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30 June 2015

अंत ....

अंत
निश्चित है
हर चीज़ का
चाहे
इंसान हो
या तारीख
अंत
ले चलता है 
नये आरंभ की ओर
नयी राह की ओर
कुछ साँसों को
एहसासों को
खुद में समेटकर
अंत 
बांटता चलता है
कहीं गम
कहीं खुशी
और कहीं
तटस्थता के
कुछ पल। 
  
~यशवन्त यश©

29 June 2015

पूर्वाग्रह जीवन का सत्य होते हैं

पूर्वाग्रह
जीवन का
सार्वभौमिक सत्य होते हैं ....
हम कुछ भी कहें
मुक्त होने की बातें
पूर्वाग्रह
सबके भीतर होते हैं ......

किस्म किस्म के पूर्वाग्रह
किसी व्यक्ति के प्रति
उसकी कला
दृष्टिकोण
समझ
और
अभिव्यक्ति के प्रति ,
या
किसी जगह
दृश्य
चित्र और
चलचित्र के प्रति  ,
ज्ञान-विज्ञान
देश
काल
वातावरण
रूप
रंग
आकार
और
नस्ल के प्रति ,

पूर्वाग्रह
तरह तरह से
चाहे -अनचाहे
हम सबके अंदर से
बाहर आते होते हैं
पूर्वाग्रह
जीवन का
सत्य होते हैं ।  

~यशवन्त यश©

28 June 2015

साहित्य स्पेशल चलाएं--सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार

कादमी से फोन आया कि उनका काव्यपाठ है? आप आ रहे हैं न? उस आवाज में इस कदर अपनापन था कि जबाव दिए बिना न रह सका!
कहा: 'आदरणीय! अगर आप आने-जाने का किराया और सीटिंग चार्ज का पेमेंट करें, तो सोचा जा सकता है। दिल्ली में आना-जाना खर्चीला है। कविता झेलने का चार्ज छोड़ भी दूं, तो आने-जाने और दो-तीन घंटे बैठने की फीस मिलाकर पांच हजार बनते हैं। इसमें बोर होने की फीस नहीं लगा रहा। इतना कंसेशन दे रहा हूं। अकादमी संवाद अचानक बंद हो गया। हमें अकादमी वाले से हमदर्दी महसूस हुई।
उसका काम 'श्रोता' जुटाना था। हमें क्या पड़ी थी ऐसा-वैसा कहने की। लेकिन फिर वह कहावत याद आई कि घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खाएगा क्या? हमारे जैसा लेखक अकादमी से यारी करेगा, तो खाएगा क्या?
यों हमने उसे समझाने की कोशिश की थी कि भइए, यह बात आपसे नहीं, आपके जरिए आपकी अकादमी से कही जा रही है। हो सके तो अध्यक्ष महोदय को बताना। सचिव जी को बताना कि इधर एक दिल्ली वाला कह रहा था कि महंगाई के चलते श्रोता महंगे हो गए हैं। वे अब फ्री में नहीं मिलते। श्रोता चाहिए, तो कुछ पेमेंट करना होगा। हर लेखक मूलत: एक श्रोता होता है, और जो श्रोता होता है, अक्सर वह लेखक भी हो ही जाता है। इसलिए हमने साहित्य की 'सहज समाधि' वाला मार्ग सुझाया।
हमने कहा- अध्यक्ष जी से कहना कि हिंदी का एक दुष्ट लेखक अरज कर रहा था कि आप पहले अकादमी अध्यक्ष हैं, जो हिंदी वाले हैं। हिंदी वाला एक सुझाव दे रहा है कि हे अध्यक्ष जी, अकादमी और आईआईसी आदि की कृपा से कविता आईसीयू में है। उसे जीवित रखना है, तो कवि के साथ श्रोता का भी एक बजट बनाइए।
दिल्ली में श्रोताओं का यों भी अकाल है। वे फ्री में जब नेताओं को नहीं मिलते, दलों को नहीं मिलते, तो अकादमी को कैसे मिलेंगे? नेता और दल उनको एसी गाड़ी में लाते, ले जाते हैं। खिलाते और पिलाते हैं, सीटिंग चार्ज भी देते हैं।  लेकिन आप भेदभाव करते हैं। दिल्ली से बाहर के लेखकों के आने-जाने के लिए हवाई जहाज और टैक्सी का किराया देते हैं, लेकिन दिल्ली वालों को बिना किराये दिए बुलाते हैं। 
यह अन्याय क्यों? असली लेखक या श्रोता का कोई पता नहीं होता। लेखक को क्या पता कि उसकी दिल्ली कहां से शुरू है और कहां खत्म? इसे महसूस करके रघुवीर सहाय ने तो कहा था दिल्ली मेरा परदेस!  आप ही विचारें, गाजियाबाद, नोएडा और गुड़गांव या हमारा मयूर विहार कहां हैं? वे एक मानी में बेंगलुरु, कोलकाता, मुंबई व चेन्नई तक से दूर हैं। इन शहरों से चला लेखक अकादमी जल्दी और खुशी-खुशी पहुंचता है, जबकि गाजियाबाद, नोएडा और गुड़गांव से रो-रोकर पहुंचता है।
हे अध्यक्ष जी, साहित्य और अकादमी, दोनों का असल संकट श्रोता का है। साहित्य ने श्रोता को फ्री में उपलब्ध समझ लिया है। लेकिन इस महंगाई के जमाने में श्रोता फ्री में किसी को नहीं मिलते। एक चाय, दो बिस्कुट, एक समोसा में लेखक/ श्रोता को बुलाना उसका घोर अपमान है।
श्रोता के संकट से बचने का उपाय यही है कि आप एक 'साहित्य स्पेशल' चला दें, जो हर शाम दिल्ली के लेखकों/ श्रोताओं क ो 'पिक अप' कर लाए, और गोष्ठी के बाद दो हजार रुपये प्रति घंटे के हिसाब से सीटिंग चार्ज पे करके ससम्मान घर छोड़ आए।
सच कहूं, ऐसा करके आप इतिहास बना डालेंगे और अकादमी का उद्धार हो जाएगा।

साभार-'हिंदुस्तान'28/जून/2015 

कुछ लोग -21

पत्थर पर खींची 
अपनी लकीर पर
चलते हुए
कुछ लोग 
अचानक ही
आ पहुँचते हैं
दो राहों पर
कभी कभी
चौराहों पर
जहां उनके नियम
उनके कायदे
डगमगाने लगते हैं
मझधार में फंसी
किसी नाव की तरह
फिर भी
अड़े रहते हैं
अपनी जिद्दी धुन पर ....
उनके निर्णय
निष्कर्ष
और सोच  की
कुंद होती धार
घातक होती जाती है
खुद ही के लिये .....
सब कुछ
जान कर भी
सब से 
अनजान बन कर
कुछ लोग
लगा लेते हैं
प्रश्न चिह्न
अपने नाम के आगे। 
  
~यशवन्त यश©

27 June 2015

आपातकाल के कुछ नायक-- रामचन्द्र गुहा (प्रसिद्द इतिहासकार)

