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15 October 2015

ये तर्क नेताजी का अपमान करते हैं--राजीव शुक्ल ( पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद)

मैं यह बात कतई मानने को तैयार नहीं हूं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस बीसों साल भारत में या दुनिया में कहीं भी रूप बदलकर, छिपकर जीवन गुजारते रहे। यह बात और यह सोच अपने आप में नेताजी जैसे महान क्रांतिकारी का बहुत बड़ा अपमान है। एक बेखौफ, जुझारू और वीर पुरुष भला इस तरह छिपकर अपनी जिंदगी क्यों गुजारना चाहेगा? जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, लगता है कि उन्हें न तो सुभाष चंद्र बोस के स्वभाव के बारे में ठीक से पता है और न ही वे उनके अदम्य साहस को ही अच्छी तरह से पहचानते हैं।

मेरे लिहाज से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का परिवार प्रधानमंत्री से मिलकर सिर्फ यह जानना चाहता है कि विमान हादसे में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं? यदि नहीं, तो फिर उसके बाद वह कहां थे? यह किसी भी परिवार के लिए लाजमी है कि वह अपने किसी पूर्वज के बारे में जानकारी मांगे।

मुझे शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जो तरह-तरह के इंटरव्यू और बयान देकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अमुक व्यक्ति दरअसल नेताजी थे, जो साधु बनकर रहे, फलां व्यक्ति नेताजी थे, जो ताशकंद मैन बनकर     रूस में रहे। कोई कहता है कि सुभाष बाबू  करीब 30 साल तक गुमनाम बनकर अयोध्या में रहे, तो कोई यह कहता है कि वह पंजाब में रहे; कोई कहता है कि वह कई बरस तक बिहार में थे, तो कोई कहता है कि वह जर्मनी में रहे। दावे तो ऐसे भी किए गए कि एक बार बाबा जयगुरुदेव के समर्थकों ने उन्हें कानपुर के फूलबाग मैदान में सुभाष चंद्र बोस घोषित कर उनके प्रकट होने का नाटक कराया और उसके बाद वहां मौजूद लाखों लोगों ने बाबा के उन समर्थकों से जमकर मारपीट की।

आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक के सी सुदर्शन स्वयं इस बात पर हमेशा विश्वास करते रहे कि नेताजी नोएडा में रहते थे। और तो और, नेताजी के गृह प्रदेश की राजधानी कोलकाता में तो आज भी ऐसे तमाम बंगाली परिवार आपको मिल जाएंगे, जो यह मानते हैं कि 118 साल की उम्र में भी नेताजी जिंदा हैं, और कहीं पर छिपे हुए हैं, जिनको भारत सरकार जान-बूझकर नहीं खोज रही है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर नेताजी देश की आजादी के बाद भी वेश बदलकर  छिपकर  क्यों रहेंगे? ऐसा मानने वालों में कुछ लोगों का तर्क यह है कि क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन के नेतृत्व वाले एलाइड देशों का विरोध किया था, इसलिए वह  ब्रिटिश सरकार के कानून के अधीन युद्ध अपराधी घोषित थे और अगर वह सामने आ जाते, तो उन्हें ब्रिटिश सरकार गिरफ्तार कर सकती थी। इसी डर से वह वेश बदलकर, और छिपकर रहे। मगर यह तर्क अपने आप में बेहद हल्का और अपमानजनक है। गुलाम भारत में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए जो व्यक्ति ब्रिटिश सरकार की जेल से नहीं डरा और  गांधी के सिद्धांतों से असहमत होते हुए अपना सैनिक संगठन बनाकर लड़ाई के लिए तैयार था, वह आजाद भारत में, जहां अंग्रेजों का कुछ भी नहीं रह गया था, भला उनकी जेल से क्यों डरेगा? ऐसे लोगों का एक और तर्क हो सकता है कि आजादी के बाद भी ब्रिटिश सरकार भारत सरकार पर दबाव डालकर उन्हें इंग्लैंड ले जाती और उन्हें जेल में डाल देती।

