सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यद्यपि मेरे अपने लिखे का स्तर कहीं भी प्रकाशन योग्य नहीं है, फिर भी यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

22 August 2012

कुछ

अभी तक
कुछ नहीं है मन में 
फिर भी
मन हो रहा है
कुछ करने का
कुछ कहने का
यह आदत है
मजबूरी है
या नौकरी
नहीं पता
बस
बाहर होती
रिमझिम को देख कर
नहा धो कर
ताजगी से 
खिलखिलाती घास-
फूल-पत्तियों को देख कर
सोच रहा हूँ
लौट जाऊं
फिर से बचपन की ओर
और कौतूहल से
निहारता रहूँ
आते -जाते,
बिखरते-सिमटते
काले बादलों को
उन कुछ पलों तक
जब तक
मन न भरे।  


©यशवन्त माथुर©

38 comments:

  1. badhiya kavita yashvant bhai... bachpan hamare bhitar taaumr jinda rahta hai

    ReplyDelete
  2. लौट जाऊं
    फिर से बचपन की ओर
    और कौतूहल से
    निहारता रहूँ
    आते -जाते,
    बिखरते-सिमटते
    काले बादलों को
    चलो साथ चलते हैं
    बहुत दिनों से
    मेरा भी मन कर रहा है .... :)

    ReplyDelete
  3. badi sundar panktiyan hai yaswant jee....

    ReplyDelete
  4. lout jau fir bachpan ki aur....

    ReplyDelete
  5. जो मन कहे वो करो.....
    और बच्चा बनना अच्छा है...
    अपने भीतर के बच्चे को कभी बड़ा न होने देना यशवंत...
    सस्नेह
    अनु

    ReplyDelete
  6. बड़े हो गए हैं, लोग क्या कहेंगे यह सोचकर हम स्वयं को कितने सहज-सुलभ सुख से वंचित कर लेते हैं।

    सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  7. अच्छा तो यह होगा कि बाल-मन के साथ बरसात में नहाने निकला जाए. बचपन की याद दिला गई कविता.

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर रचना यशवंत जी..

    ReplyDelete
  9. मन बच्चा है
    इसलिए सच्चा है
    कभी कभी बच्चा होना भी
    बहुत अच्छा है..
    :-) :-)

    ReplyDelete
  10. रिमझिम को देख कर रुकना नहीं चाहिए ..
    बाहें खोल कर समां लेना चाहिए उन बेहिसाब बरसती बूंदों को ..
    जाने ये पल फिर आये न आये..
    आखिर एक बचपना हम सभी के मन में है ..

    ReplyDelete
  11. बहुत ही सुन्दर कविता भाई यशवंत जी |

    ReplyDelete
  12. जब मन कहे जी लेना चाहिए बचपन के उन पलों को जब तक मन न भरे... बहुत सुन्दर भाव...

    ReplyDelete
  13. काश कि हम सब लौट पाते फिर ...जीवन की व्यस्तताओं को छोड़कर ....

    ReplyDelete
  14. यशवंत जी नमस्ते ,
    कुछ समय पूर्व मेरे छोटे भाई के निधन से विचलित हो कर ब्लोगिंग भी भूल गई थी |आज आपकी पोस्ट ने आशा दिखाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीया संगीता जी
      बहुत दुख हुआ यह जान कर । ईश्वर से कामना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें।

      Delete
  15. Aur yaswant Bhai Kaise ho. Tumhe pad kar aur dekhkar achaa lag.(devendra Singh Mehta)

    ReplyDelete
    Replies
    1. बस भाई बढ़िया हैं। आप कैसे हो ?
      पसंद करने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।

      Delete
  16. लौट जाऊं
    फिर से बचपन की ओर
    और कौतूहल से
    निहारता रहूँ
    आते -जाते,
    बिखरते-सिमटते
    काले बादलों को
    उन कुछ पलों तक
    जब तक
    मन न भरे।

    बालक मन जितना सोचे कम

    ReplyDelete
  17. बचपन की याद दिलाती प्यारी रचना,,,,,

    RECENT POST ...: प्यार का सपना,,,,

    ReplyDelete
  18. बचपन तो बचपन ही होता है ..फिर कौन बड़ा होना चाहता है..?सुन्दर भाव ...शुभकामनाएं यशवन्त..

    ReplyDelete
  19. बहुत बढिया ।

    ReplyDelete
  20. बचपन में लौटना सबको अच्छा लगता है !
    कोमल भाव से सजी अच्छी रचना !
    आभार !

    ReplyDelete
  21. बहुत सुन्दर भाव ... बधाई :)

    ReplyDelete
  22. बहुत सुन्दर भाव ... बधाई :)

    ReplyDelete
  23. आपकी ख्वाहिशों को पंख लग जाएँ...

    ReplyDelete
  24. बादलों को देखो, रिम-झिम बौछारों को देखो,
    घर की छत पर हर नाली को बंद कर...
    एक नदी बना लो...
    फिर उसमें खुद भी तैर लो.....
    और काग़ज़ की कश्ती भी तैराओ... :-)
    ~God Bless !!!

    ReplyDelete
  25. बचपन के दिन भी क्या दिन थे .... सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  26. निहारता रहूँ
    आते -जाते,
    बिखरते-सिमटते
    काले बादलों को
    उन कुछ पलों तक
    जब तक
    मन न भरे।
    बरसात मे बचपन ज़रूर याद आता है ...!!
    मधुर यादें भी दे जाता है ...!!
    शुभकामनायें यशवंत ...!!

    ReplyDelete
  27. बहुत अच्छा लिखा है यशवंत जी!

    ReplyDelete
  28. मन यूँ ही क्या क्या चाह लेता है... सुन्दर रचना, बधाई.

    ReplyDelete
  29. पढ कर हर किसी का मन एक बार तो बचपन के उस आंगन को जरूर झाँक आया होगा जिसके किसी कोने में आज भी हमारी शरारतें हमारा इन्तजार कर रही हैं , और यही इस कविता के सफलता है

    ReplyDelete
  30. बिखरते-सिमटते
    काले बादलों को
    उन कुछ पलों तक
    जब तक
    मन न भरे।....

    सुन्दर रचना, बधाई....

    ReplyDelete
  31. बादलों और फुहारों को निहारते हुए कभी मन नहीं भरता...
    सुंदर रचना!!

    ReplyDelete
  32. bachpan ko hum abhi bhi jinda rakh sakte hai :) Very Nice Poetry :)

    ReplyDelete
  33. बचपन की यादें ताज़ा कराती हुई ,,,बहतरीन रचना...

    मेरा ब्लॉग आपके इन्जार में,समय निकाल कर पधारिएगा-
    "मन के कोने से..."
    आभार..!

    ReplyDelete
  34. बहुत प्यारी-सी कविता

    ReplyDelete

कृपया किसी प्रकार का विज्ञापन कमेन्ट मे न दें।
कमेन्ट मोडरेशन सक्षम है। अतः आपकी टिप्पणी यहाँ दिखने मे थोड़ा समय लग सकता है।

Please do not advertise in comment box.
Comment Moderation is active.so it may take some time in appearing your comment here.

+Get Now!