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28 August 2012

खड़ा हूँ

पिछली कई सदियों से
खड़ा हूँ
इस चौराहे पर
चकाचौंध पर
सैकड़ों दिन
सैकड़ों रातें बीत चुकीं
मैं
बस यूं ही खड़ा हूँ

चेतना रहित तो नहीं हूँ
उस पार देख रहा हूँ
दाएँ कभी बाएँ देख रहा हूँ

इस चौराहे पर
कोई बाधा नहीं है
लोग आ रहे हैं
जा रहे हैं
अपनी राह
अराजकता है
फिर भी दुर्घटना नहीं

मेरे कदमों मे कंपन है
एक पल की सोच
बढ़ जाऊँ
एक पल की सोच
रुक जाऊँ
उलझन है
क्या करूँ ?

मैं यूं ही रहूँ
या चलने लगूँ
इस अर्ध जड़त्व का
कुछ तो असर होना ही है

पर क्या यह संभव है
गिरूँ तो मैं गिरूँ
पर
चोट धरती को न लगे

सोच रहा हूँ
बस इसीलिये खड़ा हूँ। 

©यशवन्त माथुर©

27 August 2012

अरे तुम तो इतने छोटे हो :)

तस्लीम-परिकल्पना सम्मान समारोह एवं अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन से लौट कर बस आया ही हूँ।

एक जगह इतने सब लोगों से मिलना वास्तव मे एक अलग ही एहसास रहा। यह भी महसूस हुआ कि लोग मुझे कम से कम मेरे नाम से जानते तो हैं :) यह बात और है कि काफी लोग शक्ल से मुझे पहचान नहीं सके। सबसे पहली मुलाक़ात संजय भास्कर जी से हुई,इनके बाद आदरणीय अमित श्रीवास्तव सर एवं निवेदिता आंटी से मिलना बेहद अच्छा लगा। चौकने वाली बात दो बार हुई जब पहली बार सुनीता शानू जी ने बोला "अरे तुम तो इतने छोटे हो"  और यही बात आदरणीया वंदना अवस्थी दुबे जी,इस्मत जैदी जी एवं शेफाली पांडे जी से मिलने पर भी हुई ;उनका भी यही कहना है कि अपनी फोटो मे मैं बहुत बड़ा दिखता हूँ लेकिन हूँ बहुत छोटा :) सही बात भी है आप सब से  छोटा तो हूँ ही :) और इसीलिए आप सभी के आशीर्वाद का आकांक्षी रहता हूँ। 

दिखता हूँ न छोटा :D:D:D:D (वंदना अवस्थी दुबे जी के साथ मैं और मेरे पिता जी )

विशेष रूप से आदरणीया शिखा वार्ष्णेय जी,राजेश कुमारी जी ,अर्चना चावजी जी ,वीणा श्रीवास्तव जी,निधि टंडन जी, रागिनी मिश्रा जी,गरिमा पांडे जी ,मुकेश कुमार सिन्हा जी ,रवि शंकर श्रीवास्तव जी,अविनाश वाचस्पति जी,संतोष त्रिवेदी जी,उदय वीर सिंह जी,धीरेन्द्र भदौरिया जी,आशीष जी,अरुण निगम जी,रविकर जी,रूप चंद शास्त्री जी,बी एस पाबला जी ,शिवम मिश्रा जी एवं नीरज जाट जी से भी प्रत्यक्ष  मिल कर बेहद अच्छा लगा।

अरुण निगम जी और उदयवीर सिंह जी के साथ

आदरणीय गिरीश पंकज जी इतने बड़े साहित्यकार होने के बाद भी जिस स्नेह  से मिले और उन से बात हुई मेरे लिये उन से कुछ पल मिलना मात्र भी आशीर्वाद से कम नहीं है।