पातकाल लगाए जाने की 40वीं वर्षगांठ के मौके पर हम कई राजनेताओं को अपनी तकलीफों और त्याग के बारे में बात करते सुन रहे हैं। लालकृष्ण आडवाणी पहले ही अपनी बात कह चुके हैं और बाकी भाजपा नेता भी पीछे नहीं हैं। शायद हमें उन्हें याद दिलाना चाहिए कि संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी इस वक्त नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और संजय गांधी के सिपहसालार जगमोहन भी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित प्रदेशों में मीडिया का मुंह बंद करने की कोशिश और आदिवासियों के मानवाधिकारों का हनन उसी तरह से हो रहा है, जैसे इमरजेंसी के दौरान हरियाणा और उत्तर प्रदेश में हुआ था।
जिन युवा कार्यकर्ताओं को इंदिरा गांधी ने जेल में डाला था, उनमें नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव हैं। अगर ये नेता अपने त्याग के बारे में बात करें, तो यह कुछ ज्यादती होगी। मुलायम व लालू मुख्यमंत्री के रूप में अपनी सत्ता का बेदर्दी से दुरुपयोग करते रहे हैं और अब अखिलेश भी अपने पिता की राह पर हैं। जहां तक नीतीश का सवाल है, तो उन्होंने पिछले दिनों कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है, जिसके युवराज इंदिरा गांधी के पौत्र हैं, जो अपनी दादी के उस विवादास्पद कार्यकाल के बारे में कतई शर्मिंदा नहीं हैं।
राजनेताओं के पाखंड के सामने हमें इमरजेंसी के कुछ सच्चे नायकों को भुला नहीं देना चाहिए। उनमें से एक मुंबई हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीएम तारकुंडे थे। 1974 में जब इंदिरा गांधी की तानाशाही प्रवृत्तियां दिखने लगी थीं, तब तारकुंडे और जयप्रकाश नारायण ने ‘सिटिजंस फॉर डेमोक्रेसी’ की स्थापना की थी, जो देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर ध्यान खींचने वाली गैर राजनीतिक संस्था थी। जयप्रकाश नारायण को जून 1975 में विपक्षी नेताओं और छात्र कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। साल के अंत में जेपी गंभीर रूप से बीमार हो गए और रिहा कर दिए गए। सन 1976 में तारकुंडे के साथ जेपी ने ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ऐंड डेमोक्रेटिक राइट्स’ (पीयूसीएलडीआर) की स्थापना की। जब इमरजेंसी हटा ली गई, तो नई सरकार के वरिष्ठ नेताओं ने आग्रह किया कि इस संस्था को अब बंद कर देना चाहिए। तारकुंडे ने इनकार कर दिया।
इमरजेंसी का एक सबक यह था कि भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लगातार सक्रिय रहना जरूरी है, ताकि ज्यादतियां फिर से न हो पाएं। लोकतंत्र के समर्थकों को इसके लिए एक स्वतंत्र मंच की जरूरत थी, जो किसी भी राजनीतिक पार्टी द्वारा मानवाधिकारों के हनन पर ध्यान खींच सके।

पीयूसीएलडीआर के अग्रणी कार्यकर्ताओं में से एक अर्थशास्त्री सीवी सुब्बाराव थे। सुब्बाराव आंध्र विश्वविद्यालय के प्रतिभाशली छात्र थे, जिन्हें इमरजेंसी में गिरफ्तार कर लिया गया था। सन 1978 में वह एमए फाइनल की परीक्षा में जेल से ही शामिल हुए। मौखिक परीक्षा देना अनिवार्य था, इसलिए सुब्बाराव को जंजीरों में जकड़कर विश्वविद्यालय में लाया गया। इसके बावजूद उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान पाया। जब इमरजेंसी खत्म हो गई, तो सुब्बाराव दिल्ली के एक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे। उन्होंने अपने आपको मानवाधिकार आंदोलन में झोंक दिया। वह देश के दूरदराज कोनों में जाकर सांप्रदायिक हिंसा, कैदियों के साथ दुव्र्यवहार, उद्योगों और खदान मालिकों द्वारा गांव की जमीन के अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर रिपोर्ट करते रहे।
मैं तारकुंडे को थोड़ा-बहुत जानता था और सुब्बाराव को अच्छी तरह जानता था। दोनों असाधारण व्यक्ति थे। तारकुंडे बहुत शालीन और मृदुभाषी थे, सुब्बाराव में कमाल का हास्यबोध और तेलुगु कविता के प्रति जबरदस्त प्रेम था। अन्य भारतीय सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरह तारकुंडे और सुब्बाराव में घमंड या शेखी बिल्कुल नहीं थी और लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पूरी-पूरी थी।

सन 1980-81 में पीयूसीएलडीआर का विभाजन हो गया और दो संस्थाएं बनीं। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (पीयूसीएल) और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) अपनी-अपनी तरह से ये संस्थाएं मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लगातार काम करती रहीं। उनके सदस्यों ने खेतिहर और औद्योगिक संघर्षों, मीडिया पर आक्रमण और फर्जी मुठभेड़ जैसे सत्ता के दुरुपयोग पर कई तथ्यपूर्ण रपटें प्रकाशित कीं। एक बहुत अच्छा काम उन्होंने कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत में मानवाधिकारों के हनन पर किया, जिन क्षेत्रों को शहरी मध्यवर्ग और मीडिया भुला चुका है। 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद पीयूसीएल और पीयूडीआर ने मिलकर एक बहुत अच्छी रपट ‘दोषी कौन’ प्रकाशित की। 1980 के दशक में एक युवा शोधकर्ता की तरह मैंने पीयूसीएल और पीयूडीआर की गतिविधियों को बहुत करीब से देखा है। इसके सदस्य आमतौर पर कॉलेज शिक्षक या वकील थे, जो अपना कामकाज संभालने के अलावा अपने बचे हुए वक्त में अपनी जेब से पैसा खर्च करके मानवाधिकारों का काम करते थे। मुझे याद है इन लोगों में एनडी पंचाली, इंद्रमोहन, आरएम पॉल, सुदेश वैद और हरीश धवन थे। दिल्ली और उत्तर भारत के अलावा पश्चिम बंगाल में कपिल भट्टाचार्य इमरजेंसी के पहले से ही मानवाधिकार आंदोलन में सक्रिय थे। मुंबई में असगर अली इंजीनियर, आंध्र प्रदेश में नामी वकील केजी कन्नाबरन और गणितज्ञ के बालगोपाल थे।
मैं सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय नहीं रहा, लेकिन मैं इन लोगों का बहुत सम्मान करता हूं। मुझे इनसे एक ही शिकायत है कि ये लोग अपने काम को संकलित करने और उसका प्रचार करने के मामले में लापरवाह हैं। भारत की महत्वपूर्ण मानवाधिकार संस्थाओं ने देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर 500 से ज्यादा रपटें तैयार की होंगी, लेकिन ऐसी कोई एक जगह नहीं है, जहां ये सारी या इनमें से काफी रपटें मिल सकें। तीस साल पहले समाजशास्त्री एआर देसाई के संपादन में एक छोटा-सा संकलन जरूर छपा था। एक दशक पहले मैंने पीयूडीआर से अपनी बड़ी रपटों का एक संकलन छापने का आग्रह किया था। एक बड़े प्रकाशक उसका प्रकाशन करने के लिए तैयार भी हो गए थे, लेकिन हमारे मित्रों के नि:स्वार्थ भाव और समाजवादी रुझान की वजह से यह कार्यक्रम नाकाम रहा।
व्यक्तियों की तरह संस्थाओं का भी एक जीवन-चक्र होता है। पीयूसीएल और पीयूडीआर अब भी एक अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन अब वे इतने प्रभावी नहीं हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि उसमें नए लोग नहीं आ रहे हैं। इन संस्थाओं में ज्यादातर लोग काफी पुराने हैं और दशकों तक काम करने से वे थक भी गए हैं। एक दूसरी बड़ी वजह यह है कि ये संस्थाएं पिछले कुछ सालों में पक्षपाती हो गई हैं। वीएम तारकुंडे या सीवी सुब्बाराव की खासियत यह थी कि जहां वे सरकार के खिलाफ सक्रियता दिखाते थे, वहीं अतिवादी संस्थाओं के प्रचार को भी जैसे का तैसा स्वीकार नहीं करते थे। अब ये संस्थाएं अक्सर सरकारी ज्यादतियों का विरोध करती हैं, लेकिन माओवादियों या अलगाववादियों का तीव्र विरोध करने से बचती हैं।
इंदिरा गांधी की इमरजेंसी ने कुछ बहुत बुरे असर दिखाए, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं और सांविधानिक मूल्यों पर उनके हमले ने कुछ असाधारण स्त्री-पुरुषों को आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ने का जज्बा दिया। आज राजनीतिक तंत्र शायद इमरजेंसी के खतरे से बचा हुआ है, लेकिन मानवाधिकारों का केंद्र और राज्य सरकारों और राजनेताओं द्वारा उल्लंघन जारी है। भारत को तारकुंडे और सुब्बाराव जैसे लोगों की एक नई पीढ़ी की सख्त जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-27/06/2015 