ऐसे लोगों से पूछने लायक एक ही सवाल है कि आजाद भारत में किस सरकार की इतनी हिम्मत हो सकती थी कि वह नेताजी को ब्रिटिश सरकार को सौंप देती? फिर अगर कोई हिमाकत करने की कोशिश भी करता, तो करोड़ों भारतीय उसके विरोध में खड़े हो जाते और जन भावनाएं अगर इतने बड़े पैमाने पर हों, तो भला किसकी ऐसी हिम्मत पड़ सकती है? और तो और, इन भावनाओं को देखते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी उनको देश के बाहर ले जाने पर रोक लगा देता और  फिर ब्रिटिश सरकार सालोंसाल अंतरराष्ट्रीय अदालत में लड़ती रहती। वैसे भी, ब्रिटेन की कोई सरकार सुभाष चंद्र्र बोस को सौंपने की मांग करती ही नहीं। इतना तो शायद  

अंग्रेज भी जानते थे कि यह काम कतई संभव नहीं है। कई बार ब्रिटेन ने खुद ही दुनिया के ऐसे बड़े लोगों के खिलाफ केस वापस ले लिए थे। वैसे आज भी न जाने कितने भारतीय अपराधी मजे से इंग्लैंड में रह रहे हैं और भारत सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वहां की छोटी-छोटी अदालतें उन्हें भारत सरकार को नहीं सौंप रही हैं। फिर भला भारत सरकार नेताजी सुभाष चंद्र्र बोस को अंग्रेजों के हवाले क्यों कर देती?

हाल ही में एक अभियान यह चला कि फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही नेताजी थे। तमाम पत्रों का हवाला दिया गया, लेकिन कुछ साबित नहीं हो पाया। गुमनामी बाबा एक ऐसे साधु थे, जो परदे के  पीछे छिपकर रहते थे और किसी को अपना चेहरा नहीं दिखाते थे, इसलिए उन्हें नेताजी बताना लोगों को आसान लग रहा है। सवाल यह उठता है कि नेताजी भला फैजाबाद में क्यों रहेंगे? और फिर वह परदे के पीछे क्यों छिपेंगे? क्यों नहीं, उन्होंने कभी अपने भाई-भतीजे के परिवार से कोलकाता में मिलने की कोशिश की, उन्हें फोन क्यों नहीं किया, उन्हें पत्र क्यों नहीं लिखा? जर्मनी में अपनी पत्नी और बेटी से कभी संपर्क क्यों नहीं किया? यह सब एक इंसान के लिए कैसे संभव है? चलिए, हम यह मान भी लें, तो आजाद हिंद फौज में जो लोग उनसे सबसे करीबी थे, उन तक उन्होंने कोई सूचना नहीं दी।

सबसे बाद तक तो उनकी घनिष्ठ सहयोगी डॉक्टर लक्ष्मी सहगल जीवित रहीं और 98 वर्ष की उम्र में पिछले साल कानपुर में उनका निधन हुआ। उन्होंने भी कभी यह नहीं बताया कि नेताजी का कभी कोई संदेश उन्हें मिला।
मेरा मानना है कि देश को इस तरह के विवाद से ऊपर उठकर नेताजी की स्मृति को संजोए रखना चाहिए और उससे प्रेरणा लेकर कई और नेताजी पैदा करने चाहिए, जो देश के लिए उतने ही समर्पित बन सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-15/10/2015 

12 October 2015

ज़िंन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............

