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27 May 2014

कुछ लोग -4

कुछ लोग
चलते रहते हैं
जीवन के हर सफर में
कभी अकेले
कभी किसी के साथ ....
पीते हुए
कभी कड़वे -मीठे घूंट
और कभी
सुनते हुए
दहशत की चिल्लाहटें ....
उनकी राह में
फूलों के गद्दे पर
बिछी होती है
काँटों की चादर
जिस पर चल चल कर
अभ्यस्त हो जाते हैं
उनके कदम
सहने को
वक़्त की हर ठोकर
और साथ ही
महसूस करने को
हर मुरझाते
फूल की तड़प ....
कुछ लोग
बस चलते रहते हैं
बिना रुके
बिना थके
क्योंकि वो जानते हैं
इंसान के रुकने का वक़्त
उस पल आता है
जब सांसें
थमने को  होती हैं
हमेशा के लिए।

~यशवन्त यश©

21 May 2014

कुछ लोग -3

कुछ लोग
अक्सर खेला करते हैं
आग से
कभी झुलसते हैं
कभी 
जलते हैं 
न जाने किस डाह को
साथ लिये चलते हैं...
शायद डरते हैं
खतरे में देख कर
खुद के अहंकार की नींव
जो दिन पर दिन
खोखली होती रह कर
ढह जानी है
एक दिन
अनजान भूकंप के
एक हल्के झटके भर से ....
ऐसे लोग
बे खबर हो कर
अपनी नाक के अस्तित्व से
करते हैं वार 
पूरी ताकत से
और धूल में मिल जाते हैं
'ब्रह्मास्त्र' की दिशा
उलट जाने के साथ। 

~यशवन्त यश©

19 May 2014

कुछ लोग--2

इस मौसम की
हर तपती दुपहर  को
मैं देखता हूँ
कुछ लोगों को
फुटपाथों पर
बिछे
लू के बिस्तर  पर
अंगड़ाइयाँ लेते हुए ....
या 
गहरी नींद मे
फूलों की खुशबू के
हसीन ख्वाबों को
साथ ले कर 
किसी और दुनिया की
हरियाली में
टहलते हुए ....

ये कुछ लोग
हैं तो
हमारी इसी दुनिया के बाशिंदे -
मगर
अनकही बन्दिशें
हमें रोज़ रोकती हैं
इनके करीब जाने से
क्योंकि इनके
शरीर और नथुनों
मे बसी है 
वही बासी गंध
जिसे हम उड़ेल कर आते हैं
पास के कूड़ा घर में.....

ऐसे लोग
अपने काले
मटमैले चेहरे और
तन पर
बस नाम के कपड़े पहने
गिनते रहते हैं
दिन की रोशनी और
रात के अँधेरों को
जिसे हम पर कुर्बान कर के
वो रहते हैं
आसमान की छत
पाताल की धरती पर
सदियों से 
यूं ही...
इसी तरह....।

~यशवन्त यश©

17 May 2014

कुछ लोग-1

ऊंची डिग्रीधारी
कुछ लोग
समझने लगते हैं
कभी कभी
खुद को
इस कदर काबिल
कि बंद हो जाता है
दिखना
उनको हर वो शख्स
जो परिधि में नहीं आता
उनके आसपास फैली
चकाचौंध की .......

वह लोग
सिमटे-सिकुड़े रहते हैं
अपनी सोच की
अनूठी
चादर के भीतर
जिसकी लंबाई चौड़ाई
फैली होती है
यूं तो
मीलों दूर तक
फिर भी सीमित रहते हैं
खुद के बनाए
उसी अंधेरे वर्ग
या वृत्त के चारों ओर
जिसकी लक्ष्मण रेखा लांघना
उनके लिए
किसी प्रतिकूलता से कम नहीं .....

ऐसे लोग
खुदा होते हैं
खुद की नज़रों में
और उनके चाटुकार
रोज़ रचते हैं
झाड़ की ऊंचाइयों पर
नये नये संविधान
जिसकी हर धारा
और उपधारा
कहीं दूर होती है
उनकी श्री की
वास्तविक
वर्तमान
और भावी
तस्वीर से ......

इसलिये
मैं कोशिश करता हूँ
दूर रहने की
ऊंची डिग्रीधारी
कुछ लोगों से 
क्योंकि 
मुझे पसंद है रहना 
शून्य की सतह पर। 

~यशवन्त यश©

13 May 2014

तस्वीरें....

तस्वीरें
जो लटकी हैं
यूं ही दीवारों पर
याद दिलाने को
बीता कल
कभी कभी
बातें करती हैं मुझ से
अकेले में
बताती रहती हैं
दूसरों के निहारने से
मिलने वाला सुख
जमी हुई गर्द से
मिलने वाला दुख
और न जाने क्या क्या
कहती रहती हैं
अपनी खामोश जुबान से
कभी कभी
सुनती रहती हैं
मेरी हरेक अनकही
बताती रहती हैं
सही गलत का भेद
शीशे के फ्रेम में जड़ी
बीते कल की 
यह तस्वीरें 
अनमोल विरासत हैं
आने वाले
कल के लिए।

~यशवन्त यश©

07 May 2014

वक़्त के कत्लखाने में -6

वक़्त के कत्लखाने में
उखड़ती साँसों को
साथ लिये
जिंदगी 
बार बार देख रही है
पीछे मुड़कर
और कर रही है
खुद से कई सवाल
जिनका जवाब
आसान नहीं
तो मुश्किल भी नहीं है
मगर
आँखों के सामने
हालातों की तस्वीर
उलझी हुई है इस कदर
कि संभव नहीं रहा
पहचानना
और ढूंढ निकालना
सही -सच्ची बातों को
'क्या 'क्यों' और 'कैसे'
अब बनने वाले हैं भूत
भविष्य की
परिभाषा रच कर
उखड़ती साँसों को 
साथ लिये 
जिंदगी 
निकल रही है 
अंतहीन सफर पर। 

~यशवन्त यश©

01 May 2014

नींव और मजदूर......(मई दिवस विशेष)


मैं रोज़ देखता हूँ
सूखे चारागाहों में
रोज़ खुदती
सपनों की
नयी नयी नींवों को 
जो जल्द ही चूमेंगी
अनेकों ख़्वाहिशों का
आसमान  ....
और उन नींवों को खोद कर
सुनहरे वक़्त को
साँचों में ढालने वाले
उम्मीदों के फूस डली
झोपड़ियों में 
यूं ही जीते रह कर
सुलगते रहेंगे
अस्तित्व खोती
बीड़ी की तरह .....
उनके हाथ
जो रंगे रहते हैं
बेहतरीन सीमेंट और
मनमोहक पेंट से
रंग नहीं सकते
खुद की दीवारें .....
वह तो बस
बदलते रहते हैं
खुद का ठौर
खुद के जीने का रंग
चलते रहते हैं
दुनिया के संग
फिर भी
गुमनाम ही रहते हैं
तन्हा नींव की
एक एक आह की तरह।  

~यशवन्त यश©
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