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31 March 2013

डॉक्टर .....

(यह पंक्तियाँ एक खास दोस्त के लिये जिन्हें मैं 'डॉक्टर' कहता हूँ।)

Ph.d भी होता है
MBBS और MD भी होता है
हर डॉक्टर
'सर्जन' ही होता है

एक चीरता है
बिगड़े अंग को
और देता है
नया जीवन

एक चीरता है
दर्शन को
और देता है
नया सृजन

मोटी किताबों
और दुनिया भर की
अगर मगर में
प्रयोगशालाओं
पुस्तकालयों की
हर डगर में

एक नये युग
नयी परिकल्पना का
अवतरण होता है

सर्जक का सृजन
हर डॉक्टर
सर्जन होता है।

~यशवन्त माथुर©

30 March 2013

दरारें और दीवारें

नया नहीं
दीवारों
और दरारों का साथ
दीवारे
ईंटों की भी होती हैं
और
रिश्तों की भी
कुछ ऊंची होती हैं
कुछ नीची होती हैं
और कुछ
कर रही होती हैं
नींव के
रखे जाने का
इंतज़ार

वक़्त के साथ
या लापरवाही से
गलतफहमी के
उफनने से
नींव के दरकने से
भूकंप से
दरारें पड़ ही जाती हैं
ईंटों की दीवारें
गिर ही जाती हैं
रिश्तों की दीवारें
उठ ही जाती हैं

और एक बार
जब हो जाता है ध्वंस
तब होता नहीं आसान 
नयी बुनियाद का
अस्तित्व।

~यशवन्त माथुर©

29 March 2013

क्षणिका...

बीतता जा रहा है वक़्त
और जारी है ख्याल की तलाश
काश! कि मिल सका तो
कह दूंगा जज़्बात । 
~यशवन्त माथुर©

28 March 2013

क्षणिका

ख्वाब होते हैं अच्छे
हकीकत से
क्योंकि
ख्वाब देते हैं 
सब कुछ
जो दूर होता है
हकीकत की पहुँच से।

~यशवन्त माथुर©

27 March 2013

कॉपी-पेस्ट

 (कृपया इस पोस्ट को दिमाग लगा कर न पढ़ें )

थोड़ा  कॉपी ,पूरा पेस्ट
नयी पोस्ट का पुराना टेस्ट 
पुराना कुछ कुछ नया लगे है 
पढ़ कर पाठक सिर धुने है 
ठक ठक ठक ठक ,दिमाग के पट पर 
निकल चल बाहर ,अंदर धर कर  
पीकर ठंडाई भंग मिला कर 
होली आई रंग मिला कर 
टाटा-टाटा बाई-बाई, हाथ हिला कर  
सॉरी माफी टाइम का वेस्ट 
खा कर गुझिया कर लो रेस्ट 
आधा कॉपी,आधा पेस्ट 
पढ़ा आपने, ऑल द बेस्ट। 

~यशवन्त माथुर©

आप सभी को होली मुबारक  

26 March 2013

अपने मियां मिट्ठू बन लूँ

इस होली पर रंग बिरंगी
पोस्टों में से कुछ को चुन लूँ
चुन चुन चुग चुग कर पढ़ कर
एक पन्ने पर सब को धर कर 
रंग बिरंगा कवर बना कर
उस पर अपना नाम सजा कर
एक किताब की रचना कर लूँ
अपने मियां मिट्ठू बन लूँ।

पीकर गुझिया,ठंडाई खा कर 
और मिठाई में भांग मिला कर
गुब्बारों मे चाशनी भर कर
जो गुजरे मूंह मीठा कर दूँ
अपने मियां  मिट्ठू बन लूँ।

इस होली पर रंग बिरंगी
पोस्टों में से कुछ को चुन लूँ
इधर उधर की सुन सुन कर के
थोड़ी देखा देखी कर के 
मन भर कागज रद्दी कर के
कर सहित कुल कीमत बिक लूँ
या दुकान पर यूं ही सज कर
अपने मियां मिट्ठू बन लूँ। 

(आप सभी को होली शुभ और मंगलमय हो)

~यशवन्त माथुर©

25 March 2013

क्षणिका

अगर
जिंदगी का मैच
फिक्स होता 
हर पल का हिसाब
पता होता
तो तस्वीर का रुख
कुछ दूसरा होता।
~यशवन्त माथुर©

24 March 2013

ज़बरदस्ती

कभी कभी
कुछ सवाल
ज़बरदस्ती के लगते हैं
और उनके जवाब भी
देने पड़ते हैं
ज़बरदस्ती ही ।
क्योंकि
मन
न होने पर भी
इच्छा
न होने पर भी 
बचना मुश्किल होता है
ज़बरदस्ती के
अनचाहे सवालों से
और
उससे भी कठिन होता है
तलाशना
ज़बरदस्ती के
ज़बरदस्त जवाबों को ।
मैंने पढ़ा तो नहीं
मनोविज्ञान
पर अब उत्सुकता है
ज़बरदस्ती की
मानसिकता को
समझने की।

~यशवन्त माथुर©

23 March 2013

सिर्फ आज ......