 बसता बिखरता हुआ सा कुछ

निदा फाजली लोकप्रिय हैं, लेकिन साहित्यिक गरिमा की कीमत पर नहीं। निदा का आत्मकथात्मक गद्य 'दीवारों के बीच' और 'दीवारों के बाहर' में संकलित है, जो अपनी निर्मम तटस्थता और संवेदनशीलता के लिए पठनीय है। 12 अक्तूबर को निदा फाजली के जन्मदिन पर 'दीवारों के बीच' से कुछ अंश और कुछ अशआर:


न फिल्मों में निर्माता जेठवाणी और गीतकार निदा और विट्ठल भाई होते हैं। इन चारों फिल्मों का सेंटूर होटल में मुहूर्त होता है। बाहरी गेट पर दो हाथी आने वाले मेहमानों को सूंड़ उठा-उठा कर हार पहनाते हैं। इस समारोह में पूरा फिल्म उद्योग शामिल होता है और रात को देर तक शराब, संगीत और छोटे-मोटे नशीले झगड़े वक्त को रोके रखते हैं। इन चारों चित्रों में से तीन एक-साथ शुरू की जाती हैं। चौथी में निर्माता एक नई अभिनेत्री को पेश करना चाहते हैं। इसके लिए किसी अच्छे हीरो की तलाश है। यह नई हीरोइन स्थानीय कॉलेज में उर्दू के एक प्रोफेसर की एक छोटी लड़की है। बाप की मर्जी के खिलाफ उसकी मां उसे हीरोइन बनाना चाहती है! लड़की कम उमर और खूबसूरत है। बम्बई में पढ़ी-लिखी है। इसलिए बाजार में खूबसूरती के प्रचलित भाव से वाकिफ भी है। लेकिन इस नए मैदान में जेठवाणी की नातजुरबेकारी खुद उसकी पारिवारिक जिन्दगी का संतुलन बिगाड़ देती है। उसका भाई, जो उसका पार्टनर भी है, उससे अलग हो जाता है। लेकिन निर्माता अपनी तन्हाइयों में लड़की का रोशन भविष्य बनाने-संवारने में खोया रहता है।

तीन फिल्मों की तिजारती नाकामी जब उसकी चौथी फिल्म के लिए हीरो की तलाश करने में नाकाम हुई तो हीरोइन खुद अपने तौर पर किसी मुनासिब हीरो की खोज में इधर-उधर घूमने-फिरने लगी। जेठवाणी ने इस तलाश की रोकथाम के लिए अपनी बची-खुची पूंजी भी दांव पर लगा दी। इस बार बड़े बजट की हिन्दी फिल्म बनाने के बजाय भोजपुरी भाषा में एक छोटी फिल्म बनाता है। इस फिल्म में यही लड़की हीरोइन होती है। यह फिल्म भी दूसरी फिल्मों की तरह निर्माता के साथ कुछ अच्छा सुलूक नहीं करती। अपने फिल्मी करियर से मायूस होकर लड़की अपनी मां की मरजी से कहीं शादी करके वक्त से पहले अपने पति को बाप का दरजा अता करके, इज्जत की घरेलू जिन्दगी गुजारती है और जेठवाणी बम्बई के समुन्दर को आखिरी सलाम करके फिर से अपनी बीवी के पति और बच्चों के बाप बन कर अपने पुराने धन्धे के बहीखातों को देखने में लीन हो जाते हैं।

इन तीन फिल्मों के नाम 'हरजाई', 'कन्हैया' तथा 'शायद' हैं। इन फिल्मों में निदा के नाम से जो गीत हैं, उनमें—
खुशबू हूं मैं फूल नहीं हूं जो मुरझाऊंगा
जब जब मौसम लहराएगा
मैं आ जाऊंगा....... (शायद)
दिन भर धूप का पर्वत काटा शाम को पीने निकले हम
जिन गलियों में मौत छुपी थी उनमें जीने निकले हम        (शायद)
तेरे लिए पलकों की झालर बनूं
कजरे सा आंखों में आंझे फिरूं
धूप लगे
जहां तुझे
छाया बनूं  (हरजाई)
कभी आंखों में आंसू हैं कभी लब पे शिकायत है
मगर ऐ जिन्दगी फिर भी मुझे तुझ से शिकायत है     
(हरजाई)