बदलते समय के साथ ......

बदलते समय के साथ
बदल जाते हैं
हमारे मूल्य
हमारी प्राथमिकताएँ
हमारा इतिहास
भूगोल
विज्ञान और दर्शन ....
हमें मिल जाते हैं 
उत्तर
अब तक अनुत्तरित के
और सामने आ जाते हैं
फिर कुछ नये
रोचक
कुछ उबाऊ
थकाऊ प्रश्न ....
जिनके रहस्यों के शोधन में
हमारा मन
तन और संचित धन 
घुल जाता है
संघर्षशील राहों की
असीम श्वासों में
बदलते समय के साथ । 

~यशवन्त यश©

26 June 2015

कहीं खो सी गयी है धरती

सपनों की बात हो गयी है
हरी भरी धरती
जी बारिश में भीग कर
कभी मुस्कुरा देती थी
अब कंक्रीट के
बोझ से दब कर
हर बरसात
रो देती है
अपनी किस्मत पर
देखो!
कितनी गुमसुम सी
हो गयी है धरती
शायद
कहीं खो सी गयी है धरती।

~यशवन्त यश©

25 June 2015

विचार ......

जैसे
आसमान पर छाए बादल
कभी छंटते हैं
गहराते हैं
वैसे ही मन के ऊपर
कुछ विचार
आते जाते हैं ....
अपनी सीमित
सोच के दायरे में
अपने विस्तार में
शब्दों की आकृतियाँ
ले ले कर
फूलों के रंग में रंग कर
काँटों सा तीखा चुभ कर
भविष्य को
गर्भ में लिए 
कभी स्मृति शेष बन कर
विशेष से बन जाते हैं
जब कुछ विचार
आते जाते हैं।
  
~यशवन्त यश©

24 June 2015

आखिर फायदे में चीन ही रहा--सही राम

योग करके हमने स्वास्थ्य लाभ लिया और चीन ने धन लाभ लिया। हमने विश्व रिकॉर्ड से नाम बनाया, उसने नामा बनाया। वैसे तो कहा जाता है कि जब आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान। हमने दुनिया को योग देकर संतोष पाया। बदले में चीन ने वह धन पाया, जो हमारे लिए धूल समान था। विघ्न संतोषी लोग आरोप लगा सकते हैं कि हमने योग को बेच दिया, और चीन ने राजपथ पर योग करने के लिए हमें अपने मैट बेच दिए। आलोचकों का कहना है कि यह सब खाए-पीए, अघाए लोगों का शगल था। चर्बी इतनी बढ़ गई थी, इस तरह ही उतर जाए तो अच्छा। देश का नाम भी दुनिया में हो जाए और अपनी सेहत भी ठीक हो जाए, क्या बुरा है? चीन ने शायद इसी से अपना फंडा निकाला होगा- तुम हमें फैट दो, हम तुम्हें मैट देंगे। उसने कहा होगा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग को मान्यता दिलाकर तुम गर्व करो, हमें तो बस थोड़ा धन दे दो। हम मेक इन इंडिया करते रहे और वे मेड इन चाइना बेच गए।

वैसे चीन हमेशा ही फायदे में रहता है। दिवाली हमारी होती है और फायदा उसका होता है। हम रोशनी के लिए लड़ियां भी उसी की और पूजा के लिए लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां भी उसी की खरीदते हैं। चेहरे बेशक कुछ अलग होते हैं, पर मूर्तियां सस्ती होती हैं और उपलब्ध रहती हैं। आखिर में दीवाला हमारा होता है और दिवाली उनकी होती है। होली हमारी होती है, और फायदा उनका होता है। स्वतंत्रता दिवस हमारा होता है और झंडे हम उसके बनाए फहराते हैं, क्योंकि तिरंगे भी अब वहीं से बनकर आते हैं। पर्व हमारा, फायदा उनका। देशभक्ति हमारी, मुनाफा उनका। देश में चुनाव हो तो भी फायदा चीन का ही होता है, क्योंकि पार्टियों की टोपियां, उनके झंडे और नेताओं के मास्क वही बनाते हैं। चुनाव से लोकतंत्र हमारा मजबूत होता है और अर्थव्यवस्था उनकी मजबूत होती है। तो जब तीज-त्योहारों से लेकर स्वतंत्रता दिवस और चुनाव तक से फायदा उसी का होता है, तो योग से भी फायदा उसे ही उठाना था। उसने उठाया। हमने दुनिया को योग दिया, उसने हमें योग के लिए मैट दिए। फायदे में आखिर चीन ही रहा।
साभार-'हिंदुस्तान'-23/06/2015 

बदलता मौसम ......

बदलता मौसम
अपने साथ ही
बादल देता है
मन में पल रहे
एहसासों को
दिखा देता है
नये ढंग
नये रंग
सीखा देता है जीना
और सलीका
नये चौराहों पर
आते जाते
कई विचारों के बीच
नये फ़ासलों
और कम होतीं
दूरियों के बीच
खुद टिकाए -
जमाए रखने का.....
बदलता मौसम
अपनी पहली
बरसात में ही
दहकती धरती पर
बिखरा देता है
अपनी सोंधी खुशबू
जिसके फैलाव में
भूल जाते हैं शब्द भी
सही आकार में ढल कर
सपनों को
साकार करना।

~यशवन्त यश©

23 June 2015

फिर भी कहेगा कहने वाला......

