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30 October 2012

सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

शाम घनेरी हो चली है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
राह अंधेरी हो चली है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

चाँदनी बिखरने लगी है
टूट कर रात की बाहों में
शबनम अब गाने लगी है
सूनी सूनी फिज़ाओं में

मावस की आहट लगी है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
झुरमुटों में सरसराहट मची है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

कल्पना रूठ कर चली है
कलम में हलचल मची है
मन स्वयंभू कवि है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ ।

©यशवन्त माथुर©

27 October 2012

दर्द

(दर्द की वजह से सूजा हुआ गाल
जिसने यह पंक्तियाँ लिखने को प्रेरित किया)
 
बदलते मौसम का असर
लापरवाही में
दे देता है
नजला,जुकाम,बुखार
बदन दर्द
और इस बहाने
मिल जाते हैं 
दो पल
कुछ सोचने को  ।
दवा के असर के साथ
इन्टरनेट की अंधेरी
गुमनाम गलियों में
फेसबुक और ब्लॉग पर
रची तमाम पहेलियों में
कभी कभी नज़र आता है
बेहिसाब दर्द
जो कभी
खुद के ज़ख़्मों को
कुरेदने से उठता है
और कभी
जहर बुझे
शब्द तीरों की
तीखी चुभन से।
'लाइक' और 'कमेन्ट' की दवा 
'शेयर' का संक्रमण
और बढ़ाती ही है
पर दर्द
पूरी तरह जज़्ब नहीं होता
सिर्फ सोता है
कुछ पल की नींद में
अपना असर
फिर दिखाने के लिये। 
 

©यशवन्त माथुर©

24 October 2012

मुझे नहीं पता.....

सभी पाठकों को सपरिवार विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ--

हर रोज़
न जाने
कितने ही रावण
दिख जाते हैं
जीवन के इस प्रवाह में
कितने ही राम,ल्क्ष्मण
और सीता
कितने ही लव-कुश
और अनगिनत 
चरित्र
करीब आ कर
धीमे से
मन को छूते हैं
और चल देते हैं
अपनी राह ।
एहसास होने के
पहले ही
बन जाते हैं
कल्पना का अंश
छप जाते हैं
कविता,कहानी या उपन्यास
के किसी पृष्ठ पर
लेखकीय भूमिका
देश-काल और वातावरण को
पुनर्जीवित करते हुए
बहा ले चलते हैं
पाठक को
अपने साथ ;
किन्तु
हर रोज़
न जाने कितने ऐसे हैं ?
जो समझते हैं
रावण के ज्ञान का दंभ 
राम चरित का मर्म
लक्ष्मण और सीता का धर्म।
सिर्फ प्रवचन और
पंडाल की कथा
राम लीला का मंचन
पुतले का दहन
मनोरंजन के सिवा
क्या देता है
मुझे नहीं पता।


©यशवन्त माथुर©

20 October 2012

आँखों देखी......

कभी कभी राह चलते स्मृति पटल पर हमेशा के लिये अंकित हो जाने वाले दृश्य दिख जाते है। प्रस्तुत पंक्तियाँ 4-5 दिन पूर्व देखे ऐसे ही एक दृश्य को शब्द देने का प्रयास मात्र हैं---

(हनुमान सेतु )
गहराती उस
आधी रात को
हनुमान सेतु* के
सन्नाटे में
ऊंची जलती स्ट्रीट लाइट्स
और नीचे गोमती के शीशे में
खुद को ताकता
काला आसमान
शायद देख रहा होगा
मेरी तरह मौन साधे
रेलिंग के सहारे
दो कपड़ों में सिमटा
गहरी नींद में खोया
एक मानव शरीर
जिसके सिर के बालों को
संवार रहा था एक श्वान
अपनी जीभ से।

दिन भर की थकान के बाद
इस सुखद एहसास को
महसूस न कर पाने का मलाल
टूट कर गिरते
उस तारे को भी हुआ होगा
जिसे देखा मैंने
बेपरवाह दौड़ते टेम्पो की
गद्देदार सीट पर बैठ कर
तेज़ आवाज़ में गूँजता 
"जीना यहाँ मरना यहाँ "
सुनते हुए।

