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28 August 2011

इन्सान आज केन्ने जा रहल बा---श्रीमती पूनम माथुर

(श्रीमती पूनम माथुर )
परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो समय के साथ साथ होता रहता है। यह परिवर्तन सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी।इंसान के बदलते व्यवहार पर पूर्वाञ्चल और बिहार की लोकप्रिय बोली भोजपुरी मे मेरी मम्मी द्वारा लिखा गया तथा क्रान्ति स्वर पर पूर्व प्रकाशित यह आलेख साभार यहाँ पुनः प्रस्तुत है-- 
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मार भईय्या जब रेल से घरे आवत रहलन तब ट्रेन में उनकर साथी लोगन कहलन कि हमनी के त बहुत तरक्की कर ले ले बानी सन.आज हमनी के देश त आजादी के बाद बहुत प्रगतिशील हो गइल बा.पहिले के जमाना में त घोडा गाडी ,बैल गाडी में लोग सफर करत रहलन लेकिन अब त पूरा महीना दिन में समूचा देश विदेश घूम के लोग घरे लौटी आवेला   .आजकल त This,That,Hi,Hello के जमाना बा. कोई पूछे ला कि how are you ?त जवाब मिले ला fine sir /madam कह दिहल जाला .कपड़ा ,लत्ता ,घर द्वार गाडी-घोडा फैशन हर जगह लोगन में त हमही हम सवार बा. आज त तरक्की के भर-मार बा.पर अपना पन से दूर-दराज बा.कोई कहे ला हमार फलनवा नेता बाडन त कोई कहे ला अधिकारी बाडन कोई प्राब्लम बा त हमरा से कहअ तुरन्ते सालव हो जाईल तनी चाय पानी के खर्चा लागी.बाकी त हमार फलनवा बडले बाडन निश्चिन्त रहअ  .खुश रहअ ,मस्त  रहअ  मंत्री,नेता अधिकारी बस जौन कहअ सब हमरे हाथे में बाडन .बात के सिलसिला अउर आगे बढित तब तक स्टेशन आ गईल .सब के गंतव्य आ गईल .अब के बतीआवेला सबे भागम्भागी में घरे जाय के तैयारी करत रहे अब बिहान मिलब सन .भाईबा त बात आगे बढ़ी आउर बतिआवल जाई सब कोई आपन आपन रास्ता नाप ले ले.रात हो गईल रहे सवारी मिले में  दिक्कत रहे हमार भइया धीरे धीरे पैदल घरे के ओरे बढ़त रहलन त देखलन  कि आर ब्लाक पर एगो गठरी-मोटरी बुझाई.औरु आगे बढ़लन त देखलन कि एगो आदमी गारबेज  के  पास बईठलबा थोडा औरु आगे उत्सुकता वश बढले त देखले कि ऊ आदमी त कूड़ा में से खाना बीन के खाता बेचारा भूख के मारल .अब त हमार भयीआ के आंखि में से लोर चुए लागल भारी मन से धीरे धीरे घरे पहुचलन दरवाजा हमार भौजी खोलली घर में चुपचाप बइठ गइला थोड़े देरे के बाद हाथ मुंह धो कर के कहलन की" आज खाना खाने का जी नही कर रहा है. आफिस में नास्ता ज्यादा हो गया है ,तुम खाना खा लो कल वही नास्ता कर लेंगे.भाभी ने पूछा बासी ,हाँ तो क्या हुआ कितनों को तो ऐसा खाना भी नसीब नहीं होता.हम तो सोने जा रहे हैं बहुत नींद आ रही है."
परन्तु बात त भुलाव्ते ना रहे कि आज तरक्की परस्त देश में भी लोगन के झूठन खाये के पड़ता आज हमार देश केतना तरक्की कइले बा .फिर एक सवाल अपने आप   में जेहन में उठे लागल कि भ्रष्टाचार ,बलात्कार,कालाबाजारी,अन्याय-अत्याचार ,चोरी-चकारी में इन्सान के 'मैं वाद' में पनप रहल बा .ई देश के नागरिक केतना आगे बढलबा अपने पूर्वज लोगन से?
भोरे-भोरे जब बच्चा लोगन उठल   अउर नास्ता के टेबुल पर बइठल  त कहे लागल "ये नहीं खायंगे वो नहीं खायेंगे"त ब हमार भइया रात के अंखियन देखल विरतांत कहलन  त लड़कन बच्चन सब के दिमाग में बात ऐसन बइठ गईल अउर सब सुबके लगलन सन .जे खाना मिले ओकरा प्रेम से खाई के चाही न नुकर ना करे के चाही .प्रेम से खाना निमको रोटी में भी अमृत बन जा ला.अब त लडकन सब के ऐसन आदत पडी गईल बा .चुप-चाप खा लेवेला अगर बच्चन सब के ऐसन आदत पड़जाई त वक्त-बे वक्त हर परिस्थिति के आज के नौजवान पीढी सामना कर सकेला .जरूरत बाटे आज सब के आँख खोले के मन के अमीर सब से बड़ा अमीर होला.तब ही देश तरक्की करी.इ पैसा -कौड़ी सब इहे रह जाई
एगो गीत बाटे -"कहाँ जा रहा है तू जाने वाले ,अपने अन्दर मन का दिया तो जला ले."
आज के इ  तरक्की के नया दौर में हमनी के संकल्प लिहीं कि पहिले हमनी के इन्सान बनब.-वैष्णव जन तो तेने कहिये .................................................................के चरितार्थ करब.

