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26 November 2012

श्रद्धांजलि........(26 नवंबर विशेष)

श्रद्धांजलि
उन अनजानों को
जिनकी आँखों में
कभी बसा करते थे
कुछ ख्वाब 
सुनहरे कल के

श्रद्धांजलि
उन जाने पहचानो को
जो दर्ज़ हैं
सरकारी सफ़ेद पन्नों पर
शहीदी की अमिट स्याही से

आज
न वो अनजाने हैं
न जाने पहचाने हैं
न वो रौब है
न ख्वाब है

ज़मीं पर रह गए
अपनों के जेहन में
पल पल की घुटन है
यादें हैं
दर्द है
रह रह कर बहता
आंसुओं का सैलाब है

स्मृति चिह्नों पर
स्मारकों पर
बड़े बड़ों के 
चिंतन -मनन
स्मरण और संस्मरण
के दिन
मेरा कुछ कहना
कुछ लिखना
व्यर्थ है
क्योंकि
सांत्वना
और हरा करती है
दिल पर लगी चोट को। 

©यशवन्त माथुर©

24 November 2012

फ़लस्तीन बच्चों के प्रति .......

इजरायल द्वारा फ़लस्तीन पर मिसाइल हमले जारी हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 80% फ़लस्तीन बच्चे तनाव के शिकार हो गए हैं। 

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निदेशक श्री सुधाकर अदीब जी सहित कई मित्रों ने आज इस चित्र को फेसबुक पर शेयर किया है। 

इस चित्र को देख कर जो कुछ मन मे आया उसे शब्द देने की यह एक साधारण सी कोशिश है--
















रोता बचपन,
सिसकता बचपन
खुशी की तलाश में
भटकता बचपन

बम धमाकों की
सिहरन कंपन
खोते अपने
और नटखट पन

तोप गोलों की रार
काल बन
छीन रही चैन
चहकता उपवन

 आने से पहले यौवन
क्या नहीं देख रहा बाल मन
आकुलता व्याकुलता की  यूं
कब तक मार सहेगा बचपन

याद कर के
अपना बचपन
शायद कुछ तो
समझे दुश्मन

है कैसा यह
वहशीपन
रोता बचपन,
सिसकता बचपन

शांति की बाट
जोहता बचपन ।


©यशवन्त माथुर©

22 November 2012

नादान परिंदे......तब और अब

मेरी इस फेसबुक कवर फोटो पर वर्षा शुक्ला जी ने 'नादान परिंदे' लिख कर अपनी टिप्पणी दी थी। उनकी टिप्पणी से मिले आईडिया के आधार पर उस समय जो मन मे आया वह सबसे पहली 4 पंक्तियों के रूप में फेसबुक पर ही लिख दिया था। आज उन पंक्तियों को और बढ़ा कर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ-


 कभी नादान हुआ करते थे,अब शैतान हुआ करते हैं,
कभी बेखौफ उड़ा करते थे,अब चलने में सोचा करते हैं
परिंदे हम तब भी थे,परिंदे हम अब भी हैं
लम्हे तब साथ चलते थे,अब लम्हों में जीया करते हैं 

कुछ सपने तब भी बुनते थे, कुछ सपने अब भी बुनते हैं 
घूम फिर कर नयी राह पर,हर पल आ पहुँचते हैं 
परिंदे हम तब भी थे,परिंदे हम अब भी हैं 
तब चलते थे हाथ थाम कर,अब मन भर दौड़ा करते हैं 

कभी बातें खुद से करते थे,अब बातें सब से करते हैं 
कभी पन्नों से खुद की कहते थे,अब मन की सब से कहते हैं 
परिंदे हम तब भी थे,परिंदे हम अब भी हैं 
तब राहों की बाट जोहते थे,अब राहों पे सफर करते हैं  

कभी नादान हुआ करते थे ,अब शैतान हुआ करते हैं 
कभी लिख कर फाड़ा करते थे,अब हर अक्षर सहेजा करते हैं  
परिंदे हम तब भी थे,परिंदे हम अब भी हैं 
तब ज़मीन पे फुदका करते थे,अब आसमां में उड़ा करते हैं।  

©यशवन्त माथुर©

 

17 November 2012

कुछ लोग ऐसे भी हैं ......

