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24 February 2014

ई वोटिंग आज की आवश्यकता

आज के समाचार पत्र में जब यह खबर (देखें चित्र लाल-पीले घेरे में) पढ़ी तो 2 वर्ष पूर्व लिखा अपना एक आलेख याद आ गया।


राज्य सभा सांसद राजीव चंद्रशेखर जी द्वारा चलाई जा रही इस मुहिम को व्यापक समर्थन की आवश्यकता है। 


उन्नत तकनीक के इस दौर में अब समय आ गया है कि वोटिंग के इस विकल्प पर भी चुनाव आयोग और सरकार को गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए जिससे वोटिंग प्रतिशत निश्चित रूप से बढ़ेगा।  
 
आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि यह आलेख 19 फरवरी 2011 को 'हिंदुस्तान' दिल्ली के तत्कालीन संपादक आदरणीय प्रमोद जोशी जी ने अपने ब्लॉग पर विशेष टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया था।  

यहाँ क्लिक करके प्रस्तुत आलेख प्रमोद जोशी जी के ब्लॉग पर भी पढ़ा जा सकता है।  
 
चुनाव आयोग को एक सुझाव
यशवंत माथुर
________________

अभी 17 फरवरी 2011 के ‘हिन्दुस्तान’ में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित नवीन जिंदल जी के आलेख को पढ़ कर मेरे मन भी एक विचार आया जो मैं आप सब के साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ.
ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत 8 करोड इंटरनेट कनेक्शंस के साथ विश्व में इंटरनेट का सर्वाधिक इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में चौथे नम्बर पर है.यह तो वो आँकडा है कि इतने लोगों के पास भारत में इंटरनेट कनेक्शंस हैं जबकि इंटरनेट प्रयोग करने वाले वास्तव में इससे कहीं ज्यादा हैं.
मेरा सुझाव है कि चुनावों की प्रक्रिया ऑनलाइन भी होनी चाहिए(अर्थात जनता के पास परम्परागत व ऑनलाइन दोनों ही विकल्पों से वोट देने का विकल्प होना चाहिए,इस हेतु दो तरह की मतदाता सूची रखनी होगी एक ऑनलाइन वोटर्स की और दूसरी पोलिंग बूथ पर जाकर वोट देने वालों की).
मेरे पास इसका पूरा खाका तैयार है.इस प्रक्रिया में हम उपलब्ध तकनीकी का ही सहारा लेकर और न्यूनतम खर्च में मितव्ययिता पूर्ण और सुरक्षित चुनाव प्रक्रिया अपना सकते हैं.आइये एक नज़र डालें मेरे बनाए खाके पर-
  • सबसे पहले चुनाव आयोग देश के सभी नागरिकों को इंटरनेट द्वारा ऑनलाइन वोटिंग करने का विकल्प उपलब्ध कराये.
  • चुनाव आयोग की वेब साईट पर ऑनलाइन मतदान के इच्छुक वोटर्स हेतु रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया आरम्भ हो.
  • इस ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन फॉर्म में इच्छुक मतदाता अपना वोटर आई डी कार्ड नम्बर,मोबाइल नम्बर और ई मेल पता भरेगा.
  • रजिस्ट्रेशन हेतु मतदाता के आवेदन की सूचना इसके मोबाइल एवं मेल पर दी जायेगी.
  • रजिस्ट्रेशन की समय सीमा के उपरान्त प्राप्त आवेदनों को रजिस्ट्रेशन नम्बर आवंटित किया जाएगा जिसे मतदान के समय वोटर आयोग की साईट पर यूजर आई डी के रूप में भी प्रयोग कर सकेगा.
  • आयोग की साईट पर ऑनलाइन वोटिंग हेतु रजिस्टर्ड मतदाताओं का नाम सम्बंधित विधान सभा एवं लोक सभा क्षेत्र की भौतिक मतदाता सूची से हटा दिया जाए.और उनका नाम पृथक से ऑनलाइन वोटर्स की मतदाता सूची में सम्मिलित कर लिया जाए.और इसकी सूचना सम्बंधित वोटर्स को भी दे दी  जाए.

यहाँ आरंभिक प्रक्रिया पूर्ण हो जायेगी.


