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02 April 2020

सब यूं ही चलता रहेगा......

सब यूं ही चलता रहेगा
समय के साथ
सब यूं ही बदलता रहेगा।
बदलाव की यह सोच
यह महत्त्वाकांक्षा
सिर्फ हमारा भ्रम है
क्योंकि हम
जा चुके हैं
अपने समय से
कई सदियों पीछे। 
हमारा मन
हमारी सोच
हमारा स्तर
सिकुड़ चुका है
और इसीलिए
हमारी आँखों को
सिर्फ वही दिखता है
जो हम देखना चाहते हैं
सत्य के चेहरे पर लगे
कई परतों वाले
द्विआयामी चश्मे से।

-यशवन्त माथुर©
02/04/2020 

01 April 2020

वक्त के कतलखाने में -18

एक अजीब सी बेबसी
जब दिखती है
कुछ लोगों के चेहरों पर
तो ऐसा लगता है
जैसे
सब कुछ होकर भी
कुछ नहीं होने का एहसास
भीतर से खोखला करता हुआ
काँटों भरे रास्तों पर चलता हुआ
अपने तीखेपन से
याद दिलाता है
जीवन के प्रेक्षागृह में
लगा हुआ
वही पुराना चलचित्र
जिसके घिसे हुए दृश्य
ले जाते हैं अपने साथ
धूल भरे उन्हीं गलियारों में
जो कभी
हुआ करते थे आबाद
वक्त के कतलखाने में।

-यशवन्त माथुर ©
01/04/2020

28 March 2020

कारवां गुजर जाने दो......

जो करना है तुमको
करते रहना मगर
उन्हें एक ठौर पाने तो दो
कारवां गुजर जाने दो।

वो इस उम्मीद में थे
कि हाथ खाली न होंगे
जो देखते हैं ख्वाब
सिर्फ खयाली न होंगे।

लेकिन पता क्या था
दिन एक ऐसा भी आएगा
जो उनका है उनसे ही
दूर हो जाएगा।

समय चक्र सबका है
सब में न भेद हो जाने दो
निकला जो मंजिल की तरफ
वो कारवां गुजर जाने दो।

-यशवन्त माथुर ©
28/03/2020

27 March 2020

कुछ कर नहीं सकता .......












ऐसे मंज़र हैं यहाँ
और वो कहते हैं
मतलब खुद से रखो
दूसरों की तो
दूसरे ही सोचते हैं।

कहीं घास चरता बचपन है
अपने घोंसले को लौटता बहुजन है
कहीं बदसलूकी है और
कहीं फेंका जा रहा राशन है।

कहीं मटर छीलते अफसरान
तीसरे पन्ने पर छापे जाते हैं
बरसते डंडों के निशान
कहीं पीठ पर पाए जाते हैं।

ये वो है जिसे अमीरी ने बोया
और गरीबी काट रही है
एक थे कभी जो उनको
ये मुसीबत बाँट रही है।

वो अब भी कायम हैं
अपनी स्वार्थी बातों पर
मैं अब भी कायम हूँ
अपने उन्हीं जज़्बातों पर।

ये जानकर भी
कि नाकारा हूँ
इन गलियों में घूमता
एक आवारा हूँ
चाहता हूँ कि
बना दूँ
इस मर्ज की
मैं ही कोई दवा
लेकिन
कुछ कर नहीं सकता
दुआ देने के सिवा ।

-यशवन्त माथुर ©
27/03/2020


livehindustan.com

26 March 2020

अफसोस! अब तक ज़िंदा हूँ..

आसमान में उड़ता
एक बेखौफ परिंदा हूँ
अफसोस! अब तक ज़िंदा हूँ।

कोशिशें
उन्होंने कीं तो बहुत
तीरों से भेदने की
गर्दन और
धड़ को अलग करने की
ये मेरी किस्मत
कि अभी तक बच निकला हूँ
अफसोस! अब तक ज़िंदा हूँ।

वो सोचते रहे
आसान है
कुरेदना मेरे मन को
क्योंकि उनकी नज़रों में
मैं हमेशा
कमजोर ही रहा हूँ
अफसोस! अब तक ज़िंदा हूँ।

-यशवन्त माथुर ©
26/03/2020 

25 March 2020

सब अपने घर में हैं....

