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27 June 2012

मेरी भी सुन लो -

यह पंक्तियाँ एक प्रयास है गर्भ में पल रहे स्त्री भ्रूण के मन की बात को कहने का -

बहुत अनिश्चित मेरा भाग
दुर्भाग से गहरा नाता है
यूं तो दुनिया मुझ से चलती
मुझ पर ही खंजर चल जाता है

माँ बचा ले मुझको तेरी
गोद में पलना भाता है 
आँचल की छांव मुझे भी दे दे
क्यों तुझे समझ न आता है ?

बड़ी बड़ी बातों मे सबकी
देवी, लक्ष्मी, सरस्वती हूँ
हूँ पूजनीया नौ दुर्गों में
मैं फिर भी त्यागी जाती हूँ

है बहुत अनिश्चित मेरा भाग
दुर्भाग मानव जात तुम सुन लो
खंजर है अधिकार तुम्हारा
बस भविष्य के अंत को चुन लो। 

 ©यशवन्त माथुर©

24 June 2012

बातों की नियति

कविताओं में
लेखों में
बैनरों मे लिखे नारों मे
जुलूसों में
सेमिनारों में
होती हैं
बड़ी बड़ी बातें
एक पल को
जो मन को भाती  हैं
तर्क की कसौटी पर
सधी हुई बातें
जो
कुतर्कों से
कट नहीं पाती हैं
अच्छी लगती हैं
मंच के सामने बैठ कर
सुनने में
और कुर्सी से उठने के बाद
मंच से बोलने के बाद
ये अनमोल बातें
खो देती हैं मोल
हार जाती हैं
धूल की तरह जमी हुई
बरसों पुरानी सोच से
तर्क के भीतर छुपे
कुतर्क से

शायद बातों की
यही नियति है । 


©यशवन्त माथुर©

22 June 2012

'मुझे तो ढहना ही है'

शब्दों की उलझी हुई सी
बेतरतीब सी
इमारत -
भावनाओं की उथली
दलदली नींव पर
कब तक टिकेगी
पता नहीं 
पर जब तक
अस्तित्व में है
बेढब कलाकारी की
झूठी तारीफ़ों
सच्ची आलोचनाओं
तटस्थ दर्शकों की
चौंधियाती आँखों में
झांक कर
रोज़ 
कहती है
एक मौन सच-
'मुझे तो ढहना ही है'

 ©यशवन्त माथुर©

18 June 2012

ओ बादलों !

ओ बादलों !
यहाँ की हरियाली को
उजाड़ कर
कंक्रीट की बस्ती में
अब मुझे इंतज़ार है
तुम्हारे बरसने का

हाँ
मैंने छीना है
तुम्हारा आकर्षण
और 
जो है भी
वो इतनी ऊंचाई पर
तुम देख नहीं सकते

क्योंकि
गमलों मे लगे बोन्साई
तुम से
कुछ कह नहीं सकते

ओ बादलों !
चोरी और सीना जोरी
मेरी स्वाभाविक फितरत है
यह तुम भी समझते हो
फिर भी
क्यों नहीं बरसते हो

चलो
अब ज़्यादा
नखरे मत दिखाओ
जल्दी से आओ
बरस भी जाओ

शायद
तुम्हारे बरसने से
झुलसती धरती के
ज़ख़्मों को
कुछ राहत मिले
और नयी कोंपल देख कर
मैं लूँ सबक
उसे सहेजने का।


©यशवन्त माथुर©

'मैं' और 'मेरी' शब्द -मानव जाति के लिये प्रयोग किए हैं

17 June 2012

ज़रूरी है ....

चुपके से खींचा गया फोटो-09/06/2012 
सिर पर
एक हाथ ज़रूरी है
हर पल का साथ
ज़रूरी है
आते जाते कदमों पर
एक एहसास ज़रूरी है

ज़रूरी हैं
कल की यादें
आज और
कल की बातें

ज़रूरी है
वही प्रेरणा
वही विश्वास
जो कल था
और
आज भी है
मेरे लिये
मेरे साथ
हमेशा की तरह!

