कभी तो सच होंगे.
 

19 May 2011

अक्सर जब देखता हूँ.....

अक्सर जब देखता हूँ
बुझे हुए चेहरों को
जलती हुई एक लौ की
तमन्ना होती है

कि उड़ जाए वो शिकन
जिसे सजा रखा है चेहरे पर
आँखों  से बहते गम की भी
एक अदा होती है

इन चेहरों को बख्श दो
नूर मुस्कुराहटों का
खामोशी को भी
महफ़िलों की चाह होती है

17 May 2011

ओ लहरों!

[चित्र:गूगल सर्च ]
ओ! ऊंची उठती गिरती
मन मौजी लहरों!
ले चलो मुझे भी
अपने साथ

तुम्हारे  साथ
मैं भी जीना चाहता हूँ
तुम्हारे  जैसा  जीवन

टकराना  चाहता हूँ
पत्थरों से
छोड़ जाने को
अपने कुछ निशाँ

उन पत्थरों के बीच से
कुछ रास्ते बना कर
उनकी ऊंचाइयों को
लांघ कर

मैं भी चाहता हूँ
अनवरत बहना
बस बहते रहना
चलते रहना
तुम्हारी तरह.

15 May 2011

भूल जाना चाहता हूँ

भूल जाना चाहता हूँ
उन राहों को
जिन से हो कर
मैं आ पहुंचा हूँ यहाँ तक
भूल जाना चाहता हूँ
उन कड़वी -मीठी बातों को
जिन्हें हर कदम पर
सुनता आया हूँ
भूल जाना चाहता  हूँ
उन यादों को
जिन्हें दर्द की तरह सीने में
सहेजा हुआ है
भूल जाना चाहता हूँ
अपने शरीर को
जिसका बोझा ढोते ढोते
अब मैं थक चुका हूँ
भूल जाना चाहता हूँ खुद को
क्योंकि अब मैं
अस्तित्व  खो चुका हूँ

मगर नहीं!
मैं चाहकर भी
कुछ भूल नहीं पा रहा हूँ
एक अजीब सा चक्रव्यूह
और
एक अजीब सी तड़प में
उलझा उलझा सा
छटपटा रहा हूँ मैं
मुक्ति पाने को !

14 May 2011

पतंग

आसमां में उड़ती
उठती गिरती
आपस में लड़ती भिड़ती
और फिर
कट कर कहीं और
किसी और के पास
चली जाती पतंग
या  फिर से वहीं
वापस आजाती
जहाँ से शुरू किया था
ऊपर उठना

एक  डोर से बंधी
जिसका छोर
थामा हुआ किसी ने
नचा रहा जो उसे
अपनी मर्ज़ी से
हवा के रुख के साथ
देता  ढील और
वो ऊपर उठती जाती है

है बड़ा अनिश्चित जीवन
पतंग  का
अस्तित्व का संघर्ष
द्वन्द  और अहम
असीम ऊंचाइयों में भी
नहीं छोड़ता साथ
रहना एक को ही होता है
या फिर से
वहीं आना होता है वापस
जहाँ  से
शुरू किया था
आगे  बढना
ऊंचा  उठना
आना  होता है फिर से
उसी के पास
थामी हुई है जिसने डोर
पतंग की .

[इस कविता को दो दिन पहले पोस्ट किया था किन्तु ब्लोगर की समस्या के चलते पहले तो यह पोस्ट ही उड़  गयी थी और जब वापस आई तो टिप्पणियाँ  उडी  हुईं थीं.अगर आपने इस पर पहले  भी टिप्पणी दी थी जो अब आपको न दिखे तो ऐसा ब्लोगर की प्रोब्लम से ही हुआ है.आशा है पाठक गण अन्यथा नहीं लेंगे.]

09 May 2011

संघर्ष अभी ज़ारी है

एक बार को लगा था
फूलों की राह पर
चल रहा हूँ

वक़्त बीतता गया
और फूल सूख गए
महसूस होने लगी
क़दमों तले तपन
दहकते पत्थरों की

पर चलना तो है ही
मैं चल रहा हूँ
फूलों से बचते हुए

हाँ इन फूलों की
खुशबू ज़रूर ले लेता हूँ

ले लेता हूँ
क्षणिक सुख
और सहेज लेता हूँ
तीखे काँटों को
अपने भीतर कहीं

अब एहसास ही नहीं होता
चुभन का
जलने का
और न अब
पैरों में छाले पड़ते हैं

पड़ चुकी है आदत
यूँ ही चलते जाने की
कहीं रुक कर
अपनी कहते जाने की

कोई सुने ना सुने
कोई फर्क नहीं
बस आज नहीं
शायद कल आने वाली
अपनी बारी है

संघर्ष अभी ज़ारी है.

