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06 February 2020

सैनिक

हम सोचते हैं
सैनिक
सिर्फ सैनिक होता है
जिसका काम
सिर्फ मारना और मरना होता है
अपने देश पर
मिटना होता है
लेकिन
हम नहीं सोचते
कि सैनिक भी
इंसान होता है
हमारी-तुम्हारी तरह
उसके भीतर भी
प्राण होता है
उसका भी
अपना एक परिवार होता है
जो निर्भर करता है
उसकी सकुशलता पर
उसकी वीरता पर
उसके कर्तव्य
और धीरता पर।
सैनिक!
सबका विश्वास, आश्वासन
और गर्व होता है
क्योंकि वह
सिर्फ सैनिक नहीं
एक संकल्प होता है।

-यशवन्त माथुर ©
08/01/2020

04 February 2020

यायावर हैं हम...

मौन समय की राहों में
हैं थोड़ी खुशियाँ, थोड़े गम
यायावर हैं हम।

इन राहों में थोड़ी मस्ती है
इन  राहों में अपनी हस्ती है।
एक शांत सरल सी रेखा पर
इंसानों की अपनी बस्ती है।

है पूर्व यही-पश्चिम यही
उत्तर-दक्षिण का न कोई भ्रम
यायावर हैं हम।

हमने बस चलना सीखा है
वर्तमान में ढलना सीखा है।
और भविष्य के खातों में
स्वप्नों को लिखना सीखा है।

ऊबड़-खाबड़ इसी आज में
चुभते काँटे थोड़े कम
यायावर हैं हम।

-यशवन्त माथुर ©
04/02/2020

02 February 2020

सैनिक

न हिन्दू होता है
न मुसलमान होता है
सैनिक तो सिर्फ
एक इंसान होता है।

इंसान , जिसकी रगों में
स्वाभिमान बसता है
गोलियां खाता है
फिर भी वो हंसता है।

उसका करम ही
उसकी पहचान होता है
शक्ल कोई भी हो
नाम हिंदुस्तान होता है।

सीना तान, सीमा पर
उसकी चहलकदमियों से
पिघल जाती है बर्फ भी
बूटों की गर्मियों से।

सारे जहां से अच्छा
एक वीर जवान होता है
सैनिक तो सिर्फ
एक इंसान होता है। 

-यशवन्त माथुर ©

14 January 2020

ज़िंदगी लगती है जंजीर की तरह.....

बेतरतीब खिंची लकीर की तरह
ज़िंदगी लगती है जंजीर की तरह ।
वक़्त की पैनी धार पर रगड़ते हुए
डरता है दिल भी अब धड़कते हुए ।
है आलम यह कि फासले ये कहने लगे
जो अब तक थे आदम अब बदलने लगे।
मिलता नहीं अब कोई फकीर की तरह
दीवारों पर सब लटके हैं तस्वीर की तरह।

-यशवन्त माथुर ©
14/01/2020 

09 January 2020

वक़्त के कत्लखाने में -17

समय की तीखी
पैनी धार पर चलते हुए
अक्सर यही सोचा करता हूँ
कि क्या होता
अगर मैं
मैं न होता
कोई और होता ?
क्या होता
अगर मेरी ही तरह
मेरे ही जैसा
कोई और होता ?
खैर
अपने इसी अस्तित्व को
स्वीकारते हुए
अंधेरी गलियों में
भटकते हुए
तलाश रहा हूँ
खुद का सच
जो कहीं
दबा हुआ है
वक़्त के कत्लखाने में।

-यशवन्त माथुर ©
09/01/2020

02 January 2020

हम वृद्ध नहीं हैं

भले ही दिखते दीन-हीन
कृशकाय शरीर और तेज विहीन
किसी युवा से कम नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

घर में तन्हा बैठे-लेटे
युग का समृद्ध इतिवृत्त समेटे
जोश तनिक भी कम नहीं है
हम वृद्ध नहीं हैं।

हम बीज भविष्य का वर्तमान में
अस्ताचल से दिन मान में
नई सुबह पर शाम नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

समय की गर्मी से तपकर
कितने ही मीलों को चल कर
पुष्प नहीं तो कंटक भी नहीं हैं
हम वृद्ध नहीं हैं।

-यशवन्त माथुर©
22/12/2019 

01 January 2020

ऐसी उम्मीद नए साल पर

जो जीते हैं गुरबत में
आए मुस्कान उनके चेहरों पर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

फसल खूब हो खेतों में
हर किसान की झोली जाए भर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

रहें शांत सीमाएं अपनी
यूं न प्रहरी जाएं मर
ऐसी उम्मीद नए साल पर।

रहे अनुकूल यह धरती अपनी
न ताप बने, न शीत लहर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

सद्भाव बना रहे अपनों का
भाईचारे को न लगे नज़र
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

सूर्य ग्रहण हो-चंद्र ग्रहण हो
लगे ग्रहण न इंटरनेट पर
ऐसी  उम्मीद नए साल पर।

नव वर्ष 2020 की अनंत शुभकामनाएं। 

-यशवन्त माथुर


17 December 2019

बहुत देर हो जाएगी .. ..

