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25 December 2013

सेंटा हमें बताओ ना .....

सभी स्नेही पाठकों को क्रिस्मस की हार्दिक शुभकामनाएँ !

Image curtsy :google search
मचल रही बच्चों की टोली
क्या लाए हो भर के झोली
सेंटा हमें बताओ ना
खुशियाँ यहाँ बिखराओ ना

परी लोक सी चमकी  धरती
महकी धरती चहकी धरती 
और सुंदर इसे बनाओ ना
हरियाली सजाओ  ना

हम सच्चे हैं,छोटे बच्चे हैं
काले-गोरे हम ही अच्छे हैं
हम को  कुछ समझाओ ना
रंगभेद को मिटाओ ना

क्रिस्मस का दिन है, बड़ा दिन है
तुम्हारा बहुत ही बड़ा दिल है
तुम भी नाचो गाओ ना
हम में घुल मिल जाओ ना

हर बोली में दुनिया बोली 
क्या लाए हो भर के झोली
सितारे ज़मीं पे लाओ ना
सेंटा हमें बताओ ना

~यशवन्त यश©

इस रचना के लिये फेसबुक पर बाल उपवन ग्रुप की ओर से प्रदत्त प्रमाण पत्र -



02/01/2014

20 December 2013

सन्नाटे को तोड़ना है

आओ चलें कि, सर्द हवाओं का रुख मोड़ना है
आज नहीं तो कल, इस सन्नाटे को तोड़ना है

यह वक़्त खामोशी का नहीं,मूंह खोलने का है
जो कुछ दबा छुपा मन में, सब बोलने का है

कुबूल सच तो था पहले भी, इन्कार कब है
झूठ की हवेली में अदालत की, दरकार कब है

सब काबिल हैं यहाँ , माहिर अपने फन के
महफिल में सजे हुए, मोम के पुतले बन के

लहरों का ले हथोड़ा, पत्थर दिल पर वार कर
बनेगा नया इक रस्ता, हर कल को संवार कर

आओ चलें कि, इस कुहासे को झकझोरना है
अपनी कदमताल से, हर सन्नाटे को तोड़ना है ।

~यशवन्त यश©

15 December 2013

किसी के गम किसी से कम नहीं हैं

दूर जाने के अभी ये मौसम नहीं हैं
किसी के गम किसी से कम नहीं हैं

कोई चलता है धीरे कोई भाग रहा है 
उलझता है कोई सुलझता जा रहा है 

ये डोर है कैसी इसका साहिल कहाँ है 
कब्र में जी उठे कोई इस काबिल कहाँ है 

बेमौसम जिंदगी की कटती पतंग यहीं है
तस्वीरें बदलती जातीं कोई एक रंग नहीं है

मुसाफिर सफर अकेले रास्ता अनजाना है 
हमसफर न कोई यहाँ जाना पहचाना है

यह बात और है कि कोई समझता नहीं है
मन में रख कर सवाल कोई पूछता नहीं है

चौराहे कई कहीं पर मन का भरम नहीं है
रिश्ता न कोई फरिश्ता आप और हम नहीं है

दूर जाने के अभी ये मौसम नहीं हैं 
किसी के गम किसी से कम नहीं हैं  ।

~यशवन्त यश©

(भावना जी की टिप्पणी के बाद इसे थोड़ा सा बढ़ा दिया है) 

 

10 December 2013

सबसे सस्ता हर इन्सान

सब कुछ महंगा है यहाँ
रोटी कपड़ा और
मकान
सब कुछ सपना है यहाँ
हर कोई परेशान और
हैरान
फिर भी जीना है यहाँ
जी लगे
न लगे
चूल्हा जलना है यहाँ
भूख लगे
न लगे
कोई तमन्ना नहीं यहाँ
हर ओर शमशान और
कब्रिस्तान
साँसों का मोल न यहाँ
सबसे सस्ता
हर इन्सान।

~यशवन्त यश©

07 December 2013

नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे इस बगिया के फूल हैं

 यह वर्ष 2013 की 200 वीं पोस्ट है (इसे फेसबुक पर सुनीता जी के ईवेंट हेतु कुछ दिन पहले लिखा था।)


नन्हें मुन्ने प्यारे बच्चे
इस बगिया के फूल हैं

क्यारी क्यारी हँसकर कहती
ये ही कोहिनूर हैं

कच्ची मिट्टी की सोंधी खुशबू
इनके भीतर से आती है

कभी गुलाब कभी मोगरा बन कर
मन को खूब लुभाती है

इनकी मस्ती मे मस्त हो कर
आओ हम भी झूमें गाएँ

इनके ही संग मिल कर हम भी
इनके जैसे हो जाएँ।

~यशवन्त यश©

06 December 2013

इमली

खट्टी मीठी 
चटपटी 
चूरन मिली 
अटपटी 
एक दुकान पर रखी 
वो आज दिखी 
उससे जब 
नज़र मिली 
चलने लगा मन 
बचपन की गली  ....
चल चल मचल 
मचल कर जीभ
जिद्द मनवाकर 
ही टली ....
खाई उन्होने आज 
चखी हमने भी 
कई बरस बाद 
स्वादिष्ट और मीठी 
लाल इमली :)

~यशवन्त यश©

05 December 2013

धुन

बिखरी हुई हैं
हर तरफ
कुछ धुनें
जानी पहचानी
अनजानी
जो 
कभी शब्दों के संग
संगीत मे घुल कर
और कभी
दृढ़ संकल्प बन कर
कराती हैं एहसास 
खुद की अदृश्य
ताकत का
और ले चलती है
उजास की
गुलशन गली में । 

~यशवन्त यश©

04 December 2013

सोते हैं हर समय कभी तो जागते भले

 -पेश है मन की कही कुछ बेतुकी सी-

कुछ नहीं तो रात में
सपने ही भले
तुम सोओ या जागो 
अब हम तो चले

बंद आँखों मे
खुद की तस्वीर देखेंगे
सुबह उठ कर शीशे में
माथे की लकीर देखेंगे

दिन मे यूं तो सब हमें
फकीर समझेंगे
हर शाम महलों के
अमीर समझेंगे

पर्दों-मुखौटों के हर राज़
नाराज़ हो चले
सोते हैं हर समय 
कभी तो जागते भले

कुछ नहीं तो रात में
सपने ही भले
गैरों की बारात में
अपने ही भले

सोना चांदी नहीं टकसाल में
भले कांसा ही ढले
कुछ भी नहीं बाज़ार में
अब हम तो चले। 

 ~यशवन्त यश

01 December 2013

दिसंबर भी आ गया

देखो न
दिसंबर भी आ गया
देखते देखते
साल बीतने को आ गया

क्या पाया
क्या खोया
कितना हँसा
कितना रोया
कब तक जागा
कब तक सोया 
कितना झेला
कितना ढोया
कुछ ही पन्ने बचे डायरी के
जिसमे इतिहास का अक्षर बोया  

यह अंत है नया दौर फिर
नए ठौर का बौर आ गया
देखो न
दिसंबर भी आ गया ।

~यशवन्त यश©

27 November 2013

'साहब'.......(हनुमंत शर्मा जी की फेसबुक वॉल से)

आदरणीय हनुमंत शर्मा जी ने इसे कल फेसबुक पर पोस्ट किया था। इस बेहतरीन अभिव्यक्ति को इस ब्लॉग पर साभार प्रस्तुत करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ । 




साहब ,
नाम ज़रूरी ही तो अलमा कबूतरी कह लीजिये |
इस वक्त एक सद्यप्रसूता हूँ और आपकी पनाह में हूँ |
आदमी ने हमारे रहने लायक तो कोई जगह छोड़ी नहीं ,
पर आपकी बालकनी में कबाड़ देखा तो लगा मुझे मेरा ‘लेबर रूम’ मिल गया |
टब में लगी तुलसी की छाया में ,मैंने अपने नन्हे आगुन्तको के लिए घासपूस का बिछौना सजा लिया |
उस दोपहर छोटी बेबी पास ही खेल रही थी कि जैसे ही मैंने पहला अंडा गिराया , हैरान हो गयी कि टेनिस बाल कहाँ से आ गया ? दौड़कर माँ को बुलाया तब तक मेरा दूसरा अंडा भी आ चुका था |
मै आश्वस्त थी कि मै और मेरे अंडे सुरक्षित रहेंगे ..तब तक जब तक घर में जनानियाँ है..आखिर उनके भीतर भी तो एक माँ होती है छुपी हुई |
बस ज़रा डर बिल्ली का था तो वो भी जाता रहा क्योंकि मेरी रखवाली में दोनों बेबियाँ और मैडम जो थी..थी क्या हैं भी |
छोटी बेबी तो रात को भी नींद से जागकर देखती है ...और सुबह उठकर सबसे पहले मेरा हाल लेती है |
उसके संगी साथी झुण्ड बनाकर आते है मुझे देखने , कोई छूना चाहे तो बेबी डांट देती है |
उसे बेताबी है नन्हे चूजों को देखने की | पर अभी उन्हें बाहर आने में ३ हप्ते और लग सकते हैं |
अभी तो मै दिन रात अंडे सेंक रही हूँ |
आप जब ठंड से बचने के लिए अन्दर रजाई में दुबके होते है,मै बाहर अपने अंडो पर पंखों में हवा भरकर बैठी होती हूँ |अपनी गर्मी उन्हें देती हुई | अपने अंडो के लिए मै ही रजाई हूँ और मेरे लिए मेरे चूजों का सपना ही मेरी गर्मी है |
दिन चढ़े मेरा संगवारी भी आ जाता है ..फिर वह सेंकता है और मै दाना पानी के इंतजाम में जुट जाती हूँ | हम अनपढ़ होकर भी काम और गृहस्थी मिल बाँट कर चला लेते है | इसे लेकर हमारे बीच कोई थाना कचहरी नही हुई अब तक |
साहब , ..
कल जब चूजे निकल आयेंगे ...तब चिल्लपों .. आवा जाही ..खिलाना सिखाना ...बीट और गुटर गू ..सब बढ़ जायेगी ..और जब चूजे ठंड में ठिठुरते हुये रोकर आपकी नींद भी खराब कर दें तो शायद सुबह उठते ही आप हमें बालकनी से बेदखल करने का फैसला भी सुना दें ..
यदि ऐसा हो साहब ,
बस इतना याद रखियेगा कि हम आपके पुराने सेवक रहे हैं |
जब ना फोन थे ना मेल ...हम ही आपके हरकारे थे |
हमी जान जोखिम में रख पैरो में संदेश बांधकर जंग के मैदान में आते जाते थे |
हमी ने आपके मोहब्बत भरे पैगाम माशूका तक पहुँचाये |
आपके गीतों और ग़ज़ल का विषय बने |
आपके दिल बहलाने को पिंजरों में क़ैद हुये और स्वाद बहलाने को दस्तरखान पर परोसे भी गये |
तो साहब ..
याद करना और रहम करना ...
आप भी आल औलाद वाले हैं आपकी बच्चियों पर भी एक दिन यह दौर आना है |
दूसरो की मल्कियत पर कब्ज़ा जमाने की इंसानी फितरत हमने नहीं सीखी है ..
उधर बच्चे उड़े कि इधर आपकी बालकनी से हमे भी उड़ जाना है ..
और हम ही क्यों ?
एक दिन तो आपको भी सब ठाठ छोड़ छाड़ कर खाली हाथ जाना है ..
" कबीरा रहना नहीं देस बेगाना है .........."|||||


~हनुमंत शर्मा ©

25 November 2013

अजीब सी तस्वीर.....