संजय भास्कर जी,धीरेन्द्र भदौरिया जी और उदयवीर सिंह जी के साथ

मेरी नज़र मे यह कार्यक्रम एक बेहद सफल आयोजन रहा जिसके लिये आदरणीय रवीन्द्र प्रभात जी,ज़ाकिर अली जी एवं रणधीर सिंह सुमन जी को विशेष धन्यवाद।

चित्रों के लिये आदरणीया वंदना अवस्थी जी एवं धीरेन्द्र जी का विशेष आभार एवं धन्यवाद !
(post re updated on 31/08/2012)


यशवन्त माथुर


22 August 2012

कुछ

अभी तक
कुछ नहीं है मन में 
फिर भी
मन हो रहा है
कुछ करने का
कुछ कहने का
यह आदत है
मजबूरी है
या नौकरी
नहीं पता
बस
बाहर होती
रिमझिम को देख कर
नहा धो कर
ताजगी से 
खिलखिलाती घास-
फूल-पत्तियों को देख कर
सोच रहा हूँ
लौट जाऊं
फिर से बचपन की ओर
और कौतूहल से
निहारता रहूँ
आते -जाते,
बिखरते-सिमटते
काले बादलों को
उन कुछ पलों तक
जब तक
मन न भरे।  


©यशवन्त माथुर©

19 August 2012

उजला-काला

वर्तमान के उजले
मुखौटे के भीतर
भविष्य का काला सच दबाए
कुछ लोग चलते जाते हैं
अपनी राह
पूरे होशो हवास मे
आत्मविश्वास मे

वो जानते हैं
भेड़चाल का परिणाम
झूठ का सच मे बदलना  है

समय के साथ
धुलना तो है ही
इस सफेदी को
पर तय है
कालिख का
प्रसाद चख कर
अंध भक्तों को 
बिना संभले गिरना है

क्योंकि मुखौटे की
अस्थायी ,स्थायी पहचान
देखने नहीं देती
खरोच पर उभरी
काली लकीर को। 


©यशवन्त माथुर©

15 August 2012

यही एक दिन है

सभी पाठकों को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
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एक साल में
एक दिन यही है
जब भूल जाता हूँ
देखना
फुटपाथ के किनारे
भूख से बिलखते
मासूमों को
मटमैले बदन पर
एक धोती में सिमटी
उस मज़दूरनी को
और उसे घूरती
लालची नज़रों को

यही एक दिन है
जब भूल जाता हूँ
देखना
नींव का पत्थर रखते हाथों को
अट्टालिकाओं की ऊंची दीवारों को रंगते
ज़िंदा इंसानी पुतलों को

यही एक दिन है
जब भूल कर
अपनी कंगाली
मैं दौड़ पड़ता हूँ
प्रभातफेरी के साथ 
हाथ मे लेकर तिरंगा
और शान से कहता हूँ
मेरा भारत महान !

©यशवन्त माथुर©
यह पोस्ट http://jmkyashwant.wordpress.com पर भी उपलब्ध है।

11 August 2012

त्रस्त है.....अभ्यस्त है

इन्हें शब्दों के बिखरे टुकड़े कहना सही रहेगा । अलग अलग समय पर अलग अलग मूड मे लिखे कुछ शब्दों को एक करने की कोशिश कर के यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ--

जनता त्रस्त है,पार्षद मस्त है
मेयर व्यस्त है,विधायक भ्रष्ट है
सांसद को कष्ट है ,मौसम भी पस्त है

कहीं गरज है, छींटे हैं ,बौछारें हैं
कहीं सूखा है,बाढ़ है ,कातिल फुहारें हैं

दरवाजों के बाहर , कहीं जूठन फिक रही है
कहीं कुलबुलाती आँतें,और आँखें सिसक रही हैं

कहीं सड़ता गेहूं -चावल, बह कर के बारिश में
फिर भी 'वो' समझते हैं,फैले हाथ मोबाइल की फरमाइश मे

अब क्या कहें कि गहराते अँधेरों में
सच का उजाला तो गहरी नींद में हसीन सपना है
सोच रहा हूँ परायों की रंगीन बस्ती में
किस मुखौटे के पीछे कौन सा चेहरा अपना है 

है यही सच कि कोई माने या न माने -
पस्त है कष्ट, और भ्रष्ट व्यस्त है
मस्त है खुद में 'आम',त्रस्त है ,अभ्यस्त है

©यशवन्त माथुर©

06 August 2012

भूल गया क्यों तुम को?