फिल्मी पत्रिकाओं में खासतौर से सराहे जाते हैं। इकबाल मसूद इनमें साहिर के बाद गीतों का नया ट्रेंड देखते हैं। लेकिन चित्रों की असफलता की वजह से बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ती। वैसे छोटी-बड़ी फिल्मों में गीत मिलते रहते हैं।
राजकपूर की 'बीवी ओ बीवी', कमाल अमरोही की 'रजिया सुल्तान', इस्माइल शिरोफ की 'आहिस्ता आहिस्ता' कई फिल्मों में से कुछ नाम हैं। पैसे भी बैंक में जमा होने लगे हैं। फिल्म की तिजारती सफलता ही फिल्म से संबंधित लोगों की कीमत और जरूरत का आईना है। इस संसार में योग्यता से अधिक इत्तिफाक का दखल है। ... विट्ठल भाई के सुझाव पर निदा खार के इलाके में एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में कुछ डिपॉजिट देकर एक फ्लैट बुक कराता है। बिल्डिंग धीरे-धीरे तैयार होती है। इसकी किस्तें भी इसी हिसाब से जमा होती हैं। इन किस्तों ने निदा को ज्यादा ऐक्टिव और सामाजिक बना दिया है। खुले हाथ आप-ही-आप बन्द होने लगे हैं। पहले वह दूसरों की जरूरतों को अपनी जरूरत मानता था— अब सिर्फ अपने-आपको पहचानता है। शाम की देर तक चलने वाली महफिलें अब अपने कमरे से निकल कर दूसरों के घरों में सजने लगी हैं। यार-दोस्तों की नजर में अब वह प्रगतिशील से प्रतिक्रियावादी बन जाता है।

इन किस्तों की अदायगी के लिए वह मजबूरी से एक-दो ऐसी फिल्में भी ले लेता है, जिनमें निर्माता विट्ठल भाई के साथ में होने से इंकार करते हैं। यह चोपड़ा की 'नाखुदा' वह अकेला ही लिखता है। उसका एक गीत रेडियो पर काफी बजाया जाता है—
तुम्हारी पलकों की चिलमनों में
ये क्या छिपा है सितारे जैसा
हसीन है ये हमारे जैसा
शरीर है ये तुम्हारे जैसा
कंट्रैक्ट की खिलाफत विट्ठल भाई को नाराज कर देती है। उनकी नाराजगी कुछ संगीत-निर्देशकों को भी अपने साथ ले लेती है। काम की तलाश में अब ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है। हर दो-तीन महीने बाद एक बड़ी किस्त मुंह फाड़े इन्तजार करती है। संगीत निर्देशकों के साथ ज्यादा समय बिताना पड़ता है। उनकी बेसिर-पैर की बातों पर मुसकराना पड़ता है। अपने-आपको भुलाना पड़ता है। उनकी गालियों भरे डमी शब्दों को अपनी जहानत से बातहजीब बनाना पड़ता है।

मीरो गालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है
सस्ते गीतों को लिख लिखकर हमने हार बनवाया है।


निदा फाज़ली की कुछ गजलें और नज़्में

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर व़क्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूं भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ
धुंधली सी एक याद किसी कब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ

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बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता

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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूं ही आंखों में      
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं       
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो

फासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

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कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से

हुआ न कोई काम मामूल से
गुज़ारे शब-ओ-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चांद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आई शब
हुये बंद दरवाज़े खुल खुल के सब
जहां भी गया मैं गया देर से

ये सब इत्ति़फा़कात का खेल है
यही है जुदाई यही मेल है
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़ामोशी सदा देर से
(वाणी प्रकाशन से साभार)

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साभार-'हिंदुस्तान'-11/10/2015 

11 October 2015

मार्क ट्वेन का एक कोटेशन



10 October 2015

नाटक

नाटक -
कुछ खेले जाते हैं
मंच पर
जिनकी पटकथा
और संवाद
सुनिश्चित हैं । 

नाटक-
कुछ बन जाते हैं
अपने आप
और हम सब
उनके पात्र
नाचते हैं
बंध कर 
किसी डोरी से ।

नाटक
भले ही होते हैं
कुछ काल्पनिक
कुछ वास्तविक
पर जीवन का
हिस्सा होते हैं
सुबह
और शाम की तरह।
 
