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04 May 2017

वह सामने होगा या नहीं।

अजीबो गरीब से
खयालातों में डूबा हुआ
नये हालातों में
कहीं खोया हुआ
गिन रहा हूँ दिन
जिंदगी के
कि जो आज है
वह कल होगा या नहीं
कल आज से बेहतर
या बदतर होगा कि नहीं
पर मैं
उलझन में  नहीं
निश्चिंत हूँ
मौन हूँ
सिर्फ यह देखने के लिए
जो मेरे मन में है
वह सामने होगा या नहीं।
.
~यश ©

25 March 2016

बस यूं ही

बस
यूं ही कभी
चलते चलते
थोड़ा रुक कर
सुस्ता कर
एक पड़ाव से
दूसरे पड़ाव की ओर
कंटीले गति अवरोधकों को
लांघ कर
जिंदगी का सफर
जब पहुंचता है
अपने अंत की ओर
तब रह जाता है
सिर्फ घूर घूर कर
देखना
दीये की
लड़खड़ाती -टिमटिमाती
बुझने को बेचैन
लौ की छटपटाहट।

~यशवन्त यश©

14 January 2016

सच है कि ज़माना बदल जाता है

सूरज
जो कभी पहाड़ों
और पेड़ों की ओट से निकलता था
अब ऊंची मीनारों
और मकानों की छतों निकल कर
इतराता है
सच है कि ज़माना बदल जाता है ।
~यशवन्त यश©

02 December 2015

तस्वीरें

रंग बिरंगी
उजली काली
तस्वीरें
इंसानी चेहरों की तरह
होती हैं
जिनके सामने कुछ
और पीछे
कुछ और कहानी होती है।
कुछ
झूठ की बुनियाद पर खड़ी
और कुछ
वास्तविकता की तरह
अड़ी होती हैं।
रंग बिरंगी
उजली काली
तस्वीरें
किसी दीवार पर
सिर्फ टंगी ही नहीं होतीं
इनकी
आड़ी तिरछी रेखाओं में
कहीं फांसी पर झूल रहा होता है
अर्ध सत्य।

~यशवन्त यश©

01 December 2015

सब

सबको हक है
सबके बारे में
धारणा बनाने का ......
सबको हक है
अपने हिसाब से
चलने का .........
सबकी मंज़िलें
अलग अलग होती हैं
कुछ थोड़ी पास
कुछ बहुत दूर होती हैं .....
सब,
जो सबकी परवाह करते हैं
सबसे अलग नहीं होते हैं
लेकिन सब,
जो सब से अलग होते हैं
धारा के विपरीत चलते हैं
और संघर्षों से
सफल होते हैं।

~यशवन्त यश©

18 November 2015

नकल और अकल ......

नकल और अकल
आज के जमाने में
दुश्मन नहीं
दोस्त हैं ....
इनके बीच
हो चुका है
कोई गुप्त समझौता
तभी तो
इधर देखने वाले
झाँकते तो उधर भी हैं
फिर भी
बैठे हैं चुप .....
क्योंकि उन्हें पता है
मुँह खोलते ही
गिर सकता है वज्र
उनके घर की छत पर।

~यशवन्त यश ©

12 November 2015

जले बारूद की गंध ........

हर तरफ फैली
पटाखों के
जले बारूद की गंध
ऐसी लग रही है
जैसे
साफ हवा की लाश
सड़ रही हो
यहीं
कहीं आस पास।

~यशवन्त यश©

10 November 2015

उम्मीदें....

न जाने किस नशे में
कभी कभी
लड़खड़ा जाते हैं कदम
न जाने किन उम्मीदों में
कभी कभी
बढ़ते जाते हैं कदम
जो भी हो
ये उम्मीदें
कभी उत्साह देती हैं
कभी तनाव देती हैं
फिर भी
नहीं छोड़ती हैं साथ
हर पल कर कहीं।


~यशवन्त यश©

08 November 2015

बस यूं ही .....