कौन है वो
अनजान  ?
बिखरे बिखरे बालों वाला
जिसका आधा चेहरा
किसी पुरुष का है
आधा किसी स्त्री का
और उसका धड़
अवशेष है 
किसी जानवर का ....

न जाने कौन
बनाता  है
मन की काली दीवार पर
सफ़ेद स्याही से 
यह अजीब सी तस्वीर
जो दिल के दर्पण मे
परावर्तित हो कर
कराती है एहसास
सदियों से
चेहरों को ढकते
मुखौटों की चमक के
फीका होने का। 

 ~यशवन्त यश©

22 November 2013

और सफर जारी है

बिखरी चट्टानों पर
लहरों का असर तारी है
चल रही हैं सांसें
और  सफर जारी है

साँसे जिन पर
न मेरा वश है न किसी और का
मालिक ही लिखता है पता
पिछले और अगले ठौर का

उस मुकाम पे खुश हूँ
जिसे पाया है अब तलक
ज़मीं पे रह कर ही
छूना चाहता हूँ फ़लक

चलना है चल रहा हूँ 
न जाने कौन सी खुमारी है
लहरों को रोकती चट्टानें
और सफर ज़री है।

~यशवन्त यश©

20 November 2013

श्री तेंदुलकराय नम: !

बहुत गहरी नींद में अचानक उपजी इन पंक्तियों को रात 1:30 से 02:15 तक मन से कागज़ पर उतारता चला गया। सचिन साहब से अग्रिम माफी के साथ अब इस सुबह अपने ब्लॉग पर भी सहेज ले रहा हूँ-

भारत रतन ! भारत रतन !
सोना कहाँ,चाँदी कहाँ 
गरीब के बच्चे को रोज़ ही 
रोना यहाँ,दूध पीना कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नम: !

महंगाई यहाँ,मंदी यहाँ 
गर्मी यहाँ,ठंडी यहाँ 
उन्हें क्या पता ऐ सी में 
ऐसी तेसी होती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

मच्छर यहाँ,मक्खी यहाँ 
मोटी रोटी पचती यहाँ 
उनका गैस का चूल्हा है 
मिट्टी लिपी भट्टी कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

माँस नहीं,हड्डी यहाँ 
खोखो यहाँ,कबड्डी यहाँ 
उनकी तो कोका कोला है 
चुल्लू कहाँ,टुल्लू कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

सूखा यहाँ,बारिश यहाँ 
रोज़ मरते लावारिस यहाँ 
उनकी वसीयत में अरबों हैं 
सैकड़ा -हज़ार क्या करते वहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः!

गिल्ली यहाँ,डंडा यहाँ 
साँसों का हर हथकंडा यहाँ 
उनकी किस्मत में 'किरकट' है 
आसमान वहाँ,धरती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

भारत रतन ! भारत रतन !
हीरा कहाँ,मोती कहाँ 
यह तो बस अपनी भक्ति है 
भजन नहीं,आरती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

~यशवन्त यश©

 

14 November 2013

उसका बाल दिवस ......?

उसने नहीं देखा
कभी मुस्कुराता चेहरा माँ का
देखी हैं
तो बस चिंता की कुछ लकीरें
जो हर सुबह
हर शाम
बिना हिले
जमी रहती हैं
अपनी जगह पर खड़ी
किसी मूरत की तरह ....
वह खुद भी नहीं मुस्कुराता
क्योंकि ज़ख़्मों
और खरोचों से भरी
उसकी पीठ
पाना चाहती है आराम....
लेकिन आराम हराम है
उसे जुटानी है
दो वक़्त की रोटी
जो ज़रूरी है
उसके लिये
बाल दिवस की छुट्टी से ज़्यादा!

~यशवन्त यश©

11 November 2013

जिंदगी एक मज़ाक है

जिंदगी एक मज़ाक है
इसे यूं भी जीना पड़ता है 
खुशी को निगलना
गम को पीना पड़ता है

कुछ पाने के लिये
कुछ खोना पड़ता है
जो खो न सके कुछ तो
दर्द को ढोना पड़ता है

यहाँ निशाना भी है
तीर कमान भी है
यहाँ ज़मीन भी है
और आसमान भी है 

उड़ते ख्वाब
भटकते अरमान भी हैं
पूरे होने को तरसते
कुछ फरमान भी हैं

ईमान के उर्वर खेतों में
बेईमान को उगना पड़ता है
भरे पेट हो कर भी
हर दाना चुगना पड़ता है

जिंदगी एक मज़ाक है
इसे यूं भी जीना पड़ता है
कड़वी गोली जीभ में धर के 
बोलना मीठा पड़ता है।

~यशवन्त यश ©

09 November 2013

ऑर्केस्ट्रा ......


Photo:Yanni-'Tribute'














अलग अलग साज
सबकी अपनी अलग आवाज़
उनको बजाने वाले जादूगर
जाने कौन सी छड़ी
लिये फिरते हैं हाथों में
कि बन जाती है
सरगम में गुथी
एक सुरीली धुन

एक सुरीली धुन
जिसके उतार चढ़ाव
खुशी -गम
परिहास और उत्साह को 
थामे रह कर
कभी ढुलका देते हैं
पलकों से आँसू
और कभी
फड़का देते हैं
ललकारती बाहों को

ज़रूर
कोई अलग ही
शक्ति होती है 
ऑर्केस्ट्रा की तराशी हुई
अनगिनत मनकों की
एक संगीत माला में
जिसे फेरने के साथ ही
अस्तित्वहीन हो कर
इंसान
मिल जाता है  
रूहानी सुकूं की
मस्त हवा के झोकों में।

~यशवन्त यश©

07 November 2013

ये बूंदें



तन नहीं मन भिगोती हैं,
देखो बरसती ये बूंदें
मुस्कुरा कर गिरती हैं,
कहीं खो जाती हैं ये बूंदें

हर बार सोचता हूँ सहेज लूँगा
कुछ बूंदें मन की प्याली में
चूक जाता हूँ फिर भी
न जाने किस बेख्याली में

आना जाना जिंदगी का
सिखा देती हैं ये बूंदें
गम ओ खुशी की बारिश बन
कभी हँसा देती हैं ये बूंदें ।

~यशवन्त यश©

03 November 2013

मुनिया की दीवाली

सभी पाठकों को दीवाली की अशेष शुभ कामनाएँ!

आज फिर दीवाली है
आज की रात
आसमान गुलज़ार रहेगा
आतिशबाज़ी के रंगों से
और ज़मीं पर
सजी रहेंगी महफिलें
जश्न और ठहाकों की

मेरे घर के पास रहने वाली
नन्ही मुनिया
मैली से फ्रॉक पहने
कौतूहल से देखती है
इन सब
सपनीली रंगीनीयों को
हर साल
वह बढ़ती है
एक दर्जा उम्र का
मनाती है अपना त्योहार
हर दीवाली की पड़वा को
क्योंकि मावस के बाद की हर सुबह
उसे मिलता है स्वाद
ज़मीं पर बिखरे पत्तलों से चिपके
खील बताशे और
स्वादिष्ट मिठाइयों के
अवशेषों का ।

~यशवन्त यश©

29 October 2013

बैठा है एक दीये वाला

सड़क किनारे 
ठौर जमाए 
बैठा है एक दीये वाला 
 
भूख की आग में 
तपी मिट्टी से 
हर घर रोशन करने वाला 

उसके आगे ढेर सजे हैं 
तरह तरह के आकार ढले हैं 
वो है खुशियाँ देने वाला 

मोल भाव में वो ही फँसता 
वो ही महंगा वो ही सस्ता
फिर भी मुस्कान की चादर ओढ़े 

बैठा  है एक दीये वाला।

~यशवन्त यश©

25 October 2013

परिवर्तन .....

मेरे घर के सामने है
एक बड़ा
खाली मैदान
जिसने देखा है
पीढ़ियों को
जन्मते गुजरते
जिसकी गोद में
खेले कूदे हैं
छोटे छोटे बच्चे
जो बना है गवाह
सावन के झूलों का
पेड़ों से झरते
गुलमोहर के फूलों का ।

वो मैदान
आज खुदने लगा है
आधार बनने को
ऊंचाई छूती
नयी एक नयी इमारत का
जिसकी ईंट ईंट पर
लगने वाला
नया रंग रोगन भी
भुला न पाएगा  
बीते कल की
अमिट खुशबू को।

~यशवन्त यश©

20 October 2013

भीड़

हर रस्ते पर
हर चौराहे पर
हर आसान
और तीखे मोड़ पर
अक्सर देखता हूँ भीड़
भागते -दौड़ते
हाँफते -थकते
और आराम से चलते
इन्सानों की
जिसका हिस्सा
हुआ करता हूँ मैं भी।

इस भीड़ से
कानों को चुभती
चिल्ल पों से
मन होता है
कभी कभी
लौट जाने को
अपने आरंभ पर
लेकिन कैसे लौटूँ ?
मैं एक छोटी सी लहर हूँ
इन्सानों की भीड़ के
इस समुद्र की
जिसे नहीं आता
पीछे देखना
या ठहरना
कुछ पल को।

उसे तो बढ़ते चलना है
और खो जाना है
इस सैलाब में
किनारे की रेत पर
छोड़ कर
कुछ सीप
अपनी याद के ।  

~यशवन्त यश©

16 October 2013

तितलियाँ....