~यशवन्त यश©

09 October 2015

लखनऊ पुस्तक मेले में डॉ सूर्यकांत जी द्वारा स्वास्थ्य परामर्श

कल 08/10/2015 को लखनऊ पुस्तक मेले के मंच से किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ सूर्यकांत जी ने फेफड़े एवं श्वास रोगों से संबन्धित परिचर्चा के अंतर्गत स्वस्थ जीवन शैली हेतु कुछ महत्वपूर्ण बातें बतायीं उनका सारांश इस प्रकार है-
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  • 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के सभी व्यक्तियों को जिम जाने व ट्रेडमिल आदि के प्रयोग से बचना चाहिए। साइकलिंग एक्सरसाइज़ ज़्यादा बेहतर है। बल्कि सबसे अच्छा तो यह है कि अपनी आयु के (क्षमता से)सामान्य से अधिक तेज़ गति से चलने की आदत डालनी चाहिए। धीमे धीमे टहलने से कोई लाभ नहीं है।
  • fast food (कोल्ड ड्रिंक नूडल्स,चाउमीन ,बर्गर,पेटीज,चाट आदि) के प्रयोग से बचें। केले से बेहतर कोई fast food नहीं हो सकता। केला अपनी diet में ज़रूर शामिल करें।
  • मधुमेह (sugar)के रोगी भी रोज़ एक केला खा सकते हैं।
  • अपनी रसोई में refined oil /dalda आदि के खाना बनाने मे प्रयोग से बचें। यह स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। सबसे बेहतर सरसों का तेल है। सरसों के तेल में बना खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
  • चीनी का प्रयोग भी कम से कम करना चाहिये। यदि चीनी का प्रयोग करना ही है तो रसायनों से साफ की हुई अधिक सफ़ेद चीनी के बजाय कत्थई (brown) रंग की चीनी का प्रयोग करना चाहिए।
         वैसे मिठास के लिए गुड़ से बेहतर स्वास्थ्यवर्धक और कोई चीज़ नहीं है।
  • नमक का प्रयोग भी कम से कम और सिर्फ दैनिक भोजन मे ही करना चाहिए।( मूँगफली या खीरा अथवा भोजन के अतिरिक्त अन्य चीजों के साथ नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। )
  • अपनी क्षमतानुसार कोई भी एक मौसमी फल नियमित लेना चाहिए।
  • सिगरेट/शराब इत्यादि के सेवन बिलकुल न करें।
  • 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के व्यक्तियों को पूर्ण शाकाहार अपनाना चाहिए,यद्यपि कई चिकित्सा शोधों से यह प्रमाणित हुआ है कि शाकाहार सभी आयु वर्ग के लिए पूर्ण एवं हानि रहित है।
  • जो रोग (जैसे एलर्जी/मधुमेह/अस्थमा आदि) हमारे साथ जीवन भर रहने हैं, उन से संबन्धित उपचार/दवाओं आदि को अपना दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त मानना चाहिए।

नियमित,संयमित एवं उचित जीवन शैली ही अच्छे स्वास्थ्य का मूल आधार है।

( जनहित में प्रस्तुतकर्ता -यशवन्त यश )

एक योजना का निराधार हो जाना--हरजिंदर, हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

यूनीक आइडेंटिटी नंबर यानी आधार की राह कभी आसान नहीं थी। खासतौर पर आम लोगों ने इसके लिए काफी पापड़ बेले हैं। पांच साल पहले, जब कार्ड बनाने की शुरुआत हुई थी, तो इसका फॉर्म लेने के लिए ही लंबी लाइनें लगती थीं।