जगह जगह बने
धूल-गर्द में ढके
निर्जन
शहीद स्मारक
आज होंगे गुलज़ार
और उनमें गूँजेंगी
भगत सिंह,सुख देव और
राज गुरु की अमर कथाएँ
सर्वस्व समर्पण की
गाथाएँ
जोशीले गीत
निकल कर बाहर
किताबों के पन्नों से
करेंगे जुगलबंदी
ज़ुबान और होठों से
सिर्फ आज के ही दिन
हमें याद आएगा
उन जाने
और अनजानों का
एहसान
हम और
हमारी पीढ़ी
कल से
फिर शुरू कर देगी
सरफरोशी को
भूल कर
एहसान फरामोशी की
दस्तूरी
दास्तान!
~यशवन्त माथुर©

22 March 2013

रोज़ सुबह-शाम ..........

 (विश्व जल दिवस  पर आज यह पंक्तियाँ एक बार पुनः प्रकाशित)
 
रोज़ सुबह-शाम
हर गली -हर मोहल्ले में
मची होती है
एक तेज़ हलचल
नलों में पानी आने की
आहट के साथ  
मेरे और सब के घरों में
टुल्लू की चीत्कार
शुरू कर देती है
अपना समूह गान

किसी की
कारें धुलने लगती हैं
किसी के डॉगी नहाने लगते हैं
और कोई
बस यूंही
बहने देता है
छत की
भर चुकी टंकी को

और उधर
बगल की बस्ती में
जहां रहते हैं
'नीच' और
'फुटपाथिया' लोग
जिनके पास टुल्लू नहीं -

म्यूनिस्पैल्टी के
नल से बहती
बूंद बूंद अमृत की धार को
सहेजने की कोशिश में
झगड़े होते हैं

पास के गड्ढे में
एक डुबकी लगा कर
हो जाता है 
बच्चों का गंगा स्नान
धुल जाते हैं
कपड़े और बर्तन

रोज़ सुबह -शाम
मैं यही सोचता हूँ
काश 'इनकी' मोटर बंद हो
और रुक जाए
छत की टंकी से
पानी का बहना
और 'वो' कर सकें
अपने काम आसानी से

पर
संपन्नता का
क्षणिक गुरूर
शायद महसूस
नहीं कर सकता
विपन्नता के
स्थायी भाव को!

~यशवन्त माथुर©

21 March 2013

वही कविता है

मन के उदगार
जो कभी
रस छंद अलंकारों
व्याकरण के नियमों की
गठरी में बंध कर
और कभी
नियमों से परे जा कर 
अपनी मौलिकता से
कराते हैं
अप्रतिम अहसास
जिन्हें कोई रचता है शब्दों में
और मुक्त हो कर
कहता है
वही कविता है। 
  ~यशवन्त माथुर©

20 March 2013

मेरे पास सैकड़ों बहाने हैं

(विश्व गौरैया दिवस पर विशेष)


दोष मेरा ही है
हरे जंगलों को काट कर
मैंने अब बसा लिया  हैं
कंक्रीट का आशियाना
गमलों मे रोप दिये हैं
बौने बोन्साई

दोष मेरा ही है
और बहाना ये भी है
कि इस महंगाई में
मैं नहीं बिखेर सकता
गेहूं और बाजरा
घर की छत पर

इतनी मेहनत से
लाइन में लग कर
लड़कर झगड़ कर
गली के उस टूटे नल से
लाता हूँ और सहेजता हूँ
अपने पीने का पानी

बोलो गौरैया रानी
मैं कैसे करूँ
तुम्हारी सेवा ?
मैं सब कुछ कर सकता हूँ
अपने लिये
पर तुम्हारे लिये .......?

मेरे पास
सैकड़ों बहाने हैं।

 ~यशवन्त माथुर©

19 March 2013

क्षणिका

काश
इंसान पंछी होता
तो उड़ता रहता
बेपरवाह
सरहदों की फिक्र
किए बिना ।
~यशवन्त माथुर©

18 March 2013

लौट आता हूँ.....