ठुकराने के बाद, मुझे 
जब करोगे पाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी । 

उजड़ जाने के बाद, महफ़िल 
जब करोगे सजाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी । 

ये वक़्त थोड़ा सा  ही है, समझ लो
जब करोगे वापस लाने की कोशिश 
बहुत देर हो जाएगी ।  

-यशवन्त माथुर 
17-12-2019 

04 December 2019

क्योंकि वो एक देवी है .. ..

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए सीमित कर दी गई है 
उसकी भक्ति 
मंदिरों के भीतर 
जहाँ 
गाई जाती है आरती 
बजाई जाती हैं भेंटें 
बोले जाते हैं 
मंत्र और श्लोक। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
उसके पाठ 
पढ़ाए जाते हैं 
किताबों में 
ग्रंथों में 
टंकित शब्दों में। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
शक्ति है 
भक्ति है 
लेकिन 
गौण है 
उसका मानवीय अस्तित्व। 

वो कैद थी 
और कैद है 
आधुनिकता की 
हदों के भीतर 
जहाँ 
हमने न तो जाना 
न ही जानना चाहते हैं 
कि वो 
कुछ और भी है 
अपने दैहिक स्वरूप और 
आकर्षण के ऊपर;

कि उसके भीतर भी 
रचता-बसता है 
एक मानव 
हमारी-तुम्हारी ही तरह। 

क्योंकि वो एक देवी है 
इसलिए 
हमारे लिए 
उसका सिद्धि रूप 
पूजनीय है 
सिर्फ नवरात्रों में 
अन्यथा 
वह कुछ भी नहीं 
सफेदी की 
कई परतों के भीतर छुपी 
हमारे मन की 
कालिख के ऊपर। 

-यशवन्त माथुर ©
04/12/2019

26 November 2019

फिर भी चलते जाने को............

होती शुरू कहीं से धारा
कहीं मिल कर खो जाने को
कितने ही पड़ाव सहेजती
भविष्य से कह कर जाने को।

उठती-गिरती दर्द को सहती
पथ को अपने चलती रहती
जब तक मिल न जाती उसको
कोई मंजिल तर  जाने को।

ऐसी ही एक धारा बन कर
काश! कि मैं भी चलता जाता
राहों की कुछ सुनता जाता
और कुछ अपनी कहता जाता।

लेकिन जाने क्यूँ अब मुझको
मेरा मैं विद्रोही लगता
माना मनाता समय ये मुझको
मैं तब भी विपरीत ही चलता।

संघर्ष ही है सच्चा साया
समय पर साथ निभाने को
भले ही काँटे बिछे राह में
फिर भी चलते जाने को।

-यशवन्त माथुर© 
26/11/2019 


22 November 2019

अंत की प्रतीक्षा में.......

एक समय
आता है
एक समय
जाता है
अपने भीतर
बहुत से
दर्द समेटे
खुशियां समेटे
क्षणिक सुखों के
कुछ सूक्ष्म
पलों के बाद
दुनियावी मेला
छँट सा जाता है
और हम में  से
हर कोई
नये आरंभ की
प्रत्याशा में
गिनता रहता है
आती-जाती साँसें
अपने अंत की
प्रतीक्षा में।

-यश ©
22/11/2019

08 November 2019

जल ही जीवन है.......

जल ही जन है
जल ही मन है
.
जल ही जीवन है।
.
जल जल कर
जलता मानव
जल जल कर ही
बनता दानव ।
.
जलते जलते यूं ही चल कर
थक कर कहीं रुकता मानव ।
.
जल ही कर्ता
जल ही धर्ता
मीनों के हर
दु:ख का हर्ता।
.
जल ही अर्पण
जल ही प्रण है
.
जल ही जीवन है।

-यशवन्त माथुर ©
08/11/2019

24 October 2019

दो दो आसमां .......

एक ये भी ....... है
एक वो भी आसमां है। 
.
ये ज़मीं से ऊपर है
वो सितारों से नीचे है।
.
एक आसमां
सिरहाने तकिये के
कहीं चैन की नींद सोता है
एक आसमां
किसी चौराहे पर
सरेआम रोता है। 
.
एक आसमां
मन की रारों का है
या नदी के किनारों का है
एक आसमां
सरहदों पर लगे
कँटीले तारों का है।
.
एक आसमां
थोड़ा तुम्हारा है 
थोड़ा हमारा है
एक आसमां में सिर्फ
फिज़ाओं  का बँटवारा है।
.
-यश ©
20/10/2019 


20 October 2019

कुछ कह न सका.....