फिर उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों का स्कैन दर्ज कराने के लिए हफ्तों बाद का समय मिलता था। इतने इंतजार के बाद नियत समय पर पहुंचने वालों को पता चलता था कि सारा काम समय से काफी पीछे चल रहा है और उन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा। देश की तकरीबन 75 फीसदी आबादी के पास आधार कार्ड के लिए भटकने के ढेर सारे कड़वे और खट्टे-मीठे अनुभव हैं- कहीं विद्युत आपूर्ति रुकने की वजह से काम अटक गया, तो कहीं पर स्कैनर खराब हो गया, नया अब अगले सोमवार को ही आ पाएगा। इन सारी बाधाओं के बावजूद अगर 90 करोड़ से ज्यादा लोगों को आधार कार्ड मिल चुके हैं, तो यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।

यह संख्या यूरोप के 50 देशों की कुल आबादी से भी 18 फीसदी ज्यादा है। लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धि अब अपना ज्यादातर महत्व खो चुकी है। यूनीक आइडेंटिटी नंबर की जो व्यवस्था पूरे देश की आबादी को एक बहुत बड़े सूचना तंत्र से जोड़ने की कल्पना के साथ रची गई थी, उसकी भूमिका अब किसी राशन कार्ड से ज्यादा नहीं रह गई। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब इसे सिर्फ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मिलने वाले अनाज, रसोई गैस और केरोसीन के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा। कहां तो योजना यह थी कि आधार कार्ड न सिर्फ प्रत्येक नागरिक की पहचान का सबसे बड़ा आधार बनेगा, बल्कि यह उसके बैंक खाते से भी जुड़ेगा और बहुत सारे भ्रष्टाचार पर लगाम लगा देगा। यह कहा जा रहा था कि इसके बाद सरकारी सब्सिडी ही नहीं, वृद्धा पेंशन तक सीधे लोगों के बैंक खाते में पहुंच जाया करेगी।

यह वादा भी था कि इससे कई तरह की धोखाधड़ी और घपलों पर भी रोक लग सकेगी। काले धन पर रोक के तर्क भी दिए जा रहे थे। शेयर बाजार में कारोबार के लिए इसे जरूरी बनाने पर भी विचार चल रहा था। सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का कहना था कि इसकी मूल परिकल्पना सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से बनाई गई थी, बैंक खाते और आर्थिक लाभ जैसी चीजें इसमें बाद में जोड़ी गईं। लेकिन सर्वोच्च अदालत के ताजा फैसले के बाद फिलहाल इन सब वादों और इरादों का कोई अर्थ नहीं रहा। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को एक सांविधानिक पीठ के हवाले करने की बात कही है, मगर अभी तो सारे भगीरथ प्रयत्न के बाद हमें जो जलधारा मिली है, उसे हम महानदी तो क्या नाला भी नहीं कह सकते।

आधार का पूरा मामला, दरअसल एक साथ हमारे तंत्र की खूबियों और खामियों को दिखाता है। खूबी इस मायने में कि हम इतनी बड़ी योजना न सिर्फ बना सकते हैं, बल्कि उसे काफी हद तक लागू भी कर सकते हैं। सवा अरब की आबादी वाले विशाल देश में अगर सरकार लोगों से संवाद कर ले, न केवल उन तक अपन संदेश पहुंचा दे, बल्कि उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित कर दे, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। वैसे इसका मजाक उड़ाते हुए यह भी कहा जाता है कि जब फायदा मिलने की बात आती है, तो लोग अपने आप उमड़ पड़ते हैं। लेकिन यह भी सच है कि भ्रष्टाचार की हाय-तौबा वाले देश में लोग अब भी पूरी तरह निराश नहीं हैं और यह मानते हैं कि सरकार उन तक योजनाओं का लाभ पहुंचा सकती है।

लेकिन आधार यह भी बताता है कि हमारा तंत्र बिना बहुत ज्यादा विचार किए किसी वृहद् योजना पर काम शुरू कर सकता है। नौकरशाही की सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता है, लेकिन जनता पर पड़ने वाले दूरगामी असर को नजरअंदाज कर दिया जाता है। सबसे पहले तो आधार की पूरी योजना ही एक सरकारी आदेश पर शुरू कर दी गई, इसके लिए कानूनी और सांविधानिक प्रावधान करने की जरूरत भी नहीं समझी गई। बाद में जो प्रावधान किए गए, वे भी आधे-अधूरे ही थे। इनमें भी इन आंकड़ों के दुरुपयोग को रोकने और लोगों की निजता के उल्लंघन से निपटने की कोई सोच नहीं थी। ढेर सारी आलोचनाएं हुईं, कई खतरे भी गिनाए गए।

