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26 February 2013

अनकही बातें

बसंत की
इस खिली धूप की तरह 
बगीचों मे खिले फूलों की तरह
खुली और मंद हवा में
झूमते हुए 
बाहर की दुनिया देखने को बेताब 
मन के भीतर की
अनकही बातें
शैतान बच्चे की तरह
करने लगी हैं जिद्द
शब्दों और अक्षरों के
साँचे में ढल कर
कागज पर उतर जाने को

मेरी पेशानी पर
पड़ रहे हैं बल
दुविधा में
कहाँ से लाऊं
अनगिनत साँचे
और कैसे ढालूँ
बातों को
उनके मनचाहे आकार में
न मेरे पास चाक है
न ही कुम्हार हूँ

बस यूं ही
करता रहता हूँ कोशिश
गढ़ता रहता हूँ  
टेढ़े-मेढ़े
बेडौल आकार
क्योंकि मेरे पास
कला नहीं
रस,छंद और अलंकार की।

©यशवन्त माथुर©

22 February 2013

अनकही बातें

अनकही बातें
खामोश सी बातें
कभी कभी उतावली होती हैं
भीतर से
बाहर आने को
दबी हुई कह जाने को
पर अनकही
अनकही ही रह जाती है
कभी साँसों के उखड़ने की
मजबूरी में
और कभी
इस उम्मीद में
कि
समझने वाले ने
झांक ही लिया होगा
मन के भीतर।
©यशवन्त माथुर©

21 February 2013

अनकही बातें .....

कभी कभी
कुछ बातें
रह जाती हैं
अनकही
अनसुनी
कभी चाहे
कभी अनचाहे
कभी धोखे में
या कभी जान कर
फिर भी
उन बातों को
सुन
समझ लिया जाता है
गूंगी जीभ के स्वाद
और
अंधे को दिखाई देती
हर तस्वीर की तरह।

©यशवन्त माथुर©

14 June 2012

अनकही बातें

कहीं रत जगे हैं 
कहीं अधूरी मुलाकातें हैं  
हवाओं की खामोशी में 
आती जाती सांसें हैं । 

डरता है कुछ कहने से 
मन की अजीब चाहतें हैं 
किसी कोने मे दबी हुई 
अब भी अनकही बातें हैं।

©यशवन्त माथुर©
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