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26 May 2012

मेरे सपनों की दुनिया

कभी कभी
रातों को आते हैं
बड़े ही अजीब से ख्वाब
मैं चला जाता हूँ
अनोखी दुनिया में
एक ऐसी दुनिया
जो घिरी है
ढेर सारे
रंगबिरंगे फूलों से
फूल -
जो कभी मुरझाते नहीं
खिले रहते हैं
महकते रहते हैं  
उस दुनिया मे
हर कोई खुश है
क्योंकि सब अमर हैं
उस दुनिया मे
रोजगार हैं;
सब
अपने ही मालिक हैं 
और नौकर
कोई नहीं
उस दुनिया मे
सब पैदल चलते हैं
पेट्रोल की महंगाई से
बे फिकर हो कर 
क्योंकि
कोई दूर नहीं
सब नजदीक हैं
तन और मन से
मैं रहना चाहता हूँ
उस दुनिया में
बसना चाहता हूँ
हमेशा के लिये
अमर हो कर
खुश रहना चाहता हूँ
पर अफसोस!
सपनों की उस दुनिया मे
मेरे लिये जगह नहीं
क्योंकि
वहाँ पीढ़ियाँ जन्म लेती हैं
अमरत्व का वरदान ले कर
और उस दुनिया के लोग
आना चाहते हैं
सपनों से बाहर की
इस दुनिया में
ताकि कर सकें
वो भी
एक जीवन से
दूसरे जीवन का सफर।

<<<<यशवन्त माथुर>>>>

24 May 2012

बात बन गयी

सोचना है कुछ
कुछ लिखना है
करनी है ईमेल
और जल्दी से भेजना है
संपादक को छापने की जल्दी है
और मुझे छपने की
अपना नाम देखने की
जल्दी है ,बहुत जल्दी है
सच मे क्या करूँ
लाइनें लिखता हूँ
मिटाता हूँ
बार बार दोहराता हूँ
और डालता  हूँ
आस पास एक नज़र
कोई विषय मिल जाए
तो बात बन जाए
दोनों की 
छपने वाले की भी
छापने वाले की भी
और बनती जा रही हैं
यह पंक्तियाँ
जो आप पढ़ रहे हैं
अपना सिर पकड़ के

भौहों को तान के
झेल रहे हैं
यह हल्की फुलकी नज़्म (?)
कविता (?)
या कुछ और
जो भी हो
मेरी तो बात बन गयी
पर  आपकी ?  :)
www.nazariya.in पर पूर्व प्रकाशित

<<<<यशवन्त माथुर>>>>

23 May 2012

धन्यवाद जयेश जी ....

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि इस ब्लॉग की पृष्ठभूमि मे मेरी आवाज़ मे स्वागत संदेश लगा हुआ है। मेरी खुशकिस्मती है कि जयेश कोठारी जी ने मेरी आवाज़ को पसंद किया और अपने मित्रों को समर्पित एक कविता को आवाज़ देने के लिए मुझ से संपर्क किया। उनकी यह कविता आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं और मेरी आवाज़ मे सुन सकते हैं। लिंक है--

http://meandwords.blogspot.in/2012/05/same-day-year-ago-i-completed-four.html

मेरी शुभकामना है कि जयेश जी अपने जीवन मे अनेकों सफलताएँ प्राप्त करें।

 

22 May 2012

तस्वीर की तलाश ......

तलाश में हूँ
एक तस्वीर की
जिसे देख कर
बिना रुके
लिखता चलूँ
और कहता चलूँ
उस तस्वीर के
मन की बात
कहता चलूँ
उसके चेहरे से
झलकता
कभी दर्द
और कभी खुशी का
संगम ! 