2011 की शुरुआत में जब यूनीक आइडेंटिटी नंबर अथॉरिटी के अध्यक्ष भाषण देने के लिए बेंगलुरु की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में गए, तो वहां इसके खतरों पर उनका ध्यान खींचने के लिए कुछ लोगों ने बैनर लगा रखे थे, जिन पर लिखा था- हैप्पी न्यू फियर। लेकिन सरकारें आलोचनाओं पर न ध्यान देती हैं, न कान। आधार की हर आलोचना को सरकार की नीयत पर संदेह की तरह देखा गया। सब ठीक है- सब ठीक है वाले अंदाज में इसे बढ़ाते रहने की कोशिशें जारी रहीं।

आधार का मामला यह भी बताता है कि जब सरकारों के सामने आलोचनाओं का जवाब देने की मजबूरी आ जाती है, तो वे अक्सर बेतुकी हो जाती हैं और कुतर्क करने लगती हैं। अभी कुछ महीने पहले ही जब आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा चल रही थी, तो सरकार ने तर्क दिया था कि निजता का अधिकार लोगों का मूल अधिकार नहीं है। बेशक, भारतीय संविधान की किताबी व्याख्याओं से इस तर्क को सही ठहराया जा सकता हो, लेकिन 21वीं सदी के इस सूचना युग में अगर कोई सरकार यह कहती है कि निजता का अधिकार कोई बड़ी चीज नहीं है, तो सचमुच लोगों को आने वाले खतरों के प्रति सचेत हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण बात कही थी, अदालत का कहना था कि किसी नागरिक को सिर्फ इसलिए उसके अधिकर से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है। इस बात को और आगे ले जाएं, तो कई और तरह के खतरे भी देखे जा सकते हैं। तब हो सकता है कि बहुत ज्यादा जोर दिए जाने के कारण आधार की सुविधा असुविधा में बदलती दिखाई दे। जैसे किसी को सिर्फ इसलिए नागरिक मानने से इनकार कर जेल में डाल दिया जाए कि उसके पास आधार नहीं है। हमने आधार कार्ड के लिए लंबा-चौड़ा तंत्र तो बना दिया, लेकिन अभी तक इसके उपयोग-दुरुपयोग के लिए कोई एथिक्स या आचार संहिता बनाने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की?

सरकारी तंत्र की बेपरवाही के कारण आधार की योजना सुप्रीम कोर्ट पहंुचकर जनता के लिए निराधार हो गई। लेकिन अगर इसी रूप में यह सचमुच लागू हो जाती, तो हो सकता है कि जनता के लिए यह बंटाधार साबित होती। आधार के इस हश्र से क्या सरकार सचमुच कोई सबक लेगी? अभी तक के जो रिकॉर्ड हैं, उनसे तो कोई उम्मीद नहीं बनती।

साभार :-'हिंदुस्तान'-09/10/2015 

08 October 2015

जो जैसा है वैसा ही रहता है........

यूं तो
झूठ,
झूठ ही रहता है
पर
कभी कभी
रंग बदल कर
सच के मुखौटे में
छिप कर
अपना सा
लगने लगता है।

यूं तो
सच,
सच ही रहता है
पर
कभी कभी
झूठ की
चादर के भीतर
खौफ में जी कर
पराया सा
लगने लगता है।

जो जैसा है
वह
वैसा ही रहता है
रूप रंग के
आवरण में
कुछ पल
छल देता है
या छला जाता है
पर फिर
वह वक़्त भीआता है
जब पर्दा हटने पर
हर अपना
पराया
और हर पराया
अपना सा
लगने लगता है। 


