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22 December 2018

खबर की तलाश में.........

खबर की तलाश में,बन गया खबर ही खुद
बा खबर था लापता, बे खबर रहा न कुछ।

बात कोई नयी कहते हुए,काँटों पर चलते हुए
फूलों पर सोते हुए, नये ख्वाब कुछ बुनते हुए। 

बूझता पहेलियाँ रहा, खुद के अक्स पर छपता रहा
अँधेरों में भटकता रहा, हर शख्स को खटकता रहा।

हल की तलाश में, मिल रहा छल-बल  न खुद
बेहाल हो कर गिर पड़ा,ताबूत में मिला न कुछ।
.
-यश ©
22/12/2018

 


13 December 2018

अरे अब तो बुझ जाऊँ मैं......

इससे पहले कि शमा बुझे
खुद ही बुझ जाऊँ मैं।
मन की सुनसान राहों पर
उड़ूँ और बिखर जाऊँ मैं।

अब तक तो ये न सोचा था
क्या फलसफे होंगे कल के।
बस आज में जीते हुए ही
बुनता सपने अपने मन के।

इससे पहले कि उलझन सुलझे
खुद को ही सुलझाऊँ मैं।
आखिर कब तक जलता रहूँगा
अरे अब तो बुझ जाऊँ मैं।

-यश©
12/दिसंबर/2018 

12 December 2018

वक़्त के कत्लखाने में -15

यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
देखता रहता हूँ
आवाजाही को
दिन और रात को
कल और आज को ।
यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
सुनता हूँ
आवाज़ें
जो निकलती हैं
बंद पलकों के पर्दे पर
चल रहे
चलचित्र के
गुमनाम-
अनजान
पात्रों से।
यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
रखता हूँ
बस यही उम्मीद
कि एक दिन
आ मिलेगी
मुझ से
मेरी परछाई
जो साथ छोड़ कर
जा पहुँची है
कहीं दूर
वक़्त के
किसी कत्लखाने में।
.
-यश ©
12/दिसंबर/2018 

07 December 2018

घूरता जाता हूँ.........

जिन्हें कभी लिखता हूँ, कभी लिख कर मिटाता हूँ बस एकटक उन्हीं शब्दों को,कभी घूरता जाता हूँ। चरित्र के प्रमाण की मुझको कोई ज़रूरत नहीं सच का चेहरा ले कर ही ,आता और जाता हूँ। जवाब क्या दूँ उनको, जिनको कुछ पल की पता है भलाई करना ही इस दौर की सबसे बड़ी खता है। माना कि पत्थर हूँ, पर चोटें मैं भी खाता हूँ खुद पर उभरी खरोचों को ही घूरता जाता हूँ । - यश© 07/दिसंबर/2018

06 December 2018

कैसे खुशी की बात करूँ?

दिन-रात अंधेरे ही अंधेरे
कब उजाले से मुलाक़ात करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

कहीं उम्मीद की आस नहीं
खुद को ही सिर्फ निराश करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

कई अजूबों की इस बस्ती में
क्यूँ झूठी मस्ती को आबाद करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

खून से रंगे हुए इन चौराहों पर 
मन के मत-भेद सरे-आम करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

दिन-रात अंधेरे ही अंधेरे
जाती साँसों पर विश्वास करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

-यश©
06/12/2018

05 December 2018

आखिर क्यूँ ?

चित्र सौजन्य-The Eyes of Children around the World
आखिर क्यूँ ये दहशत, क्यूँ आँखों में सूनापन है ?
क्यूँ डरा सा, सहमा सा ,क्यूँ काँटों सा बचपन है ?

यौवन की देहरी आने में, समय बहुत सा बाकी है । 
झूलों में, मैदानों में, खेलने की उमर  भी बाकी है ।  

फिर क्यूँ गुम हुआ चहकना,गया कहाँ वह सच्चापन है ?
मन की अपने जो था करता ,कहाँ गया वह बच्चापन  है?

–यश ©
05/12/2018

03 December 2018

बस ऐसे ही चलना है

चित्र सौजन्य- The Eyes of Children around the World
है ये किस्मत मेरी कि मुझे इसी जंजाल में रहना है।
बोझों से घिरे रह कर, न पढ़ना है न लिखना है।
दो जून की रोटी माँ बनाकर तभी खिलाएगी
जब शाम को चंद सिक्के उसके हाथों में रखना है।
ये न पूछना मुझसे कि, बनूँगा क्या बड़ा हो कर 
मज़दूर हूँ मेरा काम तो औरों की तकदीर बदलना है।
है ये किस्मत मेरी कि मुझे इसी हाल में रहना है
क्या होगा कुछ कहने से बस ऐसे ही चलना है।
-यश©
02/12/2018

01 December 2018

मेरी आवाज सुनो!