'पंक्तियों' की श्रेणी में यह मेरे जीवन और इस ब्लॉग की 500 वीं पोस्ट है। जबकि कुल प्रकाशित पोस्ट्स की संख्या 559 हो चुकी है। आप सभी के आशीर्वाद और निरंतर मिल रहे स्नेह के लिए हार्दिक आभारी हूँ।

चित्र: विभा आंटी की फेसबुक से
रंगीन फूलों से महकते
उस बगीचे में
रोज़ दिन भर
उड़ान भरती हैं
रंगीन तितलियाँ
न जाने कौन सी
बात करती हैं
अपनी ज़ुबान में
सुन कर जिसे मुस्कुराती हैं
फूलों की पंखुड़ियाँ

मेड़ पर लगी ईंटों से
कभी पत्थरों से
अनजान हवा में बहती
चलती हैं तितलियाँ
मैंने पकड़ना तो बहुत चाहा
पर खुद को ही रोक लिया
कैद में रह कर उदास
हो जाती हैं तितलियाँ

चित्र: विभा आंटी की फेसबुक से
खिले मौसम की
खिली खिली बहारों में
या बारिश की रिमझिम
बरसती फुहारों में
हँसते फूलों से प्यार
जताती हैं तितलियाँ
अपनी मस्ती में कुछ
कहती जाती हैं तितलियाँ। 

~यशवन्त यश©

13 October 2013

दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक

दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 
भीड़ को चीरता हर चेहरा मुबारक
हर बार की तरह राम रावण भिड़ेंगे 
तीरों से कट कर दसों सिर गिरेंगे 
दिशाओं को घमंड की दशा ये मुबारक
दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 

दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 
महंगाई में भूखा हर चेहरा मुबारक
गलियारे दहेज के हर कहीं मिलेंगे 
बेकारी मे किसान लटके मिलेंगे
मिलावट का आटा-घी-तेल मुबारक 
दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 

दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 
रातों में हर उजला सवेरा मुबारक
कहीं फुटपाथों पे लोग सोते मिलेंगे 
जिंदगी से हार कर कहीं रोते मिलेंगे 
हम ही राम- रावण,यह लीला मुबारक 
दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक 

~यशवन्त यश

12 October 2013

वह हो गयी स्वाहा .......

उसने देखे थे सपने
बाबुल के घर के बाहर की 
एक नयी दुनिया के 
जहां वह
और उसके
उन सपनों का
सजीला राजकुमार
खुशियों के आँगन में
रोज़ झूमते
नयी उमंगों की
अनगिनत लहरों पर

उन काल्पनिक
सपनों का
कटु यथार्थ
अब आने लगा था
उसके सामने
जब उतर कर
फूलों की पालकी से
उसने रखा
अपना पहला कदम
मौत के कुएं की
पहली मंज़िल पर

और एक दिन
थम ही गईं
उसकी
पल पल मुसकाने वाली सांसें..... 
दहेज के कटोरे में भरा
मिट्टी के तेल
छ्लक ही गया
उसकी देह पर
और वह
हो गयी स्वाहा
पिछले नवरात्र की
अष्टमी के दिन। 

~यशवन्त यश©

07 October 2013

क्योंकि वह माँ नहीं......

कल सारी रात
चलता रहा जगराता
सामने के पार्क में
लोग दिखाते रहे श्रद्धा
अर्पण करते रहे
अपने भाव
सुगंध,पुष्प और
प्रसाद के साथ
नमन,वंदन
अभिनंदन करते रहे
झूमते रहे
माँ को समर्पित
भजनों-भेंटों की धुन पर ।

मगर किसी ने नहीं सुनी
नजदीक के घर से
बाहर आती
बूढ़ी रुखसाना की
चीत्कार
जो झेल रही थी
साहबज़ादों के कठोर वार
मुरझाए बदन पर  ।

कोई नहीं गया
डालने एक नज़र
क्या... क्यों... कैसे...?
न किसी ने जाना
न किसी ने समझा ...
क्योंकि
दूसरे धर्म की
वह माँ नहीं!
औरत नहीं!
देवी नहीं  !!

हमारी आस्था
हमारा विश्वास
बस सिकुड़ा रहेगा
अपनी चारदीवारी के भीतर
और हम
पूजते रहेंगे
संगमरमरी मूरत को
चुप्पी की चुनरी ओढ़ी
मुस्कुराती औरत के
साँचे में ढाल कर। 
 
~यशवन्त यश©

05 October 2013

वह देवी नहीं

सड़क किनारे का मंदिर
सजा हुआ है
फूलों से
महका हुआ है
ख़ुशबुओं से
गूंज रहा है
पैरोडी भजनों से
हाज़िरी लगा रहे हैं जहां
लाल चुनरी ओढ़े
माता के भक्त
जय माता दी के
जयकारों के साथ।

उसी सड़क के
दूसरे किनारे
गंदगी के टापू पर बसी
झोपड़ी के भीतर
नन्ही उमा की
बुखार से तपती
देह 
सिमटी हुई है
एक साड़ी से
खुद को ढकती माँ के
आँचल में। 

उसकी झोपड़ी के
सामने से
अक्सर निकलते हैं
जुलूस ,पदयात्रा , जयकारे
जोशीले नारे
पर वह
नन्ही उमा !
सिर्फ गरीब की देह है
देवी या कन्या नहीं
जिसे महफूज रखे हैं
आस-पास भिनकते
मच्छरों और मक्खियों की
खून चूसती दुआएं।

~यशवन्त यश ©

02 October 2013

यह वो कल नहीं


यह वो कल नहीं
कभी जिसके बारे में 
तुमने सोचा था 

यह वो कल नहीं 
कभी जिसके कारण 
तुमने सब कुछ छोड़ा था 

यह वो कल नहीं 
कभी जिसके सुनहरे स्वप्न 
तुम्हें हर रोज़ आते थे 

यह वो कल नहीं 
कभी जिसके लिये 
तुम राम धुन को गाते थे 

नहीं! नहीं!! नहीं!!!
यह वो कल नहीं; स्वार्थी आज है 
जिसके बटुए में बंद 
तुम्हारा मूलधन और ब्याज है

यह वो कल नहीं 
करती जिसको रोशन राजघाट है 
तीनों बुराई* मे रचा बसा 
यह उल्टा पुल्टा आज है।
 
~यशवन्त यश©

*तीनों बुराई-बुरा मन देखो 
                  बुरा मत सुनो 
                  बुरा मत बोलो  

24 September 2013

बातें नहीं करता

नहीं 
मैं अंधेरे में 
काले आसमान से 
बातें नहीं करता  

नहीं 
मैं रोशनी में 
चमकते चाँद तारों से 
बातें नहीं करता 

नहीं 
मैं आस पास बिखरे
रिश्ते नातों से 
बातें नहीं करता 

क्योंकि 
मैं बातें करता हूँ 
भाव शून्य दीवारों से 

क्योंकि 
मैं बातें करता हूँ 
बंद कमरों पर लटके तालों से

मेरी बेमतलब 
बातों को 
हर कोई  
समझ नहीं सकता 

मैं इसीलिए
खुद से भी 
खुद की 
बातें नहीं करता। 

~यशवन्त यश©

22 September 2013

इस गली ने इन्सानों को ही,गधा बना दिया

फेसबुक पर आदरणीया प्रियंका श्रीवास्तव जी द्वारा साझा किये गए इस चित्र को देख कर  जो मन में आया-

सोचा था इंसान बन कर निकलेंगे,गधे इस गली से
इस गली ने इन्सानों को ही,गधा बना दिया ।
यूं तो मालूम न था अब तक,पर जब मालूम चला तो
अच्छा भला देख सकता था,अंधा बना दिया ।
अब कंधों पर बोझ है,जिल्द बंधी चिन्दियों का
भीतर से काला कुर्ता,ऊपर उजला बना दिया ।
माना कि यहाँ दलदल,फिर भी है जाना इसी रस्ते से
इस रस्ते ने हर सस्ते को,महंगा बना दिया।

~यशवन्त यश©

21 September 2013

थकान के बाद .......

दिन भर की थकान के बाद
उस मैदान में
पसरी हुई
हरी घास के
नरम बिस्तर पर
जब वो लेटता है
और देखता है
बंद आँखों के भीतर
चमकती दमकती
दुनिया की रंगीनियाँ
और खुली आँखों से
जब महसूस करता है
ऊंचे पेड़ों से गिरती
सूखी पत्तियों का दर्द
तब अचानक ही
मुस्कुरा देते हैं
उसके मजदूर होंठ
क्योंकि
शून्य के
शिखर पर चढ़ कर
वह
नाप चुका होता है
अनंत की
गहरी खाई को। 
~यशवन्त यश©

19 September 2013

आज भर गयी ख्यालों की गुल्लक तो.....

आज भर गयी ख्यालों की गुल्लक
तो उसे तोड़ कर देखा
भीतर जमा मुड़ी पर्चियों को
खोल कर देखा
किसी में लिखा था संदेश
आसमान के तारे गिनने का
किसी में लिखा था स्वप्न
मावस में चाँद के दिखने का
किसी में बना था महल
गरीब के झोपड़ के भीतर
किसी में अनपढ़ पढ़ा रहा था
जीवन के शब्द और अक्षर
अनगिनत इन पर्चियों पर
कल्पना के हर रूप को देखा
आज भर गयी ख्यालों की गुल्लक
तो उसे तोड़ कर देखा।
~यशवन्त यश©

17 September 2013

कहीं को जाते हुए ......