 मतदान की प्रक्रिया
अब जब भी चुनाव हों या जिस दिन जहाँ वोट पड़ना हो;वोट डालने हेतु साईट पर आते ही मतदाता अपना ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नम्बर एंटर करेगा और सबमिट करते ही उसके मोबाइल अथवा मेल पर एक पासवर्ड भेज दिया जाएगा जिसे डालते ही उसके सामने स्क्रीन पर मतपत्र आ जायेगा और अपनी पसंद के उम्मीदवार के नाम पर क्लिक करके सबमिट करते ही मतदान प्रक्रिया भी पूर्ण हो जायेगी.

मेरा इस ब्लॉग के माध्यम से सुझाव है कि हमारे चुनाव आयोग को दोहरी मतदान  प्रक्रिया पर भी विचार करना चाहिए.

आइये एक नज़र डालें इससे होने वाले लाभों पर भी.-
1.      वे सभी लोग किसी भी वजह से पोलिंग बूथ पर जाने में असमर्थ हैं और कम्प्युटर का ज्ञान रखते हैं वोट डाल पायेंगे.
2.      बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा.
3.      कागज की बचत होगी.
4.      इस प्रक्रिया में मानव श्रम भी बचेगा.
5.      यात्रा कर रहे या अपने शहर से बाहर रह रहे मतदाता जिनका अपने नए शहर की भौतिक मतदाता सूची नाम नहीं है वे भी अपना वोट डाल सकेंगे.
6.      गोपनीयतापूर्ण एवं विश्वसनीय मतदान की पूर्ण संभावना उपस्थित रहेगी.

ऑनलाइन मतदान की इस प्रक्रिया अपनाने में किसी भी तरह की नयी तकनीकी की आवश्यकता संभवतः नहीं होगी और यह प्रक्रिया सरल भी होगी.

यदि आने वाले दिनों में इस प्रक्रिया को अपनाया जाता है तो संभवतः हमारा देश विश्व का पहला देश होगा जहाँ इतनी सरल व सुगम मतदान प्रक्रिया लागू होगी.


~यशवन्त यश©

27 April 2013

भारत रत्न-चिराग जुयाल --क्या मेरी मांग गलत है ?

कल 26 अप्रैल  के 'हिंदुस्तान' मे यह समाचार पढ़ा-


(इस इमेज पर क्लिक कर के स्पष्ट पढ़ सकते हैं )

 ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी देहरादून मे इंजीनियरिंग के छात्र  चिराग जुयाल  के आविष्कार के बारे मे पढ़ कर बस यही मन मे आया की यही है सच्चा भारत रत्न। अगर इस समाचार को आप ध्यान से पढ़ेंगे तो बस यही दुआ निकलेगी कि हमारी सरकार चिराग को हर संभव मदद और प्रोत्साहन दे क्योंकि यदि इनको अपनी परियोजना मे सफलता मिलती है तो यह तेज़ी से फ़ेल रहे आतंकवाद को नियंत्रित करने,सम्पूर्ण मानवता और विश्व शांति की दिशा में  एक क्रांतिकारी खोज साबित होगी।

हम सचिन तेंदुलकर और अन्य लोगों को भारत रत्न देने की मांग कर सकते हैं तो क्यों न चिराग की सफलता के लिए दुआ करें। कम से कम मेरी नज़र में तो चिराग की अहमियत बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है।

तो अब आप ही बताइये चिराग को भारत रत्न देने की मेरी मांग क्या गलत है ? 


~यशवन्त माथुर

14 September 2012

लेटर टू अ बेस्ट फ्रेंड

माय डियर इंग्लिश ,

कोङ्ग्रेट्स फॉर योर ग्रेंड सक्सेस इन माय कंट्री। आई डोंट नो सो मच अबाउट यू एंड योर ग्रामर बट टुडे आय एम सेलिब्रेटिंग माय डे जस्ट लाइक अ बर्थ डे ईवन कोमन मैन ऑफ माय कंट्री लव्स मी सिंस द बिगनिंग ऑफ द भारतीय कल्चर। 

नाऊ डेज़ यू आर मोस्ट कॉमन इन इंडिया;नोट इन भारत । भारतीय पीपुल वांट्स टू स्पीक यू ,दे लाइक टू जॉइन स्पीकिंग क्लासेस एंड ऑल बट देयर रूट्स काँट चेंज देम । भारतीय पीपुल वांट्स  टू बी नॉन एज़ इंडियन एंड माय ईजिनेस इनसिस्ट देम टू स्टैंड एज़ अ भारतीय। 