©यशवन्त माथुर©

*हनुमान सेतु लखनऊ का एक प्रसिद्ध पुल है  जिसे कभी मंकी ब्रिज भी कहा जाता था ।

16 October 2012

उसे महफूज रखना

सुबह से सुन रहा हूँ
फिल्मी पैरोडी पर
गूँजते भजनों का शोर
कभी तेज़
कभी धीमा संगीत
जिसके पार्श्व में
दबते से ,सिकुडते से बोल
न जाने कौन से
खोल में छुपे हुए हैं
हर ओर
बह रहा है 
सिर्फ संगीत ही संगीत
जिसके साथ
बहता जा रहा हूँ
मैं भी
गुनगुनाता जा रहा हूँ
फिल्मी गाना
अखबार मे छपी
मलाला की तस्वीर की
कल्पना करते हुए 
दुआ करते हुए
देवी माँ
उसे महफूज रखना
धरती की गोद में।

©यशवन्त माथुर©

10 October 2012

न जाने क्यों ?

आते जाते
राहों पर
तिराहों-चौराहों पर
मंदिर -मजारों पर
गिरिजा-गुरुद्वारों पर
मैं देखता हूँ
हाथ फैलाए खड़े 
लठिया टेक लोगों की
अनोखी दुनिया को

आसमान की
खुली छत के नीचे
बसने वाला आदिम युग
खत्म होती सब्सिडी से
बेखबर हो कर भी
बा खबर रहता है
अगले फुटपाथ पर
गूँजती नयी किलकारी से
ईद और दीवाली से

अब एक कमरे मे सिमटी
लाखों किलोमीटर की
गोल दुनिया
छोटी लगती है
लठिया टेक लोगों की
दो गज़ चादर से

न जाने क्यों ?

©यशवन्त माथुर©

05 October 2012

रोज़ सुबह-शाम ..........

रोज़ सुबह-शाम
हर गली -हर मोहल्ले में
मची होती है
एक तेज़ हलचल
नलों में पानी आने की
आहट के साथ  
मेरे और सब के घरों में
टुल्लू की चीत्कार
शुरू कर देती है
अपना समूह गान

किसी की
कारें धुलने लगती हैं
किसी के डॉगी नहाने लगते हैं
और कोई
बस यूंही
बहने देता है
छत की
भर चुकी टंकी को

और उधर
बगल की बस्ती में
जहां रहते हैं
'नीच' और
'फुटपाथिया' लोग
जिनके पास टुल्लू नहीं -

म्यूनिस्पैल्टी के
नल से बहती
बूंद बूंद अमृत की धार को
सहेजने की कोशिश में
झगड़े होते हैं

पास के गड्ढे में
एक डुबकी लगा कर
हो जाता है 
बच्चों का गंगा स्नान
धुल जाते हैं
कपड़े और बर्तन

रोज़ सुबह -शाम
मैं यही सोचता हूँ
काश 'इनकी' मोटर बंद हो
और रुक जाए
छत की टंकी से
पानी का बहना
और 'वो' कर सकें
अपने काम आसानी से

पर
संपन्नता का
क्षणिक गुरूर
शायद महसूस
नहीं कर सकता
विपन्नता के
स्थायी भाव को!


©यशवन्त माथुर©

02 October 2012

झूठ की मधुशाला में ......(गांधी जयंती विशेष)


















झूठ की मधुशाला में
जहां सच के जाम छलकते हैं
एक मेज पर प्रजा और राजा
वहाँ सबके सब बहकते हैं

सोच रहा हूँ मैं भी आज
एक बार वहाँ हो कर आऊँ 
झूठ कपट चढ़ा बांह पर
सच की छांह मे सो कर आऊँ

'बार' के सामने खड़ी कार में
बापू तुम्हारा चित्र देख कर
अरब-खरब सब खप जाते हैं
पेटी खोखा चोखा बन कर

सोच रहा हूँ वहाँ से लौट कर
उस फुटपाथ  पर टहल कर आऊँ -

जहां तुम्हारे 'वैष्णव जन'
अधनंगे हाथ फैलाते हैं
घिसट -घिसट रामधुन को गाते
दाना -पानी पाते हैं

झूठ की मधुशाला मे जो
सच के जाम टकराते हैं
आज देखना राजघाट पर
वे ही सर झुकाते हैं !


©यशवन्त माथुर©
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