बस यूं ही
देखता हूँ
सड़कों पर
आते जाते
चलते फिरते
दौड़ते लोगों को
जिनमें
कोई फुर्ती से
कोई सुस्ती से
बढ़ रहा होता है
अपनी मंज़िल की ओर
कोई मुस्कुराता हुआ
कोई उदास सा
ज़िंदगी के सबक
सीखता हुआ
अपनी अपनी तरह से
कुछ समझता हुआ
आसमान को
छूने की चाहत में  
हर कोई
उठना चाहता है
बहुत ऊपर
लेकिन बस यूं ही
बंद आँखों के भीतर
महसूस करता है
खुद को बहुत नीचा
और
सच के करीब।

~यशवन्त यश©

04 November 2015

चलताऊ शब्द .....

इन चलताऊ
शब्दों को
कोई कविता समझता है
कोई कहानी
कोई बस यूं ही
एक नज़र डालता है
और चल देता है
अपनी राह
लेकिन मैं
इन बेकार से
बिना मतलब के
फटीचर से शब्दों से
संतुष्ट करता हूँ खुद को
हमेशा से।

~यशवन्त यश©

03 November 2015

समझ नहीं आता है

कभी कभी
मन कहता कुछ
करता कुछ है
सोचता कुछ
लिखता कुछ है
कुछ कुछ करता हुआ
मन के साथ
समय बीत जाता है
और इस बीच क्या होता है
समझ नहीं आता है।

~यशवन्त यश©

21 September 2015

बस यूं ही.......

न यहाँ ज्ञान है
न विज्ञान है
न साहित्य है
न कविता है
न कहानी है
न कोई विधा है
यहाँ तो बस
कुछ बातें हैं
जो मन में आती हैं
और लिख जाती हैं
दर्ज़ हो जाती हैं
डायरी की तरह
हर आने वाले कल
अपनी याद दिलाने के लिए
यूं ही पलटते हुए
अनकहे ही
कुछ कह जाने के लिए ।

~यशवन्त यश©

10 July 2015

यूं ही भटकते भटकते......

बेतरतीब
भटकते भटकते
चलते चलते
इन गलियों में
थक हार कर
बैठ कर
कुछ सोच कर
उठ कर
चल कर
मंज़िल के 
करीब आने तक 
पता नहीं क्यों 
फिर गुम हो जाता हूँ
एक नयी
भूलभुलैया में  ।


~यशवन्त यश©

08 June 2015

बस यूं ही

बस यूं ही
लिख देता हूँ
कभी कभी
मन में आती
कुछ बातों को
दे देता हूँ
अपने शब्द 
अपने भाव
अपनी संतुष्टि के लिए
अपने अहं
गुस्से और खुशी को
कर देता हूँ ज़ाहिर
कभी कागज़ के
किसी पन्ने पर
कभी साझा कर लेता हूँ
की बोर्ड के खटराग से
अंतर्जाल की
आभासी असीम दुनिया में
सबकी पसंद -नापसंद से 
बेशक
बेपरवाह हो कर
अपनी ही धुन में
अपनी ही राह पर
अकेला चल देता हूँ
बस यूं ही
कभी कभी
कुछ लिख देता हूँ।

~यशवन्त यश©

04 June 2015

मन के साथ चलता हूँ ..........

बस यूं ही
मन के साथ चलता हूँ
कहता हूँ
कुछ बाहर की
कुछ भीतर की
यहाँ वहाँ की
देख कर-सुनकर
खुद से चुगली करता हूँ
आईने में
निहार निहार कर
आँखों के काले धब्बे
झाइयाँ  और बेजान
रूखी त्वचा
उम्र के अंत पर भी
अनंत उमंगों का
खाली झोला लटकाए
टकटकी लगाए
कहीं कोने में बैठा हुआ
बंद पलकों के पर्दे पर
आते जाते लोगों को देखता हुआ
बस यूं ही
वक़्त के हमकदम होता हूँ 
मन के साथ चलता हूँ ।