आई नो यू वांट टू किक आऊट  मी फ़्रोम माय ऑन हाउस ;योर अटेंप्ट्स आर नोट फुल्ली सक्सीडेड येट एंड ट्रस्ट मी इट्स माय हाउस फोरेवर। 

एनी वे आय हेव नो प्रॉबलम लिविंग विद यू :) माय केक इज़ वेटिंग फॉर मी ऑन द टेबल फॉर फिफ़्टीन मोर डेज़ टिल देन यू ओलसो इनवाईटेड टू फिनिश इट। 

जॉइन मी एंड एंजॉय द नेशनल हिन्दी डे /वीक / फोर्टनाइट :)

ब बाय। 
हैव अ गुड टाइम।  


©यशवन्त माथुर©

02 June 2012

आपका साथ और ये 2 वर्ष ..........

जून का दूसरा दिन और दो साल पूरे करने के बाद यह ब्लॉग अब अपने 3 रे वर्ष मे प्रवेश कर रहा है। 2010-11 की तुलना मे 2011-12 काफी कुछ सिखाने और दिखाने वाला रहा। ब्लॉग के बारे मे तकनीकी जानकारी मे वृद्धि हुई;और सब से बड़ी बात यह कि बहुत से अच्छे दोस्त मिले ,कुछ लोगों से मिलने का मौका भी मिला और कुछ लोगों से फोन पर भी संपर्क हुआ जो अब तक कायम है। हाँ इस दौर मे कुछ दोस्तों से दोस्ती टूटी भी ,जो भ्रम थे उन पर से पर्दा भी हटा और ब्लोगिंग के साथ चल रहे कुछ लोगों के गोरख धंधों का भी पता चला।

फिलहाल मेरे पास ज़्यादा कुछ कहने को नहीं सिवाय इसके कि आप सभी पाठकों के असीम स्नेह के लिए तहे दिल से आभारी हूँ और आशा करता हूँ कि आगे भी आपका स्नेह इसी प्रकार बना रहेगा।

प्रस्तुत है मेरी एक पुरानी कविता जो पहले भी इस ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी है--


नए दौर की ओर


शुरू हो गया
फिर एक नया दौर
कुछ आशाओं का
महत्वाकांक्षाओं का
कुछ पाने का
कुछ खोने का
नीचे गिरने का
उठ कर संभलने  का
उसी राह पर
एक नयी चाल चलने का

ये नया दौर
क्या गुल खिलायेगा
कितने सपने
सच कर दिखाएगा
दिल के बुझे चरागों को
क्या नयी रोशनी दिखाएगा

नहीं पता.

नहीं पता -
क्या होगा
क्या नहीं
वक़्त की कठपुतली बना
मैं चला जा रहा हूँ
एक नए दौर की ओर

नए दौर की ओर
जहाँ
पिछले दौर की तरह
चलता रह कर
फिर से इंतज़ार करूँगा
एक और
नए दौर का.

<<<यशवन्त माथुर>>>

07 October 2011

दंतेवाडा त्रासदी - समाधान क्या है?

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा का नाम यूं तो कोई भी नहीं जानता था पर पिछले एक वर्ष से यह जगह नक्सली हमलों की वजह से खबरों की सुर्खियों मे है। आज सुबह फिर एकबार सैन्य वाहन पर नक्सली हमला हुआ प्रश्न यह है कि आखिर क्या वजह है नक्सली समस्या की? कौन हैं ये नक्सली और क्यों अक्सर अपने कारनामों से सरकार की नाक मे दम किए रहते हैं?

लगभग एक वर्ष पूर्व मेरे पिता जी का लिखा यह आलेख इसी सब पर रोशनी डालता है जिसे उनके ब्लॉग से साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ---

दंतेवाड़ा त्रासदी - समाधान क्या है?  
 