चलते चलो इन राहों पर
मत कदमों की ताल सुनो
पंख पसार कर अब ऊंची
एक नयी परवाज़ चुनो। 

मेरी आवाज सुनो!

यह समय काया पलटने का है 
इसमें मुखौटों का काम नहीं 
यह समय कुछ कर गुजरने का है 
इसमें रुकने का नाम नहीं । 

निडर हो कर नव जागरण का 
नित नया एक गान सुनो 
युवा धरा की युवा शक्ति तुम!
खुद में स्वाभिमान बुनो। 

मेरी आवाज़ सुनो!

-
-यश ©
01/दिसंबर/2018 

22 November 2018

बदलाव के साथ .....

मन के
कोरे पन्ने पर
लिखते-मिटते शब्द
समय के बदलाव के साथ
बदलते जाते हैं
बस अपनी ही कहते जाते हैं।
इन शब्दों से
खेलने की चाह
होते हुए भी
मैं
मौन ही रह जाता हूँ
कुछ कर नहीं पाता हूँ।
मेरे इस मौन में
सिर्फ इंतज़ार है
अपने अन्तिम पड़ाव का
जहाँ से
बदलाव का चरम
संग ले चलेगा
एक नयी दुनिया की
नयी यात्रा पर।

-यश ©

20 November 2018

इंतज़ार में हूँ ....

इंतज़ार में हूँ
कि मौत की राह पर
बढ़ते ये कदम
कहीं थम जाएँ
तो कह सकूँ
कि अभी ज़िंदा हूँ मैं।
.
-यश ©
20/11/2018

15 November 2018

बिछड़ने के लिए यहाँ .........

सबक ज़िंदगी के 
यूं हर रोज़ मिलते हैं 
बिछड़ने के लिए यहाँ 
कुछ लोग मिलते हैं।  

कुछ पल का हँसना 
कुछ पल का मुस्कुराना
कुछ पल गले लगाना 
कुछ पल  साथ निभाना। 

न मालूम किस नशे में 
दो अनजान मिल कर 
काँच के से नाज़ुक 
कुछ सपनों को बुन कर।  

कभी खाते हैं कसमें 
कभी हर वादा तोड़ते हैं 
बिछड़ने के लिए ही यहाँ 
कुछ लोग मिलते हैं। 

-यश©
15/11/2011

10 November 2018

छुट्टियों के बाद .......

लंबी छुट्टियों के बाद
थमी हुई ज़िंदगी 
थोड़ा अलसाते हुए 
फिर पा लेती है 
ऊर्जा 
कहीं काम पर 
जाते हुए 
कहीं  से 
वापस आते हुए 
हिस्सा बन कर 
उसी भागदौड़ का 
जिससे पाया था 
थोड़ा सा अंतराल। 
यह अंतराल 
किसी को छोटा लगता है 
किसी को खलता है 
कोई इसे सुकून से जीता है 
कोई हर पल गिनता है 
पर 
छुट्टियों के बाद का 
हर पहला दिन 
सबके लिए 
थोड़ा अजीब सा होता है। 

-यश ©
(10/11/2018)

07 November 2018

दीप जलें कुछ ऐसे जग में

दीप जलें कुछ ऐसे जग में
उजियारा हर कहीं हो जाए
जन जन में उल्लास बसे
भूखा न कहीं कोई सो पाए।

मिले सद्बुद्धि हर जन-मन को
ऋद्धि-सिद्धि से युक्त सभी हों
आशा के हर गीत को गा कर
गहन निराशा से मुक्त सभी हों।

समय की बहती इस धारा में
मन का तमस गर मिट जाए
भेद-भाव से रहित दीवाली
ज्योतिर्मय सब को कर जाए।

-यश©


04 November 2018

भेद

चित्र साभार - The Eyes of Children around the World
शब्द-यशवन्त माथुर


02 November 2018

न होतीं बेटियाँ अगर तो

न होतीं बेटियाँ अगर तो
कन्या पूजन कैसे करते ?
न पढ़तीं  बेटियाँ अगर तो
बुढ़ापे में भजन कैसे करते ?
न बढ़तीं बेटियाँ अगर तो
पूरे सपने कैसे करते ?
न होतीं बेटियाँ अगर तो
सबके रिश्ते कैसे होते ?