(चित्र साभार-गूगल/फ़ेसबुक )
ये समय का चक्र है 
कि कोई मजे में है 
दीवारों के भीतर
मखमली पर्दों 
और आरामतलबी की 
कैद में है। 

ये बात और है 
कि कुछ लोग 
सड़क के किनारों पर 
खाली पेट और 
सहमी आँखों के साथ 
ढलती दुनिया के 
संभल जाने की 
उम्मीद में हैं। 

ये जो कुछ भी है 
क्या है 
इतनी समझ तो नहीं 
असर इतना है 
कि सब अपने घर में हैं। 

-यशवन्त माथुर ©
25/03/2020

24 March 2020

हम सब गंदे हैं ...

अंधे हैं
हाँ हम सब अंधे हैं
दिखते हैं साफ़
पर बहुत गंदे हैं
हाँ बहुत गंदे हैं।
अपने उजले
आवरण के भीतर
चेहरे पर लगे
मुखौटों की
कई परतों के भीतर
हमारी आखिरी
वास्तविक सतह
ढो रही है
कभी न मिटने वाली
कालिख
और रपटीली
काई
जिस पर बे-असर हैं
सारी सावधानियाँ
और उपकरण
क्योंकि
इस अंतिम स्थिति का
स्वाभाविक चरम
विनाश के सिवा
और कुछ भी नहीं।

-यशवन्त माथुर ©
24/03/2020

23 March 2020

कुछ लोग-47

खुद
सामने आने के बजाय
कुछ लोग
चलते हैं
अपनी चालें
उन ना-समझ मोहरों से
जो होते हैं बे-खबर
प्रत्यक्ष के
परोक्ष से।
पर वो नहीं जानते
कि ये मोहरे ही
अक्सर उनके
विभीषण बनकर
दिखा देते हैं
असत्य के भीतर
कहीं गहरे से दबा
सत्य।
कई उजले मुखौटों के
सौन्दर्य को
दर्पण में निहारते
कुछ लोग
जानकर भी
अनजान बने रहते हैं
कि उनकी
बतकहियों के तूफान में
शांत रहने का अर्थ
आत्मसमर्पण नहीं
सामने वाले का
संकल्प होता है।

-यशवन्त माथुर ©
23/03/2020

21 March 2020

वो सबको खुश न रख पाता......

जलते जलते दीया भी
है अक्सर बुझ जाता ।
जो दबा उसके भीतर
समझ कोई न पाता। 

उसके तल पर घना अंधेरा
लौ भले ही दिखलाती सवेरा।
थोड़ा गिरती -थोड़ा उठती
करम अपना वो करती रहती।

व्यंग्य बाणों से बिधते रह कर
अपना जीवन जीता जाता ।
हर दीये का एक ही किस्सा
वो सबको खुश न रख पाता।

-यशवन्त माथुर ©
21/03/2020

09 March 2020

होली मुबारक..


भंग में रंगों  की तरंगें  मुबारक
गली में नुक्कड़ों में  हुड़दंगे मुबारक।
बच्चों की टोली को ठिठोली मुबारक
ठंडाई और गुझिया की होली मुबारक।

सब ओर बरसते गुलाल मुबारक
फागों के रागों को सुर ताल मुबारक।
बुजुर्गों को यादों की हर झोली मुबारक
कहानियों और किस्सों की होली मुबारक।

मुबारक मुबारक-मुबारक मुबारक
दोस्तों को यारों की महफिल मुबारक।
अमन  और चैन की हर बोली मुबारक
जो करती है एक सबको  होली मुबारक ।

-यशवंत माथुर 




06 February 2020

सैनिक

हम सोचते हैं
सैनिक
सिर्फ सैनिक होता है
जिसका काम
सिर्फ मारना और मरना होता है
अपने देश पर
मिटना होता है
लेकिन
हम नहीं सोचते
कि सैनिक भी
इंसान होता है
हमारी-तुम्हारी तरह
उसके भीतर भी
प्राण होता है
उसका भी
अपना एक परिवार होता है
जो निर्भर करता है
उसकी सकुशलता पर
उसकी वीरता पर
उसके कर्तव्य
और धीरता पर।
सैनिक!
सबका विश्वास, आश्वासन
और गर्व होता है
क्योंकि वह
सिर्फ सैनिक नहीं
एक संकल्प होता है।

-यशवन्त माथुर ©
08/01/2020

04 February 2020

यायावर हैं हम...

