सर्वाधिकार सुरक्षित ©

इस ब्लॉग पर प्रकाशित अभिव्यक्ति (संदर्भित-संकलित गीत /चित्र /आलेख अथवा निबंध को छोड़ कर) पूर्णत: मौलिक एवं सर्वाधिकार सुरक्षित है।
यद्यपि मेरे अपने लिखे का स्तर कहीं भी प्रकाशन योग्य नहीं है, फिर भी यदि कहीं प्रकाशित करना चाहें तो yashwant009@gmail.com द्वारा पूर्वानुमति/सहमति अवश्य प्राप्त कर लें।

30 November 2015

कुछ लोग-33

अपना दिमाग लगाए बिना
फर्जी रिश्तों के जाल में फाँस कर
कभी भाई बना कर
कभी बहन बन कर
कुछ लोग
अपना उल्लू सीधा होते ही
खड़ी कर लेते हैं अपनी दुकान
दूसरों के दिमाग से।
वही अवधारणा
वही परिकल्पना
वही भाषा
वही चेहरे
और वही मोहरे
लेकिन नहीं
तो केवल वह बहाने
वह अवकाश।
वह आज मुक्त हैं
आनंद में हैं
सीधेपन को
बेवकूफी समझ कर
खुद को पीछे रख कर
औरों से भिड़ा कर
कुछ लोग
आज के आनंद में
भूल जाते हैं
अपना बीता हुआ
कल।

~यशवन्त यश©

29 November 2015

बातें अपने मन की

कुछ लिखने के लिए
विषयों की कमी नहीं
कमी हम में होती है
हम ढूंढ नहीं पाते
देख नहीं पाते
अपने आस-पास
बस सोचते रह जाते हैं
क्या लिखें
क्या कहें
कैसे कहें .......
क्योंकि
बातें तो सब वही
पसरी पड़ी हैं
हर ओर
जिन्हें और लोग
पहले भी कह चुके हैं
अपने शब्दों में
हम
बस खोजते रह जाते हैं
अपने शब्दों
अपनी शैली
और अपनी
आत्मा की आवाज़ को
बस कभी कभी
मनमाफिक शब्दों को
तरसते हैं
और जब
वह मिलते हैं
तब हम भी कहते हैं
बातें
अपने मन की।

~यशवन्त यश©

28 November 2015

माना कि साथ चलते हैं......

माना कि साथ चलते हैं कुछ लोग हम राह बन कर
पर अपने ठौर तक अकेले ही जाना होता है
माना कि रोशनी नज़र आती है बस यहीं पर
पाने को उसको मीलों चले ही जाना होता है
खुद से शुरू होता है खुद ही खत्म होता है सफर
न चाह कर भी खुद को सिफर बन ही जाना होता है।

~यशवन्त यश©

27 November 2015

जासूस

जासूस
कब किस रूप में
क्या बन कर
सामने आ जाए
नहीं पता होता
किसी को।
पता तो तब चलता है
जब पंछी
फँसता है जाल में
और कैद हो जाता है
किसी पिंजरे में।
लेकिन
कुछ जासूस
ऐसे भी होते हैं
जो बता देते हैं
अपना सच
अपने कारनामों से।
जासूस
कुछ सच में ही
जासूस होते हैं
और कुछ
फँस कर
हो जाते हैं कैद
अपने ही पिंजरे में।

~यशवन्त यश©

26 November 2015

धर्म क्या है ?

धर्म! वह नहीं
जो हम समझते हैं
सदियों की चली आ रही
रूढ़ियों से।
धर्म!
वह नहीं
जो बाँट चुका है हमें
हिन्दू,मुस्लिम
सिख,पारसी
यहूदी,ईसाई
और न जाने कितनी ही
अनगिनत अनजानी
संज्ञाओं और विशेषणों में।
तो धर्म क्या है ?
धर्म वह है
जिसे धरण किया जा सके
अपनाया जा सके
सिखाया जा सके
बताया जा सके ।
धर्म !
वह धारणा है
जो ले चलती है
अच्छाई की राह पर
स्त्री-पुरुष
काले गोरे
देश-काल और
भाषा का
भेद किए बिना
जो देखती है
हर मानव को
समभाव से
और समरसता से।
धर्म !
मन की शांति है
शक्ति है
और अभिव्यक्ति है
जो हर व्यक्ति को
सिखाती है
ज़मीन पर टिके रह कर
आसमान को छूना।

~यशवन्त यश©

25 November 2015

कुछ लोग-32

कुछ लोग
बिना लाग लपेट
कह डालते हैं
अपने मन की
बना डालते हैं
नये दुश्मन
अपने शब्दों से
शब्दों में छिपे
अर्थों से
कर देते नाराज़
अपने राजदारों को
फिर भी
चलते रहते हैं
नुकीले-कंटीले रस्तों पर
नये विरोधियों की
खोज में।

~यशवन्त यश©

24 November 2015

गली के कुत्ते ......