वो दौर गया जब बेटे ही
जीने का सहारा होते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
आँखों का तारा होते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
आसमां को चूमा करते थे
वो दौर गया जब बेटे ही
सरहद पर झूमा करते थे

ये दौर नहीं कि बेटी को
दुनिया में कोई न आने दे
ये दौर नहीं उसके सपनों को
आकार न कोई  लेने दे ।

ये दौर है कर्ता-धर्ता का
और उसकी आत्मनिर्भरता का
ये दौर है साझी समता का
उसकी विलक्षण क्षमता का।

ये दौर है नारी शक्ति का
उसके मन की अभिव्यक्ति का
किसी मंदिर की मूरत नहीं
पर उसकी सच्ची भक्ति का।

-यश©

इन पंक्तियों के लिए मुझे मेरे संस्थान द्वारा स्मृतिचिह्न एवं प्रशस्ति पत्र द्वारा सम्मानित किया गया। 

28 October 2018

दुविधा

इस दुनिया की सरहद से
मीलों दूर
निर्वात के
एकांत और सूनेपन में
शरीर से निकल कर
अनंत यात्रा पर
बढ़  चली
मेरी आत्मा
इस इंतज़ार में है
कि
शायद कोई मिले
जो दिखा दे
मंज़िल और
मिलवा दे
मिट्टी से बने
या आकार लेने जा रहे
किसी पुतले से ,
क्योंकि
यह अब तक अतृप्त
यह आत्मा
हमेशा की तरह
नहीं चाहती
यूं ही
भटकते रहना
न ही चाहती है
आदी होना
किसी शरीर की
फिर भी
यूं भटकते हुए
या कहीं रहते हुए
उबर नहीं पाती
खुद की
स्वाभाविक दुविधा से।

-यश©
28/10/2018



25 October 2018

शमा के बुझने तक........

ढलती जाती
गहराई हुई रात के 
सन्नाटे में 
मद्धम संगीत के 
लहराते सुर 
एकांत सफर के
साक्षी बन कर 
जैसे भर देते हैं प्राण 
साथ छोड़ चुके 
किसी साए में। 

पौ के फटने तक 
अनगिनत 
ख्वाबों के दरिया में 
डूब कर-उतर कर 
पलकें खुलते ही 
मिल जाती है 
मुक्ति 
हो जाती है 
विरक्ति 
नयी निशा के मिलने तक 
और 
शमा के बुझने तक। 

-यश ©
25/10/2018

23 October 2018

वक़्त के कत्लखाने में -14

समय की देहरी पर 
लिखते हुए 
कुछ अल्फ़ाज़ 
गुनगुनाते हुए 
जिंदगी की सरगम 
बजाते हुए 
बेसुरे साज 
कभी-कभी सोचता हूँ 
कि 
आते-जाते ये पल 
ऐसे क्यों हैं ?
कभी 
मेरे मन की करते हैं 
और कभी 
अपने हर वादे से 
मुकरते हैं 
लेकिन यह 
फितरत है हर पल की 
हम इन्सानों की तरह। 
ये पल 
ये समय 
ये लोग 
एक ही जैसे नहीं होते 
वक़्त के 
कत्लखाने में 
आदि से अंत तक 
इनको 
जूझना पड़ता है 
अपने ही 
जुड़वा मुखौटों से। 

-यश ©
23/10/2018

22 October 2018

मुरझाए हुए फूल .....

दिन भर 
खिले-खिले 
मुस्कुराने वाले फूल 
शाम को जब मुरझाते हैं 
जीवन का सत्य कह जाते हैं। 

सत्य जिसका 
अस्तित्व कायम है 
चौरासी करोड़ योनियों में 
भूत,वर्तमान और भविष्य की 
निरन्तर गतिशील समय यात्रा में।  

दिन भर 
इंसानी हाथों में 
दबे- छुपे तड़पते फूल 
शाम को जब मुक्ति पाते हैं 
सिर्फ अपने अवशेष छोड़ जाते हैं। 

-यश ©
22/10/2018

20 October 2018

बस चलना ही है .....

वक़्त के साथ एक दिन
गुमनाम तो होना ही है
दर्ज़ हो कर कुछ पन्नों में
कभी तो खोना ही है।

सुर बन कर  कभी तो
साज़ों में ढलना ही है
किसी की कल्पना को
कोई शब्द तो देना ही है।

ये और बात है कि रंग
हर पल तो बदलना ही है
सारे मुखौटों को चेहरे से
कभी तो उतरना ही है।

बहती हुई धारा के साथ
कदमताल तो करना ही है
घड़ी की हर सुई को
रुके बिना बस चलना ही है।

-यश ©
20/10/2018

16 October 2018

बहकते अल्फ़ाज़

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेहया से बहते हैं
मौन धारा के साथ
राहें तय करते हैं।

मन के कहीं
किसी कोने में
बादलों की तरह
उमड़-घुमड़ कर
अनगिनत बातें
अपने भीतर लेकर
अल्फ़ाज़  जब बरसते हैं
बेहया से हँसते हैं
या आँखों की कोरों से
आँसू बन कर रिसते हैं।