बंद कमरे से निकल कर
बाहर की दुनिया में
जब भी जाता हूँ 
एक नज़र देखता हूँ
लौट आता हूँ

नहीं मुझ में ताकत
कडवे सच से
रु ब रु होने की
नहीं मुझ को तमन्ना
खतम कहीं पे शुरू होने की

चारदीवारी के बाहर
माहौल सब एक जैसा है
कहीं कोई रोता है
कोई हँसता है

कोई दीवालिया है
कोई धन्ना सेठ है
इन्सानों का  तो बस
उतना ही बड़ा पेट है

फिर भी भूख से रोता
बचपन नहीं देख पाता हूँ 

बंद कमरे से निकल कर
बाहर की दुनिया में
जब भी जाता हूँ 
एक नज़र देखता हूँ
लौट आता हूँ

~यशवन्त माथुर©

17 March 2013

क्षणिका

किताबों के रंगीन
पन्नों के भीतर
छुपी कालिख
सिर्फ स्याही 
मे ही नहीं होती
पन्नों के सुर्ख रंग
कभी कभी
मुखौटा भी
हुआ करते हैं। 
~यशवन्त माथुर©

16 March 2013

क्षणिका

नकल और
अकल की कुश्ती
के साथ
परीक्षाओं के
इस तमाशे में
हार और जीत
नज़रें झुकाए
कर रही हैं याद
बीते दौर को।
 ~यशवन्त माथुर©

15 March 2013

क्षणिका.....

आँख पर पट्टी बांधे
न्याय की मूरत
अकर्मण्यता के
बंद कमरे में
कर रही है आराम
और बाहर
सुनहरा कल (?)
बीन रहा है
टुकड़ा टुकड़ा सपनों को
कूड़े के ढेरों पर!

~यशवन्त माथुर©

14 March 2013

क्षणिका

कभी कभी
बहुत मुश्किल लगती है
कुछ लिखने के लिये
किसी विषय की खोज
फिर भी
निगाहों के चारों ओर
कुछ तो होता ही है
लिखने के लिये।
©यशवन्त माथुर©

13 March 2013

मुझ में नहीं सामर्थ्य

मुझ में नहीं सामर्थ्य
समझने की
किसी कथा
और
उसकी अंतर्कथा का
रहस्य
क्योंकि  
मेरे भीतर का पाठक
जलते हुए रोम में
नीरो की
बांसुरी के स्वरों का 
आनंद लेते हुए
असमर्थ है
पात्रों के चरित्र
और उनके चित्र की
आंतरिक और
वाह्य
आड़ी -तिरछी 
रेखाओं को
समझने में।

©यशवन्त माथुर©

12 March 2013

क्षणिका

निर्वात के
इस भ्रम में
परावर्तित होती
मन की तस्वीर
घुप्प अंधेरे में
जब दिखाती है
खुद की परछाई
तो होता है
एहसास
निर्जन में
जन के होने का ।  
©यशवन्त माथुर©

11 March 2013

सोच......(कुछ विचार)

 (1)

सोच
जितनी असीमित
और अनंत होती है
कभी कभी
लगा देती है
उतने ही अनंत
असीमित प्रश्न चिह्न
खुद के माथे पर

(2)

सोच
कभी
होती है
मिट्टी के मोल
और कभी
हीरे से भी महंगी
कभी तुलती है
टनों में
और कभी
रत्ती या छ्टांक में
फिर भी
बनाए रखती है
अपना अस्तित्व
बंद मुट्ठी के खुलते ही
बिखर जाती है
एक की
अनेक हो कर!

©यशवन्त माथुर©

10 March 2013

ॐ नमः शिवाय च

आप सभी को महा शिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ! इस अवसर पर इस ब्लॉग पर पुनर्प्रस्तुत है मेरे पिता जी का यह आलेख--

श्री विजय माथुर 


" नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.

आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति
च अर्थात तथा/ एवं / और
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन


शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-


जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..


हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.


आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.


१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभी विनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)


इस शिव रात्रि पर लोग सही संकल्प ले सकें तो देश का भविष्य सुखद हो सकता है.वर्ना तो सर्वत्र ढोंग-पाखण्ड का प्रचार हो ही रहा है ,रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता.

