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04 August 2013

अर्थ के अर्थों में..........

अर्थ के अर्थों में, उलझा हुआ है आदमी
निरर्थ होकर अर्थ पर, सोया हुआ है आदमी
जाने किन स्वप्नों में, व्यर्थ खोया हुआ है आदमी
अनर्थ कर रहा अर्थ,अर्थ पर लोटता हुआ आदमी।

[अर्थ->मतलब ,धन और धरती (earth) के संदर्भ में]


 ~यशवन्त माथुर©

29 March 2013

क्षणिका...

बीतता जा रहा है वक़्त
और जारी है ख्याल की तलाश
काश! कि मिल सका तो
कह दूंगा जज़्बात । 
~यशवन्त माथुर©

28 March 2013

क्षणिका

ख्वाब होते हैं अच्छे
हकीकत से
क्योंकि
ख्वाब देते हैं 
सब कुछ
जो दूर होता है
हकीकत की पहुँच से।

~यशवन्त माथुर©

25 March 2013

क्षणिका

अगर
जिंदगी का मैच
फिक्स होता 
हर पल का हिसाब
पता होता
तो तस्वीर का रुख
कुछ दूसरा होता।
~यशवन्त माथुर©

19 March 2013

क्षणिका

काश
इंसान पंछी होता
तो उड़ता रहता
बेपरवाह
सरहदों की फिक्र
किए बिना ।
~यशवन्त माथुर©

17 March 2013

क्षणिका

किताबों के रंगीन
पन्नों के भीतर
छुपी कालिख
सिर्फ स्याही 
मे ही नहीं होती
पन्नों के सुर्ख रंग
कभी कभी
मुखौटा भी
हुआ करते हैं। 
~यशवन्त माथुर©

16 March 2013

क्षणिका

नकल और
अकल की कुश्ती
के साथ
परीक्षाओं के
इस तमाशे में
हार और जीत
नज़रें झुकाए
कर रही हैं याद
बीते दौर को।
 ~यशवन्त माथुर©

15 March 2013

क्षणिका.....

आँख पर पट्टी बांधे
न्याय की मूरत
अकर्मण्यता के
बंद कमरे में
कर रही है आराम
और बाहर
सुनहरा कल (?)
बीन रहा है
टुकड़ा टुकड़ा सपनों को
कूड़े के ढेरों पर!

~यशवन्त माथुर©

14 March 2013

क्षणिका

कभी कभी
बहुत मुश्किल लगती है
कुछ लिखने के लिये
किसी विषय की खोज
फिर भी
निगाहों के चारों ओर
कुछ तो होता ही है
लिखने के लिये।
©यशवन्त माथुर©

12 March 2013

क्षणिका

निर्वात के
इस भ्रम में
परावर्तित होती
मन की तस्वीर
घुप्प अंधेरे में
जब दिखाती है
खुद की परछाई
तो होता है
एहसास
निर्जन में
जन के होने का ।  
©यशवन्त माथुर©

04 March 2013

क्षणिका

कुछ भी तो नहीं यहाँ
फिर भी 
इन सन्नाटों में
मन के
इस निर्जन कोने में
सोते ख्यालों के
खर्राटों की गूंज
कर रही है परेशान
बार बार ।

 ©यशवन्त माथुर©

19 February 2013

सोच रहा हूँ-

सोच रहा हूँ-
वक़्त -बेवक्त दिखने वाली
धूप छांव की
इस मृग मरीचिका में
सुस्ताती हुई
जीवन कस्तूरी
आखिर क्या पाती है
यूं पहेलियाँ बुझाने से ?

©यशवन्त माथुर©

13 February 2013

अब मोमबत्तियाँ नहीं जलेंगी .....

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अब मोमबत्तियाँ नहीं जलेंगी
न ही कुछ लिखा जाएगा
न लोग इकट्ठे होंगे
न लगेंगे मुर्दाबादी नारे
क्योंकि जिंदाबादों की यह बस्ती

आबाद है
अवसरवादी मुखौटों से!


©यशवन्त माथुर©

(इलाहाबाद रेलवे स्टेशन की घटना पर मेरी यह प्रतिक्रिया संजोग अंकल के फेसबुक स्टेटस पर टिप्पणी में है।)  

08 February 2013

क्षणिका....

थोड़ा ख्वाब
थोड़ी हकीकत
जिंदगी जो भी है
ज़िंदगी ही है!

©यशवन्त माथुर©

04 February 2013

क्षणिका.......

सड़क सिर्फ
सड़क ही नहीं
सड़क
सिर्फ एक रास्ता ही नहीं
कभी कभी सड़क
मंज़िल भी होती है
जहां से शुरू होती है
वहीं पर खत्म होती है।  

©यशवन्त माथुर©

31 January 2013

क्षणिका

जब कभी देखता हूँ
शब्दों के आईने में
अपना अक्स ...
तो बच नहीं पाता हूँ
खुद के बिखरे होने के
एहसास से।
 
©यशवन्त माथुर©

28 January 2013

बदतमीज़ सपने

बदतमीज़ सपने 
रोज़ रात को 
चले आते हैं 
सीना तान कर 
और सुबह होते ही 
निकल लेते हैं 
मूंह चिढ़ा कर 
क्योंकि 
बंद मुट्ठी का 
छोटा सा कमरा 
कमतर है 
बड़े सपनों की 
हैसियत के सामने।
  
©यशवन्त माथुर©
 

20 January 2013

पूर्वाग्रही हूँ......

चाहता तो हूँ
कि बचा रहूँ
पूर्वाग्रह के
संक्रामक रोग से
मगर 
इसकी सार्वभौमिकता
अक्सर अपनी चपेट में लेकर
लगवा ही देती है मुझ पर
पूर्वाग्रही का ठप्पा ।

©यशवन्त माथुर©

16 January 2013

सपने

सपने
ईश्वर का वरदान हैंमानव को
क्योंकि सपने
भूत की प्रेरणा से
वर्तमान मे
आधार बुनते हैं
सुनहरे भविष्य का।

©यशवन्त माथुर©

10 January 2013

कौन जानता है ?

भावनाओं के धधकते
ज्वालामुखी से निकलता
एहसासों का धुआँ
सिर्फ एक पूर्वानुमान है।
उसके भीतर दबे
शब्दों का लावा
अपनी जद में
समेटेगा
किन विधाओं को ...
कौन जानता है ?
©यशवन्त माथुर©
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