©यशवन्त माथुर©

16 June 2012

टूटना

टूटना
एक शीशे का हो
सपने का हो
या रिश्ते का हो

टूटना
दिल का हो
बात का हो
या वादे का हो

टूटना
कसमों का हो
रस्मों का हो
या तिलिस्मों का हो

अच्छा होता है
कुछ चीजों का टूटना
और टूट कर बिखरना
उस एहसास के लिये
कि जुड़ना
आसान नहीं होता।


©यशवन्त माथुर©

15 June 2012

क्षणिका

कहीं ये न हो 'निराश' कि
लौ के बुझ जाने पर
जश्न मनाने लगें
पर्दानशीं चिराग।

©यशवन्त माथुर©

FB Status-14/06/2012

'निराश'=मेरा उपनाम जिसे बहुत कम प्रयोग करता हूँ। 

14 June 2012

अनकही बातें

कहीं रत जगे हैं 
कहीं अधूरी मुलाकातें हैं  
हवाओं की खामोशी में 
आती जाती सांसें हैं । 

डरता है कुछ कहने से 
मन की अजीब चाहतें हैं 
किसी कोने मे दबी हुई 
अब भी अनकही बातें हैं।

©यशवन्त माथुर©

12 June 2012

क्षणिका

ए वक़्त !
बस इतना सा एहसान कर दे
धूल के गुबार की तरह
मेरा ज़र्रा ज़र्रा उड़ता जाए
और कहीं खो जाए
ज़मीं पर गिरने से पहले।

©यशवन्त माथुर©

11 June 2012

कुछ अविश्वसनीय चित्र

 रोज़ तो आप मेरी रचनाएँ पढ़ते ही हैं लेकिन आज आप सभी के साथ कुछ अविश्वसनीय चित्र साझा कर रहा हूँ जो मुझे यशोदा दीदी ने मेल पर भेजे हैं । यह चित्र देखने मे किसी कैमरे से खींचे गये लगते हैं जबकि वास्तव मे इन्हें पेंसिल से बनाया गया है।  

चित्रकार हैं -श्री पॉल कैडन ।  



"Artist's drawings take between three and six weeks to create and sell for up to £5,000 each. These might look like photographs, but it's not all black and white when it comes to the work of this artist.

Despite looking like they have been captured on a camera, these are actually hand-drawn images created by hyper realist artist Paul Cadden. The 47-year-old, from Scotland , is able to recreate photos in amazing detail, often just using only a pencil.


From the wrinkles on a woman's face, a puff of smoke from a cigarette or dripping water - Cadden's drawings look unbelievably realistic."

















 

साभार-http://mails.forwards4all.com

09 June 2012

'मैं' और 'वो'

मुझे फिकर है
बिजली जाने की
इन्टरनेट से
दूर हो जाने की
मुझे फिकर है
खुद की
खुद के घर की
मुझे फिकर है
औरों के सुख की
खुद के दुख की
मुझे फिकर है
सिर्फ उनकी
जिन्हें मैं जानता हूँ
पहचानता हूँ
क्योंकि
इस आवरण से
नहीं निकल सकता
बाहर
चाह कर भी

एक ये 'मैं' हूँ
घोर स्वार्थी
जो खुद के लिये
सिर्फ खुद का है 

और एक 'वो' है
जो सबके लिये
और सबका है
'वो'
जो खुद के घर से
मीलों दूर
रेगिस्तान की
तपती रेत में भी
तरोताजा है
'वो' जो
भयंकर शीत मे भी
जुझारू है
कभी बंकर के भीतर
कभी बाहर 
जिसके जज़्बात
दबे हुए हैं भीतर कहीं
जो एक पल को
शायद कभी
कुलबुलाता है
जब कोई उसकी
राह देखता
बुलाता है 

'वो'
जो सैनिक है
मुझ से
बहुत अच्छा है
'मैं' कागजी शेर हूँ
और 'वो'
सच में दहाड़ता है।

  
©यशवन्त माथुर©

08 June 2012

नेता जी गुस्से मे हैं

पड़ोस मे रहने वाले
नेता जी
आज बहुत गुस्से मे हैं 
लड़ रहे हैं
सभासद का चुनाव
अक्सर देते हैं
सफाचट मूछों पर ताव  
आज अचानक वो बोले
आओ बिजली घर पर
हल्ला बोलें
जब तब चली जाती है
देर तक नहीं आती है
ट्रेलर बहुत दिखाती है
हमरा वोट कटवाती है

निकला जब जुलूस
हुई किरपा जे ई जी की
लौट  के जब सब घर को आए
कटिया कटी
नेता जी की

अब सर झुकाए
भन्नाए ,बड़े अनमने  हैं
नेता जी गुस्से मे हैं। 


[सच से कहीं दूर ये पंक्तियाँ पूरी तह काल्पनिक हैं;सच सिर्फ इतना है कि यहाँ लाइट बहुत आ जा रही है ]