07 May 2011

तुम्हारे लिये

(मेरी माँ )

 हर सुख में 
हर दुःख में 
तुम मेरे साथ हो 
किसी छाया की तरह 

जीवन के 
इन ऊबड़ खाबड रास्तों पर 
इस मृग मरीचिका में 
मेरे भटकते क़दमों को 
तुमने दिखाई है 
एक नयी दिशा 
और आज
इतना कुछ देकर भी 
तुम
मांगती कुछ भी नहीं 

तो क्यों न 
मैं ही दे दूँ 
तुमको 
ये कुछ शब्द
अथाह समुद्र में 
एक छोटी बूँद की तरह .


05 May 2011

बस यूँ ही

बस यूँ ही कभी
खामोश रह कर
बेचैन सन्नाटों में
तलाश करता हूँ
खुद को

शायद खो चुकी
मेरी रूह
भटकती  हुई
कहीं मिल ही जाए
और मैं जी सकूँ फिर से
भूत, वर्तमान और भविष्य को !

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 [कुछ पोस्ट्स पर असंगत टिप्पणियों के प्राप्त होने के कारण इस ब्लॉग पर अब मोडरेशन सक्षम है. अतः यदि आपकी टिप्पणी कुछ विलम्ब से प्रकाशित हो तो उसके लिये अग्रिम खेद है.]

04 May 2011

जिंदगी ऐसे भी जी ही जाती है

अक्सर वो दस बारह साल के
नन्हे कदम
वो  किशोर
वो युवा
लेते हैं जो आनंद
अभावों का
भावविहीन हो कर

जिंदगी की ज़द्दोज़हद में
वो घिसटते दिखते हैं
आते जाते हर रास्ते पर 
हाईवे पर
रेल की पटरियों के किनारों पर
हर चौराहे पर
फुटपाथ पर
हर मोड़ पर

मगर फिर भी कहीं
एक मासूम सी मुस्कराहट
नज़र आ ही जाती है
उनकी भाषा भी
कुछ समझ आ ही जाती है

काले चश्मों के पीछे
धुएँ में उड़ती जिंदगी
एश ट्रे में गिरती राख भी
कभी शरमा ही जाती है

एक जिंदगी
ऐसे भी जी ही जाती है.


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[कुछ पोस्ट्स पर असंगत टिप्पणियों के प्राप्त होने के कारण इस ब्लॉग पर अब मोडरेशन सक्षम है. अतः यदि आपकी टिप्पणी कुछ विलम्ब से प्रकाशित हो तो उसके लिये अग्रिम खेद है.]

01 May 2011

मजदूरनी

आज  मजदूर दिवस है और इस अवसर पर मैं इस ब्लॉग पर पहले भी प्रकाशित हो चुकी इस कविता को पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ जो महाकवि निराला जी की 'वह तोडती पत्थर' शीर्षक कविता से प्रेरित है जिसे मूल रूप से मैंने हाईस्कूल के दौरान वर्ष  2000 में लिखा था-

 पत्थर तोडती
'निराला' की नारी
अक्सर दिखती है
सड़क के किनारों पर
तपती दुपहरी में
कंपकपाती सर्द लहरों में
वर्षा ऋतु की
अलसाती धुप में
क्रूर कुटिल भेड़ियों की
परवाह किये बगैर
उस के अश्रुओं और
स्वेद की बूँदें
चोट करती हैं
काले पथरीले दिलों पर
और वो
मुस्कुराती है
समाज के सीने पर
उभर आई
खरोचों को देख कर
उस की किस्मत में जो था
वो झेल रही है
न जाने कब से
सदियों से
या,बरसों से
यूँ ही खुले आसमाँ के तले
फुटपाथों पर
अक्सर खेलती है
मौत से
मत कहो उसे
अबला या बेचारी
'निराली ' है 'निराला' से
'निराला' की नारी.




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