~यशवन्त यश©

27 April 2015

यूं ही जीता चलता हूँ

यहीं कहीं
कभी कभी
मन के
एक कोने मे
छुप कर
जी भर
बातें करता हूँ
खुद से ही
अनकही को
कहता हूँ
अंधेरों से भरे
सुनसान रस्तों पर
डरता हूँ
मगर चलता हूँ
हताशा-निराशा के पलों में
झुरमुटों की ओट से
किसी रोशनी की
तमन्ना
और उम्मीद लिये
अपने मन की
सुनता चलता हूँ
यूं ही जीता चलता हूँ। 

~यशवन्त यश©

20 March 2015

वैसा ही हूँ

शून्य से चलकर
शून्य पर पहुँच कर
शून्य मे उलझ कर
शून्य सा ही हूँ

जैसा था पहले
वैसा ही हूँ ।

देखता हूँ सपने
सुनहरी राहों के नींद में
हर सुबह को काँटों पर
चलता ही हूँ

जैसा था पहले
वैसा ही हूँ ।

जो मन में आता है
उसे यहीं पर लिख कर
कुछ अपने ख्यालों में
जीता ही हूँ

जैसा था पहले
वैसा ही हूँ ।
 
~यशवन्त यश©

15 March 2015

बहुत आसान लगता है ........

बहुत आसान लगता है
किसी लिखे हुए को पढ़ना
किसी के लिखे हुए को
अपना नाम देना
लेकिन
बहुत कठिन होता है
उस लिखे को समझना
आत्मसात करना
और उस जैसा ही
लिखने की
कोशिशें करना
जो अधिकतर असफल
और कभी
सफल भी हो जाती हैं
फिर भी
लाख चाहने के बाद भी
नहीं आ पाता
मौलिकता का
वह तत्व
जो होता है
आत्मा की तरह 
किसी की भी लेखनी का
अभिव्यक्ति का 
इसलिए
बेहतर यही है
कि मैं
वह लिखूँ
जो पूरी तरह
सिर्फ मेरा हो
मेरे लिये
आवाज़ हो
मेरे अन्तर्मन की
मेरे ही शब्दों में
हमेशा की तरह। 
 
~यशवन्त यश©

19 February 2015

नहीं कहना कुछ भी किसी से

यूं तो हैं यहाँ
बहुत से किस्से
सुनने सुनाने को बहुत से
सुनूँ क्या
और क्या कहूँ किससे ....?

नहीं दिखता यहाँ
कोई अपना सा
कुछ समझता सा
राह दिखाता सा
बस 
खुद की परछाई से
अक्सर बातें करता सा....

मन की आज़ादी को
बांटते हुए खुद से
मुझे नहीं कहना
कुछ भी किसी से।

~यशवन्त यश©

07 March 2014

गहराती रात के सूनेपन में .......

गहराती रात के सूनेपन में
सरसराती आ रही है
एक आवाज़
कि कहीं से
झुरमुटों की ओट से
या किसी और छोर से 
जैसे
कोई पुकार रहा हो
किसी को;
कभी के भूले भटके को....
पर ना मालूम
सोते ख्यालों की इस भीड़ में
सुन रहा है कौन
किसकी आवाज़ ....
चाहता है कौन
किसका साथ
गहराती रात के सूनेपन में
अक्सर मिल जाते हैं
सुकून के
दो चार पल
जब हो जाती है मुलाक़ात
आसमान से बरसती
चाँदनी से या
चमकते तारों से
फिर आज....
अचानक यह आवाज़
जो है तो अपरिचित
फिर भी
न जाने क्यों
परिचित सी लगती है
हर बार
भटकता है
मन के भीतर का मन
पहचानने को
वह आवाज़ है ...
या कोई साज़
गहराती रात के सूनेपन में। 

~यशवन्त यश©
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