कहीं को जाते हुए
जब भी गुज़रता हूँ 

रेल लाइन के किनारे की 
उस बस्ती से 
देखता हूँ उसे 
हर बार की तरह 
मुस्कुराते हुए 
चमकती आँखों में
कुछ सपने सजाते हुए । 
वो गाता है 
दो दूनी चार 
वो सुनता है 
ककहरा के पाठ 
फुटपाथ की समतल 
कुर्सी और मेज पर 
नन्ही तर्जनी की पेंसिल से 
वह लिखता है अपना कर्म 
पथरीली मिट्टी की कॉपी पर । 
मैं थोड़ा रुकता हूँ 
आँखों के कैमरे से 
उतार कर
उसकी एक तस्वीर 
सँजोता हूँ 
मन की एल्बम में 
और निकल लेता हूँ 
उसकी उजली राह से 
अपनी अंधेरी 
मंज़िल की ओर। 

~यशवन्त यश©

14 September 2013

फिर वही.....

फिर वही बात
वही संकल्प
वही सप्ताह
वही पखवाड़ा
वही माह
वही मंच
पुरस्कार
और प्रपंच

फिर वही
व्यक्तिवाद
भाषावाद
क्षेत्रवाद
और अपवाद ....?

अपवाद है
तो सिर्फ
अपनी ज़ुबान
जिस पर
रचती बसती है
अपनी
हिन्दी ।

 ~यशवन्त यश©

10 September 2013

बस ऐसे ही 'एक' के अनेक हो जाते हैं

फोटो साभार-Gregg Braden
रंग अलग
रूप अलग
पसंद अलग
नापसंद अलग
हो सकता है
वेश और परिवेश अलग
भाषा और देश अलग
जाति और धर्म अलग 
फिर भी भीतर से
एक ही है
हमारा ढांचा
बिल्कुल
उसी साँचे की तरह
जिसमे रख कर
ढाला गया है
तन की मिट्टी को  
स्त्री और पुरुष बना कर
जाने कितने रंग
और रूप बना कर ।

साँसों की अमानत
साथ में लिये
वक़्त की ज़मीं -
आसमां हाथ में लिये 
जाने क्यूँ चलते चलते
रुक जाते हैं कदम
किस नशे में क्यूँ इतना
बहक जाते हैं हम।

कहीं गिराते हैं बम
कहीं छुरे चाकू चलाते हैं 
बस ऐसे ही 'एक' के
अनेक हो जाते हैं ।

~यशवन्त यश©

08 September 2013

कबाड़ी वाला .....

हर सुबह से शाम
वो रोज़ गुज़रता है
गली गली घूमता है 
हर घर के
सामने से
आवाज़ लगाते हुए
खरीदने को
फालतू रद्दी
लोहा लंगड़
टूटा प्लास्टिक
और
न जाने क्या क्या
सब कुछ
जो उसके
और हमारे
काम का नहीं।

वो
तोल कर 
बटोर कर 
समेट कर
सहेजता है 
अपने ठेले में
और चल देता है
अगली राह
जहां कोई और होगा
जो खरीदेगा
उसका बिकाऊ माल।  

अनेकों पड़ावों
से गुज़र कर
आखिरकार
वह रद्दी
वह कचरा
या तो बदल लेता है
रंग- रूप- आकार
या दफन हो जाता है
कहीं किसी
गुमनाम कब्र मे
हमेशा के लिये ।

पर क्या
कोई ऐसा भी
कबाड़ी वाला है..?
जो खरीदता हो
और
ठिकाने लगा देता हो 
मन के एक कोने मे
न जाने कब से जमा
और दबा
रद्दी का ढेर ...
...वह ढेर
जिससे मुक्त होना
इतना भी आसान नहीं।

~यशवन्त यश©

06 September 2013

जन्नत निकल पड़ी है,गबन दोज़ख का करने

निकल जाए जो साँस, तो मुर्दा बदन देख कर
ज़ख्मी रूह भी आएगी,जनाज़े का मंज़र देखने।
मैं इंतज़ार में हूँ,कफन कोई ला दे मुझको
चल दूंगा फिर खुद ही,खुद को दफन करने।
अब और नहीं चलना,इस राह ए जिंदगी पर
जन्नत निकल पड़ी है,गबन दोज़ख का करने।

  ~यशवन्त यश©

05 September 2013

कोई था जो अब भी है

जब घबरा जाता था
कठिन शब्दों की इमला से
आँखों से बहने लगते थे आँसू
तब कोई था
जो हौसला बढ़ाता था
लिखना सिखाता था

जब लिख कर दिखाता था
किसी पन्ने पर 
कल्पना से बातें करती
कोई कविता
तब कोई था
जो सहेजना सिखाता था

जब पढ़ता था
फर्राटेदार संस्कृत
क्लास रूम रीडिंग के समय
तब कोई था
जो सबसे तालियाँ बजवाता था

जब ज़रूरत थी
कॉमर्स की
महंगी किताबों की
तब कोई था
जो निश्चिंत रहने को कहता था

जब दिक्कत आती थी
अङ्ग्रेज़ी बोलने में
नौकरी की जगह पर
तब कोई था
जो झिझक मिटाता था

वो कोई था
वो अब भी है
मेरे दिल के भीतर
बीते दिनों की यादों के साथ 
इस सफर में
न कभी भूला हूँ
न कभी भूलूँगा
अपने शिक्षकों को।

शिक्षक दिवस पर सादर समर्पित --
चतुर्वेदी मैडम (श्री एम एम शैरी स्कूल कमला नगर आगरा-वर्ष 1988-2000)
श्रीवास्तव मैडम (श्री एम एम शैरी स्कूल कमला नगर आगरा-वर्ष 1988-2000)
जौहरी मैडम (श्री एम एम शैरी स्कूल कमला नगर आगरा-वर्ष 1988-2000)
सीमा राणा मैडम  (श्री राधा बल्लभ इंटर कॉलेज दयाल बाग आगरा-वर्ष 2000-2002)
डॉ रंजन पोरवाल सर (वाणिज्य संकाय-राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय आगरा-वर्ष 2002-2005)
एवं सुब्रतो दत्ता सर को (जिन्होंने मेरी नौकरी के दौरान समय समय पर प्रेरित किया-वर्ष 2006)

~यशवन्त यश©

01 September 2013

किसे चुनूँ किस पर लिखूँ ?

नज़रों के सामने
फैले हुए हैं
ढेर सारे विषय
कुछ आकार में बड़े
कुछ बहुत ही छोटे
कुछ समुंदर की
अंतहीन गहराई लिये
पहाड़ों की ऊंचाई लिये 
कुछ
थोड़ा ही कुरेदने पर
मुट्ठी के भीतर 
समा जाते हैं
कुछ
पल मे ही
उफनाने लगते हैं 
सबके अपने शब्द हैं
अपनी भाषा है
अपना अलग व्याकरण है
और इन सबके सामने
कभी चौंकता
कभी ठिठकता
भ्रम में पड़ता
सोच में डूबा
निरीह सा 'मैं'
उलझा हूँ
किसे चुनूँ
किस पर लिखूँ ?
:)
  ~यशवन्त यश ©

29 August 2013

नहीं चाहता समझना

नहीं चाहता समझना
क्या है सच
और उसके पीछे का
मर्म
मैं खुश हूँ
खुद के ऊपर छाए
झूठ के आवरण के भीतर
जहां महफूज है
मेरा मन
टेक लगा कर
वर्तमान के सिरहाने पर।

~यशवन्त माथुर©

26 August 2013

"फेक -स्टिंग - ऋचा " (अनीता राठी जी की कहानी)

(अनीता राठी जी)
दरणीया अनीता राठी जी  ब्लॉग जगत मे अपने ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं जहां  समय समय पर अपनी बेहतरीन रचनाएँ साझा करती रहती हैं।

सोशल नेटवर्किंग साइट्स (जैसे फेसबुक) जहां अनेक लोगों से हमे प्रत्यक्ष जुडने और हमारे विचारों पर त्वरित प्रतिक्रिया प्राप्त करने का साधन हैं वही ऐसी साइट्स पर निजी जानकारियाँ साझा करना मुसीबत को दावत देने जैसा हो सकता है

अतः किसी अनजान से कभी भी अपना फोन नंबर या घर का पता साझा न करने का संदेश देती यह कहानी उनकी फेसबुक वॉल से साभार यहाँ भी प्रस्तुत  है-


 "फेक -स्टिंग - ऋचा "

(दोस्तों फेसबुक पर हो रहे क्राइमस की एक दास्ताँ .... एक ऐसी कहानी जो इस सोशल - मीडिया के रिश्तो की एक बानगी प्रस्तुत करती है .... बताइयेगा .... कैसी लगी ...)

टिर्र्र्रिन टिर्रीन .... हेलो ... हे हाई ...

कैसी हो ऋचा ....?... जी ठीक हु ...

कुछ कहो ... ?

में क्या कहूँ .... अरे ... कल इनबॉक्स में तो बहोत मजाक कर रही थी

तो क्या हुआ ...?? मजाक कर रही थी न .... मजाक, हर वक़्त तो नहीं होती ...

नहीं नहीं ... ऋचा तुम्हारी प्रोफाइल पिक बहोत ही ब्यूटीफुल है

अच्छा ......... !

रियली, और सुनाओ क्या क्या शौक है ... तुम्हे पढने लिखने के अलावा ...

दोस्तों से बातें करना , घूमना, वाटर-गेम्स।

अच्छा फिर तो खूब बनेगी हम दोनों में ... मुझे भी घूमने का बहोत शौक है ... चलो न किसी दिन मिलते है हम तो एक ही शहर में रहते है ......

हाँ .... किन्तु ऐसे कैसे ... मैं तो आपको जानती नहीं , पहचानती नहीं ऐसे कैसे में आपके साथ .....

ओह ... ऋचा ... जान भी लेना ... पहचान भी लेना ... मिलो तो ....

