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27 April 2012

गनीमत है

बौर बन चुके आम
कीमत बस खास की है
सोच का काम तमाम
आज़ादी बकवास की है। ......
पढ़ना वढ्ना मैं न जानूँ
लढना भिड़ना जानूँ मैं
दोस्त कोई न नाता मेरा
कीमत पूरी मांगू मैं । .........
मैं मैं- मैं मैं
चें चें- पें पें
क्या लिख रहा हूँ
पता नहीं है
झेलने वाले झेल रहे हैं
क्या कहेंगे समझ नहीं है । ........
पेन टूट गया ,खो गयी डायरी
की बोर्ड की अब चढ़ी खुमारी
खटर पटर पर ब्लोगिंग श्लौगिंग
नशा है कोई या अजब बिमारी । .....
किसी को टेढ़ा टेढ़ा लगता
किसी को सीधा सधा सा अक्षर
चश्मा नाक पे चढ़ा मोटा सा
भगा नहीं सकते बैठा मच्छर। .....
हम तो ऐसे ही हैं भैया
शून्य शान सी कीमत है
पढ़ कर पके नहीं अगर आप
अपने लिये यही  गनीमत है
आपके हाथ मे छुपा जो  बैठा
उस टमाटर की कीमत है । :))))


22 April 2012

पृथ्वी दिवस पर.......

बुद्धिजीवियों की
कालोनी से गुजरते
उस रस्ते पर
मैंने देखा
कोलतार की
वह सड़क
चौड़ी
की जा रही थी
बूढ़े पेड़ों को
उनकी
औकात बताई जा रही थी
और उस किनारे
पार्क से
आ रही थी आवाज़--
सड़क के
सामने वाले घर मे
गुज़र करने वाले
सज्जन
माइक पर
कर रहे थे आह्वान
पृथ्वी को बचाने का
पृथ्वी दिवस मनाने का।


18 April 2012

अनजान बन जाऊं (ब्लॉग पोस्ट नंबर-300)

कभी कभी सोचता हूँ
हर चीज़ से
हो जाऊं अनजान
खाली सा हो जाऊं
किसी ब्लैंक
सी डी  या डी वी डी
की तरह
और पहुँच जाऊं
कुछ हाथों मे
जो कुछ भी लिख दें
कुछ भी कह दें
अच्छा या बुरा
जो मन मे हो
और मैं
जान जाऊं
मन के भीतर के
दबे हुए
मौन का सच!

16 April 2012

मैं देखता रहा :(

सरे आम
पिटते देखा उसे
मालिक के हाथों
चाय की दुकान पर
क़ुसूर सिर्फ इतना था
उन मासूम हाथों से
गरम चाय
छलक गयी थी
साहब के जूतों पर
और मैं
चाह कर भी 
बना रहा कायर
क्योंकि
उसकी नौकरी बचानी थी
उसे घर जाकर
माँ के हाथों मे
मजदूरी थमानी थी । 

14 April 2012

मुलाक़ात कर लूँ

 शुरू की 5 लाइन्स को कल मैंने फेसबुक स्टेटस बनाया था...आज न जाने किस धुन मे यह बढ़ता चला गया और सामने आया इस बेतुके रूप मे ----

कदमों के निशां छोड़ कर
जो गयी है कहीं दूर.....
सोच रहा हूँ
आज उस रूह से
एक मुलाक़ात कर लूँ....
उस की अनसुनी आहट का
एक एहसास यूं तो हुआ था
गहरी नींद में ,जब मैं सोया हुआ था
ये न मालूम था कि ,ठहरेगी नहीं
लौट जाएगी
सिरहाने पे ,बेरूखी छोड़ जाएगी 
वो दूर पहले भी थी
वो दूर आज भी है
न जाने कौन सा किरदार
खबरदार आज भी है
फितूर है या कुछ और कि
बीते कल के साथ चलूँ
सोच रहा हूँ
आज उस रूह से
मुलाक़ात कर लूँ। 


