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30 July 2013

कल्पना की लहरें .....

चित्र साभार-गूगल सर्च
(1)
कभी
कल कल कर
निर्बाध बह बह कर
किनारे पर आ लगती थीं
कल्पना की
अलग अलग लहरें....
कहती थीं
अपने हिस्से का सच
छोड़ जाती थीं
भीतर समाए हुए
सीपियों के कुछ निशां 
जिन से झलकती थी
सरसता और
मौलिकता ।

(2)
विकास के इस दौर में
पल पल बदलती रंगत में
न जाने कहाँ खो गयी है
वह निर्बाध कल कल
काली-स्याह
प्रदूषित
मेरे इस युवा समय की
भोंथरी कल्पना
अब अपने भीतर
सीप नहीं ...
लेकर चलती है
सड़े गले अवशेष
दरकिनार कर के
पुरानी बूढ़ी विरासत को
और किनारे की रेत मे
छोडती चलती है
भाव रहित
बे हिसाब ठोस
कंकड़ पत्थर
जो बने हैं
सरसता
और मौलिकता की
दुखियारी आँखों से
गिरते आंसुओं की
हर एक बूंद से। 

 ~यशवन्त माथुर©

27 July 2013

फूल

Image Curtsy Google Search
फूल!
कितने अच्छे लगते हो तुम
यूं खिले हुए
मुस्कुराते हुए
रात की नींद के बाद
खुली हुई खिड़की से
झाँकता
तुम्हारा खिला खिला चेहरा
और उससे
आती तुम्हारी
खिली खिली खुशबू
बना देती है
हर सुबह सुहानी।

दिन भर
तुम से खेलते हैं
कितने ही तितलियाँ -भौंरे
और मुझ जैसे इंसान
शाम होते होते
तुम पर छा जाती है थकान
हवा की हल्की थपकी के साथ
तुम बिखेर देते हो खुद को
धरती माँ की गोद में
क्योंकि सूर्यास्त के बाद
दूसरी कलियाँ
करने लगती हैं तैयारी
तुम्हारे जैसा ही रूप धरने की।

फूल!
तुम साक्षात जीवन चक्र हो
तुम खुद मे ही
कविता-कहानी
और लंबे आलेख हो
तुम चिराग हो
जो रोशनी दिखाते दिखाते
अंधेरे मे जीता है।

फूल!
तुम अतुल्य हो
फिर भी तुलते हो
लंबी मालाओं-लड़ियों
और चक्रों में सज कर
किसी के श्रंगार को
स्वागत को
और कभी अंतिम यात्रा का
सहयात्री बन कर
कराते हो एहसास
किसी के जाने पर भी
खुद के अस्तित्व का
क्योंकि
तुम बने हो
सिखाने के लिये
समर्पण का पाठ। 

~यशवन्त माथुर©

25 July 2013

तो कैसा हो ?

अब रौनक रहती है
मेरे घर के सामने से
सुबह और शाम
आते जाते  हैं
घर से स्कूल
और स्कूल से घर 
चहकते मुस्कुराते
छोटे छोटे बच्चे
काले गोरे बच्चे
अमीर और गरीब बच्चे
मन के सब ही सच्चे ।  

पीठ पर लटकाए बस्ता
गले मे पानी की बोतल 
दौड़ते भागते
मम्मी-पापा
भाई -बहन से
मचलते बच्चे
गुब्बारे-टॉफियाँ देख
ललचते बच्चे
रोते कभी हँसते बच्चे ।

अपने घर की
बालकनी से
रोज़ निहारता हूँ
सुबह कुछ देर
इन बच्चों को
और सोचता हूँ
यह बच्चे
बच्चे ही रहें हमेशा
तो कैसा हो ?

~यशवन्त माथुर©

20 July 2013

बुखार के बाद.....

लगने लगती है
गुमनाम सी दुनिया
जब असर दिखाती है
चढ़ते बुखार की तपिश

सुध बुध खो कर
चादर में सिमटती
अकड़ती सी देह
अपने अवसान की प्रतीक्षा में
बदलती है करवटें  

गंगा जल के आचमन के साथ
गले से उतरती
दवाओं की रंगीन गोलियां
अंदर घुल कर
जब दिखाती हैं अपना असर
बाहर से भिगोता पसीना
चीरने लगता है 
बंद आँखों के भीतरी अंधेरे को

धीरे धीरे खुलती
नींद से जागती आँखें
ऊर्जावान होती देह
ठिठक कर देखने लगती है
चलती फिरती दुनिया
और हो जाती है
पहले की तरह गतिशील
बुखार के अवरोधक को
पार कर के।

 ~यशवन्त माथुर©
(पिछला एक हफ्ता तेज़ बुखार की चपेट मे बीता है। यह पंक्तियाँ उसी से प्रेरित हैं। दवाओं ने इस काबिल बनाए रखा कि कुछ देर को नेट पर बना रहा और हलचल पर भी मेरी पोस्ट निर्बाध आती रहीं।)