©विजय माथुर©

09 March 2013

इससे बड़ी सज़ा नहीं

अर्थ हो
या अर्थ का अनर्थ हो
सार्थक हो
या लिखना ही व्यर्थ हो
कुछ लोगों से
कुछ भी कहो
पर अपनी ही
मस्ती में मस्त हो
ज़बरिया कर के टैग
फेसबुक की दीवारों पर
चाहते हैं दो शब्द
खुद के विचारों  पर

टैग की टांग पकड़कर
कब तक चढ़ेंगे ऊपर
पता नहीं
पूछिए हम, बिचारों से
कि इससे बड़ी सज़ा नहीं :)
©यशवन्त माथुर©

08 March 2013

An Open Letter to Sonia Gandhi on Soni Sori

Dear Ms Gandhi, President of the Congress Party, Chairperson of the National Advisory Council

We appeal to you as the Chairperson of the NAC and the President of the Indian National Congress Party, the largest party in Government and the party which declares that “it is for us to ensure that it [the party] holds out hope for each and every Indian,” to intervene and speak out on behalf of Soni Sori, an Adivasi woman, a mother and a school teacher who has been raped and tortured whilst being held in police custody and has been held imprisoned now for over fourteen months in Chhattisgarh. We hope that this intervention on your part will lead to Soni Sori`s release by March the 8th, International Women`s day. By standing for Soni Sori, like us, you would not be merely upholding rights of a specific woman but for people of all gender, their civil liberties and human rights. This is what our Constitution promised us and this is what we need you and your party to deliver through actions.


In recent months, the eyes of the world have been focused on the rights of Indian women as a consequence of the horrific rape and murder of a young Indian woman by six men in December. A previous assault on a seventeen-year old in July was well publicised because people chose to watch and use their mobile phones to film the crime rather than go to the young woman`s assistance or call the police. As International Women’s Day approaches, how will the world view the position of women in India? However, the finger of blame is increasingly being pointed at the Indian state, nationally and globally. There is a danger that these events simply confirm to the rest of the world the age-old stereotype of South Asian women being so downtrodden and oppressed that men can act with impunity against them with little fear of punishment or social condemnation. The Indian government not only fails to protect women from sexual and other types of violence, but in fact sanctions, indeed rewards such crimes when they are committed by its employees and representatives to silence women who speak out in defence of human rights.

On the 4th of October 2011, Soni Sori was arrested in Delhi, where she had fled from her home in Chhattisgarh in fear for her life. Three days later she was transferred to the jail in Dantewada in Chhattisgarh where there is compelling evidence that she was tortured and sexually assaulted at the command of the then District Police Superintendent Ankit Garg. Three months later, on the Republic Day in 2012, Garg was awarded the Presidential Medal for Gallantry. Sori continues to be held on a plethora of false charges including one in which she has been accused of being a courier between the banned Communist Party of India (Maoist) and the Essar Energy Group which has mining interests in Chhattisgarh, even though she has recently been acquitted in several other cases .

Pleas by national and international human rights groups to get Soni Sori released in time for International Women`s Day 2012 were ignored. Almost a whole year has gone by and Soni Sori still remains in custody with little hope of bail for an alleged crime of which there is little evidence. Both Essar and the Maoists deny that they were parties in the alleged extortion racket at the centre of this case and although local contractor BK Lala as well as Essar company manager DVCS Verma were also arrested at the same time as Soni Sori, both men have been out on bail since early 2012. Meanwhile, Soni Sori, who is a mother of three children, two of them under ten at the time of arrest, and should therefore, under the Indian law been presumed to receive bail, continues to suffer ongoing neglect and abuse in prison.



Far from being an oppressed and downtrodden woman, as an outspoken critic of both the Maoists and the mining companies, Soni Sori is being punished for exerting her democratic right to speak out in defence of her Adivasi community rather than for a crime she has not even been tried for. She is being punished by those who would not have the authority to mete out punishment even if she were found guilty of a crime and the form of her punishments are not to be found in any penal code anywhere in the world. If the Indian government is not willing to protect women from the illegal actions of its own agents when in their custody, then what message is it sending out to Indian men– that women are fair game just for going out or speaking out?

The arrest and trial of those that perpetrated the rape and murder of the young woman in Delhi is to be welcomed. But justice for Soni Sori and others like her also needs to be seen to be done to send a clear message that rape and violence against women under any circumstances is unacceptable. Recently Soni Sori has been exonerated in four cases. It is important that Soni Sori be released from jail. It is also important that government sponsored awards should not be given to representatives of the State, such as Ankit Garg against whom there is evidence of crimes such as torture and rape.

Many people, men and women alike, are horrified by the case of Soni Sori and how it reflects on the Indian government. They are organising events and protests to highlight such abuses, nationally and internationally. They will continue until their requests for justice are met. Let this International Women`s Day be the day when Soni Sori is unconditionally released and those who committed crimes against her be duly punished for going against the call of justice. Honourable madam, we request and hope that you will add your powerful voice to these calls for justice and help make this happen.