अल्फ़ाज़ जब बहकते हैं
बेसुध से बिखरते हैं
कई शब्द रूपों के साथ
नए आकार लेते हैं।

-यश ©
16/10/2018





15 October 2018

कुछ लोग -42

अनेकों
औपचारिकताओं के
लबादे में
ढँके-छुपे कुछ लोग
सिर्फ चाह में रहते हैं कि
बने रहें अच्छे
और सच्चे
औरों की निगाहों में ;
लेकिन;
भूल जाते हैं
कि उनके चेहरे पर लगा
आदर्शवादी मुखौटा
देर से ही सही
पर
जब हटता है
तब साफ दिखने लगते हैं
वो तमाम कील और मुँहासे
जिनसे रिसता है
उनके वास्तविक सच
और चरित्र का मवाद।

अपने 'अभिनय' से
सबको कायल करने वाले
ऐसे लोग
समय रहते ही
पहचान में आ तो जाते हैं
मगर
पहचानने वाले भी
छू लेने देते हैं
उन्हें उनका  फ़लक
क्योंकि
ऊंचाई से गिरने पर
शर्मिंदा अर्श भी
कर लेता है
खुद को और भी कठोर
ताकि
वो कर सकें
एहसास
खुद के दिल
और दिमाग पर पुती
कालिख के
गहरेपन का।

~यश©
15/10/2018
  

14 October 2018

चौराहे

जीवन की
इस अविरल समय यात्रा में
अपने अनेकों रूप लिए
अनगिनत चौराहे
निभाते हैं
हमारा साथ
उस हमसफर की तरह
जो
कभी-कभी
साथ न हो कर भी
साथ रहता है
मन का
हर भेद जान लेता है।

ये चौराहे
अपनी चारों दिशाओं में
कहीं फूल
कहीं काँटे
और कहीं
दिखाते हैं
पथरीले -रपटीले रास्ते
जिनसे गुज़र कर
तय होता है
मंज़िल का मिलना
या उससे दूर रहना ।

हर
आने -जाने वाले के साथ
ये चौराहे
बिना हीनता का एहसास कराए
अपने सार्वभौमिक
अस्तित्व के साथ
बस इस बाट में रहते हैं
कि इन हो कर
जो जा रहा है
कल
फिर लौट कर आएगा
अपनी एक
नयी परछाई के साथ।

~यश ©
14/10/2018

13 October 2018

वक़्त और पन्ने

ये वक़्त
अपने साथ लाता है
कुछ स्याह
कुछ सफेद पन्ने
जिन पर रचा होता है
हमारा भूत
वर्तमान और भविष्य.....
हमारी अपेक्षाएँ
आशा
और निराशा।

ये पन्ने-
कभी धारा के साथ
बहते हैं
कभी
विपरीत चलने की
कोशिश में
लगाते हैं
अपना पूरा ज़ोर।
कहीं
किसी किनारे पर
ठिठक कर
रुकते हैं
सुस्ताते हैं
किसी हमराह को
कुछ राज़ बताते हैं
और बढ़ जाते हैं
अंतहीन आदि से
अनंत की ओर।

ये वक़्त
उसकी किताब
और पन्नों का
होश खोकर
चिन्दी-चिन्दी होकर
बिखरना
ऐसा लगता है
जैसे इन चलती साँसों को
मिल गया हो मुकाम
एक निर्बाध
यात्रा के बाद।

~यश©
13/10/2018

12 October 2018

समय की बेख्याली में

समय की बेख्याली में,
मन के भीतर
उठती गिरती
कई बातों के साथ
कभी-कभी
लगता है
जैसे धँसता जा रहा हूँ
किसी दलदल में
या फँसता जा रहा हूँ
किसी रेगिस्तान की
मृगमरीचिका के
मायाजाल में।
पर
यह जो भी है
कहीं ऊपर है
दिन-रात
या
पल-पल बदलते
मौसम की
हर रंगत से
समय की
हर फितरत
और
संगत से।
वजह
या बेवजह
चलते जाने की
चाह
या
मज़बूरी
समय की बेख्याली में
ज़रूरी भी होती है
ज़ाया करने के लिए
कुछ शब्द
बस इसी तरह।

~यश©
12/10/2018

13 September 2018

कुछ लोग -41

विरले ही होते हैं कुछ लोग इस तरह के जो,
डूब जाते हैं खुद, पार तिनके को लगा देते हैं।
वो लहरों के साथ-साथ चलते तो नहीं मगर
डगर दुनिया को एक नयी सी दिखा देते हैं ।
उनके आगे क्या अपना– क्या पराया कोई
वो अपनी बातों से हर सोते को जगा देते हैं।
विरले ही होते हैं कुछ लोग इस तरह के जो,
अपनी साँसों से किसी और को जिला देते हैं।
-यश ©
13/09/2018


15 August 2018

अगर आज़ाद हैं हम तो क्यों .......

अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
इंसान बाज़ारों में बिकता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
बचपन फुटपाथों पर दिखता है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
कोई दर-दर भटकता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
सड़क किनारे सोता है ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
कठुआ-मुजफ्फरपुर होता है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
इंसानियत का कत्ल होता  है?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
अपनी नीयत बदली हुई ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
है आग दहेज की लगी हुई ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
बेड़ियाँ अब भी जकड़ी  हुईं ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
हैं अफवाहें फैली हुईं ?
अगर आज़ाद हैं हम  तो क्यों
हैं फिज़ाएँ बदली हुईं?

 -यश©
12/08/2018

05 July 2018

ऑफर,रिटर्न और एक्सचेंज .........

जिंदगी के
खुशनुमा पलों पर
अगर  चल रहा होता ऑफर
एक के साथ एक
या दो फ्री का
तो कितना अच्छा होता
थोड़ी देर को ही सही
हर कोई
कितना सच्चा होता।
या ऐसा होता
कि
लौटा सकते हम
अपने
अनचाहे पलों को
और बदले मे पा सकते
अपने बीते बचपन
और कभी के
बिछुड़े
अपनों को
हर रात देखे
हसीन सपनों को।
लेकिन ....
ज़िंदगी
कोई सुपर मार्केट नहीं
जहाँ
चलती है
हमारी खुद की मर्ज़ी
चीजों को
चुनने,आज़माने
और बदले जाने की। 
ज़िंदगी तो
असल में
स्याह-सफ़ेद परतों की
एक विचित्र
कविता
या कहानी है
खुद ही पढ़ते-झेलते
और
कहते जाने की;
इसमें
संभव नहीं पाना
कोई भी ऑफर
रिटर्न या एक्सचेंज
बस
एक गुंजाइश है
साँसों के चलते
या थमते जाने की ।

-यश©
05/07/2018

02 July 2018

काश! कि न होती ये बारिश

काश!
कि न होती ये बारिश
तो
न मन यूं भीगता
न भीतर ही भीतर
चीखता
मुक्ति पाने को
काले बादलों की तरह
उमड़ते
अनचाहे शब्दों से ।
हाँ !
अनचाहे शब्द
जो तितर-बितर
हो कर
न जाने
किस तरह जुड़ कर 
असपष्ट सा आकार लेते हैं
न जाने क्या समझते हैं
न जाने क्या समझाते हैं।
काश!
कि न होती ये बारिश
तो न जमती
द्वेष और हीनता की
काई और कीचड़
टूटे दिल के
उस एक कोने में
जो लाख समझाने पर भी
मानता नहीं
कि हकीकत
कहीं हटकर होती है
कल्पना से।
काश!
कि न होती ये बारिश
और बना रहता
अस्तित्व
जेठ की तपती दोपहरों का
तो सुकुं मिलता मुझको
सिर्फ यह सोचकर
कि
इस कदर
जलने वाला
अकेला मैं ही नहीं
और भी हैं।

-यश ©
02/07/2018



28 June 2018

वक़्त के कत्लखाने में -13

यूं ही
समय के
इस खालीपन में
खुद से
बातें करता हुआ
अतीत के झरोखों से
अपने
आज को देखता हुआ
कभी-कभी सोचता हूँ
क्या रखा है
धारा के साथ बहने में
या
धारा के विपरीत चलने में
एक आसान है
दूसरा कठिन
मगर चुनना तो है ही
किसी एक को
वक़्त के इस कत्लखाने में
खुद का अस्तित्व
कायम रखने के लिए।

-यश ©
28/06/2018

21 June 2018

ज़िंदगी धोखेबाज है

क्या पता कल था किसका
और किसका यह आज है
ज़िंदगी धोखेबाज है।

कल लिखे थे गीत सुनहरे
कल क्या लिखा जाएगा।

कोई कहेगा कर्कश स्वर में
कोई सुर में गाएगा।

यूं ही अकेले बैठे-ठाले
समय की स्याह कहानी के

टूटे-फूटे हर्फों के ये
पन्ने कौन समझ पाएगा।

ना-मालूम इन राहों पर अब
कैसे चलना आएगा।

थमना जिसने कभी न सीखा
बैठ कहीं सुस्ताएगा।

मिटेगा कोई राम भरोसे
कोई अमर हो जाएगा।

आना-जाना लगा ही रहेगा
सांस तो सिर्फ परवाज़ है
ज़िंदगी धोखेबाज है।


-यश ©
17 जून/2018


15 May 2018

सुनो ताज !