14 July 2013

ये दुनिया पागल है

रोज़ बनाता हूँ
बातों की रेत के टीले
रोज़ रंगता हूँ
मन की
काली दीवारों को
सफेदी से ...
रोज़ लगाता हूँ
चेहरे पर
शराफत के मुखौटे
जिनकी लकीरों को
बदलता हूँ
कपड़ों की तरह

मैं निश्चिंत हूँ
टीलों की
मजबूती को ले कर
मैं निश्चिंत हूँ
कोई भी खरोच
मिटा नहीं सकेगी
सफेदी
मैं निश्चिंत हूँ
मेरे गिरगिटिया मुखौटे
ज़ाहिर नहीं होने देंगे
मेरी सही पहचान

क्योंकि ये जो दुनिया है
उसे आदत है
काँटों पर सोते हुए
फूलों के बिछौने की

आखिर पागल जो है
मेरी तरह।  

~यशवन्त माथुर©

11 July 2013

राम रचि राखा.....

 [अक्सर बात बात पर लोग कहते और लिखते हैं कि होना वही  है जो होना है तो फिर जो कुछ भी बुरा हो रहा है आखिर जगह जगह उस पर वाद और प्रतिवाद क्यों ? आखिर क्यों सामाजिक,आर्थिक और अन्य मुद्दों पर बुद्धिजीवियों और सामान्य जनों द्वारा प्रश्न खड़े किए जाते हैं ? आखिर क्यों बढ़ती महंगाई,दहेज,बेरोजगारी,घोटालों और दुष्कर्मों को ले कर आंदोलन और गिरफ्तारियों की मांगें की जाती हैं ? सब कुछ राम (ऊपर वाले) की मर्ज़ी से हो रहा है तो होने दीजिये। सब उसकी मर्ज़ी। फिर काहे का यह सब ड्रामा ? ......यह पंक्तियाँ इसी सोच का परिणाम हैं।

'होइ है सोई
जो राम रचि राखा'
अपनी समझ में
कुछ नहीं आता

पहाड़ टूटा
आपदा आई
टूटती सांसें
प्रकृति गुस्साई

कहीं कत्ल
कुकर्म कहीं पर
रिश्तों की
टूटती मर्यादा

कोई घर छोड़ भागा फिरता
घिसट घिसट कर खुद को ढोता 
कोई छड़ी से पिट पिट कर भी
कुम्भकर्णी नींद सोता होता

तुलसी तुमने क्या कह डाला
हमने अर्थ का अनर्थ कर डाला
खुद के दोष पर नाम राम का
क्या यही उसी ने रचि राखा ?

~यशवन्त माथुर©

07 July 2013

कविता और कवि ...

'जहां न पहुंचे रवि
वहाँ पहुंचे कवि '
जो कह न सके कभी
वही कह देता अभी

कविता और कवि ......।

न ज्ञान व्याकरण का
न भाषा का, शुद्धता का
हर कोई है 'बच्चन','पंत'
महा भक्त 'निराला' का

न कॉमा, विराम कभी
न छंद,अलंकार कभी
उसके कुतर्क ही सही
'दिनकर' वही, 'कबीर','सूर' वही

हर गली दिखता वही
अभी यहाँ,फिर वहाँ कभी
कुकुरमुत्ते की सी छवि
डूबती कविता,उतराता कवि

खुद के लिखे को कभी
किताब बना छपवाता कवि
कीमत डेढ़ सौ,मुफ्त बाँट पाँच सौ
मुस्कुराता- इतराता कवि

कविता और कवि.....। 


 ~यशवन्त माथुर©

02 July 2013

सब चाहते हैं......

सब चाहते हैं सबकी नाव
आकर लगे किनारे पर
सब चाहते हैं अबकी बार
हों खड़े बिना किसी सहारे पर

सब चाहते हैं पाते जाना
सागर की गहराइयों को
सब चाहते हैं छूते जाना
आसमान की ऊंचाइयों को

सब चाहते हैं चलते जाना
फिर भी थक कर बैठ जाते हैं
सब चाहते हैं कछुआ बनना
खरगोश बन कर सो जाते हैं

सब चाहते हैं पूरे सपने
सब चाहते हैं सब हों अपने
सब चाहते हैं सब कुछ पा कर
कुछ कभी न खो पाना

सब चाहते हैं ऐसे ही
जीवन धारा का चलता जाना
सब चाहते हैं पास आते ही
दूर किनारे से हट जाना 

सब चाहते हैं सबकी नाव
तैरती रहे जल धारा पर
सब चाहते हैं कभी न डूबे
किसी पत्थर से टकरा कर।
   
~यशवन्त माथुर©
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