गली के कुत्ते
अपने आप में
अनोखे होते हैं

उनको होती है पहचान
गली के हर शख्स की
खास ओ आम की
खुशी और गम की
हर घर में आए मेहमान की

वो पूंछ हिलाते हैं
एक नज़र देख लेने भर से
पुचकार लेने भर से
उभर आती है मासूमियत
उनके चेहरे पर

गली के कुत्ते
सिर्फ गली के कुत्ते नहीं होते
उनके आवारापन में
छिपा होता है
एक अलग सा अपनापन
जो उन्हें अलग करता है
घरों में कैद और
पट्टे से बंधे
सभ्य कुत्तों से।

~यशवन्त यश©

23 November 2015

मुनासिब नहीं

मुनासिब नहीं पत्थरों से कुछ कहना
क्योंकि पत्थर इंसान नहीं होते
मुनासिब नहीं इन्सानों से कुछ कहना
क्योंकि इंसान पत्थर नहीं होते
तो किससे कहें किस्से अपने मन के
डायरी के सब पन्ने भी अपने नहीं होते
हवा को अपना बनाकर है हमें यूं ही चलना
कहीं तो पहुंचेंगे ही कहीं उड़ते उड़ते।

~यशवन्त यश©

22 November 2015

बदलते दिन ......

तारीखें बदलती हैं
दिन बदलते हैं
सोच बदलती हैं
चेहरे बदलते हैं
लेकिन अंदर से
हम वही
वहीं के वहीं रहते हैं ।
एक दौर बीतता है
नया दौर आता है
सपनों और उम्मीदों के
नये ठौर सजाता है
अब देखना है
सामने पसरी हुई
नयी राहों पर
कदम चलते हैं
या कि थमते हैं
सुना है कि दिन
गिरगिट की तरह
अपने रंग बदलते हैं।

~यशवन्त यश©

21 November 2015

अपना ज्ञान अपने ही पास

रखना चाहिए
अपना ज्ञान
अपने ही पास
क्योंकि इस दौर में
देने वाले को ही
स्वार्थी समझा जाता है
और लेने वाला
एहसान दिखाता है।
जो सीखा
जो समझा
वह सब
रखना चाहिए
खुद के लिए
खुद के ही पास
क्योंकि
उलट-पुलट के
इस दौर में
सबको
अपना हित
समझ आता है।


~यशवन्त यश©

20 November 2015

ये शब्द.....

ये शब्द -
सिर्फ कुछ शब्द हैं
जो मेरे मन में
ख्याल बन कर आते हैं
और ढल जाते हैं
अक्षरों के साँचे में
यहीं इसी जगह ।
ये शब्द-
सिर्फ कुछ शब्द हैं
कविता और कहानी नहीं
सिर्फ अभिव्यक्ति हैं
साहित्य नहीं।
ये शब्द-
सिर्फ एक पंछी हैं
जिसकी उड़ान को
मैं रोकता नहीं
जिसे मैं कभी टोकता नहीं
बस उड़ने देता हूँ
और थक कर बैठने देता हूँ
अंतर्जाल की
इस चारदीवारी पर।

~यशवन्त यश©

19 November 2015

वो आज खुश हैं .....

आज नहीं तो कल
उन्हें पता तो चलेगा ही
कि क्या होता है मतलब
बिना सच जाने
सिर्फ झूठ की बुनियाद पर
सहानुभूति बटोरने का.......
वो आज खुश हैं
मस्त हैं
अपने अच्छे दिनों में
लेकिन धोखे में हैं .....
वो जान कर भी
सिर्फ अनजान हैं
इस बात से
कि दिन बदलते
देर नहीं लगती
सुनहरे आज के पृष्ठ में
पुती हुई कालिख
दर्द देने में
देर नहीं लगाती।

~यशवन्त यश©

18 November 2015

नकल और अकल ......