विजय माथुर
 समय करे नर क्या करे,समय बड़ा बलवान.
असर ग्रह सब पर करे ,परिंदा पशु इनसान

मंगल वार ६ अप्रैल २०१० के भोर में छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा में ०३:३० प्रात पर केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल पर नक्सलियों का जो हमला हुआ उसमें ७६ सुरक्षाबल कर्मी और ८ नक्सलियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.यह त्रासदी समय कि देन है.हमले के समय वहां मकर लग्न उदित थी और सेना का प्रतीक मंगल-गृह सप्तम भाव में नीच राशिस्थ था.द्वितीय भाव में गुरु कुम्भ राशिस्थ व नवं भाव में शनि कन्या राशिस्थ था.वक्री शनि और गुरु के मध्य तथा गुरु और नीचस्थ मंगल के मध्य षडाष्टक योग था.द्वादश भाव में चन्द्र-रहू का ग्रहण योग था.समय के यह संकेत रक्त-पात,विस्फोट और विध्वंस को इंगित कर रहे थे जो यथार्थ में हो कर रहा.विज्ञानं का यह नियम है कि,हर क्रिया कि प्रति क्रिया होती है.यदि आकाश मंडल में ग्रहों की इस क्रिया पर शासन अथवा जनता के स्तर से प्रतिक्रिया ग्रहों के अरिष्ट शमन की हुई होती तो इतनी जिन्दगियों को आहुति न देनी पड़ती।
जबहम जानते हैंकि तेज धुप या बारिश होने वाली है तो बचाव में छाते का प्रयोग करते हैं.शीत प्रकोप में ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते हैं तब जानबूझकर भी अरिष्ट ग्रहों का शमन क्यों नहीं करते? नहीं करते हैं तभी तो दिनों दिन हमें अनेकों त्रासदियों का सामना करना पड़ता है.जाँच-पड़ताल,लीपा – पोती ,खेद –व्यक्ति ,आरोप प्रत्यारोप के बाद फिर वाही बेढंगी चल ही चलती रहेगी.सरकारी दमन और नक्सलियों का प्रतिशोध और फिर उसका दमन यह सब क्रिया-प्रतिक्रिया सदा चलती ही रहेगी.तब प्रश्न यह है कि समाधान क्या है?महात्मा बुद्द के नियम –दुःख है! दुःख दूर हो सकता है!! दुःख दूर करने के उपाय हैं!!! दंतेवाडा आदि नक्सली आन्दोलनों का समाधान हो सकता है सर्वप्रथम दोनों और की हिंसा को विराम देना होगा फिर वास्तविक धर्म अथार्त सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रहाम्चार्य का वस्तुतः पालन करना होगा.

सत्य-सत्य यह है कि गरीब मजदूर-किसान का शोषण व्यापारी,उद्योगपति,साम्राज्यवादी सब मिलकर कर रहे हैं.यह शोषण अविलम्ब समाप्त किया जाये.

अहिंसा-अहिंसा मनसा,वाचा,कर्मना होनी चाहिए.शक्तिशाली व सम्रद्द वर्ग तत्काल प्रभाव से गरीब किसान-मजदूर का शोषण और उत्पीडन बंद करें.

अस्तेय-अस्तेय अथार्त चोरी न करना,गरीबों के हकों पर डाका डालना व उन के निमित्त सहयोग –निधियों को चुराया जाना ताकल प्रभाव से बंद किया जाये.कर-अप्बंचना समाप्त की जाये.

अपरिग्रह-जमाखोरों,सटोरियों,जुअरियों,हवाला व्यापारियों,पर तत्काल प्रभाव से लगाम कासी जाये और बाज़ार में मूल्यों को उचित स्तर पर आने दिया जाये.कहीं नोटों को बोरों में भर कर रखने कि भी जगह नहीं है तो अधिकांश गरीब जनता भूख से त्राहि त्राहि कर रही है इस विषमता को तत्काल दूर किया जाये.

ब्रह्मचर्य -धन का असमान और अन्यायी वितरण ब्रहाम्चार्य व्यवस्था को खोखला कर रहा हैऔर इंदिरा नगर लखनऊ के कल्याण अपार्टमेन्ट जैसे अनैतिक व्यवहारों को प्रचलित कर रहा है.अतः आर्थिक विषमता को अविलम्ब दूर किया जाये.चूँकि हम देखते हैं कि व्यवहार में धर्मं का कहीं भी पालन नहीं किया जा रहा है इसीलिए तो आन्दोलनों का बोल बाला हो रहा है. दंतेवाडा त्रासदी खेदजनक है किन्तु इसकी प्रेरणा स्त्रोत वह सामाजिक दुर्व्यवस्था है जिसके तहत गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर होता जा रहा है.कहाँ हैं धर्मं का पालन कराने वाले?पाखंड और ढोंग तो धर्मं नहीं है,बल्कि यह ढोंग और पाखण्ड का ही दुष्परिनाम है कि शोषण और उत्पीडन की घटनाएँ बदती जा रही हैं.जब क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया होगी ही.