अफसोस ये कि दिल से कुछ कह न सका,
अफसोस ये कि दिल की कुछ सुन न सका।
यूँ तो राही बनके आया था इस जहां में मगर,
कदम कमज़ोर ये ही थे कि ठीक से चल न सका।
.
-यश©
17/10/2019

08 October 2019

दशहरा मना कर क्या होगा ?

मर न सका जो रावण मन का
पुतले जला कर क्या होगा ?
अज्ञानी थे,अज्ञानी हैं हम
दशहरा मना कर क्या होगा ?

मन के भीतर अंधकार हमारे
मर रहे संस्कार हमारे
केवल कागज़ी सिद्धांतों का
नारा लगाने से क्या होगा ?

एक रंग का लहू है भीतर
तलवार चलाने से क्या होगा?
बन न सके जो इंसान अभी तक
दशहरा मना कर क्या होगा ?

-यश ©
06/10/2019

02 October 2019

रीत युग की बदल रही

श्रद्धा के दो फूल चढ़ाऊँ 
कैसे तुम्हारी समाधि पर? 
रीत युग की बदल रही 
अब खुद की बर्बादी पर। 

सोचता हूँ तुम जहाँ भी होगे 
परिवर्तन को तो देखते होगे 
इन्हीं दिनों के लिए दी कुर्बानी 
तुमने देश की आज़ादी पर ?

नोटों पर छप कर क्या होगा 
आदर्शों की नीलामी पर ?
'हे राम'! ही मालिक अहिंसा के 
सूने चरखे,खादी पर!

-यश ©
01/10/2019 

19 September 2019

उम्मीदें और हम ......

हमारा आज
हमारा कल
हमारा हर पल
चलता है
तो सिर्फ
उन उम्मीदों के साथ
जो
समय का हाथ थाम कर
सिर्फ बढ़ती ही जाती हैं
मृगतृष्णा में
धकेलती ही जाती हैं
और हम
बस उन उम्मीदों के
पूरा होने की चाहत लिए
धँसते ही जाते हैं
फँसते ही जाते हैं
एक अजीब से भंवर में
जहाँ रोशनी नहीं
सिर्फ अंधेरा है
गहरा अंधेरा
दूर-दूर तक
किसी लकीर के
नामो-निशां के बिना
हमें
बस उतरना ही होता है
उठना नहीं,
क्योंकि
हमारा गिरना
द्योतक होता है
उम्मीदों के टूट कर
बिखरते जाने का।

-यश©
19/09/2019  

15 September 2019

कुछ लोग-46

कुछ लोग 
नहीं चाहते बंधना 
नियमों के 
असीम जाल में 
नहीं चाहते 
फंसना 
क्योंकि 
उनका दायरा 
संकुचित होता है 
चारदीवारी के भीतर 
खुद की 
खुशियों तक 
सीमित होता है। 

कुछ लोग 
नहीं चाहते हैं 
टोका जाना 
रोका जाना 
उनको भाता है 
अतिक्रमण....
लांघ कर 
दूसरों की सीमाएँ
चलते जाना।

और जब 
आता है 
ठहराव का 
अंतिम 
अनचाहा पड़ाव 
तब चाह कर भी 
कुछ लोग 
बंध नहीं पाते 
क्योंकि 
अवश्यंभावी होता है 
एक ही 
नीरस चलचित्र का 
बोझिल सा अन्त। 

-यशवन्त माथुर©
15/09/2019
 

08 September 2019

वो बादल भी बरसेंगे........

ये न सोचते कि वही होना है,
जो लिखा के लाए हैं लकीरों पर ।
नयी तकदीरों की झलक दिखती,
गर बदलती तसवीरों पर।
यूं रंग बदले हैं, कई रंग आगे भी बदलेंगे,
अब तक थे जो गरजे, वो बादल भी बरसेंगे।
बस एक इत्तेफाक की उम्मीदों में चराग बुझ जाते हैं
पल गुजरते जाते हैं ,चेहरे बदलते जाते हैं।

-यशवन्त माथुर  ©

06 September 2019

न जाने कौन से एहसानों में........?

वो....
बेसब्री से गिन रहे हैं दिन
मेरी तेरहवीं के इंतजार में
शायद आता है उनको मज़ा
मौत के ही व्यापार में।

हदें अपनी भूल कर
खुद हदों की उम्मीदों में
बेहयाई का ये आलम है
लकीरों के फकीरों में।

है ऐलान यह कि सब अच्छे हैं 
उनके ही गुलिस्तानो में
ना-माकूल समझ बैठे हैं (मुझको)
न जाने कौन से एहसानों में?

-यश ©
05092019
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