25 August 2011

सवाल

हर पल
हर कहीं
घर मे या
घर के बाहर
एकांत मे
या किसी के साथ
किसी भीड़ मे
कहीं आते हुए
कहीं को जाते हुए
किसी से बात करते हुए
खुद को समझाते हुए
कुछ लिखते हुए
कुछ पढ़ते हुए
कुछ न कुछ करते हुए 
जेहन मे उठते हैं
अनेकों सवाल
न जाने क्यों?

22 August 2011

तेज़ रफ्तार मे चलते हुए...........

तेज़ रफ्तार मे चलते हुए  
जाने अनजाने
कभी कभी आ जाते हैं
कुछ टेड़े मेड़े मोड़
जिनके तीखे ,अंधे
घुमाव का
नहीं होता अंदाज़ा
आखिर टकराना
होता ही है 
गिरना होता ही है
झेलना पड़ता है
अनचाहा
क्षणिक जड़त्व
झेलना पड़ता है
जगह जगह
खरोचों को 
ज़ख़्मों को
हर बार मिलती है
कभी समझ न आने वाली सीख
संतुलित हो कर चलने की।

18 August 2011

अपनी अपनी किस्मत

एक तरफ -
लाड़
नाज़ भी नखरे भी
सोने के बिस्तर पर सोना
मोबाइल और बाइक को झगड़ना
फर्जी ख्यालों मे उड़ना
और फेल होना लगातार
कई साल। 
आँख पर
काला चश्मा लगाए चलना
काली जुबां का कदमताल करना
और एक तरफ-
सड़क के बीचों बीच
फुटपाथ पर 
हथेली पर अपनी इज्ज़त
और जान  लेकर
एक चादर मे सिमट कर
हर मौसम मे
उघाड़े बदन
दो मीठे बोल बोलना
आपस मे। 
दिन मे पेट की
रिक्शा चलाना
और रात को
ऊंची स्ट्रीट लाइट की
मंद रोशनी मे पढ़ना
फिर भी
सफलता का उच्च
शिखर चूमना
यही है
अपनी अपनी किस्मत!