नहीं ... नहीं ... किसी ने देखा तो ... नहीं पापा को बुरा लगेगा ..

अरे १-२ घंटे की ही तो बात है ... अच्छा बताओ कब मिल रही हो ...
नहीं मैं नहीं मिल सकती ..... हेलो हेलो ... हेलो हेलोओ .... हे बुरा मान गए ... चलो मिलेंगे .... तब तक बात तो कर सकते है न।

ओह हाँ ... अच्छा ऋचा ... एक बात पूछु आपसे ,... मैं पिछले एक महीने से तुमसे बात कर रहा हु ... तुम्हे तो मेरी याद आती नहीं ... बस मैं ही याद करता हु ... है न ... नहीं आती न मेरी याद ......

ऐसा नहीं है ... दोस्त की याद कैसे नहीं आएगी लेकिन में बहोत ही पारंपरिक परिवार से हु ... संजय ... मेरे पेरेंट्स मुझे अलाऊ नहीं करते और नहीं मैं खुद पसंद करती हु ये सब ....

अरे .... पेरेंट्स का बहाना मत बनाओ ... तुम ही मुझे नहीं चाहती .... अच्छा सच कहो ... ऋचा तुम्हारी लाइफ में मेरी क्या वेल्यु है ..... बस एक दोस्त ..... लेकिन में तो तुम्हे बहोत चाहता हूँ , मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हु , आज कहना ही है

क्या ....???

यही की मैं तुम्हे बहोत चाहने लगा हु , लेकिन ये सब में कह नहीं पाया ... आज लेकिन मैं कहना चाहता हु ... की मैं .... मैं
मैं तुमसे बेहद प्यार करता हु .....

अरे ये सब क्या है .... हम अच्छे दोस्त है , ठीक है पिछले कुछ दिनों से डेली तुम बात करते हो. तो अच्छा लगता है मगर इसका या मतलब कटाई नहीं की मैं तुमसे प्यार व्यार करती हु ... नहीं ... संजय .... plz ... मुझे गलत मत समझो ....

नहीं मैं जानता हु तुम भी मुझे चाहती हो ... कहो तुम मुझे चाहती हो ... हो की नहीं ...
अ अ अ ... हाँ लेकिन एक दोस्त की तरह ...
बस इतना काफी है .... सुनो एक बार मेरी खातिर बोल दो .... वही ढाई अक्षर ... मैं तुम्हारे मुहं से सुनना चाहता हूँ ... ?
हे यू ... तुम पागल हो ... ऐसा नहीं हो सकता , तुम मेरे दोस्त हो सिर्फ दोस्त ....
ठीक है दोस्त को ही बोल दो .... मेरी ख़ुशी के लिए .... plz ... plz ...
अरे ... ओके बाबा ... I Love You ..... अब तो खुश
या थैंक्स ... सुनो कब मिलोगी ....
.... देखेंगे .... ओके अब बाय
बाय ..... ऋचा सोच में पड़ गई , अरे ये मैंने संदीप को क्या बोल दिया ... कहीं वो मुझे सच में न प्यार करने लगे .... न बाबा ना ...

डिनर फिनिश कर ऋचा त.व. देख रही थी की .... फ़ोन फिर से घनघना उठा टिर्र्र्रिन टिर्रीन .... हेलो ... हे हाई ...

कैसी हो ऋचा ....?.

.. जी .

कुछ कहो ... ?

में क्या कहूँ .... अरे ... इस वक़्त फ़ोन ... पापा डांटेंगे ... बंद करो

करता हु बस एक बात कहनि थी .... ऋचा i love you ..... मैं तुम्हारे लिए पागल हो रहा हु ... हर वक़्त बस तुम ही तुम

अर्रर्र्रे ...?? ... ऐसा नहीं कहते ... अपना ख्याल रखो न गुड नाईट बाय

ऋचा एक बार बोल दो .... रिचा ने अनजाने ही बोल दिया i love you ... ताकि घर में किसी को पता न चले की फ़ोन पर बात हो रही है ...सोचा की जल्दी पीछा छूट जायेगा

... ओके माय लव बर्ड ....
उफ़्फ़…. तुम भी न कुछ भी ... कुछ भी बोल देते हो…। चलो कल बात करेंगे ...

सुबहो सुबहो ऋचा ने फ़ोन देखा 5 मिस काल ..... और १ ० सन्देश .... सब में एक ही बात i love you ऋचा .... ऋचा को भी न जाने क्यों न चाहते हुए भी वो शब्द अच्छे लगने लगे .... ... घर के सब लोग अपने अपने कम में व्यस्त थे ..... ऋचा ... भी कोर्स
की किताब उठा पढने लगी ...... छत पर अकेले थी .... की फिर से फ़ोन पर घंटी सुनाई दी ... फ़ोन उठाया देखा .... संजय .ही था ... हे .... गुड मोर्निंग ... लव बर्ड ....
गुड मोर्निंग .... सुनो ये क्या है .... रात २ बजे काल . ... फिर .. ३. बजे ... फिर ४ बजे ... ५ बजे .... सोये नहीं रात भर ... पागल हो .....
हाँ ऋचा तुम्हारे साथ को तरसता रहा पूरी रात ... अब आँखें भारी हो रही है ...

तो सो जाओ ....

तुम सुला दो .... मैं सोच रहा हु ... तुम मेरे पास हो , मेरा सर तुम्हारी गोद में है , तुम मेरे माथे को सहला रही हो ... फिर ... अचानक मैंने तुम्हे अपनी बांहों में कस के पकड़ लिया और .... और ऋचा ... और मैं तुम्हे बेतहाशा ... प्यार करने लगा ....

ओह ...हे ... हेलो ... इतना मत ऊडो .... जमीं पे रहो मजनू .... ये पागलपन है

हाँ ऋचा मैं पागल हो गया हु तुम्हारी आवाज़ , तुम्हारी तस्वीर , तुम .... मुझे पागल कर रही हो .... ..... प्ल्ज़ एक बार कह दो
मैं जो सुनना चाहता हु ...........

ऋचा मारे डर के कोई ऊपर न आजाये ..... तुरंत बोल पडी ... Ya . संजय . ... आई लव यू टू .... टू मच .... मिस यू ... लव यू ..... ओके नाऊ बाय ....

बाय बेबी ........

पागल .... कहीं के ... । इतना कह ऋचा ने फ़ोन काट दिया ..... दुसरे दिन फेस बुक पर एक नयी रिक्वेस्ट देखि दोस्ती के लिए ... देखा प्रोफाइल ठीक था ... ऐड कर लिया ..... कुछ देर इनबॉक्स में जान पहचान की बातें हुई ... ऋचा भोली सीधी खुद और सीधी ही उसकी दुनिया .... दोस्तों से गप्पें मरना , पढना या घर का काम .... और मस्त रहना ... बातों बातों में .... मयंक ने नम्बर माँगा उसने दे दिया ...... क्या हुआ .... बात ही तो करेगा ... वहां दूर कश्मीर से चल कर आ थोड़े ही जायेगा ...... चलो कोई नहीं

टिर्र्र्रिन टिर्रीन .... हेलो ... हे हाई ...

कैसी हो ऋचा ....?... जी ठीक हु ...

कुछ कहो ... ?

क्या कहु ... तुम बताओ कैसे हो , क्या कर रहे हो , खाना खा लिया या नहीं , पढने में क्या पसंद है ,.... फिक्शन या पोएट्री
.....और फिर ... मयंक भी ऋचा को ... दिन में १० - १० बार फ़ोन करता ..... और अंत में वही सब बातें ... घुमा फिर कर .... ऋचा से ... लव यू , लव यू बुलवा लेना .... ..................

फिर वही एक दो दिन में कोई और नयी दोस्ती की गुजारिश ... वही फ़ोन नंबर लेना और धीरे धीरे वही सब बातें ........... और एक दिन ......

हेलो ...आर यू ऋचा स्पीकिंग ...

जी येस्स. ... लेकिन मैंने आपको पहचाना नहीं .....

ऋचा .... ये अकाउंट नंबर है ... इसमें आपको एक लाख रुपये जमा करने है ....

व्हाट ..... लेकिन क्यों ... ...

आप धंधा करती है .... आपके कितने लडको से गलत ताल्लुक है ..... आअप या तो ये पैसा जमा करवा दे या कल सुबहो आपको पता चल जायेगा .....

ऋचा ने दर के मारे फ़ोन काट दिया ..... सुबहो के इन्तिज़ार में पूरी रात आँखों में काटी .... करीब ... ९ बजे एक फ़ोन आया ...कैसी हो मैडम .... अपने अमाउंट नहीं डाला ....

जी देखिये मेरी कोई गलती नहीं , और न ही मेरा किसी से कोई ऐसा वैसा रिलेशन है .... और ... न ही मेरे पास इतना बड़ा अमाउंट है .....

हमें नहीं पता .... ठीक है तो फिर अपना फेसबुक ओपन करो और देखो आज की तजा खबर

व्हाट ..... व्हाट इस थिस ........... दिस इस फ्रॉड ..... बोगस .... इ कानन'ट बिलीव एट ....

फेसबुक पर ऋचा की आवाज़ वाले ... कुछ ऐसे पिक्स थे .... जो ट्रिक फोटोग्राफी से बनाये गए थे ...... ऋचा की आवाज ... ऋचा का फोटो .... पोर्न साईट पर .... ऋचा को कुछ नहीं सुझा ... हाथ पैर सुन्न हो गए , दिमाग ने कहा अब तुम कहीं की नहीं .... रही पूरी दुनिया ने इसे देखा है .... सुना है ... हाँ मेरी ही आवाज है ये .... और ऋचा को .... चक्कर आ गया ..... वहीँ धम्म से गिर पड़ी .... ... आवाज सुन माँ ने कमरे में झाँक कर देखा ... ऋचा बच्चे क्या हुआ .... क्या हुआ गुडिया .... उठ तो .... उठ ... अरे कोई पानी लाओ देखो तो रिची को क्या हो गया है ........ माँ ... की ममता इतनी तड़प उठी .... की ऋचा कैसे न उठती ... ऋचा ने आँखे खोली .... और खुद को माँ की गोद में देख ... फुट फुट कर रोने लंगी ... भैया अपने दोस्त के साथ बातें कर रहे थे ... वो भी कमरे में आ गए .... सारा मंजर देखा ... क्या हुआ मेरी गुडिया सी बहन को ..... भैया मुझे बचाओ ... मैंने कुछ नहीं किया ... कुछ नहीं किया ... मैं ऐसी नहीं हु ....

