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30 October 2012

सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

शाम घनेरी हो चली है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
राह अंधेरी हो चली है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

चाँदनी बिखरने लगी है
टूट कर रात की बाहों में
शबनम अब गाने लगी है
सूनी सूनी फिज़ाओं में

मावस की आहट लगी है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
झुरमुटों में सरसराहट मची है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ

कल्पना रूठ कर चली है
कलम में हलचल मची है
मन स्वयंभू कवि है
सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ ।

©यशवन्त माथुर©

18 comments:

  1. कल्पना रूठ कर चली है
    कलम में हलचल मची है
    मन स्वयंभू कवि है
    सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ ।
    बहुत सुन्दर लिखा है यशवंत विशेषकर ये पंक्तियाँ तो लाजबाब हैं

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  2. अरे वह सोचते-सोचते ही बहुत कुछ लिख दिया आपने तो...:)

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  3. कुछ भी हो ..
    कवि तो लिखेगा ही.

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  4. आपकी उम्दा पोस्ट बुधवार (31-10-12) को चर्चा मंच पर | जरूर पधारें | सूचनार्थ |

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  5. चाँदनी बिखरने लगी है
    टूट कर रात की बाहों में
    शबनम अब गाने लगी है
    सूनी सूनी फिज़ाओं में
    बिम्बो का सुन्दर प्रयोग

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  6. कल्पना रूठ कर चली है
    कलम में हलचल मची है
    मन स्वयंभू कवि है
    सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
    सोचने में इतना लिखे ,सोच लीजिएगा तो .........

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  7. बिना सोचे काफी कुछ लिखा है अब सोच कर लिखो :):)

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  8. कल्पना रूठ कर चली है
    कलम में हलचल मची है
    मन स्वयंभू कवि है
    सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ ।

    Khoob Likha Hai....

    ReplyDelete
  9. मावस की आहट लगी है
    सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ
    झुरमुटों में सरसराहट मची है
    सोच रहा हूँ,कुछ लिखूँ,,,,,,

    बहुत खूब सुंदर रचना,,,

    RECENT POST LINK...: खता,,,

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  10. सुन्दर मनोभाव............

    यूँ ही सृजन हुआ कविता का...
    सस्नेह
    अनु

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  11. कभी कभी सोच ही कब कविता बन जाती है पता ही नहीं चलता..

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  12. ab to mai bhi soch rahi hun kuch likhu..... behtreen..

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  13. कुछ लिखने की सोचकर ही इतना अच्छा लिख दिया है..
    :-)

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  14. मन स्वयंभू कवि है, सच है !!!
    बेहतरीन रचना यशवंत जी ....

    ReplyDelete
  15. मन स्वयंभू कवि है, सच है !!!
    बेहतरीन रचना यशवंत जी ....

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  16. ऐसी परिस्तिथि से अक्सर दो चार होना पड़ता है

    ReplyDelete

  17. सोचते सोचते लिख ही गयी ये रचना .. :)
    सुन्दर।
    सादर
    मधुरेश

    ReplyDelete

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