सब ढूंढते हैं हम प्याला
सब ढूंढते हैं हम निवाला
कहने को तो सब अपने हैं
कहीं नहीं कोई सुनने वाला
फिर भी कहेगा कहने वाला.......

कहीं कोई किस्मत का मारा
कहीं कोई किस्मत का प्यारा
चलती साँसों के फेरों मे
जीत हार कर जीने वाला 
फिर भी कहेगा कहने वाला......

कहने पर कोई रोक नहीं है 
कहने पर कोई टोक नहीं है
ठोक-पीट कर घिसट-फिसट कर 
कोई काँटों पर चलने वाला
फिर भी कहेगा कहने वाला......

~यशवन्त यश©

22 June 2015

कुछ लोग- 20

दोहरे मापदंड
साथ लिए चलने वाले
कुछ लोग
अपने लिए कुछ
और के लिए कुछ और
सोचने-करने वाले
कुछ लोग
गढ़ लेते हैं
एक ही स्थिति-
परिस्थिति की
दो परिभाषाएँ
एक
अपने अनुकूल
एक 
और अपने प्रतिकूल 
ताकि दिखा सकें
क्रूर चेहरे  पर लगा
उदार मुखौटा
और भी बेहतरी से।

~यशवन्त यश©

21 June 2015

कुछ भी तो नहीं मेरे पास

कुछ भी तो नहीं
मेरे पास
बस झोली में
लेकर चलता हूँ
आस और विश्वास ....
इन अजीब से जंगलों में
भटकते हुए
यूं ही कभी
थोड़ा बहकते हुए
कुछ निगाहों को
खटकते हुए
देखता हूँ 
समय को
सरकते हुए .....
कुछ भी तो नहीं
मेरे पास
खोखला करतीं
दीमकों को देने के लिए
किसी से कुछ लेने के लिए
इस जीवन को
जीने के लिए
बस लेकर चलता हूँ
हर पल
एक नयी सांस
अपना खोया विश्वास
यहाँ
कुछ भी तो नहीं
मेरे पास।  

~यशवन्त यश©

20 June 2015

सोचता हूँ ......

सोचता हूँ
जब समय आएगा
चले जाने का
तब क्या छोड़ पाऊँगा
यहाँ
अपने अनजान
कदमों के निशान ?
क्या छोड़ पाऊँगा
अपनी बातें
अपने एहसास
और अपनी
तीखी ज़ुबान ?
या
बस यूं ही
हवा में घुल कर
चंद आहों से धुल कर
दफन हो जाऊंगा
समय की
धूल भरी 
किसी कब्र के भीतर
जिसके ऊपर
न कोई धूप जलेगी
न दीप
बस पतझड़ के
कुछ सूखे पत्ते
यहाँ-वहाँ बिखर कर
कभी कभी
पढ़ लेंगे
कहीं कोने में लिखा
मेरा नाम.....
और फिर
कहीं इकट्ठे हो कर
खरपतवार बन कर
जल कर
धुएँ में मिल कर
कहीं खो जाएंगे
खुद मेरे अपने
अस्तित्व की तरह। 
  
~यशवन्त यश©

19 June 2015

चलता जाता हूँ अपनी राह.........

हर रोज़
बहुत सी तमन्नाएँ
दिल में लिए
चलता जाता हूँ
अपनी राह
अँधेरों के उस पार
कुछ देखती
निगाह के साथ
आगाह होता जाता हूँ
हर अगले कदम
अपने वज़ूद को
कायम रखने के
हर जतन करता हुआ
तीरों के निशाने पर
रहता हुआ
हर रोज़
हर लौ के साथ
पिघलता हुआ
चलता जाता हूँ
अपनी राह
सदियों से
सदियों के
सिलसिले में।

~यशवन्त यश©

18 June 2015

अलग सी दुनिया..........

सोचता हूँ
कैसी होगी
जज़्बातों के
बाहर की दुनिया
जहां सब कुछ
शून्य होगा
जहां
न होंगेरिश्तों के बंधन
न नियम
न अनुशासन
फिर भी
स्व नियंत्रण की
उस नयी
अलग सी
इंसानी दुनिया में
पर-नियंत्रण की
आज की
मशीनी दुनिया से बेहतर
दूसरों से कटे
मगर खुद से जुड़े
खुद में खोए
अपनी भाषा में
अपनी भाषा में
खुद से बातें करते
कुछ इंसान होंगे
दूर की सोचते दिमाग
और जज़्बातों के बिना
वह अलग सी दुनिया
फिर भी हरी-भरी होगी
अलग सी धरती पर।  

~यशवन्त यश©

17 June 2015

कुछ लोग-19

अपनी आदतों से मजबूर
कुछ लोग
जाने -अनजाने ही
चल देते हैं
विध्वंस की राह पर
बिना कुछ सोचे
बिना कुछ समझे
अपने पुरातन
परिवेश के आकर्षण में
भूल जाते हैं
समन्वय
अपने स्वभाव
अपनी ज़िद
अपने पूर्वाग्रहों के
वशीभूत हो कर
कुछ लोग
आनंदित होते हैं
जलती चिताओं से उठतीं
ऊंची लपटें देख कर। 

~यशवन्त यश©

16 June 2015

डायरी के पन्ने .....

कभी
कुछ याद दिलाते
कभी
कुछ बात बताते
बीते पलों का
इतिहास दिखाते
डायरी के पन्ने
कितना कुछ
काला-सफ़ेद
समेटे रहते हैं
अपने भीतर.....
कभी हँसाते
कभी रुलाते
गैरों के बीच
अपना बन कर
कुछ समझाते
कुछ सिखलाते
डायरी के पन्ने
अपनी परतों के
सीमित भूगोल में
समेटे रहते हैं
समुद्र की अथाह गहराई
अंतरिक्ष की
असीमित ऊंचाई
फिर भी
बने रहते हैं 
बेहद सादे
असाधारण स्याही के
कई दाग
कई धब्बों को झेल कर
समय की
गर्द में लिपट कर भी
नये जैसे
चमकते रहते हैं
ये डायरी के पन्ने।

~यशवन्त यश©

15 June 2015

शेल्फ साहित्य ........

खुद के लिये लिखा
खुद के लिये छपा
कहीं कोने में रखा
खुद का ही
कोई संस्करण
रंगीन आवरण के साथ
खुद के अहं को
तुष्ट करता हुआ
खुद के परिचय को
समृद्ध करता हुआ 
खुद की पूंजी के निवेश से
नये परिवेश रचता हुआ
विक्रय को तरसता हुआ
किसी शेल्फ पर सजता हुआ
खिसियानी हँसी
हँसता हुआ
मन मसोस कर
दिन गिनता हुआ
किसी की बाट जोहता हुआ
खुद के अक्षर
गिन गिन कर
खुद से खुद को
पढ़ पढ़ कर
नहीं ऊबता खुद से
खुद का बना
शेल्फ साहिय !