ताज!
सुना है तुम अब वैसे नहीं रहे
जैसा मैं देखा करता था
हाथीघाट* के सहारे चलते हुए
यमुना के उस पार!
तुम
सूरज की तेज रोशनी में
अलग ही चमका करते थे
तुम रात के चटख अंधेरे में भी
चाँदनी की बाट जोहते
दिखा करते थे।
ताज !
सुना है
अब तुम पर
काई की परतें जमने लगी हैं
कालिख से
तुम्हारी दोस्ती
अब कुछ ज़्यादा बढ़ने ही लगी है
क्यों ?
आखिर क्यों ?
क्या यूँ
सदियों से खड़े रह कर
यमुना को
नदी से
नाले में बदलते देख कर
उसकी नीली लहरों को
काली स्याह होते देखकर
अब डोलने लगा है
तुम्हारा आत्मविश्वास ?
या
होने लगा है
तुम्हारे संगमरमरी हुस्न पर
बढ़ती उम्र का असर ?
जो भी हो
तुमको होना ही होगा
बे-रहम
हर उस धुएँ
और गुबार पर
जो अपने आगोश में लेकर
तुमको
बिसरा देना चाहता है
अमर प्रेम के नक्शे से ।
तुमको
खुदका ही हकीम बनकर
करनी होगी
खुद की दवा
क्योंकि
कल हो
या आज
तुम्हीं रहोगे सरताज
बेहिसाब युगलों के
धड़कते दिलों में।

-यश©
11/05/2018
08:57 PM
--------------
15/05/2018
06:58 PM
*हाथीघाट -आगरा शहर में यमुना किनारे की एक जगह जहाँ 2 हाथियों की प्राचीन मूर्तियाँ लगी हैं।


10 May 2018

क्या लिखूँ?

तूफाँ के हर मंज़र के बाद
गिरे-पड़े दरख्तों का दर्द लिखूँ
या इस गहराती गर्मी में
कहीं का मौसम का सर्द लिखूँ

क्या लिखूँ?

सड़क किनारे सोते-जागते
किसी आवारा का ख्वाब लिखूँ
या आधी रात के सन्नाटे में
किसी पर चढ़ती  शराब लिखूँ

क्या लिखूँ?

क्या लिखूँ कि जिसको पढ़ कर
खुद ही रोऊँ और हंसू भी
हर अक्षर की तरह बिखर कर
अपनी कोई बात कहूँ भी

फुटपाथों पर लोट लगाते
उस बचपन के रंग लिखूँ
या तेज़ी से भागते जाते
किसी जीवन के ढंग लिखूँ

क्या लिखूँ?


-यश ©
10/05/2018

01 May 2018

वो मजदूर का बच्चा है

तन से मैला पर मन से सच्चा है
गुरबत में जी कर भी
खुद में अच्छा है
वो मजदूर का बच्चा है।

वो देखता है रोज़
नयी इमारतों को बनते
किसी और के ख्वाबों को
नये रंगों में ढलते।

उसे फूलों की नहीं, ईंट,मौरंग
और सीमेंट की खुशबू पसंद है
उसे संगीत की नहीं
छैनी-हथोड़े की हर धुन पसंद है।

वो अक्सर सुनता है खंडहरों
और बंजर धरती की कहानियाँ
जिन पर खुदी नींवें
अब छूती हैं ऊँचाइयाँ।

भीतर से मजबूत पर बाहर से कच्चा है
घरौंदे सा उसका घर
महलों से अच्छा है
वो मजदूर का बच्चा है।

यश ©
26/04/2018


28 April 2018

28 साल

28 साल पहले, 28 अप्रैल 1990 को आगरा से प्रकाशित साप्ताहिक 'सप्तदिवा' में जब यह छपा था तब मैं लगभग 6 साल का था ( जिसे संपादक महोदय ने 7 वर्ष लिख दिया  )।
यह जो लिखा है पूरी तरह से बेतुका है लेकिन अपना नाम देख कर Motivation तो मिला ही। इस सबका पूरा श्रेय पापा को ही जाता है क्योंकि मुझे न कभी रोका न टोका जबकि कुछ लोगों ने कई तरह से demotivate करने की भी कोशिश की।
खैर तब से अब तक मैं अपने मन का लिखता और कई पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में समय-समय पर छपता आ रहा हूँ।
मेरे इस ब्लॉग  http://jomeramankahe.blogspot.com  पर अब तक का लिखा बहुत-कुछ संग्रहित है।