इतनी देर में भैया के दोस्त ने ...सामने स्क्रीन पर .... सब कुछ देखा पढ़ा ... फ़ोन चेक किया ... ..... ओह तो ये है फसाद
... हे .... राकेश देख तो यार ...... ये क्लिपिंग देख ....

ओह .... अरे ऋचा .... कंप्यूटर इंजिनियर की बहन हो कर भी इतना भी नहीं समझती के तुम्हारे पेरेंट्स ये सब नॉन सेन्स से डगमग होने वाले नहीं .... बस तुम्हारी ... छोटी सी मिस्टेक थी की तुम उनकी इमोशनल ब्लाच्क्मैलिंग की शिकार हो गयी और दूसरी गलती .... अनजान इंसान को अपना नंबर दे दिया .....

भूल जाओ ... इस बकवास को हम देख लेंगे ... तुम बे फ़िक्र रहो ... मुझे तुम पर पूरा विश्वास है .... पूरा दिन घर में रहती हो , अपने अदब से जाना , अदब से आना है तुम्हारा ... तुम्हे बिलकुल दुखी नहीं होना ब्लकि अपनी दोस्तों को भी कहो की इन्टरनेट के इस ज़माने में .... ऐसी बातो के कोई मायने नहीं .... अपने पर विश्वास रखो और अनजान लोगो से अपना फ़ोन नंबर शेयर नहीं किया करो ....

अगले दिन .... भाई ने सारे फोन न . .... की ... पुलिस आईटी क्राइम सेल में शिकायत दर्ज करवाई तो पता चला की ये लोग भोले भले लोगो को यु ही लूट ते है ... पुलिस ने ट्रेस कर ... दबिश दी ... तो पता चला की ...... एक शख्स ... अलग अलग नम्बरों से ऋचा को बेवकूफ बना लूटने की फिराक में था ...... मगर ... भाई की हिम्मत और समझदारी ने ऋचा को बर्बाद होने से बचा लिया था। घर पहुच कर ... जल्दी से स्टेटस अपडेट किया ...... हे फ्रेंड्स ............................


~अनीता राठी ©

ब्लॉग लिंक 

24 August 2013

कहाँ जाना है मुझे ?

दिन चढ़ने के साथ ही
दिन ढलने के साथ ही
चारदीवारी के बाहर
कभी चारदीवारी के अंदर
ढूँढता हूँ एक मुकाम
कहाँ जाना है मुझे

ऊंचे पहाड़ों की
मुश्किल चढ़ाइयां चढ़ते हुए
पहुँच कर ऊपर
फिर नीचे उतरते हुए 
चार राहें हैं सामने
कहाँ जाना है मुझे

वक़्त यूं तो सगा
किसी का भी नहीं होता
अक्सर उसने दिया है
मुझको ही धोखा  
 धीमा चलना न
तेज़ भागना है मुझे 

कहाँ जाना है मुझे ?
 
 ~यशवन्त माथुर©

21 August 2013

डॉलर और रुपये की असली कहानी....

यह पोस्ट आज फेसबुक पर बहुत शेयर की जा रही है। www.allindiadaily.com पर प्रकाशित जानकारी वर्धक इस पोस्ट को संकलित  करने के लिहाज से इस ब्लॉग पर साभार  प्रस्तुत कर रहा हूँ।


Real story of American Dollar v/s Indian Rupee 

An Advice to all who are worrying about fall of Indian Rupee

Throughout the country please stop using cars except for emergency for only seven days (Just 7 days)
Definitely Dollar rate will come down. This is true. The value to dollar is given by petrol only.This is called Derivative Trading. America has stopped valuing its Dollar with Gold 70 years ago.

Real story of American Dollar v/s Indian Rupee


Americans understood that Petrol is equally valuable as Gold so they made Agreement with all the Middle East countries to sell petrol in Dollars only. That is why Americans print their Dollar as legal tender for debts. This mean if you don't like their American Dollar and go to their Governor and ask for repayment in form of Gold,as in India they won't give you Gold.

You observe Indian Rupee, " I promise to pay the bearer..." is clearly printed along with the signature of Reserve Bank Governor. This mean, if you don't like Indian Rupee and ask for repayment,Reserve Bank of India will pay you back an equal value of gold.(Actually there may be minor differences in the Transaction dealing rules, but for easy comprehension I am explaining this)

Let us see an example. Indian petroleum minister goes to Middle East country to purchase petrol, the Middle East petrol bunk people will say that liter petrol is one Dollar.
But Indians won't have dollars. They have Indian Rupees. So what to do now? So That Indian Minister will ask America to give Dollars. American Federal Reserve will give us dollars by taking Indian Rupees ( according to exchange rate ) , print Dollars on it and give it to the Indian Minister. Like this we get dollars , pay it to petrol bunks and buy petrol.

But there is a something wrong here. If you change your mind and want to give back the Dollars to America we can't demand them to pay Gold in return for the Dollars. They will say " Have we promised to return something back to you? Haven't you checked the Dollar ? We clearly printed on the Dollar that it is Debt"
So, Americans don't need any Gold with them to print Dollars.

But what will Americans give to the Middle East countries for selling petrol in Dollars only?

Middle East kings pay rent to America for protecting their kings and heirs. Similarly they are still paying back the Debt to America for constructing Roads and Buildings in their countries.

At present the problem of India is the result of buying those American Dollars. So if we reduce the consumption of petrol and cars, Dollar will come down

The Above Details have been provided originally in Telugu Language by Madhava Turumella and were translated to English by Radhika Gr.



स्रोत (साभार) http://www.allindiadaily.com/2013/08/real-story-of-american-dollar-vs-Indian-Rupee.html?m=1
एवं-Raj.Rocker की फेसबुक वॉल


 
~यशवन्त माथुर

19 August 2013

पटरी पर जिंदगी

(चित्र साभार-अविनाश कुमार चंचल जी )
(1)
भागती है
अपनी पटरी पर
सरपट ये जिंदगी
देखती है
और सहेजती है
दौड़ लगाती
धरती और पेड़ों को
ऊंचे पुलों को
बहती-सूखी नदियों को
चलती बसों-ट्रकों
आते जाते लोगों
और सुनसान सड़कों को
जो दिन मे गुलज़ार रहती हैं
अमीरों को मस्ती में
और कराहती हैं हर रात को
हरे ज़ख़्मों पर छिटके
नमक की टीस से ।

(2)
यादों की भीड़ से
ठसाठस भरी
यह जिंदगी की रेल
आने वाले मुकामों पर
थोड़ा ठहर कर
कभी खुद से बातें करती है
कभी औरों की बातें सुनती है 
न जाने किस तरह
बुनते हुए चित्र
हर आने वाले पल का
और चलती रहती है
अपनी पटरी पर
सदा की तरह। 

~यशवन्त माथुर©
(पत्रकार अविनाश कुमार चंचल जी के फेसबुक चित्र से प्रेरित)

17 August 2013

वह रास्ता अब बंद है

पिछली बार
जब गुज़रा था उस रास्ते से
उस से हो कर गुजरती थी
एक लंबी चौड़ी सड़क
जिसके दोनों किनारे
लगे थे
नीम और बरगद
आते जाते
कभी कभी
रुक जाया करता था
पाने को छांव
या कभी
बचने को
बरसात से
आज फिर चाहा
उसी रास्ते से
अपनी मंज़िल को जाना
पर जा नहीं सका
वह रास्ता अब बंद है
और उसकी जगह मौजूद है
बहुमंज़िला इमारत
जिसके भीतर
हर दिन होता है
ईमान का
मोल तोल। 

~यशवन्त माथुर©

15 August 2013

स्वतन्त्रता दिवस पर


सच बोलो तो जेल मिलेगी
झूठ बोलो तो आज़ादी
ईमानदारी की ऐसी तैसी
बेईमान काटते हैं चाँदी

कटोरा हाथ मे लिये फिरता बचपन
लोट लगाता सड़कों पर  
जब भी देखता चमक दमक
तब रोता अपनी किस्मत पर

आती जाती हर नारी को
घूरती नज़रें खा जाने को
दुर्योधन सब बने घूमते
नहीं कृष्ण लाज बचाने को 

फुटपाथों पर जिंदगी मिलती
कूड़े के ढेर पर आज़ादी
जन गण मन की इसी धुन पर
कहीं विलासिता कहीं बर्बादी

फिर भी आज है जश्न
अरे देखो नयी गुलामी का
जो पाया सब खो दिया
मोल न समझा कुर्बानी का।

~यशवन्त माथुर©

09 August 2013

रास्ता ही मंज़िल है

आदरणीया अनुपमा पाठक जी की आज की पोस्ट के शीर्षक से प्रेरित पंक्तियाँ 

रास्ता ही मंज़िल है
और हर मंज़िल
एक रास्ता है
नज़रों से ओझल
खुशी के फूलों से आती
मन भाती खुशबू को
ढूंढ कर
मन के किसी कोने मे
सहेज लेने की
बीते कल के सपनों के
आज में बदलने की

कुछ पूर्व निश्चित है
कुछ अनिश्चित है
कभी दोराहे,तिराहे
और चौराहों को
हम पहचानते हैं
कभी अनजान रास्ते भी
हमीं को जानते हैं

कभी रास्तों पर
चलते चलते
अपने पड़ाव
पर पहुँचने की
जल्दी होती है
कभी मन भटका कर
अनजान मंज़िल
इंतज़ार कर रही होती है

वक़्त की तेज़ी के साथ
पल पल गुजरते
नए रास्ते
काँटों से सजे
कभी फूलों से भरे

कुछ सीख कर
समझ कर
जीवन के भंवर में फँसकर
सर उठाकर
फिर निकलना ही
इसका हासिल है

हर रास्ता ही मंज़िल है ।

~यशवन्त माथुर©

08 August 2013

नहीं आता

सोच सोच कर सोच समझ कर
कुछ कहना मुझ को नहीं आता
तुक सहित या तुक रहित पर
बंधना मुझको नहीं आता

ऐसा ही नीरस हूँ तब से
जब से होश संभाला है
दुनियावी चलचित्र में जब से
अपना चरित्र खंगाला है

कठपुतली हूँ बंधा डोर से
नाच नचाना नहीं आता
सीधे सीधे कहता मन की
हर बात घुमाना नहीं आता । 

~यशवन्त माथुर©

04 August 2013

अर्थ के अर्थों में..........