मौन समय की राहों में
हैं थोड़ी खुशियाँ, थोड़े गम
यायावर हैं हम।

इन राहों में थोड़ी मस्ती है
इन  राहों में अपनी हस्ती है।
एक शांत सरल सी रेखा पर
इंसानों की अपनी बस्ती है।

है पूर्व यही-पश्चिम यही
उत्तर-दक्षिण का न कोई भ्रम
यायावर हैं हम।

हमने बस चलना सीखा है
वर्तमान में ढलना सीखा है।
और भविष्य के खातों में
स्वप्नों को लिखना सीखा है।

ऊबड़-खाबड़ इसी आज में
चुभते काँटे थोड़े कम
यायावर हैं हम।

-यशवन्त माथुर ©
04/02/2020

02 February 2020

सैनिक

न हिन्दू होता है
न मुसलमान होता है
सैनिक तो सिर्फ
एक इंसान होता है।

इंसान , जिसकी रगों में
स्वाभिमान बसता है
गोलियां खाता है
फिर भी वो हंसता है।

उसका करम ही
उसकी पहचान होता है
शक्ल कोई भी हो
नाम हिंदुस्तान होता है।

सीना तान, सीमा पर
उसकी चहलकदमियों से
पिघल जाती है बर्फ भी
बूटों की गर्मियों से।

सारे जहां से अच्छा
एक वीर जवान होता है
सैनिक तो सिर्फ
एक इंसान होता है। 

-यशवन्त माथुर ©

14 January 2020

ज़िंदगी लगती है जंजीर की तरह.....

बेतरतीब खिंची लकीर की तरह
ज़िंदगी लगती है जंजीर की तरह ।
वक़्त की पैनी धार पर रगड़ते हुए
डरता है दिल भी अब धड़कते हुए ।
है आलम यह कि फासले ये कहने लगे
जो अब तक थे आदम अब बदलने लगे।
मिलता नहीं अब कोई फकीर की तरह
दीवारों पर सब लटके हैं तस्वीर की तरह।

-यशवन्त माथुर ©
14/01/2020 

09 January 2020

वक़्त के कत्लखाने में -17

समय की तीखी
पैनी धार पर चलते हुए
अक्सर यही सोचा करता हूँ
कि क्या होता
अगर मैं
मैं न होता
कोई और होता ?
क्या होता
अगर मेरी ही तरह
मेरे ही जैसा
कोई और होता ?
खैर
अपने इसी अस्तित्व को
स्वीकारते हुए
अंधेरी गलियों में
भटकते हुए
तलाश रहा हूँ
खुद का सच
जो कहीं
दबा हुआ है
वक़्त के कत्लखाने में।

-यशवन्त माथुर ©
09/01/2020

02 January 2020

हम वृद्ध नहीं हैं

भले ही दिखते दीन-हीन
कृशकाय शरीर और तेज विहीन
किसी युवा से कम नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

घर में तन्हा बैठे-लेटे
युग का समृद्ध इतिवृत्त समेटे
जोश तनिक भी कम नहीं है
हम वृद्ध नहीं हैं।

हम बीज भविष्य का वर्तमान में
अस्ताचल से दिन मान में
नई सुबह पर शाम नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

समय की गर्मी से तपकर
कितने ही मीलों को चल कर
पुष्प नहीं तो कंटक भी नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

-यशवन्त माथुर©
22/12/2019 

01 January 2020

ऐसी उम्मीद नए साल पर

जो जीते हैं गुरबत में
आए मुस्कान उनके चेहरों पर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

फसल खूब हो खेतों में
हर किसान की झोली जाए भर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

रहें शांत सीमाएं अपनी
यूं न प्रहरी जाएं मर
ऐसी उम्मीद नए साल पर।

रहे अनुकूल यह धरती अपनी
न ताप बने, न शीत लहर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

सद्भाव बना रहे अपनों का
भाईचारे को न लगे नज़र
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

सूर्य ग्रहण हो-चंद्र ग्रहण हो
लगे ग्रहण न इंटरनेट पर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

नव वर्ष 2020 की अनंत शुभकामनाएं। 

-यशवन्त माथुर


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