शुद्ध रहे व्यवहार नहीं,अच्छे आचार नहीं.
इसीलिए तो आज ,सुखी कोई परिवार नहीं.

समय का तकाजा है कि हम देश,समाज ,परिवार और विश्व को खुशहाल बनाने हेतु संयम पूर्वक धर्म का पालन करें.झूठ ,ढोंग-पाखंड की प्रवृत्ति को त्यागें और सब के भले में अपने भले को खोजें.

यदि करम खोटें हैं तो प्रभु के गुण गाने से क्या होगा?
किया न परहेज़ तो दवा खाने से क्या होगा?

आईये मिलकर संकल्प करें कि कोई किसी का शोषण न करे,किसी का उत्पीडन न हो,सब खुशहाल हों.फिर कोई दंतेवाडा सरीखी त्रासदी भी नहीं दोहराएगी.

05 September 2011

वो स्कूल के दिन और मेरी टीचर्स

(स्कूल ड्रेस मे वह बच्चा जिसका ब्लॉग आप पढ़ रहे हैं )
ज शिक्षक दिवस है। पीछे लौटकर बीते दिनों को देखता हूँ, याद करता हूँ  तो मन होता है कि उन दिनों मे फिर से लौट जाऊँ। मैने पहले भी यहाँ एक बार ज़िक्र किया था कि पापा को देख कर मैंने थोड़ा बहुत लिखना सीखा है;स्कूलिंग शुरू हुई श्री एम एम शैरी स्कूल कमला नगर आगरा से जहां क्लास नर्सरी से हाईस्कूल तक( लगभग 5 वर्ष की आयु से 16 वर्ष की आयु तक ) पढ़ाई की। मुझे अभी भी चतुर्वेदी मैडम याद हैं जो 5th क्लास तक मेरी क्लास टीचर भी रहीं थीं और मेरे से विशेष स्नेह भी रखती थीं। वहाँ की वाइस प्रिन्सिपल श्रीवास्तव मैडम और जौहरी मैडम मैडम को भी मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। श्रीवास्तव मैडम और जौहरी मैडम के नाम मुझे अभी भी नहीं मालूम बस सरनेम याद है। श्रीवास्तव मैडम हिन्दी पढ़ाती थीं और जौहरी मैडम इंग्लिश बहुत अच्छा पढ़ाती  थी। मैं पढ़ाई मे शुरू मे ठीक था फिर बाद मे लुढ़कता चला गया लेकिन फिर भी चतुर्वेदी मैडम,श्रीवास्तव मैडम और जौहरी मैडम को मेरे से और मुझे उन से खासा लगाव था। जौहरी मैडम को ये पता चल गया था कि मैं लिखता हूँ बल्कि मैंने ही उनको अपनी कोई कविता कौपी के पन्ने पर लिख कर दिखाई थी तो उन्होने सलाह दी थी कि यशवन्त अपनी कविताओं को इस तरह पन्नों पर नहीं बल्कि किसी कौपी या डायरी मे एक जगह लिखा करो ऐसे खो सकते हैं (और अब तो यह ब्लॉग ही है सब कुछ सहेज कर रखने के लिये)। पूरी क्लास (लगभग 40-50 बच्चों के सामने)  मे उन्होने जो शब्द मेरे लिए कहे थे वो अब तक याद हैं "यह लड़का एक दिन कायस्थों का नाम रोशन करेगा " शायद  यह बात 6th या 7 th क्लास की होगी। पता नहीं कितना नाम रोशन करूंगा या नहीं पर उनका आशीर्वाद अब इतने सालों बाद भी मुझे याद है । इन्हीं जौहरी मैडम ने मुझे स्कूल ड्रेस की टाई बांधना सिखाई थी जो अब भी नहीं भूला हूँ और टाई बहुत अच्छी तरह से बांध लेता हूँ।
अक्सर सपनों मे मैं अब भी खुद को अपने स्कूल (एम एम शैरी स्कूल को मैं अपना स्कूल ही समझता हूँ) की किसी क्लास मे बैठा पाता हूँ जहां जौहरी मैडम ,श्रीवास्तव मैडम और चतुर्वेदी मैडम  पढ़ा रही होती हैं। लगभग 11 साल उस स्कूल को छोड़े हुए हो गए हैं और बहुत सी तमाम बातें मुझे अब भी याद हैं। बहुत सी शरारतें,क्लास्मेट्स से लड़ना ,स्कूल का मैदान और उस मे लगे कटीले तार जिन्हें दौड़ कर फाँदना बहुत अच्छा लगता था और अक्सर चोट भी खाई थी।   वर्ष 1988 मे पापा ने मेरा एडमिशन उस स्कूल मे इसलिए करवाया था क्योंकि वह घर से बहुत पास था। वह स्कूल अब भी वहीं है पर शायद सभी टीचर्स बदल गए हैं और बच्चे तो बदलेंगे ही जिनमे से एक मैं (अब 28 साल का बच्चा) उस शहर से बहुत दूर ,उस स्कूल से बहुत दूर उन टीचर्स से बहुत दूर हो चुका हूँ। लेकिन अपनी इन  सब से पसंदीदा टीचर्स को मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा। 