अर्थ के अर्थों में, उलझा हुआ है आदमी
निरर्थ होकर अर्थ पर, सोया हुआ है आदमी
जाने किन स्वप्नों में, व्यर्थ खोया हुआ है आदमी
अनर्थ कर रहा अर्थ,अर्थ पर लोटता हुआ आदमी।

[अर्थ->मतलब ,धन और धरती (earth) के संदर्भ में]


 ~यशवन्त माथुर©

03 August 2013

उजली राहों के किनारे पर ......

उजली राहों के किनारे पर
अँधेरों की उस बस्ती में
घुटनों चलती है जिंदगी
मुस्कुराते  हुए

मैं हर रोज़ गुज़रता हूँ
भलमनसाहत का लबादा ओढ़ कर 
डालता हूँ एक नज़र
मुंह छुपाते हुए 

कोई देख न ले मुझे
उन कच्चे ढलानों पर
उतर कर जाते हुए
लौट कर आते हुए

उजली राहों के किनारे पर
अँधेरों की उस बस्ती में
प्यास से जूझती है जिंदगी
भूख बिताते हुए। 

~यशवन्त माथुर©

02 August 2013

सीमित शब्द और मेरे ख्याल

मेरे ख्याल
घूमते हैं
कुछ गिने चुने
कुछ खास
शब्दों के इर्द गिर्द ...
जिन के चारों ओर
परिक्रमा करता है
मेरा मन

कभी समझते हुए
किसी तस्वीर की
मौन भाषा   ...
कभी देखते हुए
बहते पानी की
चहकती लहरें.... 
कभी देख कर
अधखिली कलियाँ ...
कभी झूमते हुए
खिले हुए फूलों की
मादक खुशबू में ...
कभी निहारते हुए
उड़ती चिड़ियाँ
भौंरे और तितलियाँ
कभी सुनते हुए
मन पसंद संगीत ...

मेरे ख्याल
अपने सीमित शब्दकोश से  
चुन लेते हैं
कहने लायक कुछ शब्द 
और कोशिश करते हैं
करने की
कुछ बातें खुद से।

~यशवन्त माथुर©

01 August 2013

छुपा हुआ सच....

30 जुलाई को यह चित्र एक दोस्त ने फेसबुक पर टैग
किया था। यह पंक्तियाँ इसी चित्र को देख कर अभिव्यक्त हुई हैं-



 







डायरी मे लिखी
यादों के
उसी एक पन्ने पर
बार बार ठहर जाती है नज़र
जिस पर रच डाला है
मैंने
जीवन का
अनकहा सच 

सच ...
सुना नहीं सकता किसी को
बना कर कोई कविता
कोई कहानी
सच ....
जिसे दे नहीं सकता शब्द
मगर बना सकता हूँ
खुद के समझने लायक
आड़ी तिरछी लकीरें
सच...
जिसे छुपा तो सकता हूँ
नये
अगले
सफ़ेद और कोरे
पन्ने के मुखौटे के
भीतर
ताकि मैं वही रहूँ
जो मैं हूँ
आज कल और
हमेशा
दुनिया की नज़रों में।

~यशवन्त माथुर©

30 July 2013

कल्पना की लहरें .....

चित्र साभार-गूगल सर्च
(1)
कभी
कल कल कर
निर्बाध बह बह कर
किनारे पर आ लगती थीं
कल्पना की
अलग अलग लहरें....
कहती थीं
अपने हिस्से का सच
छोड़ जाती थीं
भीतर समाए हुए
सीपियों के कुछ निशां 
जिन से झलकती थी
सरसता और
मौलिकता ।

(2)
विकास के इस दौर में
पल पल बदलती रंगत में
न जाने कहाँ खो गयी है
वह निर्बाध कल कल
काली-स्याह
प्रदूषित
मेरे इस युवा समय की
भोंथरी कल्पना
अब अपने भीतर
सीप नहीं ...
लेकर चलती है
सड़े गले अवशेष
दरकिनार कर के
पुरानी बूढ़ी विरासत को
और किनारे की रेत मे
छोडती चलती है
भाव रहित
बे हिसाब ठोस
कंकड़ पत्थर
जो बने हैं
सरसता
और मौलिकता की
दुखियारी आँखों से
गिरते आंसुओं की
हर एक बूंद से। 

 ~यशवन्त माथुर©

27 July 2013

फूल

Image Curtsy Google Search
फूल!
कितने अच्छे लगते हो तुम
यूं खिले हुए
मुस्कुराते हुए
रात की नींद के बाद
खुली हुई खिड़की से
झाँकता
तुम्हारा खिला खिला चेहरा
और उससे
आती तुम्हारी
खिली खिली खुशबू
बना देती है
हर सुबह सुहानी।

दिन भर
तुम से खेलते हैं
कितने ही तितलियाँ -भौंरे
और मुझ जैसे इंसान
शाम होते होते
तुम पर छा जाती है थकान
हवा की हल्की थपकी के साथ
तुम बिखेर देते हो खुद को
धरती माँ की गोद में
क्योंकि सूर्यास्त के बाद
दूसरी कलियाँ
करने लगती हैं तैयारी
तुम्हारे जैसा ही रूप धरने की।

फूल!
तुम साक्षात जीवन चक्र हो
तुम खुद मे ही
कविता-कहानी
और लंबे आलेख हो
तुम चिराग हो
जो रोशनी दिखाते दिखाते
अंधेरे मे जीता है।

फूल!
तुम अतुल्य हो
फिर भी तुलते हो
लंबी मालाओं-लड़ियों
और चक्रों में सज कर
किसी के श्रंगार को
स्वागत को
और कभी अंतिम यात्रा का
सहयात्री बन कर
कराते हो एहसास
किसी के जाने पर भी
खुद के अस्तित्व का
क्योंकि
तुम बने हो
सिखाने के लिये
समर्पण का पाठ। 

~यशवन्त माथुर©

25 July 2013

तो कैसा हो ?

अब रौनक रहती है
मेरे घर के सामने से
सुबह और शाम
आते जाते  हैं
घर से स्कूल
और स्कूल से घर 
चहकते मुस्कुराते
छोटे छोटे बच्चे
काले गोरे बच्चे
अमीर और गरीब बच्चे
मन के सब ही सच्चे ।  

पीठ पर लटकाए बस्ता
गले मे पानी की बोतल 
दौड़ते भागते
मम्मी-पापा
भाई -बहन से
मचलते बच्चे
गुब्बारे-टॉफियाँ देख
ललचते बच्चे
रोते कभी हँसते बच्चे ।

अपने घर की
बालकनी से
रोज़ निहारता हूँ
सुबह कुछ देर
इन बच्चों को
और सोचता हूँ
यह बच्चे
बच्चे ही रहें हमेशा
तो कैसा हो ?

~यशवन्त माथुर©

20 July 2013

बुखार के बाद.....

लगने लगती है
गुमनाम सी दुनिया
जब असर दिखाती है
चढ़ते बुखार की तपिश

सुध बुध खो कर
चादर में सिमटती
अकड़ती सी देह
अपने अवसान की प्रतीक्षा में
बदलती है करवटें  

गंगा जल के आचमन के साथ
गले से उतरती
दवाओं की रंगीन गोलियां
अंदर घुल कर
जब दिखाती हैं अपना असर
बाहर से भिगोता पसीना
चीरने लगता है 
बंद आँखों के भीतरी अंधेरे को

धीरे धीरे खुलती
नींद से जागती आँखें
ऊर्जावान होती देह
ठिठक कर देखने लगती है
चलती फिरती दुनिया
और हो जाती है
पहले की तरह गतिशील
बुखार के अवरोधक को
पार कर के।

 ~यशवन्त माथुर©
(पिछला एक हफ्ता तेज़ बुखार की चपेट मे बीता है। यह पंक्तियाँ उसी से प्रेरित हैं। दवाओं ने इस काबिल बनाए रखा कि कुछ देर को नेट पर बना रहा और हलचल पर भी मेरी पोस्ट निर्बाध आती रहीं।)

14 July 2013

ये दुनिया पागल है

रोज़ बनाता हूँ
बातों की रेत के टीले
रोज़ रंगता हूँ
मन की
काली दीवारों को
सफेदी से ...
रोज़ लगाता हूँ
चेहरे पर
शराफत के मुखौटे
जिनकी लकीरों को
बदलता हूँ
कपड़ों की तरह

मैं निश्चिंत हूँ
टीलों की
मजबूती को ले कर
मैं निश्चिंत हूँ
कोई भी खरोच
मिटा नहीं सकेगी
सफेदी
मैं निश्चिंत हूँ
मेरे गिरगिटिया मुखौटे
ज़ाहिर नहीं होने देंगे
मेरी सही पहचान

क्योंकि ये जो दुनिया है
उसे आदत है
काँटों पर सोते हुए
फूलों के बिछौने की

आखिर पागल जो है
मेरी तरह।  

~यशवन्त माथुर©

11 July 2013

राम रचि राखा.....