15 August 2011

आज़ादी से

हर तरफ दिख रहा है जोश
बज रहे हैं ढ़ोल
हो रहा है शोर
उत्साह,जश्न
आज़ादी के त्योहार का
एक अलग समाँ
हर कहीं लहराते तिरंगे का
जन गण मन का
वन्दे मातरम का
गूंज रहा है गीत
निकल रहे हैं जुलूस
उत्साहित बच्चों के
नौजवानों के
मोहल्ले-मोहल्ले
की सड़कों से
निकल रहे हैं काफिले
'माननीयों' के
जो आज़ादी से
दे रहे हैं भाषण
नैतिकता के
मूल्यों  के
जिनको रौंदते भी वही हैं
अपने पैरों से
आज़ादी से!

आज मैं भी
टहलुंगा शाम को कुछ देर
दिन के कोलाहल के बाद
शांत सड़कों पर
और देखुंगा
कोने कोने पर 
सुबक रहे
कागज़ और प्लास्टिक के
तिरंगे को
जिसके आँसू
लगा रहे होंगे
एक प्रश्न चिह्न
आज़ादी पर
हर साल की तरह
हर बार की तरह
आज़ादी से!


आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाएँ!तिरंगा हमारी पहचान है इसका सम्मान करें!

11 August 2011

आज फिर वही खबर

आज फिर वही खबर
दहेज की आग मे
जला एक घर
जल गए अरमान
जल गए सपने
गिर पड़ा पहाड़
टूट गए अपने
बस रह गयीं
वो लाड़ की
वो नाज़ों की बातें
बचपन की 'उसकी'
शरारतों की यादें।

आज फिर वही खबर
जिसे पढ़ा था कल
जिसे पढ़ा था परसों
जिसे पढ़ते पढ़ते
बीत गए बरसों
बरसों से चल रही है मुहिम
लोगों को समझाने की
परीक्षाओं मे बच्चों से
निबंध लिखवाने की
बीज के बोने की
पेड़ के होने की
फूल भी खिले
फल भी पके
मगर लालच की
शाखाओं को रोक न सके
और रुक  न सकी
छपने से
आज फिर वही खबर ।

07 August 2011

कहीं न कहीं सच मे .........

अभी 2 दिन पहले सुषमा जी ने एक फोटो अपनी फेसबुक वॉल पर शेयर किया था जिसे देख कर मेरे मन मे उसी क्षण जो आया वह मैंने वहाँ कमेन्ट मे लिख दिया था। सुषमा जी की अनुमति से उनकी वॉल से उनको धन्यवाद सहित वह चित्र यहाँ प्रस्तुत है और साथ मे अपने पाठकों के लिए कमेन्ट मे लिखी वह पंक्तियाँ  यहाँ भी प्रस्तुत  कर रहा हूँ  -



कहीं न कहीं सच मे ऐसा होता होगा, 
हमकदम बन कर कोई साथ चलता होगा।
किसी के आंसुओं मे कोई दर्द अपना देख कर, 
हाथ थाम यूं गले लगा लेता होगा।।

ये जिंदगी है समुंदर की लहरों जैसी, 
कोई पत्थर भी राह बनाना सीख लेता  होगा।
  कहीं न कहीं सच मे ऐसा होता होगा,
 कांटे बिछा कर ज़माना भी रो देता होगा।। 



(आप सभी को मित्रता दिवस की शुभकामनाएँ!)

04 August 2011

रहना चाहता हूँ दूर ......

सिर्फ स्वप्न हैं
अनगिनत
आशाओं का
एक अजब सा
माया जाल है
हर तरफ
भागमभाग है-
आगे बढने की
कभी खुद की इच्छा से
खुद के बल से
और कभी
किसी को जबरन
धकेल कर
किसी 'सीधे' को
मोहपाश मे बांध कर
तेज़ी से 
ऊपर की मंज़िल पर
चढ़ने की
बिना कोई सबक लिए
कछुआ और खरगोश की
कहानी से।
इस मायाजाल से
मैं रहना चाहता हूँ दूर
खड़े रहना चाहता हूँ
पैरों को ज़मीन से टिकाए
क्योंकि
ऊपर की मंज़िल के
सँकरेपन का आभास है
डर है
ऊपर से पैर फिसला
तो आ न सकूँगा
ज़मीन पर।
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