-यश-

19 April 2018

कुछ बातें

कुछ बातें
अपनी शुरुआत से ही
निकल पड़ती हैं
अंतहीन मंज़िल की ओर
पार करते हुए
कई
चाहे-अनचाहे रास्ते।
.रास्ते
जिन पर मिलते हैं
कई सुनने वाले
सुनकर लिखने वाले
सोचने वाले
विचार बनाने वाले
और
उन बातों को
नयी राह की ओर
ले जाने वाले।
यह सिलसिला
चलता रहता है
यह सिलसिला
चलता रहेगा
क्योंकि
कुछ बातें
एक शून्य से
शुरू हो कर
अनंत शून्यों तक की
अपनी यात्रा में
लेतीं नहीं कहीं भी
अर्द्ध या
पूर्ण विराम।

-यश ©
19/04/2018

15 April 2018

खामोश नहीं रहेंगे

सब खामोश हैं और सब खामोश ही रहेंगे
जो अब तक बोलते थे बहुत कुछ 
कुछ भी नहीं कहेंगे।  

इस दौर में उतर रहे हैं कई ओढ़े हुए नकाब 
नकली चेहरों को नहीं सूझ रहे 
चुभते सवालों के जवाब।  

अब तक सहा सभी ने अब और नहीं सहेंगे 
जो अब तक झेलते थे बहुत कुछ 
खामोश नहीं रहेंगे। 

-यश ©
15/04/2018

12 April 2018

यही पूजा है तो ......

यही पूजा है कि जो आसिफा तुम्हारे साथ हुआ ?
यही पूजा है कि जो निर्भया तुम्हारे साथ हुआ ?

यही पूजा है कि जो भजन यहाँ पर गाए जाएँ ?
यही पूजा है कि जो सारे सपने बिखराए जाएँ ?

यही पूजा है तो देवता करें अब वास कहाँ पर ?
यही पूजा है तो नवरात्रों के हों उपवास कहाँ पर ?

यही पूजा है तो 'आदि शक्ति' किसे कहोगे ?
यही पूजा है तो 'माँ' की  भक्ति किसे कहोगे ?

यही पूजा है तो 'धर्म' पर प्रश्न चिह्न क्यों लगाते हो ?
यही पूजा है तो जय-जयकारे क्यों लगाते हो ?

यही पूजा है  कि समझ लो पूजा मन से जाता है 
यही पूजा है कि कोई धर्म  बैर नहीं सिखाता है । 

यही पूजा है कि हर नारी को अधिकार और मान दो 
उसकी देह और उसके मन को उसका उचित सम्मान दो। 


-यश ©
12/04/2018

07 April 2018

देहदान कर देना


जब नहीं हों मुझमें प्राण,
इतना एहसान कर देना
अंतिम इच्छा यही कि
मेरा देहदान कर देना।
जीते जी कुछ किया न मैंने
स्वार्थी जीवन बिताया है
यूं ही कटे दिन रात , समझ
कभी न कुछ भी आया है।
क्या होगा शमशान में जल कर
क्या होगा किसी कब्र में दब कर
चार कंधों पर ढोकर सबने
राम नाम ही गाया है।
मन तो व्यर्थ रहा ही मेरा
तन को नष्ट न होने देना
अंग हों जो भी काम के मेरे
जीवन उनसे किसी को देना ।
मृत शरीर अनमोल है इससे
नयी खोजें हो जाने देना
दान देह का सबसे बड़ा है
इसको व्यर्थ न जाने देना।

-यश ©

06 April 2018

दुनिया बड़ी ज़ालिम है

ये दुनिया बड़ी ज़ालिम है
इससे कोई बात न करना
चार दिन की महफिल में
खुद को बरबाद न करना ।

कुछ पल का है हँसना रोना
कुछ पल की सब बातें हैं
बाकी तो बस तनहाई में
यूं कटते दिन और रातें हैं ।

चेहरे से सब अपने लगते
भीतर से सब पराए हैं
अपनी अपनी कहने सुनने
कई रूप धर कर आए हैं ।

कागज़ कलम हैं सच्चे साथी
और किसी से आस न रखना
आस्तीन के साँप बहुत हैं
उनको अपने पास न रखना ।

-यश ©
06/04/2018 

31 March 2018

मौन के एकांत में

मौन के एकांत में
कहीं खो कर
किसी निर्वात के
हवाले हो कर
सोच रहा हूँ
खुद पर लगे
प्रश्न चिह्न हटाने की
खुद से खुद की
दूरियाँ मिटाने की
यह  समय
जो अपने हर पल
ले रहा है मेरा इम्तिहान
कातिलाना होकर
न जाने क्यों
मुझ पर चाह रहा है
टूट पड़ना
न जाने क्यों
चाह रहा है
मुझ से लड़ना
खैर
मुझे लड़ना है
खुद के उस अबूझ
अन-सुलझे
आवरण से
जो अनचाहे ही
चस्पा हो गया है
मेरे चेहरे पर।

यश ©
31/03/2018 

26 March 2018

मैं !

