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26 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -3

वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी
कितने ही एहसासों को
खुद के भीतर दबाए
हर पल
मांगती रहती है मन्नतें
इस दुनिया के पार जाने की
लेकिन
तैयार नहीं
देने को
इम्तिहान
तो विकल्प क्या ...?
हाँ विकल्प है
सिर्फ एक ही विकल्प
कि वक़्त के कत्लखाने में
सांसें गिनती जिंदगी 
वक़्त से पहले ही
उम्मीदों की 
सबसे ऊपरी मंज़िल से 
कूदकर नीचे
हो जाए मुक्त
इन तमाम झंझटों से।

~यशवन्त यश©

23 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में -2

वक़्त के कत्लखाने में
सिमट कर बैठने की
कोशिश करती रूह
चाह कर भी
नहीं निकल पाती बाहर
बंद पिंजरे से ...
हो नहीं पाती आज़ाद
कई कोशिशों के बाद भी ....
वह मजबूर है
सुनने को
पल पल बिंधती देह की 
आहें....
जो बढ़ती ही जाती हैं
उम्र के ढलान पर ....
उभरती झुर्रियों के
खंजर
झेलने होंगे
आखिर कब तक ?
और
आखिर कब
कामयाब होगी
यूं फैली बैठी हुई रूह
पूरी तरह सिमट कर
अपने वर्तमान को
मिट्टी में मिलाने में .....
वो पल भी आएगा
अपने तय पल पर
मुझे इंतज़ार है
बेसब्री से
जब यह एहसास
लुढ़के पड़े मिलेंगे
किसी रोज़ ....
वक़्त के कत्लखाने में । 

~यशवन्त यश©

20 March 2014

वक़्त के कत्लखाने में-1

वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
नयी उम्मीदों की आस में
झेलती है
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस....
ज़ख्म -
जिनके भरने का
भान होते ही
उन पर छिड़क दिया जाता है
नयी नयी बातों का
आयोडीन रहित
ताज़ा नमक....
जो कैद रखता है
दर्द को
नसों में भीतर तक
फिर भी निकलने नहीं देता
मूंह से एक भी आह
क्योंकि
वक़्त के कत्लखाने में
कट कट कर
ज़िंदगी
सुन्न ज़ुबान 
और सिले हुए होठों से 
बयां नहीं कर सकती 
अपनी तड़प 
बस
झेलती रहती है 
यादों के चुभते
हरे ज़ख़्मों की टीस
आज़ाद हो कर 
मुक्त आकाश में 
उड़ने की 
तमन्ना लिये। 

~यशवन्त यश©

17 March 2014

देखो होली का हुड़दंग


  लाल हरा पीला नीला
थोड़ा सूखा थोड़ा गीला
भर पिचकारी उड़ता रंग
देखो होली का हुड़दंग

बच्चा बच्चा भीगा भीगा
थोड़ा मस्त थोड़ा खीझा
गली गली में होती जंग
देखो होली का हुड़दंग

जैकब गुरमीत फरहा सीता
ठंडाई हर कोई पीता
प्लेट में गुझिया मस्त तरंग
देखो होली का हुड़दंग

खुशी से सबका गहरा नाता
त्योहार हमको यही बताता
मिलकर गले बिखरता रंग
देखो होली का हुड़दंग। 

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आप सभी को सपरिवार होली मुबारक
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~यशवन्त यश©

09 March 2014

हर कोई है यहाँ अपने मे मशगूल

हर कोई है यहाँ
अपने मे मशगूल
किसी को बीता कल याद है
और कोई
आज मे ही आबाद है
कोई डूबा है
आने वाले कल की चिंता में
कोई बेफिकर
देखता जा रहा है
मिट्टी के पुतलों के भीतर
छटपटाती आत्माओं की
बेचैनी ।

हाँ
हर कोई है यहाँ
मशगूल
बदलते वक्त के साथ
दर्पण में
खुद की बदलती
तस्वीर देखने में
पर सच तो यही है
कि इन तस्वीरों का यथार्थ
दिल दिमाग के
बदलने पर भी
नहीं बदलता
रंग रूप की तरह।

 ~यशवन्त यश©

07 March 2014

गहराती रात के सूनेपन में .......

गहराती रात के सूनेपन में
सरसराती आ रही है
एक आवाज़
कि कहीं से
झुरमुटों की ओट से
या किसी और छोर से 
जैसे
कोई पुकार रहा हो
किसी को;
कभी के भूले भटके को....
पर ना मालूम
सोते ख्यालों की इस भीड़ में
सुन रहा है कौन
किसकी आवाज़ ....
चाहता है कौन
किसका साथ
गहराती रात के सूनेपन में
अक्सर मिल जाते हैं
सुकून के
दो चार पल
जब हो जाती है मुलाक़ात
आसमान से बरसती
चाँदनी से या
चमकते तारों से
फिर आज....
अचानक यह आवाज़
जो है तो अपरिचित
फिर भी
न जाने क्यों
परिचित सी लगती है
हर बार
भटकता है
मन के भीतर का मन
पहचानने को
वह आवाज़ है ...
या कोई साज़
गहराती रात के सूनेपन में। 

~यशवन्त यश©

01 March 2014

पौधे से सीखो





उठ जाओ कितने ही ऊपर
देखो चाहे गगन को छूकर
जुड़े रहना धरती से देखो
बच्चों ! प्यारे पौधे से सीखो।

वो तुम से कुछ नहीं लेता है
फल फूल हवा भी देता है
उसको स्वार्थ का पता नहीं
वृक्ष बन कर छाँव बिखेरता है ।

दुख जीवन के सभी झेल कर
आँधी औ तूफानों से खेल कर
सीना तान कर जीना देखो
बच्चों ! प्यारे पौधे से सीखो।


~यशवन्त यश©
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