~यशवन्त यश©

14 June 2015

डालडा डाट साब की लीला - सुधीश पचौरी

'डाट साब' का मतलब जानते हैं?
यह वह अनोखा प्राणी है, जो सिर्फ हिंदी में मिलता है। एक अध्ययन के अनुसार, अंग्रेजी के 'डाट काम' का चलन तो बहुत बाद में शुरू हुआ, उससे कहीं पहले हिंदी में 'साब' के आगे 'डाट' शब्द का चलन शुरू हो चुका था। कौन जाने कि 'काम' वालों ने 'काम' के आगे जो 'डाट' लगाया, वह हिंदी से चुराया हो। एक रिसर्च कहती है कि 'डाट' शब्द का प्रयोग पहले-पहल हिंदी में हुआ। अंग्रेजी में बहुत बाद में आया। और अब भी जब हर बंदा 'डाट काम' हुआ पड़ा है, तब भी हिंदी में 'डाट साब' चलता है। एक मानी में 'डाट साब' 'डाट काम' का बाप है।

'डाट काम' की महिमा से 'डाट साब' की महिमा सवाई है। यही हिंदी की कमाई है। वह हिंदी वाला ही क्या, जिसके जानने वाले उसे दिन में दो चार बार 'डाट साब' कहकर न पुकारें? 'डाट साब' शब्द के कई आयाम हैं। कई पर्याय हैं। उसके कई प्रकार हैं और कई उच्चारण-भेद हैं। किसी के लिए वह 'डाट्सा' है। किसी के लिए 'डाक्टसा' है, किसी के लिए 'डाक्टर साहिब' है, तो किसी के लिए 'डाकटर साहेब।' डाट के पीछे 'साहब' कब लगा, क्यों लगा, इसका पता नहीं, पर हिंदी में बड़े से बड़ा 'साहब' सिर्फ कालांतर में 'साब' मात्र रह जाता है।


कुछ लोग मानते हैं कि 'डाट' वाली बोतल की 'डाट' जब किसी हिंदी वाले को उछलकर लगी, तो वह आदमी 'डाट साब' कहलाने लगा। कुछ लोगों का मानना है कि जिसे सबसे ज्यादा 'डांट' पड़ती है, वही 'डाट साब' हो जाता है। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि हिंदी के आदमी के नाम के आगे जो 'डा.' लगता है, वह 'डालडा' का प्रथमाक्षर है। जिस तरह एक जमाने में 'डालडा' लोकप्रिय था, उसी तरह हिंदी में 'डा.' भी लोकप्रिय है।

'डाट साब' व्याकरण की दृष्टि से क्या है? यह व्याकरण तक नहीं बता पाता। नहीं बताता है। यह वह अमर 'अव्यय' है, जो बार-बार के उपयोग से व्यर्थ नहीं होता। न अंग्रेज होते, न 'पीएचडी' का धंधा शुरू कराते। न हर आदमी 'डाक्टरेट' के लिए तरसता और न 'डाट साब' कहलाता। अंगे्रजों ने 'पीचडी' चलाई, तो हिंदी वाले तुरंत समझ गए कि भइए! हिंदी में भी पीएचडी करनी-करवानी है। बस फिर क्या था, हर आदमी पीएचडी करने को ललकने लगा और 'डाक्टर' कहलाने लगा। 'डाक्टर' शब्द का उपयोग साबुन की बटिया की तरह होने लगा। हिंदी में आकर बटिया घिसने लगी और 'डाक्टर' की 'डाट' भर रह गई। हिंदी विभागों में कहीं चले जाइए, वहां हर कहीं 'डाट साब' सुनाई देगा।

'डाट साब' संबोधन इस असार संसार में हिंदी विभागों का हिंदी साहित्य के लिए मौलिक सविनय नैवेद्य है। वह हिंदी विभाग क्या, वह हिंदी विभागी क्या, जिसके नाम के आगे अत्यंत सुखकारी 'डा.' न चिपका हो? 'डा.' माने डाक्टर। 'डा.' माने 'डाक्टरेट किया हुआ।' 'डा.' माने 'डाट साब।' जिसने विभागों में डाक्टरेट होते देखा या किया है, वही जानता है कि आदमी से 'डाट साब' बनने की प्रक्रिया क्या है? कितनी सहज-सरल और कितनी उत्तम है? जिस तरह मेडिकल का डॉक्टर अपने मरीज की दवा-दारू करता है, मरहम-पट्टी करता है, उसी तरह हिंदी वाला भी हिंदी की तीमारदारी करता है। यह और बात है कि इस चक्कर में उसकी दो-चार हड्डियां और चटक जाती हैं। आज जो भी टूटी-फूटी हिंदी बची है, ज्यादातर डालडा डाट साबों ने ही बनाई है।
जोर से बोलो: डालडा डाट साब की जै!

साभार-'हिंदुस्तान' संपादकीय पृष्ठ -14/06/2015 

अजीब सी बातें ......

कुछ अजीब सी बातें
जिनका कोई सिरा नहीं होता
न ही कोई किनारा होता है
रह रह कर
मन में आती जाती हैं
कभी खुशी
कभी उदासी
कभी तटस्थता के भाव
खुद में समेटे हुए
कुछ शब्दों
और कुछ धुनों में मिल कर
बिखर जाती हैं
बहक जाती हैं
कहीं खो सी जाती हैं
और भटका जाती हैं
इन अजीब सी राहों पर
कुछ अजीब सी बातें। 

~यशवन्त यश©

13 June 2015

बोस जो जापान में अब भी लोकप्रिय हैं --रामचन्द्र गुहा- (प्रसिद्ध इतिहासकार)

मैं पिछले दिनों जापान में था और वहां मैंने अपने मेजबानों से पूछा कि इस देश में सुभाष चंद्र बोस को कितना याद किया जाता है? उनका जवाब था कि सुभाष चंद्र बोस को सिर्फ भारतीय इतिहास के विशेषज्ञ जानते हैं, जबकि दूसरे बोस, यानी रास बिहारी बोस जापान, खासकर टोकियो में बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जापानियों को भारतीय करी से परिचित कराया था, जो अब तक शहर के लोकप्रिय होटलों में परोसी जाती है। रास बिहारी बोस का नाम मेरे लिए भी अपरिचित नहीं था। जब मैं कोलकाता में पढ़ता था, तब मैं अक्सर 27 नंबर की धीमी ट्राम से रास बिहारी एवेन्यू तक जाता था। वह सुभाष चंद्र बोस ही नहीं, बल्कि महात्मा गांधी के भी पहले के दौर के क्रांतिकारी थे। अनोखी बात है कि फिलहाल वह भारत की अपेक्षा जापान में ज्यादा जाने जाते हैं।