28 August 2011

इन्सान आज केन्ने जा रहल बा---श्रीमती पूनम माथुर

(श्रीमती पूनम माथुर )
परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जो समय के साथ साथ होता रहता है। यह परिवर्तन सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी।इंसान के बदलते व्यवहार पर पूर्वाञ्चल और बिहार की लोकप्रिय बोली भोजपुरी मे मेरी मम्मी द्वारा लिखा गया तथा क्रान्ति स्वर पर पूर्व प्रकाशित यह आलेख साभार यहाँ पुनः प्रस्तुत है-- 
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मार भईय्या जब रेल से घरे आवत रहलन तब ट्रेन में उनकर साथी लोगन कहलन कि हमनी के त बहुत तरक्की कर ले ले बानी सन.आज हमनी के देश त आजादी के बाद बहुत प्रगतिशील हो गइल बा.पहिले के जमाना में त घोडा गाडी ,बैल गाडी में लोग सफर करत रहलन लेकिन अब त पूरा महीना दिन में समूचा देश विदेश घूम के लोग घरे लौटी आवेला   .आजकल त This,That,Hi,Hello के जमाना बा. कोई पूछे ला कि how are you ?त जवाब मिले ला fine sir /madam कह दिहल जाला .कपड़ा ,लत्ता ,घर द्वार गाडी-घोडा फैशन हर जगह लोगन में त हमही हम सवार बा. आज त तरक्की के भर-मार बा.पर अपना पन से दूर-दराज बा.कोई कहे ला हमार फलनवा नेता बाडन त कोई कहे ला अधिकारी बाडन कोई प्राब्लम बा त हमरा से कहअ तुरन्ते सालव हो जाईल तनी चाय पानी के खर्चा लागी.बाकी त हमार फलनवा बडले बाडन निश्चिन्त रहअ  .खुश रहअ ,मस्त  रहअ  मंत्री,नेता अधिकारी बस जौन कहअ सब हमरे हाथे में बाडन .बात के सिलसिला अउर आगे बढित तब तक स्टेशन आ गईल .सब के गंतव्य आ गईल .अब के बतीआवेला सबे भागम्भागी में घरे जाय के तैयारी करत रहे अब बिहान मिलब सन .भाईबा त बात आगे बढ़ी आउर बतिआवल जाई सब कोई आपन आपन रास्ता नाप ले ले.रात हो गईल रहे सवारी मिले में  दिक्कत रहे हमार भइया धीरे धीरे पैदल घरे के ओरे बढ़त रहलन त देखलन  कि आर ब्लाक पर एगो गठरी-मोटरी बुझाई.औरु आगे बढ़लन त देखलन कि एगो आदमी गारबेज  के  पास बईठलबा थोडा औरु आगे उत्सुकता वश बढले त देखले कि ऊ आदमी त कूड़ा में से खाना बीन के खाता बेचारा भूख के मारल .अब त हमार भयीआ के आंखि में से लोर चुए लागल भारी मन से धीरे धीरे घरे पहुचलन दरवाजा हमार भौजी खोलली घर में चुपचाप बइठ गइला थोड़े देरे के बाद हाथ मुंह धो कर के कहलन की" आज खाना खाने का जी नही कर रहा है. आफिस में नास्ता ज्यादा हो गया है ,तुम खाना खा लो कल वही नास्ता कर लेंगे.भाभी ने पूछा बासी ,हाँ तो क्या हुआ कितनों को तो ऐसा खाना भी नसीब नहीं होता.हम तो सोने जा रहे हैं बहुत नींद आ रही है."
परन्तु बात त भुलाव्ते ना रहे कि आज तरक्की परस्त देश में भी लोगन के झूठन खाये के पड़ता आज हमार देश केतना तरक्की कइले बा .फिर एक सवाल अपने आप   में जेहन में उठे लागल कि भ्रष्टाचार ,बलात्कार,कालाबाजारी,अन्याय-अत्याचार ,चोरी-चकारी में इन्सान के 'मैं वाद' में पनप रहल बा .ई देश के नागरिक केतना आगे बढलबा अपने पूर्वज लोगन से?
भोरे-भोरे जब बच्चा लोगन उठल   अउर नास्ता के टेबुल पर बइठल  त कहे लागल "ये नहीं खायंगे वो नहीं खायेंगे"त ब हमार भइया रात के अंखियन देखल विरतांत कहलन  त लड़कन बच्चन सब के दिमाग में बात ऐसन बइठ गईल अउर सब सुबके लगलन सन .जे खाना मिले ओकरा प्रेम से खाई के चाही न नुकर ना करे के चाही .प्रेम से खाना निमको रोटी में भी अमृत बन जा ला.अब त लडकन सब के ऐसन आदत पडी गईल बा .चुप-चाप खा लेवेला अगर बच्चन सब के ऐसन आदत पड़जाई त वक्त-बे वक्त हर परिस्थिति के आज के नौजवान पीढी सामना कर सकेला .जरूरत बाटे आज सब के आँख खोले के मन के अमीर सब से बड़ा अमीर होला.तब ही देश तरक्की करी.इ पैसा -कौड़ी सब इहे रह जाई
एगो गीत बाटे -"कहाँ जा रहा है तू जाने वाले ,अपने अन्दर मन का दिया तो जला ले."
आज के इ  तरक्की के नया दौर में हमनी के संकल्प लिहीं कि पहिले हमनी के इन्सान बनब.-वैष्णव जन तो तेने कहिये .................................................................के चरितार्थ करब.