12 April 2012

कोयल की आवाज़ सुनी

कोयल की आवाज़ सुनी
वो कुहुक रही थी
आज अचानक
मेरे घर की बालकनी में
आकर
अंदर के कमरे में
बैठा मैं
चारों ओर घूमती
उसकी नज़रों को
भाँप रहा था
शायद वो
ढूंढ रही थी
सामने के
आम के पेड़ पर बना 
अपना आशियाना
शायद वो
ढूंढ रही थी
उन बौरों को
जिनकी मंद मंद
खुशबू के बीच 
वो गाती है
अपने राग
पर तभी
उसकी नज़रों ने देख ली
ज़मींदोज़ हो चुके
उस हरे भरे
आम के पेड़ की गति
और इंसान को
कोसती हुई 
वो कोयल उड़ गयी
नये ठिकाने की
तलाश में  !

(काल्पनिक )

08 April 2012

वक़्त की कैद मे ..............

वक़्त की कैद मे
रहते हुए भी
मैं बेखबर हूँ
सलाखों के अंदर की
इस दुनिया से
बिलकुल वैसे ही
जैसे
रंगबिरंगी मछलियाँ
मस्त रहती हैं 
एक्वेरियम की
दीवारों के चारों ओर।

05 April 2012

इस राह पर.....

कभी कभी मैं बहुत कुछ अजीब सोचता हूँ। यह पंक्तियाँ मेरे सिरफिरे मन मे आए कुछ विचारों का परिणाम हैं। और चूंकि अब लिख गयी हैं तो आप भी झेलिए :)















इस राह पर
हुआ करती थी
कभी चहल पहल
तन का चोला ओढ़े
84 करोड़ आत्माएँ
भेदती थीं
धरती का सीना
अपनी पदचापों से

आज
ये राह सुनसान है
जीवन की
कल्पना से परे
गहन,बेचैन
और
भावशून्य निर्वात
भीतर ही भीतर
सिसक रहा है

इस राह पर
अक्सर दिखता है
आसमान मे
चमकता चाँद 
बादलों से
अठखेलियाँ करता चाँद
बेढब बेडौल
मगर
मुसकुराता सा चाँद-
इस राह को
ऐसे देखता है
जैसे उसे
पता हो सब
भूत और
भविष्य का विधान

इस राह पर
निर्जन राह पर
टिकी हुई है
मेरी दृष्टि
समय के उस पार से
चाँद के उस पार से
तिलिस्मी
आकाश गंगा की
अनंत गहराइयों के
भीतर से
ताक रहा हूँ
एकटक 
प्रकाश वर्षों के
इस पार
इस एक
अकेली
राह पर!

01 April 2012

मूर्ख ही तो हैं

आप सभी को मुझ मूर्ख की ओर से मूर्ख दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ :) और चूंकि आज राम नवमी भी है इसलिए उसकी शुभ कामनाएँ भी स्वीकार कीजिये। यह रचना नयी नहीं है  बल्कि   ठीक एक वर्ष पूर्व इसी ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है और आज एक बार पुनः प्रस्तुत है ---
 
फुटपाथों पर जो रहगुज़र किया करते हैं 
सड़कों पर जो घिसट घिसट कर चला करते हैं 
हाथ फैलाकर जो मांगते हैं दो कौर जिंदगी के 
सूखी छातियों से चिपट कर जो दूध पीया करते हैं 
ईंट ईंट जोड़कर जो बनाते हैं महलों को 
पत्थर घिस घिस कर खुद को घिसा करते हैं 
तन ढकने को जिनको चीथड़े भी नसीब नहीं 
कूड़े के ढेरों में जो खुद को ढूँढा करते हैं 
वो क्या जानें क्या दीन क्या ईमान होता है 
उनकी नज़रों में तो भगवान भी बेईमान होता है 
ये जलवे हैं जिंदगी के ,जलजले कहीं तो हैं 
जो इनमे भी जीते हैं, मूर्ख ही तो हैं.

-यशवन्त यश ©


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