बेंगलुरु लौटने के बाद मैंने रास बिहारी बोस की एक जीवनी खोज निकाली, जो होक्काईदो विश्वविद्यालय के ताकेशी नाकाजिमा ने लिखी थी और जिसे अंग्रेजी में प्रेम मोटवानी ने अनुवादित किया था। उससे मैंने जाना कि रास बिहारी बोस जापान में जून 1915 में, यानी ठीक सौ साल पहले पहुंचे थे। वह अंग्रेजों से बचकर भागे थे, क्योंकि उन्हें वायसराय को मारने के एक षड्यंत्र की वजह से खोजा जा रहा था। सन 1886 में उनका जन्म बंगाल के एक गांव में हुआ था। वह चंदन नगर में बढ़े-पले थे, जो उस वक्त फ्रांस के कब्जे में था। हाई स्कूल के बाद उन्होंने फौज में भर्ती होने के लिए अर्जी दी, लेकिन उन्हें नहीं चुना गया, क्योंकि अंग्रेज बंगालियों को फौज के उपयुक्त नहीं मानते थे। बोस को कसौली में क्लर्क की नौकरी मिली, उसके बाद वह देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) पहुंच गए। हालांकि, वह अंग्रेज सरकार की नौकरी में थे, लेकिन उनके विचार घोर सरकार विरोधी थे। उसी दौरान उन्होंने पंजाब और बंगाल के क्रांतिकारियों से मेल-जोल बढ़ा लिया।

एफआरआई में काम करते हुए रास बिहारी बोस को रसायनों का और देशी बम बनाने का ज्ञान प्राप्त हुआ। जब दिसंबर 1912 में अंग्रेजों की राजधानी दिल्ली पहुंची, तो बोस ने उस समारोह में गड़बड़ी पैदा करने का फैसला किया। उनके साथी एक अन्य बंगाली क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास थे, जिन्होंने रास बिहारी बोस का बनाया बम वायसराय लॉर्ड हार्डिंग के हाथी पर फेंका। उससे बहुत बड़ा धमाका हुआ, लेकिन हार्डिंग मामूली चोटों के साथ बच गए। भगदड़ का फायदा उठाकर बोस और विश्वास वहां से भाग लिए। रास बिहारी ने देहरादून के लिए शाम की ट्रेन पकड़ी और अगले दिन से नौकरी शुरू कर दी। उनकी दोहरी जिंदगी इतनी खूबसूरती से छिपी हुई थी कि जब लॉर्ड हार्डिंग कुछ महीनों के बाद देहरादून आए, तो रास बिहारी ने उनके सम्मान में स्वागत समारोह आयोजित किया। लेकिन धीरे-धीरे उनकी तरफ शक की सुई घूमने लगी। जब उनके कुछ साथी गिरफ्तार हो गए, तब बोस चंदन नगर भाग गए। वह कुछ दिनों तक बनारस और चंदन नगर में छिपते रहे। आखिरकार अप्रैल 1915 में छद्म नाम से वह जापान के लिए रवाना हो गए।

पांच जून, 1915 को वह कोबे बंदरगाह पहुंचे और वहां से ट्रेन से टोकियो पहुंच गए। शुरू में वह जिन लोगों से मिले, उनमें महान चीनी राष्ट्रवादी सन यात सेन भी थे, जो तब जापान में सन जोंगसान नाम से रह रहे थे। बोस ने जापानी पत्रकारों और एशियाई एकता के समर्थकों से भी संपर्क स्थापित कर लिया। अंग्रेजों को आखिरकार पता लग गया कि रास बिहारी टोकियो में हैं और उसने जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की मांग की। उनके मित्र उन्हें नाकामुराया बेकरी के मालिक के पास ले गए, जिन्होंने उन्हें बेकरी में कई महीनों तक छिपाए रखा और बेकरी के कर्मचारियों ने भी अपने मालिक का साथ दिया। इस दौरान रास बिहारी ने वहां काम कर रही जापानी महिलाओं को भारतीय व्यंजन बनाने सिखाए। इस बीच एक अंग्रेज जहाज ने एक जापानी व्यापारिक जहाज पर गोलाबारी कर दी, जिससे दोनों देशों के रिश्ते खराब हो गए और रास बिहारी को इसका फायदा मिला। जब वह छिपे हुए थे, तब नाकामुराया बेकरी के मालिक से उनके बहुत घनिष्ठ संबंध हो गए। जब वह आजादी से घूमने-फिरने लगे, तो उसके मालिक ने अपनी बेटी तोशिको की शादी बोस के साथ कर दी। उन दोनों के दो बच्चे हुए, लेकिन 1925 में तोशिको की निमोनिया से मृत्यु हो गई।

रास बिहारी बोस ने अपने दुख को राजनीतिक व्यस्तता में भुलाने की कोशिश की। वह एशियाई एकता के समर्थकों में सक्रिय हो गए। उन्होंने टोकियो में भारतीय क्लब बनाया और पश्चिमी उपनिवेशवाद के खिलाफ भाषण देना शुरू किया। तब तक वह अच्छी तरह से जापानी लिखने-बोलने लगे थे। लेकिन उनकी राजनीति में उनके पाक कौशल का तड़का लगा हुआ था। सन 1927 में नाकामुराया ने अपने मैन्यु में भारतीय करी को जगह दी। वह उसका सबसे लोकप्रिय व्यंजन साबित हुई। इस बीच वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर पैनी नजर रखे हुए थे। वह गांधीजी के यंग इंडिया  सहित कई पत्र पढ़ते थे। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि गांधी के विचारों या उनके भाषणों से ज्यादा ताकत उनकी त्याग की भावना में है। गांधी की व्यक्तिगत ईमानदारी और सादगी की वजह से ही देश के दूर-दराज के गरीब इलाकों तक आजादी का संदेश पहुंच पाया है। रास बिहारी एक अन्य युवा कांग्रेस नेता सुभाष चंद्र बोस से भी बहुत प्रभावित थे। उन्होंने लिखा कि गांधी का मैं बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन वह बीते हुए कल के व्यक्ति हैं, जबकि सुभाष चंद्र बोस आज के नेता हैं।

इस बीच दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। फरवरी 1942 में अंग्रेजी सेना को सिंगापुर में जापानियों ने जबर्दस्त शिकस्त दी। अंग्रेजी सेना के जो भारतीय सिपाही पकड़े गए, उन्होंने मोहन सिंह के नेतृत्व में एक आजाद हिंद फौज बनाई और जापानियों के साथ मिलकर अपने देश की आजादी के लिए लड़ने का फैसला किया। इससे उत्साहित होकर रास बिहारी भी टोकियो से दक्षिण-पूर्वी एशिया पहुंच गए। बैंकॉक में हुए एक सम्मेलन में यह तय किया गया कि आजाद हिंद फौज एक इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के तहत होगी, जिसके अध्यक्ष खुद रास बिहारी बोस होंगे। जापानियों ने आजाद हिंद फौज के नेतृत्व को मजबूत बनाने के लिए सुभाष चंद्र बोस से संपर्क किया, जो तब बर्लिन में थे। मई 1943 में सुभाष चंद्र बोस एक पनडुब्बी से जापान पहुंचे। एक महीने बाद दोनों बोस मिले।

रास बिहारी ने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग का नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया। रास बिहारी बोस फरवरी 1944 में फेफड़ों की बीमारी से गंभीर रूप से बीमार हो गए। उनकी सेहत खराब होती गई और 21 जनवरी, 1945 को उनकी मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि अपने आखिरी दिनों में जब वह अस्पताल में थे, तो डॉक्टरों ने रास बिहारी से उनकी भूख के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि जब नर्सें मुझे मेरा प्रिय खाना खाने ही नहीं देतीं, तो मुझे भूख कैसे लग सकती है? डॉक्टर ने पूछा कि आपको क्या खाना पसंद है, तो उन्होंने कहा था- नाकामुराया की इंडियन करी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

साभार-हिंदुस्तान-संपादकीय पृष्ठ-13/06/2015 

कल्पना.....