नकल और अकल
आज के जमाने में
दुश्मन नहीं
दोस्त हैं ....
इनके बीच
हो चुका है
कोई गुप्त समझौता
तभी तो
इधर देखने वाले
झाँकते तो उधर भी हैं
फिर भी
बैठे हैं चुप .....
क्योंकि उन्हें पता है
मुँह खोलते ही
गिर सकता है वज्र
उनके घर की छत पर।

~यशवन्त यश ©

17 November 2015

समय समय पर ............

समय समय पर
बदलती रहती हैं
समय की परिभाषाएँ .....
समय समय पर
हम गढ़ते रहते हैं
समय के कई रूप.......
समय फिर भी
वैसे ही निराकार रहते हुए
साकार करता रहता है
समय समय पर
हमारे अधूरे सपने।

~यशवन्त यश©

16 November 2015

मुनाफाखोर रिश्ते........

अंतर्जाल के
इस स्वार्थी
मतलबी युग में
बदल रहे हैं अब
रिश्तों के मायने।
रिश्ते-
जो कभी हुआ करते थे
समर्पित
सगे या मुंह बोले
रिश्ते-
जो कभी सीमित थे
रिश्तों के भीतर
अब लांघ रहे हैं
अपनी सीमा।
चौहद्दी के भीतर
और बाहर
रिश्ते
आँका करते हैं
अब अपना स्तर
आर्थिक स्थिति
और आडंबर।
रिश्ते -
अब सिर्फ रिश्ते नहीं रहे
रिश्ते -
अब हो चुके हैं व्यापार
और हम सब
बन गए हैं
दुकानदार
जिसके भंडार में
न भाव है, न भावना।
आज के दौर में
रिश्ते -
करने लगे हैं
सिर्फ मुनाफे की कामना।
 
~यशवन्त यश©

15 November 2015

आतंक बस आतंक होता है

आतंक 
बस आतंक होता है 
जो शर्मिंदा कर देता है 
नर्क की आग को भी 
अपने क्रूर 
वीभत्स रूप से। 
आतंक 
बस आतंक होता है 
जो किसी किताब में 
पढ़ाया नहीं जाता 
बताया नहीं जाता 
सिर्फ महसूस किया जाता है 
मासूम और 
अनाथ आँखों से बहते 
दर्द के झरने में । 

~यशवन्त यश ©

14 November 2015

बच्चे सभ्यता के शिक्षक होते हैं

बच्चे
सिर्फ देखने में ही
छोटे होते हैं
लेकिन
उनका मन
उनकी सोच
बड़ों के
संकुचित
कुंठित
दायरे से
कहीं बड़ी होती है.....
बच्चे
खेलते कूदते
कोई भेद भाव नहीं करते
अपनी जाति
नस्ल, धर्म
रंग और रूप का .....
बच्चे
अपने बचपन में
सभ्यता के
शिक्षक होते हैं
जो बड़े हो कर
बन जाते हैं छात्र
इस तिलिस्मी
रंगमंच के।

~यशवन्त यश©

13 November 2015

कुछ लोग-31

अपने कुतर्कों को
तर्क कहने वाले
कुछ लोग
चाहते नहीं
निकलना
अपने आस-पास की
अंधेरी गलियों से
क्योंकि उन्हें भाता नहीं
कोई सच बताने वाला
रोशनी दिखाने वाला .....
और क्योंकि
वह संतुष्ट हैं
अपनी सीमित दुनिया में
असीमित
मुखौटों के भीतर।

~यशवन्त यश©

12 November 2015

जले बारूद की गंध ........

हर तरफ फैली
पटाखों के
जले बारूद की गंध
ऐसी लग रही है
जैसे
साफ हवा की लाश
सड़ रही हो
यहीं
कहीं आस पास।

~यशवन्त यश©

11 November 2015

खुशियाँ देते रहें सबको

दीयों की तरह
होते रहें रोशन
मन के जज़्बात
लौ की स्याही से
अंधेरे पन्नों पर
छोड़ते रहें
अपने निशान
कल, आज और कल
औरों से बेखबर
रह रह कर
बस अपनी दुनिया में
डूब कर उतर कर
नये आगाज के
इंतज़ार में
बाती की तरह
भूलते रहें,खुद को
खुशियाँ देते रहें,
सबको।

~यशवन्त यश©

10 November 2015

उम्मीदें....