~यशवन्त यश©

07 October 2015

जब कोई मच्छर वीआईपी हो जाए--सहीराम

डेंगू के मच्छर का पूरा अंदाज ही निराला है। वह सिर्फ साफ पानी में पनपता है। दूसरे मच्छरों की तरह वह गंदे पानी की तरफ देखता भी नहीं। इसीलिए बताते हैं कि वह वीआईपी इलाकों में ही ज्यादा पनपता है- राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद तक। मंत्रियों के बंगलों से लेकर डॉक्टरों के घरों तक। वह गंदी बस्तियों का कतई मोहताज नहीं है। गरीबों को मारने के लिए दूसरी बहुत-सी बीमारियां हैं।

वह आरोप क्यों ले कि उसका जोर भी भगवान की तरह गरीबों पर ही चलता है? हो सकता है कि आने वाले दिनों में उसकी मांग यह हो जाए कि मेरे लिए फिल्टर वाटर या मिनरल वाटर का इंतजाम करो। बताते हैं कि डेंगू के मच्छर दिन में काटते हैं। उनकी ड्यूटी का समय तय है- सुबह नौ बजे तक और कुछ देर शाम के वक्त। हो सकता है कि दोपहर को एकाध झपकी भी ले लेता हो। दूसरे मच्छरों की तरह नहीं है कि रात भर भिनभिनाता रहे। वह कोई मजदूर नहीं है कि ओवरटाइम करे।

पता चला है कि मच्छर मारने वाले धुएं का उस पर कोई असर नहीं होता। वह बाबुओं की तरह बिल्कुल चिकना घड़ा हो गया है। यह धुआं उस धमकी की तरह है, जो छोटे कर्मचारियों पर असर दिखाता है, बाबुओं और नौकरशाहों पर इसका कोई असर नहीं होता। जैसे नौकरशाही व्यवस्था को अपनी तरह तोड़-मोड़ लेती है, डेंगू मच्छर भी इस मच्छर मार धुएं को अपनी खुराक बना लेता है, अपने लिए इस्तेमाल कर लेता है। कहा तो यह भी जाता है कि डेंगू का मच्छर बड़ा ही समाजवादी किस्म का जीव है, जबकि ऐसे जीव आजकल कम ही मिलते हैं। वह अमीरों-गरीबों में कोई भेद नहीं करता है।

वह वीआईपी लोगों और आम गरीब-गुरबे में कोई भेद नहीं करता है, वह समान भाव से अपना काम करता है। वह डॉक्टरों को सिर्र्फ  इसलिए नहीं बख्श देता कि उनका काम बीमार होना नहीं, इलाज करना है। वह वीआईपी लोगों को भी इसलिए नहीं बख्शता कि वे बस अमीरों वाली बीमारियों के लिए आरक्षित हैं। आजकल तो भेदभाव करने वाले लोग ही नहीं मिलते, और न ऐसे विचार ही मिलते हैं, मच्छर कहां मिलेंगे भला?

सहीराम

साभार-'हिंदुस्तान'- 07/10/2015

01 October 2015

कुछ लोग-28

स्वनाम धन्य
कुछ लोग
जो कहने को
पत्रकार
कलाकार
और न जाने
क्या क्या होते हैं
देश दुनिया की
तमाम समझ होने पर भी
कभी कभी
अपनी टिप्पणियों से
ना समझ लगते हैं।
उनके पास
उनके स्वाभाविक
पूर्वाग्रहों का
असीमित भंडार
रोकने लगता है
सही तरह
सोचने से
और वह
सिर वही लिखते
और कहते हैं
जो देश -समाज
भविष्य के हित से परे
सिर्फ उनके
अपने अहं को
संतुष्ट करता है
सिर्फ उनके
अपने चित्त को
तुष्ट करता है।
हर जगह
अपने कुतर्कों को
तर्क साबित करने में
ऐसे कुछ लोग
बिता देते हैं
वह अनमोल वक़्त
जो
खो चुका होता है
अपनी सार्थकता
सिर्फ
उनकी वजह से। 

~यशवन्त यश©
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