लेकिन वो चित्रकार कहाँ
जिसने रची होगी
वो तस्वीर
और कहाँ वो तस्वीर 
जिसे पाने के
कर लिये अनेकों जतन

वो साधारण सी
असाधारण तस्वीर
और उसके जैसे
सैकड़ों चेहरे
हर रोज़ देखता हूँ
अपने आस पास

मगर फिर भी
तलाश जारी है
"कुछ हटके" की
जिस पर लिख सकूँ
"कुछ हट कर"
बिना पेन और कागज के
बिना की बोर्ड और स्क्रीन के
गढ़ दूँ कुछ ऐसे अक्षर
जो कभी चोट लगें
और कभी मलहम
उस तस्वीर के
खुशी और गम की तरह।

<<<<यशवन्त माथुर >>>> 

इस ब्लॉग का एक लिंक अब यह भी--http://jmkyashwant.wordpress.com/

20 May 2012

पत्थर का साथ

चित्र साभार- http://hardinutsav.blogspot.in
इंसान की फितरत से
पत्थर का साथ अच्छा है .....
सिर्फ देखता है एक टक ,
सुनता है -समझता है....
न छल है उसमे कोई
न कोई तमन्ना है ...
लहरों से टकराना है..
टूटना है बिखरना है ....
फिर अंजाम की क्या फिकर...
कि इंसान भी टूटकर
बिखरता है एक दिन .....
एक जज़्बात से टूटता है
दूसरा लहरों मे बिखरता है ।

[ मेरी आदत है कुछ लिंक्स को फेसबुक पर शेयर करने की। स्वप्नगंधा जी की शायरी वाले एक लिंक पर स्वाति वल्लभा जी की एक टिप्पणी के उत्तर मे मैंने (17 मई को) उपरोक्त पंक्तियों को लिखा था।  ]

<<<<<यशवन्त माथुर >>>>

17 May 2012

अक्षरों का जीवन .....

चित्र साभार:- http://www.facenfacts.com/
कभी मैं सोचा करता था
लिखे हुए अक्षर
कभी नहीं मिटते
पर आज
जब देखा
गले हुए पन्नों वाली
एक पुरानी किताब को
जगह जगह धुंधली पड़ती
स्याही
दे रही थी गवाही
मैं गलत था

अक्षरों का जीवन भी
इन्सानों जैसा होता है
कुछ समय चलता है
चमकता है
और फिर
फीका हो जाता है

अक्षरों का जीवन
निर्भर है
किताब के आवरण की
चमक के टिकाऊपन पर
कागज और स्याही के
समन्वय पर
वर्तमान और भविष्य पर
और अंततः
लकड़ी की अलमारी के
कोने मे छुपी दीमक
की पहुँच पर

अक्षर मिटते हैं
क्योंकि सृजनकर्ता की
मेहनत पर
पानी फिरना ही होता है
एक दिन !

<<<< यशवन्त माथुर >>>>  
 

15 May 2012

मन का पंछी


कितना अजीब होता है
मन का पंछी
पल मे यहाँ
पल मे वहाँ
पल मे नजदीक
पल मे मीलों दूर
भर सकता है उड़ान
आदि से अंत तक की
 
मन का पंछी !
बोल सकता है
मौन मे भी
जी सकता है
निर्वात मे भी
कल्पना के उस पार
जा कर
खोज सकता है
रच सकता है
नित नए शब्द
नित नये चित्र
 
मन का पंछी !
मेरे मन का पंछी
अक्सर
ले चलता है मुझको
अपनी असीमित
उड़ान के साथ
शीत ,ग्रीष्म और वर्षा मे
करने को सैर
अनगिनत मोड़ों वाली
उस राह की
जिस पर छिटके हुए हैं
विचारों के
कुछ फूल और
कुछ कांटे!

<<<<
यशवन्त माथुर>>>>

09 May 2012

गायब हो जाऊं .....

सोच रहा हूँ
कुछ पल को
गायब हो कर
कहीं अपने मे
खो कर
एक कोशिश करूँ
खुद को समझने की
जिसमे असफल रहा हूँ
अब तक 
अपने कमरे मे
मैंने बंद कर दिये हैं
रोशन होने वाले रास्ते
कानों मे भर ली है रुई
और आँखें बंद
खुद को सुनने के लिये
खुद को देखने के लिये
ज़रूरी है-
यह विश्राम
क्योंकि
मन की किताब के
हर पन्ने पर  लिखे
बारीक अक्षर
मेरी समझ मे
जल्दी नहीं आते।

<<<<यशवन्त माथुर >>>>
 

08 May 2012

नया जीवन



पानी की बोतल मे 
अपनी जड़ों का 
एहसास करता 
बड़े पत्तों वाला वह 
मनी प्लांट 
जिसके पत्ते के ऊपर 
निकल आया 
एक और बड़ा पत्ता 
महसूस कर रहा है 
सुकून
इस पत्ते के भीतर 
तिनकों के बिस्तर पर 
आँखें बंद किये 
चिड़िया के नवजात 
शिशुओं का 
बोझ उठा कर
क्योंकि उसे पता है 
एक दिन 
वो भी साक्षी होगा 
शून्य से
अनंत की उड़ान का !