न जाने किस नशे में
कभी कभी
लड़खड़ा जाते हैं कदम
न जाने किन उम्मीदों में
कभी कभी
बढ़ते जाते हैं कदम
जो भी हो
ये उम्मीदें
कभी उत्साह देती हैं
कभी तनाव देती हैं
फिर भी
नहीं छोड़ती हैं साथ
हर पल कर कहीं।


~यशवन्त यश©

09 November 2015

कुछ लोग -30

घमंड में चूर
कुछ लोग
जब निकलता देखते हैं
जनाजा
अपनी हसरतों
और दिल में
दबे अरमानों का.....
एहसास
तब भी नहीं कर पाते
कि यह क्या हुआ
और क्यों हुआ
खुली और बंद आँखों से
बस देखते रह जाते हैं
टूटना
अपने तिलिस्मों का......
उधार का जादू लिए
हाथों में उपहार लिए
ऊँघते-अलसाए हुए से
अपनों से बे कदर-
बे सबर 
कुछ लोग 
यूं ही देखते हैं
दम तोड़ना लौओं का
और बुझना दीयों का। 

~यशवन्त यश©

08 November 2015

बस यूं ही .....

बस यूं ही
देखता हूँ
सड़कों पर
आते जाते
चलते फिरते
दौड़ते लोगों को
जिनमें
कोई फुर्ती से
कोई सुस्ती से
बढ़ रहा होता है
अपनी मंज़िल की ओर
कोई मुस्कुराता हुआ
कोई उदास सा
ज़िंदगी के सबक
सीखता हुआ
अपनी अपनी तरह से
कुछ समझता हुआ
आसमान को
छूने की चाहत में  
हर कोई
उठना चाहता है
बहुत ऊपर
लेकिन बस यूं ही
बंद आँखों के भीतर
महसूस करता है
खुद को बहुत नीचा
और
सच के करीब।

~यशवन्त यश©

07 November 2015

मन जब खो जाता है ......

मन
जब खो जाता है
कहीं
किसी अनजान दुनिया में
बहुत मुश्किल होता है
तब उसे जगाना
और उबारना
दिन के सपनों की
कृत्रिम रंगिनियों से
और उस चकाचौंध से
जो तेज़ खिली धूप के सामने
बेबस हो कर
छटपटाती रहती है
गहरी रात, और
अंधेरे के इंतज़ार में। 
 
~यशवन्त यश©

06 November 2015

तमाशा

हर जगह
हर कहीं
हर कोई
दिखा रहा है
अपना तमाशा
कुछ उम्मीद लिए
या
नाउम्मीदी के शीशे में
बुझते दीयों का
अक्स देखते हुए
हर जगह
हर कहीं
हर कोई
बन रहा है
खुद ही
एक तमाशा।

~यशवन्त यश©

05 November 2015

अच्छे दिनों के रंग........

मंडी में बिकते,महंगे आलुओं के संग,
अमीरों के थाल में सजतीं ,महंगी दालों के संग,
इरोम शर्मीला के अनशन के, पंद्रह सालों के संग,
दिखा रहे हैं अच्छे दिन, अब अपने कई रंग।

~यशवन्त यश©

04 November 2015

चलताऊ शब्द .....

इन चलताऊ
शब्दों को
कोई कविता समझता है
कोई कहानी
कोई बस यूं ही
एक नज़र डालता है
और चल देता है
अपनी राह
लेकिन मैं
इन बेकार से
बिना मतलब के
फटीचर से शब्दों से
संतुष्ट करता हूँ खुद को
हमेशा से।

~यशवन्त यश©

03 November 2015

समझ नहीं आता है

कभी कभी
मन कहता कुछ
करता कुछ है
सोचता कुछ
लिखता कुछ है
कुछ कुछ करता हुआ
मन के साथ
समय बीत जाता है
और इस बीच क्या होता है
समझ नहीं आता है।

~यशवन्त यश©

02 November 2015

कुछ लोग-29

कुछ लोग
धन दौलत से
अमीर लोग
सिर्फ देखते हैं
अपना 'स्टेटस'
हर जगह
हर कहीं
सिर्फ वहीं
घुलते-मिलते
आते हैं नज़र
जहां वह
और उनके अपने
चमकीले पर्दों के भीतर
उड़ाते हैं
कागज की चिन्दियाँ। 

~यशवन्त यश©

01 November 2015

बदलती तारीखें.......

बदलती तारीखें
पल पल नये रंगों में
रंगती तारीखें
अपने भीतर
कुछ समेट लेती हैं
कुछ निकाल देती हैं
मन से
कभी बेमन से
थक कर कहीं
रुकती नहीं
बरस दर बरस
कहीं दबती, छुपतीं
आगे बढ़ती तारीखें
इंसानी मन की तरह
रंग बदलती तारीखें। 

~यशवन्त यश©
+Get Now!