©यशवन्त माथुर©

06 June 2012

आम आदमी हूँ मैं

अभी 2 दिन पहले यशोदा दीदी ने फेसबुक पर एक स्टेटस दिया था। उसी स्टेटस से प्रेरित कुछ पंक्तियाँ-


न महलों मे रहता
न कारों मे चलता
न जहाजों मे उड़ कर
कहीं जाता हूँ मैं

न नेता न अभिनेता
न वादों से मुकरता
जो कहता
वो रोज़ निभाता हूँ मैं

अखबार मे रोज़ छपता
टूट टूट कर बिखरता
मुसीबतों मे जीने की
अजब कहानी हूँ मैं 

जो गर्मी मे झुलसता
शीत मे ठिठुरता
रोज़ भूख से बिलखता
आम आदमी हूँ मैं

©यशवन्त माथुर©

03 June 2012

गोरख धंधा

सोच रहा हूँ शुरू करूँ
आज से मैं भी गोरख धंधा
चार आँखें हों चढ़ी नाक पे
बोलूँ फिर भी खुद को अंधा

कैसा होगा ऐसा धंधा
जिसमें पैसा -रुपया होगा
अकल घुलेगी घुटी भांग संग
बाप बड़ा न भैया होगा

ऐसा धंधा चोखा होगा
जिसमे केवल धोखा होगा
एक भरेगा अपना झोला
लुट पिट रोना दूजा होगा

चार अक्षर चालीस छपेंगे
घट बढ़ गड़बड़ मोल भरेंगे
इस धंधे की माया ऐसी
मोल तोल मे झोल करेंगे

माफ करो मुझ से नहीं होगा
कैसे मन ने सोचा ऐसा
रूख सूख का गरूर है खुद को 
नहीं चाहिये खोटा पैसा

गोरख धंधा,गोरख धंधा
अरबों का है मूरख धंधा
आज ऊंच कल नीच पड़ेगा
मंदा होगा जब ये धंधा 

तब मत कहना मुझ को अंधा।

©यशवन्त माथुर©

02 June 2012

आपका साथ और ये 2 वर्ष ..........

जून का दूसरा दिन और दो साल पूरे करने के बाद यह ब्लॉग अब अपने 3 रे वर्ष मे प्रवेश कर रहा है। 2010-11 की तुलना मे 2011-12 काफी कुछ सिखाने और दिखाने वाला रहा। ब्लॉग के बारे मे तकनीकी जानकारी मे वृद्धि हुई;और सब से बड़ी बात यह कि बहुत से अच्छे दोस्त मिले ,कुछ लोगों से मिलने का मौका भी मिला और कुछ लोगों से फोन पर भी संपर्क हुआ जो अब तक कायम है। हाँ इस दौर मे कुछ दोस्तों से दोस्ती टूटी भी ,जो भ्रम थे उन पर से पर्दा भी हटा और ब्लोगिंग के साथ चल रहे कुछ लोगों के गोरख धंधों का भी पता चला।

फिलहाल मेरे पास ज़्यादा कुछ कहने को नहीं सिवाय इसके कि आप सभी पाठकों के असीम स्नेह के लिए तहे दिल से आभारी हूँ और आशा करता हूँ कि आगे भी आपका स्नेह इसी प्रकार बना रहेगा।

प्रस्तुत है मेरी एक पुरानी कविता जो पहले भी इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है--


नए दौर की ओर


शुरू हो गया
फिर एक नया दौर
कुछ आशाओं का
महत्वाकांक्षाओं का
कुछ पाने का
कुछ खोने का
नीचे गिरने का
उठ कर संभलने  का
उसी राह पर
एक नयी चाल चलने का

ये नया दौर
क्या गुल खिलायेगा
कितने सपने
सच कर दिखाएगा
दिल के बुझे चरागों को
क्या नयी रोशनी दिखाएगा

नहीं पता.

नहीं पता -
क्या होगा
क्या नहीं
वक़्त की कठपुतली बना
मैं चला जा रहा हूँ
एक नए दौर की ओर

नए दौर की ओर
जहाँ
पिछले दौर की तरह
चलता रह कर
फिर से इंतज़ार करूँगा
एक और
नए दौर का.

<<<यशवन्त माथुर>>>
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