उड़ान -
जो देगी विस्तार 
उस चिड़िया के 
अनंत सपनों को 
कभी तेज़ 
कभी धीमी 
और कभी थमी हुई 
हवा की  
छुअन के साथ
और वो बच्चे 
देखेंगे 
जीवन का सच 
जब कोई बहेलिया 
फैलाएगा जाल
परीक्षा की 
घड़ी में
और तब 
'जीतना' ही होगा 
लक्ष्य
हर हाल में  !

वो मनी प्लांट 
सोच रहा है 
जीवन का आना 
जीते जाना 
चलते जाना 
कितना अच्छा होता है 
निश्छल चहकना 
माँ के आँचल में 
जो बनाती है 
तिनका तिनका जोड़कर 
गुदगुदा सा बिस्तर 
और खुद 
सोती है 
बोतल के किनारे 
हरे बड़े पत्ते की छांव में 
क्योंकि 
एक नया जीवन 
अनमोल है 
उसके लिये !
 
 <<<<यशवन्त माथुर >>>>

05 May 2012

परछाई और मैं

(फोटो : गूगल सर्च )
 कभी साथ चलती है
कभी दूर हो लेती है
खुद की परछाई भी
मजबूर हो लेती है

उसकी मजबूरी मे जब
खुद को तलाशना चाहा
वजह पूछते ही
उसने भागना चाहा

वो बोली कि साथ
इतना ही है तेरा मेरा
मिलना कभी बिछड़ना है
गहरी रात हो या उजला सवेरा

पर एक याद है दोस्ती की
अक्सर जो साथ होती है
परछाई है किस्मत
मजबूरी मे दूर
कभी पास  होती है ।

>>>>यशवन्त माथुर<<<<

03 May 2012

बस यूं ही......

सूई से चुभते फूल
अब सुहाते नहीं है
कोमल से शूल
कुछ सुनाते नहीं हैं

मुंह फुला कर बैठा है
गमले मे गुलाब
गेंदा और बेला
नज़र उठाते नहीं हैं

न जाने क्या हुआ कि
क्यारियाँ भी सूख गयीं
गुलशन जो थे हलक
अब कुछ कह पाते नहीं हैं।

>>>>यशवन्त माथुर <<<<

01 May 2012

मई का पहला दिन (मजदूर दिवस विशेष)



आज
न गणतन्त्र दिवस है
न स्वतन्त्रता दिवस है
न होली है आज
न दिवाली है
न 'सितारों' का जन्म दिन है
न किस्मत के खुलने का दिन है
मई का पहला दिन है
दिन है जो आधार है
मुट्ठी मे बंद संपन्नता का
दिन है जो आधार है
स्वतन्त्रता का
दिन है उनका
जिनके अरमान
शोषण की दीवाली
मनाते हुए
अपेक्षाओं के आसमान मे
हर रोज़ बिखरते  हैं 
और उनकी बारूदी महक
दबा कर रख दी जाती है
सहेज दी जाती है
मौकापरस्ती की होली
एक दिन मनाने को
दिन है उनका
जिनके हाथ
अगर थम जाएँ
खेतों खलिहानों मे
कारखानों मे
तो मयखानों के
सुरूर मे डूबे 
शरीफ
ताकते रह जाएँ अपनी राह
मगर
यह दिन है जिसका
वो जीता है
अपने ही उसूलों पे
गीता के कर्म पे
जीवन के मर्म पे
वो गतिशील है
प्रगतिशीलता के लिये
स्थिरता के लिये
शायद तभी
इतना खामोश है
आज का दिन
मई का पहला दिन। 

>>>>यशवन्त माथुर <<<<

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