मैं !
बस अपनी कल्पनाओं में
खोया सा रह कर
अनजान सपनों से
अपने मन की
कुछ -कुछ कह कर
कभी -कभी
तांक-झांक लेता हूँ
इधर-उधर ।

मैं !
खुद को जानने की
जितनी कोशिशें करता हूँ
उतना ही अनजान बनता चला जाता हूँ
अपने अतीत और वर्तमान से ।

मैं !
बौराए आम के बागों में
चहलकदमी करता हुआ
हमराहियों के चेहरे पढ़ता हुआ
झपकती पलकों से
अनगिनत प्रश्न करता हुआ
हैरानी से देखता हूँ
जिंदगी के पहियों को
कभी घिसटते हुए
कभी आराम से चलते हुए।

मैं !
अपनी सोच के सीमित दायरे में
अपनी ही लिखी किताब पर
उकेर देता हूँ
कई और इबारतें
देखता हूँ
एक के ऊपर एक
शब्दों और अक्षरों के
जटिल पिरामिडों को
आकार लेते हुए
बस अपनी कल्पनाओं में
खोया सा रह कर
यूं ही बेमतलब की
लिखकर-कहकर
बना रहता हूँ अनजान
आने वाले
हर तूफान की आहट से।

-यश©
26/03/2018

कौन हूँ मैं


पूछ रहा हूँ खुद से 
कि कौन हूँ मैं । 
कहीं अंधेरे में छुपा 
अनकहा मौन हूँ मैं ।

मैंने धोखे खाए हैं 
उजालों से हर दफा 
कहीं कब्र में दफनाए हैं 
अपने ख्याल हर मर्तबा

सच की इबारत हूँ 
या तिलिस्मी झूठ हूँ मैं ?
पूछ रहा हूँ खुद से कि कौन हूँ मैं ।

-यश ©
14/02/2018

16 March 2018

मैं देवी हूँ-9 (नवरात्रि विशेष)

इन नौं दिन
तुमने पूजा है
पत्थर की मेरी मूरत को। 
उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर के
तुमने मांगी हैं मन्नतें
दु:ख के जाने और
सुख के आने की।
सप्तशती के
सात सौ श्लोकों के साथ 
तुमने रखे हैं
फलाहार और निर्जल व्रत।

लेकिन कभी सोचा है
क्या होगा इस सबसे ?

क्या बदल पाए हो
खुद की नज़रों और
नजरिए को ?

क्या निकल पाए हो
अपनी पुरातन सोच के
दायरे से ?

नहीं
कुछ बदलाव नहीं होगा
बस भ्रम बना रहेगा
यूं ही चारों ओर
क्योंकि
तुम्हारी हर क्रिया-प्रतिक्रिया का
रहस्य मैं जानती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018


मैं देवी हूँ-8 (नवरात्रि विशेष)

मैं!
बन कर रह गयी हूँ
पैमाना
सिर्फ
अपने रूप-रंग
और वाह्य आकर्षण का ही।

मुझे मापा जाता है
मेरे गोरा या काला होने से
पतला या मोटा होने से
लंबा या नाटा होने से
अनपढ़ या पढ़ा लिखा होने से ।

मुझे तोला जाता है
मेरे पिता की संपत्ति के तराजू में
जिसके एक पलड़े पर
होने वाले दामाद की
सरकारी नौकरी बैठती है
और दूसरे पलड़े पर
खैरात की कार,बाइक
और अन-गिनत अपेक्षाएँ
कोशिश करती हैं
संतुलन बनाने की।

खुद ही
खुद के हक से वंचित हो कर
इस विकसित युग में भी
कई बेड़ियों से
जकड़ी हुई हूँ
मैं ! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

मैं देवी हूँ -7 (नवरात्रि विशेष)

कई रूप
कई स्वरूप हैं मेरे
लेकिन क्या
मेरे 'स्वयं' के दर्शन
कभी कर पाई हूँ ?
अपने पिता-भाई
और माँ के लिए
पराई हूँ
श्वसुराल में
बाहर से आई हूँ।

मेरी खुद की
इच्छाएँ
महत्त्वकांक्षाएँ
दब जाती हैं
हर देहरी के भीतर
क्योंकि मुझे
जानने -समझने
और मानने वाला
दूर -दूर तक
कोई नहीं।

मैं!
खुद ही निराशा में
आशा को ढूंढती फिरती हूँ
खुद से ही
खुद की बातें किया करती हूँ
मैं! देवी हूँ।

-यश ©
16/03/2018

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