With hopes of an immediate positive action from you

Signed by the large number of  people over face book including shares.



source--
http://www.facebook.com/notes/one-billiion-rising-for-soni-sori/an-open-letter-to-sonia-gandhi-on-soni-sori/350352561740270

07 March 2013

यह सब चलता रहेगा.....

दामिनी...
सोनी सोरी ...
और भी हैं कई
जिनके नाम
मालूम हैं हमें
और कुछ गुमनाम होकर
वक़्त और भाग्य की चोट
सह रही हैं
या गिन रही हैं
घड़ी की टिक टिक
हर पल

कुछ सांसें
उखड़ चुकी हैं
कुछ सांसें
मांगती हैं
हर रोज़ हिसाब
घुट घुट कर
जीने का

यह सिलसिला
चलता रहेगा
भाषण गूँजते रहेंगे
लिखावटें
छपती रहेंगी
स्याह तस्वीरें
दिखती रहेंगी
जब तक
बदलेगी नहीं
सोच 
और दृष्टि
और जब तक
हमें
होगी नहीं पहचान
सफ़ेद मुखौटे मे
छुपे
काले चेहरों की !
©यशवन्त माथुर©

06 March 2013

परीक्षा का दौर ......

सामने के पार्क से
गायब है
हर शाम को
क्रिकेट और
बेडमिंटन खेलते
बच्चों की रौनक
सबके सब
दुबके हुए हैं
कमरे की
दीवारों के भीतर
गायब है
रातों की नींद
और दिन का चैन
फिर भी
माँ-बाप
भाई और दीदी की
मार और फटकार झेलते
मोटी किताबों के
पन्ने पलटते
और कुछ ख्वाब सँजोते
जुते हुए हैं
कोल्हू के बैल की तरह
जुटे हुए हैं
नंबर गेम में
अव्वल आने को
विजय पाने को
स्कूल और बोर्ड की परीक्षा
पार लगाने को
पर ....
हर पल चलने वाली
जीवन की परीक्षा
क्या हो सकती है पार
इसी तरह
किताबों मे डूब कर  ?

©यशवन्त माथुर©

05 March 2013

वो पल....

बचपन में
कभी
जिन गलियों से
गुज़रा करता था 
वो गलियाँ
वो सड़कें
अब बन चुकी हैं
कहानी
एक बीते दौर की
और आज
जब भी करता हूँ याद
उन बीते पलों को 
कबूतरखाने जैसा
यह ठौर
निकलने नहीं देता
खुद की जद से।

©यशवन्त माथुर©

04 March 2013

क्षणिका

कुछ भी तो नहीं यहाँ
फिर भी 
इन सन्नाटों में
मन के
इस निर्जन कोने में
सोते ख्यालों के
खर्राटों की गूंज
कर रही है परेशान
बार बार ।

 ©यशवन्त माथुर©

03 March 2013

तस्वीरें ....

दीवार पर टंगी
इन तस्वीरों  में
कुछ नयी हैं
कुछ पुरानी हैं
कुछ आज की
और कुछ
बीते दौर की कहानी हैं
इन तस्वीरों में
सुनहरा भूत है
जो याद दिलाता है
गौरव
मान
और शान के
इतिहास की
इन तस्वीरों में
वर्तमान की निराशा है
वर्तमान की सफलता भी है
और ये तस्वीरें
सँजोये हुए हैं
भविष्य की रूप रेखा
शायद इसीलिए
समय की मार सह कर भी
कुछ तस्वीरें
दिलाती ही हैं
अपना ध्यान 
समय समय पर
अक्सर!
©यशवन्त माथुर©

02 March 2013

ऐसे भी लोग हैं

मतलब
निकल जाने के बाद
सिर पर सजाये हुए
ठेंगे का मुकुट
चमकती बड़ी बड़ी आँखों
और चेहरे पर उत्साह के साथ
करते हुए अभिनय
जागते हुए सोने का
जो जीते हैं हर पल
स्वार्थ की दुनिया में
चारों ओर
कुछ ऐसे भी लोग हैं। 

©यशवन्त माथुर©

01 March 2013

क्योंकि वो इंसान नहीं हैं

आसमान मे उड़ते पक्षी
सड़क पर घूमते
आवारा जानवर 
नदियों तालाबों और समुंदर में तैरते
जलचर
सभी कर रहे हैं सफर
बिना किसी लक्ष्य
बिना किसी उद्देश्य के 
क्योंकि
वो इंसान नहीं हैं।
©यशवन्त माथुर©
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