अक्सर
हमारी कल्पना
गुमसुम सी होकर
कहीं
खो सी जाती है
निराशा में
सो सी जाती है
कई प्रयासों के बाद भी
अपनी अनकही
उदासी में
ढूंढती फिरती है
शब्दों और भावों को
व्यवहारों को
विचारों को ....
फिर कहीं थक कर
हर जाती है
अक्सर
हमारी कल्पना
कहीं खो जाती है।

~यशवन्त यश©

12 June 2015

कुछ लोग -18

गुमनाम तस्वीरों को
दिल से लगाए कुछ लोग
देख नहीं पाते
दर्द
उन जानी-पहचानी
तस्वीरों का
जिनकी उँगलियाँ पकड़ कर
चलते चलते
आ पहुंचे हैं वह
आज के मुकाम पर .....
जहां
देखते हैं
जीवन की नयी राहें
और देखेंगे
नये सुनहरे सपने
आज और कल
फिर क्यों
आखिर क्यों
जीती जागती तस्वीरों को
कहीं बिसरा देते हैं
कुछ लोग
जीवन के
नाज़ुक मोड़ों पर।

~यशवन्त यश©

11 June 2015

Something Intresting about Maggi--Sanjog Walter

Julius Maggi, Julius Michael Johannes Maggi (Frauenfeld, Switzerland, 9 October 1846 – Küsnacht, 19 October 1912)
The original company came into existence in 1872 in Switzerland, when Julius Maggi took over his father's mill. He quickly became a pioneer of industrial food production, aiming to improve the nutritional intake of worker families. Maggi was the first to bring protein-rich legume meal to the market, and followed up with a ready-made soup based on legume meal in 1886. In 1897, Julius Maggi founded the company Maggi GmbH in the German town of Singen, where it is still based today.


In 1947, following several changes in ownership and corporate structure, Maggi's holding company merged with the Nestlé company to form Nestlé-Alimentana S.A., currently known in its francophone homebase as Nestlé S.A.



Source...Sanjog Uncle's facebook timeline. 

उलझे हुए शब्द ........

आपस में
उलझे हुए शब्द
सुलझ कर
ढल कर
किसी साँचे में
पाले रहते हैं उम्मीद
दस्तावेज़ बन कर
कल,आज और कल के
किसी कोने में छुप कर
फूल या काँटा बन कर
मन को भाने
या
चुभ जाने की.....

आपस में
उलझे हुए शब्द
नामालूम क्यों
कई गांठों में
कहीं दबे होते हुए भी
अपने आप ही
सुलझे से लगते हैं
किसी अनजान भाषा में
किसी अनजान से
कुछ कहते हुए से।

~यशवन्त यश©

10 June 2015

अबला नहीं हो सकतीं उच्च शिक्षित महिलाएं -ऋतु सारस्वत जी का आलेख

लाक या वैवाहिक मतभेद के लंबित मामलों में अब उच्च शिक्षित महिलाएं गुजारा भत्ता पाने का दावा नहीं कर सकेंगी। मुंबई के एक परिवार न्यायालय ने हाल ही में एक बड़ा फैसला करते हुए उच्च शिक्षित महिलाओं को इस अवधि में भत्ता दिलवाने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि महिलाओं को इस बात अनुमति नहीं दी जा सकती कि उच्च शिक्षित होने के बाद भी वे आराम से बैठकर अपने निर्वाह-व्यय का दावा करें। अदालत ने सख्त शब्दों में कहा कि हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 ऐसे लोगों की फौज तैयार करने के लिए नहीं है, जो उच्च शिक्षित और अपना निर्वाह करने योग्य होने के बाद भी आराम से बैठकर अपने पति से गुजारा भत्ता पाने का इंतजार करें। अदालत की यह सख्ती उन महिलाओं व कथित नारीवादी समूहों को चेतावनी है, जो अपने लाभ के लिए कानून का बेजा इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करतीं।

बीते दशकों में देश की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में जो बदलाव आया है, उसके चलते जहां महिलाएं बराबरी के प्रश्न पर संघर्ष कर रही हैं, वहीं रिश्तों के टकराव की स्थिति में खुद को असहाय व दुर्बल घोषित करने के प्रयास भी करती दिखाई देती हैं। अपने आर्थिक लाभ के लिए इस प्रकार की मानसिकता किसी भी स्थिति में ठीक नहीं ठहराई जा सकती। बीते दशकों में तलाक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। दस वर्ष पूर्व जहां तलाक की दर प्रति एक हजार में एक प्रतिशत थी, वह वर्तमान में 1.3 प्रतिशत है। इस बढ़ती तलाक-दर के क्या कारण हैं, यह शोध का विषय है, परंतु यह स्पष्ट है कि पुरुषों में वर्चस्ववादी सोच, महिलाओं में पनपती मनोवैज्ञानिक व वित्तीय स्वतंत्रता ने इसे बढ़ावा दिया है। इसमें कोई दोराय नहीं कि आज भी ऐसी स्त्रियों की बहुलता है, जो न उच्च शिक्षित हैं और न ही आत्मनिर्भर। ऐसे में, वैवाहिक मतभेद की स्थिति में अपने जीवनसाथी से गुजारा भत्ता पाना न्याय-संगत है, परंतु सिर्फ अपने अधिकारों की बात करके उच्च शिक्षित महिला का इस तरह के प्रश्नों को उठाना कानून की परिभाषा तोड़ना-मरोड़ना है, क्योंकि कानून में साफ है कि वैवाहिक संबंधों में पति-पत्नी का दर्जा एक समान है। यदि पति कमाऊ है और पत्नी गृहणी है, तो उसकी जरूरतों को पूर्ण करने की जिम्मेदारी पति को होगी। वहीं पत्नी कामकाजी है व पति बीमार या बेरोजगारी के दौर से गुजर रहा है, तो वह पत्नी पर आर्थिक तौर पर निर्भर रह सकता है।

गौरतलब है कि कुछ अरसे पहले पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका के तौर पर कार्यरत महिला को अदालत ने निर्देश दिया था कि वह अपने बीमार पति का इलाज कराए। इसके अलावा वह पति की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर माह 5,000 रुपये का भुगतान भी करे। अदालत का यह फैसला, वैवाहिक संबंधों में, उसकी समदृष्टि को पुख्ता करता है। जरूरी है कि यह सोच समाज में भी पैदा हो।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
.
साभार-'हिंदुस्तान' -09/जून/2015 

आतंक.......