25 July 2011

ॐ नमः शिवाय च

आज सावन का दूसरा सोमवार है। सावन के महीने मे भगवान शिव की आराधना का अपना अलग महत्व है। भगवान शिव के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते  अपने पिता जी के इस लेख को उनके ब्लॉग  क्रान्ति स्वर से साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

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"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.

दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 

शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-

जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..

हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.

आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.

१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभीविनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)

----विजय माथुर 

22 July 2011

इन लड़कों को सलाम

हिंदुस्तान -लखनऊ-22/07/2011 

आज सुबह जैसे ही अखबार के पहले पेज पर यह खबर पढ़ी यकीन जानिये बहुत खुशी हुई। 5 लड़कों ने 355 हवाई यात्रियों की जान बचाई। रात को करीब पौने 2 बजे ये लड़के पार्टी मे मशगूल थे तभी आसमान से जाती दिल्ली से न्यू यॉर्क की फ्लाइट पर इनमे से एक हिमांशु सोनी  की निगाह पड़ी जिसमे चालक दल समेत 355 यात्री सवार थे। विमान का पिछला दायाँ हिस्सा आग की वजह से  लाल हो चुका था जबकि पायलट को सिर्फ यह महसूस हुआ कि  विमान मे कुछ गड़बड़ है । हिमांशु के मित्र कार्तिक ने तत्काल दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को सूचित किया और आनन फानन मे एयरपोर्ट पर विमान की फुल  इमरजेंसी लैंडिंग सफलता पूर्वक करवाली गयी। दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने इन मित्रों को पुरस्कृत करने की बात कही  है।

क्या सिर्फ 355 लोगों की जान ही बची ?
सोचिये अगर समय रहते हिमांशु की निगाह इस विमान पर नहीं पड़ती तो क्या होता? कुछ ही देर मे विमान आग का गोला बन कर संभव है किसी रिहायशी इलाके या बिल्डिंग पर गिरता तो न केवल विमान मे सवार यात्री अपितु उस इलाके मे रहने वाले तमाम लोग भी मारे जाते। भ्रष्टाचार से जूझ रहे इस देश मे फिर कुछ लोगों को मुआवजे इत्यादि की आड़ मे और भ्रष्टाचार का मौका मिलता और भीषण नुकसान की तो सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।
इसलिए मेरा यही कहना है कि हिमांशु की इस सजगता से न केवल 355 बल्कि कई अन्य  जानें भी बची और साथ ही देश  को होने वाला अरबों रुपयों का नुकसान भी बचा।

