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26 January 2014

जन तंत्र

जन 

कहीं खोया खोया सा
मारा मारा सा
भटकता रहता है
रात दिन
मुकाम की तलाश में
इक उम्मीद के साथ
कि इन अँधेरों में
कहीं कोई रोशनी हो
परवाज़ दे सके
जो उसके सपनों को।

तंत्र 

काँटों का ताज लगाए
यूं तो बैठता  है
मखमली कुर्सी पर
सोता है
अशर्फ़ियों के गद्दों पर
रोता है
फिर भी
छटपटाता है
बार बार याद आते
आश्वासनों के
जाल से
बाहर निकलने को  
जिसे उसने
कभी खुद ही बुना था ।

जन-तंत्र 

तंत्र
परिणाम है
जन के जपे
मंत्रों की तरंगों का
और जन
स्रोत है
तंत्र की
स्वतन्त्रता
उछृंखलता का ....
ज़रूरी है
दोनों का अस्तित्व
संतुलन को
क्योंकि दोनों ही
पूरक हैं
मछ्ली
और जल की तरह।


गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ!


  ~यशवन्त यश©

20 January 2014

गर शब्द बंद हो सकते होते किसी लॉकर में ........

गर शब्द
बंद हो सकते होते
किसी लॉकर में
तो लोग सहेज कर रखते
सोने के गहनों की तरह
बैंक खातों में .....
काले
कभी सफ़ेद धन का
रूप ले कर
सोच की
जंग लगी अलमारी में
सिकुड़े बैठे
रहते ...
उस दिन की प्रतीक्षा में
जब बाहर निकाले जाते
दहेज में देने को
या
आयकर के छापे में
जब्त होने को

काश !
कि ऐसा हो सकता होता
वास्तविकता के धरातल पर ...
तो इंसान
न कह सकता होता
सब कुछ
जो कह देता है
ईर्ष्या
कभी स्नेह से
न बना सकता होता
मन के कोरे कैनवास पर
कोई तस्वीर

गर शब्द
बंद हो सकते होते
किसी लॉकर में
तो अभिव्यक्ति
न बन सकती होती
अनुभूति
गहरी अंधेरी रात में
टिमटिमाते तारों से आती
मद्धिम रोशनी की।

~यशवन्त यश©

19 January 2014

मैंने कब कहा .......

मैंने कब कहा
आसमान से
तारे तोड़ कर लाऊँगा

मैंने कब कहा मैं ही
चाँद और
मंगल पर जाऊंगा

मैंने कब कहा
अँधेरों में
रोशनी बन जाऊंगा

मैंने कब कहा
सोने पर
हीरे सा जड़ जाऊंगा

मैंने कब कहा
सीढ़ी लगा
गगन से मिल आऊँगा

मैंने कब कहा
सर्दियों में
रोज़ ही नहाऊँगा

मैंने कब कहा
अपना कहा यूं
लिख कर मिटाउंगा

मैंने कब कहा
हर पाठक के
दिमाग का दही बनाऊंगा 

मैंने जो कहा
तब कहा
कहे से मुकर जाऊंगा

मैंने अब कहा
अपने कहे पर
कहकहे लगाऊँगा

मैंने कब कहा
मेरा लिखा
पढ़ना ज़रूरी है

हूटिंग के इस दौर में
'यशवंत'
अब भागना मजबूरी है।

~यशवन्त यश©

15 January 2014

कहीं ज़्यादा गर्मी,कहीं ज़्यादा ठंड है

(चित्र-हिंदुस्तान-लखनऊ-पेज-14)

कहीं ज़्यादा गर्मी,कहीं ज़्यादा ठंड है
यह प्रकृति से खेलने का ही दंड है

भूकंपों से कभी समझाती है हमें
तूफानों से कभी दहलाती है हमें

हरियाली क्यों हमें सुहाती नहीं
कंक्रीट उसको कभी लुभाती नहीं

उजड़ते गांवों का यह शहरीकरण है 
कहीं ज़्यादा गर्मी,कहीं ज़्यादा ठंड है । 
 
~यशवन्त यश©

11 January 2014

आज भी वह मेरे काम आया ......

कुछ चीज़ें
कभी कभी 
मिल कर
अचानक ही कहीं
याद दिला देती हैं
पिछले दिनों की
और गुज़र चुके वक़्त की
आज एक
ऐसी ही चीज़  मिली
एक पुराना
25 पैसे का सिक्का
नये की तरह
आज भी
वैसा ही चमकता हुआ......

मिला करता था मुझे
वैसा ही
25 पैसे का सिक्का 
स्कूल के दिनों मे 
जेब खर्च को
जो काम आता था
लेने को
कभी टॉफी
कभी इमली
या कुछ और .....

आज भी
वह सिक्का
मेरे काम आया
और मैं घूम आया
बचपन की
सुनहरी गलियों में। 

~यशवन्त यश©

04 January 2014

चलो कहीं चलें

भीड़ भरे चौराहों पर चलें
या सुनसान राहों पर चलें  
ऐ मेरे मन !
चलो कहीं चलें

जहां भागते समय का
कोई डर न हो
जहां हम हों और
किसी को खबर न हो

जहां मीलों फैली
धरती की छत पे
सितारे सजे हों
जहां चाँद और सूरज
साथ ही खड़े हों 

मावस का हर दिन
जहाँ पूनम की रातें हों
पास में हो क्षितिज
और आसमान से बातें हों 

तो किस बात की देर
आओ ख्वाबों के पार चलें
 ऐ मेरे मन !
चलो कहीं चलें। 

~यशवन्त यश©

01 January 2014

बता दो न ...प्लीज़ :)

नव वर्ष !
अब जब
तुम आ ही गए हो
तो तुम्हारा स्वागत है
वैसे ही
जैसे
हर आगत का होता है
भारतीय परिवेश मे

पर मेरे पास
तुम्हारे लिये
आरती का थाल नहीं
न ही तिलक है
बस दो जुड़े हुए हाथ हैं
और माथे पर
तुम से अपेक्षाओं की
अनगिनत लकीरें

अपेक्षाएँ
जो होना स्वाभाविक है
ठीक वैसे ही
जैसे बच्चे
ताकते  हैं
घर आए मेहमान के 
सूट केस को
या पोटली को
कि शायद कुछ
आया हो लेकर 
उनके मतलब का  

बस उसी तरह    
मैं भी 
ताक रहा हूँ तुम्हें 
कि 
365 दिनों की
इस नयी पोटली मे 
छुपा कर
क्या कुछ लाए हो
मेरे लिये
बता दो न 
...प्लीज़ :)
 
~यशवन्त माथुर©
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