जीवन के
इन उन छोरों पर
अपने अनेक रूप लेकर
आतंक
दिखाता रहता है
खौफ
मासूम दिलों पर
कभी मजहब का
चोला पहन कर
कभी जात,नस्ल
और अनजान कट्टरता का
मुखौटा लगा कर 
बेचैन करता रहता है
उन अनगिनत आत्माओं को
जो जुड़ी हुई हैं आपस में
रिश्तों की डोर में ....
इस आतंक का
खौफ का
अंत कभी नहीं होगा
क्योंकि
आतंक
जमा चुका है जड़ें
हमारी दिनचर्या में
अनुशासन की
बैसाखी बन कर। 
  
~यशवन्त यश©

09 June 2015

सबकी अपनी सोच सबके अपने विचार ......

सबकी अपनी सोच
सबके अपने विचार
नये नये रूप धर कर
सामने आते जाते हैं
आगे बढ़ते जाते हैं
इतिहास में ढल कर
नया कल बन कर
स्वर्णाक्षरों में लिख कर
सूरज सा दिख कर
नयी रोशनी
नया उत्साह
और नयी राह के पार
सबकी अपनी सोच
सबके अपने विचार
खोल देते हैं द्वार
नयी महत्वाकांक्षाओं के।

 ~यशवन्त यश©

08 June 2015

बस यूं ही

बस यूं ही
लिख देता हूँ
कभी कभी
मन में आती
कुछ बातों को
दे देता हूँ
अपने शब्द 
अपने भाव
अपनी संतुष्टि के लिए
अपने अहं
गुस्से और खुशी को
कर देता हूँ ज़ाहिर
कभी कागज़ के
किसी पन्ने पर
कभी साझा कर लेता हूँ
की बोर्ड के खटराग से
अंतर्जाल की
आभासी असीम दुनिया में
सबकी पसंद -नापसंद से 
बेशक
बेपरवाह हो कर
अपनी ही धुन में
अपनी ही राह पर
अकेला चल देता हूँ
बस यूं ही
कभी कभी
कुछ लिख देता हूँ।

~यशवन्त यश©

07 June 2015

पल पल बदलते रंग.......

पल पल बदलते रंग
अपनी संगत में
कभी धुंधला कर देते हैं
तस्वीरों को
और कभी
बना देते हैं
पहले से ज़्यादा खरा
उत्कृष्ट और स्पष्ट....
पल पल बदलते रंग
हमारे चेहरे की लकीरों को
अनचाहे ही
सबकी निगाहों के 
सामने लाकर
बे पर्दा कर देते हैं
झूठ के पीछे छिपा
हमारा असली रूप  ......
पल पल बदलते रंग
ज़रूरी हैं
जिंदगी के नये ढंगों में
ढलने के लिए।
  
~यशवन्त यश©

06 June 2015

कुछ लोग-17

हर सुबह
ताज़ी हवा में
टहलने जाते लोग .....
मूंह में दातुन दबाए
उछलते कूदते
कसरत करते लोग ....
हँसते गाते
उलझनों को सुलझाते लोग .....
उम्र, धर्म और
जात के बंधन से मुक्त
पार्कों की हरी घास पर
महफिल जमाते लोग ......
जाने क्यों भूल जाते हैं
एकता की बातें
और अनेक हो जाते हैं
अपने छोटे से ड्राइंग रूम में
जिसकी सजीली मेज पर
रखे अखबार की सुर्खियों में
कर्फ़्यू और दंगों की खबरें
आग लगा देती हैं
सुबह की चाय के प्याले में। 

~यशवन्त यश©

05 June 2015

कैसे रहे हरी भरी धरती ?

कंक्रीट के जंगलों में
रहते रहते
जीते जीते
हो चुके हैं हम भी
कंक्रीट जैसे कठोर
निष्ठुर
बेजान और
बुजदिल .....
अब नहीं गिरते
हमारी आँखों से आँसू
किसी को
तड़पते
मरते देख कर
छांव की तलाश में
भटकते देख कर
या फिर
जीवन की
दो बूंद तलाशते देख कर ....
फिर क्यों
हम उम्मीद करते हैं
हरी भरी धरती की
जिसके भीतर की हलचल
पल भर में
डगमगा देती है 
सारे सपने ...
जिसके आँचल  में
अब जगह नहीं बची
रोते आसमान के
आंसुओं को समेटने की
क्योंकि
अब
धरती नहीं
सिर्फ़
अवशेष बचे हैं
हमारी तरक्की की
अजीब दस्तानों के। 

~यशवन्त यश©

04 June 2015

मन के साथ चलता हूँ ..........

बस यूं ही
मन के साथ चलता हूँ
कहता हूँ
कुछ बाहर की
कुछ भीतर की
यहाँ वहाँ की
देख कर-सुनकर
खुद से चुगली करता हूँ
आईने में
निहार निहार कर
आँखों के काले धब्बे
झाइयाँ  और बेजान
रूखी त्वचा
उम्र के अंत पर भी
अनंत उमंगों का
खाली झोला लटकाए
टकटकी लगाए
कहीं कोने में बैठा हुआ
बंद पलकों के पर्दे पर
आते जाते लोगों को देखता हुआ
बस यूं ही
वक़्त के हमकदम होता हूँ 
मन के साथ चलता हूँ ।

~यशवन्त यश©

03 June 2015

कभी कभी ......

ऐसे ही होती है
हर दिन की शुरुआत
कभी कुछ चाहते हैं
योजना बनाते हैं
होता कुछ और है
और  कभी
अपने आप ही
होने लगता है
सब कुछ
अनुकूल 
नकारात्मकता
प्रतिकूलता को
पीछे छोड़ कर
हम बढ्ने लगते हैं आगे
खटकने लगते हैं
कुछ लोगों की आँखों में
फिर भी
जीते जाते हैं
कुछ थोड़े से पल
कभी कभी।


~यशवन्त यश©

02 June 2015

कुछ नहीं ......

एक अकेला
मेरा मन
रोज़ भटका करता है
खुद की खोज में
यह जानते हुए भी
कि देखा करता है
खुद का अक्स
गर्मी से जलती
चमकती
रेतीली देह के
दर्पण में
महसूस करता है
खुद को प्रत्यक्ष
अपने चंचलपन में
यहाँ वहाँ
घूम फिर कर
लौट आता है
आ मिलता है
अपने आरंभ
अपने अंत पर
और उस बिन्दु पर
जिसकी सीमारेखा के भीतर
खालीपन में
कुछ भी खाली नहीं ।

~यशवन्त यश©

01 June 2015

बीतती तारीखें ........

पल दर पल
दिन दर दिन
महीनों और
साल दर साल
बीतती तारीखें
अपने जिस्म पर
जख्म और दर्द लिए
बेबसी और लाचारी के
किस्सों में
कहीं दफन हो जाती हैं
और जब
अचानक से याद आती हैं
तब खाली हाथ लिए खड़ा
अगला पल
झट से निगल जाता है
उन यादों को
जैसे बचना चाहता हो
भयंकर भूख के
तीखे एहसास से। 

~यशवन्त यश©
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