लगभग साल भर से यह पंक्तियाँ ड्राफ्ट में सुरक्षित थीं। पूर्व में अन्यत्र प्रकाशित अपनी इन पंक्तियों को अपने ब्लॉग पर आज प्रकाशित कर रहा हूँ-


उस क्षण !
मैंने तुमको
किया था
याद बहुत
जब
गहरे अंधेरों में
खुद को
डूबता पाया था
उस क्षण !
जब मैं गिन रहा था
साँसे
गुमनामी की
रोग शैय्या पर
लेटे हुए
मैं याद करता था
तुम को

उस क्षण !
जब मेरे अपने
होते जा रहे थे दूर
नाज़ुक से
मुलायम हाथों को
छिटक कर
मैं
हाथ जोड़े खड़ा था
तुम्हारे सामने

समय का
तेज चलता पहिया
न जाने
कब वो दिन बीत गए
पूरे होते सपनों की उड़ान में
अनोखी आशाओं के
मखमली बिस्तर पर
मैं भूल गया था
तुमको

और अब
फिर झेल रहा हूँ
झंझावातों को
खड़ा हूँ
हाथ जोड़े
तुम्हारे सामने
झुकी नजरों से
मांग रहा हूँ
आसरा
तुम्हारे आँचल में

मैं शरमा रहा हूँ
कुछ भी कहने में
तुम्हारी मूरत से
नज़र मिलाने का साहस
अब नहीं रहा

काश !
उसी तरह तुमको
रखता साथ
मन के भीतर
किसी कोने में
तो शायद
मेरा आज
आज न होता
जी रहा होता
मैं
सुनहरे बीते कल को
आज बना कर

कर रहा हूँ
खुद से एक प्रश्न
भूल गया क्यों तुम को ?
उन पलों में .

©यशवन्त माथुर©

04 August 2012

भ्रम

एक सच है
एक झूठ है
एक मुखौटा है
एक असली चेहरा है
एक शतरंज है
एक मोहरा है
एक साँप है
एक सपेरा है
एक अंधेरा है
एक सवेरा है
एक प्रश्न बहुत टेढ़ा है
किसका साथ दूँ ?
जब सब कुछ साफ है
है पट्टी बंधी आँखों पे
पर क्या इंसाफ है ?
मति भ्रम कहो या
या पैदाइशी दृष्टि भ्रम
मैंने सोचा है
सच की आग में
झुलसुंगा।


©यशवन्त माथुर©

01 August 2012

'दो'

आदत है अँधेरों में जीने की 
तो क्या चीज़ उजाला है 
एक तरफ है झक सफ़ेद 
एक तरफ काला है  

कहीं इस समय दिन है 
कहीं पे रात है 
कहीं भरी दुपहर है 
कहीं शाम की बात है 

मावस की लकीरों में 
कहीं उदास है जिंदगी 
पूनम की महफिलों में 
कहीं खास है जिंदगी 
 
दो रूप हैं ,दो रंग हैं 
एक लुभाता ,एक अखरता है 
जो पूरा है,अधूरा भी है 
दो नज़रों से एक दिखता है

आदत है दो में जीने की 
क्या कर सकता एक अकेला है 
काला सफ़ेद तो निश्चित होगा 
जिंदगी का यही झमेला है


(दो दिन बिजली ग्रिड की गड़बड़ी से प्रेरित )


 ©यशवन्त माथुर©
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