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14 May 2013

वह तस्वीर......

बहुत वक़्त से
देखता रहता था
मैं
दीवार पर टंगी
उस तस्वीर को

न जाने कब से टंगी थी
घर के कोने के
उस अंधेरे कमरे में

गर्द की
एक मोटी परत
रुई धुनी रज़ाई की तरह
लिपटी हुई थी
उस तस्वीर से
पर आज .....

पर आज
मन नहीं माना मेरा
उत्सुकता
और रहस्य के चरम ने
रोशन कर ही दिया
अंधेरे कमरे को
और
फिरा ही दिये हाथ
उस तस्वीर पर 

गर्द के आवरण में
वह तस्वीर नहीं
एक पुराना शीशा था
जिसमें
अब देख सकता हूँ मैं
परावर्तित होती
खुद की
 नयी तस्वीर। 

~यशवन्त माथुर©

14 comments:

  1. रोशन कर ही दिया
    अँधेरे कमरे को
    फिरा दिये हाथ
    उस तस्वीर पर
    बढ़िया अभिव्यक्ति !!बहुत सुंदर....

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  2. वक्त के साथ परिवर्तन होना अक सहज प्रक्रियाहै , वक्त की सुन्दर तस्बीर खींची है

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  3. अपनी तस्वीर साफ दिखाई दे यही बहुत है .... सुंदर अभिव्यक्ति ।

    ReplyDelete
  4. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति

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  5. अच्छा है .. बदलाव कुछ बेहतर बनाता है

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (15-05-2013) के "आपके् लिंक आपके शब्द..." (चर्चा मंच-1245) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (15-05-2013) के "आपके् लिंक आपके शब्द..." (चर्चा मंच-1245) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

    ReplyDelete
  9. बहुत बढिया शुभकामनाएं...

    ReplyDelete
  10. waaaaaaah bhot achchi tasvir khinchi hai aapne bhot achchi

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  11. वाह ! यशवंत जी,आपकी यह कविता बहुत गहरे अर्थ लिए है..भविष्य में इसे आप सच होते हुए देखेंगे..

    ReplyDelete
  12. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 17-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

    ReplyDelete
  13. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 17-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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