न दो हाथ, न दो पैर, मगर जिंदगी जीते ही हैं
सर पे न हाथ,न साथ में साया किसी का
साँसों की मजबूरी, कि दर बदर घिसटते ही हैं
मेरे चारों ओर, कुछ लोग ऐसे भी हैं 

दिन मे तोड़ते हैं पत्थर,रात सड़क पे सोते ही हैं
खाते अमीरों की जूठन ,कीचड़ को पीते ही हैं
आसमां है जिनकी छत,तन पर चिथड़े ही हैं
मेरे चारों ओर, कुछ लोग ऐसे भी हैं

गुजरती रेलों,उड़ते जहाजों को देख कर
सजी धजी मेमों,सूटेड साहबों को देख कर
ये 'ज़ाहिल' भी साहिल के सपने देखते ही हैं
मेरे चारों ओर, कुछ लोग ऐसे भी हैं   । 
 

©यशवन्त माथुर©

15 November 2012

ख्यालों के रास्ते

बढ़े अजीब होते हैं
ये ख्यालों के टेढ़े मेढ़े
रास्ते
जिन से गुज़र कर
गिरते उठते शब्द
बन बिगड़ कर
धर लेते हैं
कोई न कोई रूप 
और आखिरकार 
पा ही लेते हैं
अपनी मंज़िल

ख्यालों के
इन टेढ़े मेढ़े रास्तों पर चलना 
कभी शब्दों की
मजबूरी होती है
और कभी
स्वाभाविक इच्छा

क्योंकि
संघर्ष से ही
बिखरे शब्द
एक हो कर
रूप धरते हैं
गद्य या पद्य का। 

©यशवन्त माथुर©

13 November 2012

आज शाम को ....

 आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

आज शाम को 
मैं नहीं चाहता 
देखना 
बेबस हो कर 
कराहते रंगीन 
आसमान को 

आज शाम को 
मैं नहीं चाहता एहसास  
पटाखों के तेज़ धमाकों से 
हिलती धरती 
और बिंधते वायुमंडल में 
घुलती बारूद की तीखी गंध का 
जो लीलती है कई बेज़ुबान जीवन 
बिना कहे, बिना सुने 

आज शाम को 
मैं चाहता हूँ देखना 
खुशबू से महकता 
क़हक़हों से
चहकता आसमान 
दीयों से रोशन धरती  
खुशी से झूमते बच्चे 
कमर तोड़ महंगाई के दौर में भी 
कुछ पल मुस्कुराते चेहरे 
और भेदभाव से परे 
एक  सुकून देने वाला 
अनकहा एहसास !

©यशवन्त माथुर©

07 November 2012

बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है......

बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है
6 बजे से शाम को अंधेरा छाने लगा है
खिली होती थी इस समय कभी धूप जून के महीने में
घूमते घूमते धरती को चक्कर आने लगा है
7 बजे खोलता है सुबह सूरज भी अपनी आँखें
बादलों की रज़ाई में आसमां छुप जाने लगा है
बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है
एक चादर मे सिमट कर फुटपाथ कंपकपाने लगा है
मावस की कालिख हो या चाँदनी की चमक में
ओस की बूंदों को गिरने में मज़ा आने लागा है 
बदलते मौसम का असर नज़र आने लगा है।

©यशवन्त माथुर©

05 November 2012

क्षणिका...

इन ठंडी रातों में
मन के वीरान
मैदान पर  
जहां तहां उग आयी
ख्यालों की दूब पर
चमकती बूंदों को देख कर
ऐसा लगता है जैसे
अंधेरा भी रोता है
ओस के आँसू !

©यशवन्त माथुर©

01 November 2012

ओ चाँद!

ओ चाँद!
कोशिश करता हूँ
समझने की
अक्सर
तुम्हारी कहानी को
पूर्णिमा के दिन
जब तुम दिखते हो
किसी झरोखे से
पहाड़ों के बीच से
या ऊंचे पेड़ों की
किसी शाख के किनारे से
दिखाते हो एक झलक
मुस्कुराते हुए
बादलों के बीच
तुम्हारी लुका छिपी से
मैं कभी झल्ला भी जाता हूँ
पर
जब कभी देखता हूँ
तुम्हारी आँखों में आँखें डाल कर
ऐसा लगता है
जैसे धरती की गोद में
सिर रख कर
तुम रो पड़ोगे
ऐसा कौन सा दर्द है
जिसे अपने में समेटे
अँधेरे की चादर
ओढ़ लेते हो
ओझल हो जाते हो
अमावस की रातों में
आज बता दो
ओ चाँद !
मैं सुनना चाहता हूँ
तुम्हारी कहानी
करना चाहता हूँ
अटूट दोस्ती तुम से
तुम खामोश क्यों हो
क्यों नहीं सुन रहे
मेरी बातों को
अब चुभ सी रही है
तुम्हारी ये हंसी
कोई जवाब नहीं
आखिर क्यों
ये मौनव्रत
लिया है तुमने?
ओ चाँद!
तुम्हारी चांदनी के साये में
ओस की बूंदों जैसे
तुम्हारे आंसू
मेरे कन्धों पर गिर रहे हैं
मैं समझ रहा हूँ
फिर भी सुनना चाहता हूँ
तुम्हारी जुबां में
तुम्हारी कहानी को
बोलो न
आखिर कुछ तो कहो
ओ चाँद!
तुम खामोश क्यों हो?

©यशवन्त माथुर©

('परिकल्पना' पर पूर्व प्रकाशित यह पंक्तियाँ इस ब्लॉग के ड्राफ्ट में सहेजी हुई थीं। आज निगाह पड़ी तो अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर रहा हूँ। )
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