 [अक्सर बात बात पर लोग कहते और लिखते हैं कि होना वही  है जो होना है तो फिर जो कुछ भी बुरा हो रहा है आखिर जगह जगह उस पर वाद और प्रतिवाद क्यों ? आखिर क्यों सामाजिक,आर्थिक और अन्य मुद्दों पर बुद्धिजीवियों और सामान्य जनों द्वारा प्रश्न खड़े किए जाते हैं ? आखिर क्यों बढ़ती महंगाई,दहेज,बेरोजगारी,घोटालों और दुष्कर्मों को ले कर आंदोलन और गिरफ्तारियों की मांगें की जाती हैं ? सब कुछ राम (ऊपर वाले) की मर्ज़ी से हो रहा है तो होने दीजिये। सब उसकी मर्ज़ी। फिर काहे का यह सब ड्रामा ? ......यह पंक्तियाँ इसी सोच का परिणाम हैं।

'होइ है सोई
जो राम रचि राखा'
अपनी समझ में
कुछ नहीं आता

पहाड़ टूटा
आपदा आई
टूटती सांसें
प्रकृति गुस्साई

कहीं कत्ल
कुकर्म कहीं पर
रिश्तों की
टूटती मर्यादा

कोई घर छोड़ भागा फिरता
घिसट घिसट कर खुद को ढोता 
कोई छड़ी से पिट पिट कर भी
कुम्भकर्णी नींद सोता होता

तुलसी तुमने क्या कह डाला
हमने अर्थ का अनर्थ कर डाला
खुद के दोष पर नाम राम का
क्या यही उसी ने रचि राखा ?

~यशवन्त माथुर©

07 July 2013

कविता और कवि ...

'जहां न पहुंचे रवि
वहाँ पहुंचे कवि '
जो कह न सके कभी
वही कह देता अभी

कविता और कवि ......।

न ज्ञान व्याकरण का
न भाषा का, शुद्धता का
हर कोई है 'बच्चन','पंत'
महा भक्त 'निराला' का

न कॉमा, विराम कभी
न छंद,अलंकार कभी
उसके कुतर्क ही सही
'दिनकर' वही, 'कबीर','सूर' वही

हर गली दिखता वही
अभी यहाँ,फिर वहाँ कभी
कुकुरमुत्ते की सी छवि
डूबती कविता,उतराता कवि

खुद के लिखे को कभी
किताब बना छपवाता कवि
कीमत डेढ़ सौ,मुफ्त बाँट पाँच सौ
मुस्कुराता- इतराता कवि

कविता और कवि.....। 


 ~यशवन्त माथुर©

02 July 2013

सब चाहते हैं......

सब चाहते हैं सबकी नाव
आकर लगे किनारे पर
सब चाहते हैं अबकी बार
हों खड़े बिना किसी सहारे पर

सब चाहते हैं पाते जाना
सागर की गहराइयों को
सब चाहते हैं छूते जाना
आसमान की ऊंचाइयों को

सब चाहते हैं चलते जाना
फिर भी थक कर बैठ जाते हैं
सब चाहते हैं कछुआ बनना
खरगोश बन कर सो जाते हैं

सब चाहते हैं पूरे सपने
सब चाहते हैं सब हों अपने
सब चाहते हैं सब कुछ पा कर
कुछ कभी न खो पाना

सब चाहते हैं ऐसे ही
जीवन धारा का चलता जाना
सब चाहते हैं पास आते ही
दूर किनारे से हट जाना 

सब चाहते हैं सबकी नाव
तैरती रहे जल धारा पर
सब चाहते हैं कभी न डूबे
किसी पत्थर से टकरा कर।
   
~यशवन्त माथुर©

28 June 2013

देख नहीं सकता

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
चार दीवारी की बंधी पट्टी के उस पार
देख नहीं सकता।

मैं महफूज हूँ अपनी ही चादर में सिमट कर
बाहर निकल कर खुले जिस्मों को
देख नहीं सकता।

नीरो की तरह बांसुरी बजा कर अपनी मस्ती में
मुर्दानि में झूमता हूँ किसी को रोता
देख नहीं सकता।

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
इंसान के लबादे में इंसा को
देख नहीं सकता।  

~यशवन्त माथुर©

24 June 2013

जाने क्यों इतना बहता है पानी

जाने क्यों इतना बहता है पानी
अपनी कल-कल में आज रचता
मन में कोई कहानी

ताल तलैया,नदियां सागर
कल्पना के सीप समा कर
कुछ छोड़ किनारे पर करता
रह रह कर अपनी मनमानी

भावना की नौका चलती

सैर कराकर हर कोने की
जब आ किनारे पर लगती
तब भी थमता नहीं पानी

जाने क्यों इतना बहता है पानी
अपनी कल-कल में आज रचता
मन में कोई कहानी

~यशवन्त माथुर©


[एक खास दोस्त की फेसबुक फोटो को देख कर 
मेरे मन में आए विचार जिसे उनके कमेन्ट बॉक्स से यहाँ कॉपी-पेस्ट किया है। ]

21 June 2013

खंडित उत्तर हैं, प्रश्न गायब हैं यहाँ......

सांसें चलती हैं, यूं तो जीवन के लिये। 
सांसें थमती हैं,यूं तो जीवन के लिये॥

पहाड़ टूटते हैं, सबक सिखाने के लिये ।
कुछ लोग बचते हैं, मंज़र बताने के लिये॥   

लाशें बिछी पड़ी हैं, मंदिर के द्वार पर। 
जो खड़े हैं गिर रहे हैं, जीवन से हार कर॥ 

मौत भी चल रही है, बेईमान बनने के लिये। 
इंसान की संगत का, असल असर दिखाने के लिये॥  

समझ आया न अब तक, क्या हो रहा है यहाँ ।
खंडित उत्तर हैं, प्रश्न गायब हैं यहाँ॥ 

सांसें चलती हैं, यूं तो जीवन के लिये। 
सांसें थमती हैं,यूं तो जीवन के लिये॥

बारिश थम चुकी है, ज़मींदोज़ अरमानों के लिये। 
सन्नाटों में कुछ भी नहीं, सपने सजाने के लिये॥

~यशवन्त माथुर©

18 June 2013

मौसम बड़ा भ्रष्ट है

इसी बात का कष्ट है
यहाँ सब कुछ स्पष्ट है
एक कोने मे सूखा-गर्मी
दूसरी जगह सब त्रस्त है
मौसम बड़ा भ्रष्ट है। 

कहीं बाढ़ की रार मची है
कहीं  रिमझिम की तान छिड़ी है
कोई भीगता भीगता हँसता
कोई भागता भागता रोता
दिन रात के सुकून को खोता।

उस समय को क्यों नहीं सोचा
जब हरियाली को है नोंचा
जैसा किया अब भोगो वैसा
नियम प्रकृति का स्पष्ट है
वो तो अपने ही में मस्त है।

रिश्वत संकल्प की चाहता मौसम
नंगे पहाड़ों का पेड़ ही वस्त्र हैं
मत उजाड़ो सुंदर धरती 
झरने नदियां हम से त्रस्त हैं
मौसम नहीं हम ही भ्रष्ट हैं ।

~यशवन्त माथुर©

17 June 2013

कल रात आसमान में चाँद नहीं दिखा।

कल रात
आसमान में चाँद नहीं दिखा
मानसूनी बादलों को ओढ़े
जाने कहाँ छिपा रहा

मैं ताकता रहा राह
कि अगर दिख जाय तो
तारों की थाली में
परोस दूंगा कुछ बातें

न आया वो
न हो पायी मुलाक़ात
कड़कती रही बिजली
होती रही बरसात
 
वो किसी गम में है
या किसी और से मिलता रहा
कल रात आसमान में
चाँद नहीं दिखा।

~यशवन्त माथुर©

16 June 2013

मैं चुप नहीं रह सकता ...

न जाने कैसे
कुछ लोग
ओढ़े रहते हैं
मौन का आवरण
कोलाहल में भी
बने रहते हैं शांत
रुके हुए पानी की तरह

मैंने कोशिश की कई बार
उन जैसा बनने की
शांति और सन्नाटों को
महसूस करने की 

पर अफसोस!
मैं पानी की बहती धार हूँ
जो बक बक करती जाती है
अपनी कल कल में
अपनी धुन में
इस बात से बे परवाह
कि कोई सुन रहा है
या नहीं

मैं ऐसा ही हूँ
मौन और मेरा
छत्तीस का रिश्ता है
मौन आकर्षित कर सकता है
मगर मैं
निर्जीव दीवारों से भी
कह सकता हूँ
अपने मन की हर बात
क्योंकि
मैं चुप नहीं रह सकता। 

~यशवन्त माथुर©

14 June 2013

मुझे याद है ....

मुझे याद हैं
सन्न कर देने वाले
वह पल
जब  सुनते ही
'तार' का नाम
छा जाती थी
अजब सी खामोशी
छलक पड़ती थीं आँखें
कभी खुशी में
कभी गम में ।
मुझे याद हैं 
त्योहारों पर
भेजे जाने वाले
एक लाइना संदेश ...
लैटर हेड्स पर लिखा
'तार' का पता। 
मुझे याद है
वह पल
जब पहली बार सुना था
'तार' का नाम
बचपन में
और चौंक कर देखा था
धातु के एक तार को
बाल सुलभ
उत्सुकता से ।
वह 'तार'....
बेतार का 'तार'
अब हो जाएगा विदा
हमेशा के लिये
बना कर
साक्षी मुझ को
एक युग के
दूसरे  युग मे
संक्रमण का।
सोच रहा हूँ
'यश' का अंत
इसी तरह होता है
समय यूं ही
चलता है
अपनी तेज़ चाल......। 
  
~यशवन्त माथुर©

बातें......

रिश्ते कैद हो रहे हैं
मशीनों के भीतर
मुट्ठी में दुनिया है
और ठोकर पर बातें 


कहकहे गुम हो रहे हैं
खामोशियों के भीतर
मीलों आगे है दुनिया
और सदियों पीछे हैं यादें

अब कोई मोल नहीं
कसमों का न वादों का

ये दौर है पल में बनती
पल मे बिगड़ती बातों का

गाँव सिमट रहे हैं
बढ़ते शहरों के भीतर
कंक्रीट हो रही है दुनिया
और जम रही हैं बातें।
~यशवन्त माथुर© 

(आदरणीया शालिनी सक्सेना जी की
फेसबुक पोस्ट पर की गयी टिप्पणी का विस्तारित रूप)
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