तुम्हें सलाम !
अपनी आज की इस पोस्ट के द्वारा मैं हिमांशु और इनके मित्रों की इस सजगता को सलाम करता हूँ और माननीया राष्ट्रपति महोदया एवं भारत सरकार से यह मांग करता हूँ कि इनको मिलने वाला पुरस्कार ऐसा हो जो ये भी हमेशा याद रखें और हम सब भी।

मेरा सुझाव है कि यदि ये लोग अभी पढ़ाई कर रहे हैं तो सरकार इनकी आगे की पूरी पढ़ाई का जिम्मा सुनिश्चित रोजगार की गारंटी के साथ उठाए और यदि यह लोग नौकरी की तलाश मे हैं तो तत्काल इन्हें प्रतिष्ठित एवं योग्य पद पर नियुक्त  करे। 

यदि ऐसा पुरस्कार इन्हें दिया जाता है तो यह न केवल इन पांचों को बल्कि और भी तमाम नौजवानों  को सजगता एवं सतर्कता के लिए आजीवन प्रेरित करेगा। महज कुछ रुपयों का चेक और स्मृति चिह्न देना ही पर्याप्त न होगा। 

08 June 2011

नयी-पुरानी हलचल -हम सब का एक नया ब्लॉग

अक्सर हम जब भी कोई ब्लॉग पढते हैं या फौलो करते हैं तो अधिकतर हम नयी पोस्ट ही पढते हैं और उसके आगे की पोस्ट्स पर ही अपने विचार रखते हैं जबकि संभव है कि हम से कोई महत्वपूर्ण पोस्ट पढ़ने से रह गयी हो.नयी-पुरानी हलचल एक प्रयास है नए ब्लोग्स,नयी पोस्ट्स के बारे में आपको बताने  का और साथ ही पहले लिखी गयी कुछ महत्वपूर्ण और रोचक पोस्ट्स  से भी आपको रु-ब-रु कराने का.

इस ब्लॉग में मेरे साथ अभी सत्यम शिवम जी जुड़े हैं जिन्हें आप सभी इनके रोचक प्रस्तुतीकरण के लिये जानते हैं.इनके अनुभव का इस ब्लॉग को लाभ मिलता रहेगा.फिर भी यहाँ एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि ये ब्लॉग सिर्फ मेरा या सत्यम जी का ही नहीं है ये ब्लॉग  सामूहिक रूप से हम सबका है जो ब्लॉग लिखते हैं और जो ब्लोगिंग में आना चाहते हैं .

पहले दिन से ही नयी-पुरानी हलचल को आप सभी का स्नेह  मिलने लगा है और आशा है आपका यह स्नेह इस ब्लॉग के साथ आगे भी बना रहेगा.
इस  ब्लॉग की बेहतरी के लिये आप सभी के महत्वपूर्ण सुझावों का सहर्ष स्वागत है.

02 June 2011

आप सब के बीच यह एक साल

आज दो जून है और आज ही के दिन पिछले साल मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था.हालांकि bloogger.com पर मैंने अगस्त 2008 में ही आई डी बना ली थी.ब्लॉग वास्तव में क्या है यह मुझे नहीं पता था हाँ इतना पता था कि अमिताभ बच्चन जी भी ब्लॉग लिखते हैं और एक दिन मेरा भी ब्लॉग होगा.और यह सपना साकार तब हुआ जब पिछले साल मई में लखनऊ ट्रांसफर न होने और एनुअल अप्रेज़ल से असंतुष्ट हो कर मैंने एक मशहूर रिटेल चेन के कस्टमर सर्विस से रिजाइन कर दिया और पापा की इच्छा और सहमति से घर पर ही अपना साइबर कैफे शुरू कर दिया.28 मई को इस कैफे ने भी एक साल पूरा कर लिया है.

यूँ देखा जाए तो लिख  तो मैं आठ वर्ष की उम्र से रहा हूँ.उसकी भी एक कहानी है.आगरा से निकलने वाले  साप्ताहिक सप्तदिवा में पापा के लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते थे.अक्सर पापा अखबारों में छापने वाली बाल कवितायेँ पढ़ कर सुना दिया करते थे.न जाने कहाँ से मेरे मन में यह बात आ गयी कि पापा लेख लिखते हैं मैं कवितायेँ लिखूंगा.मैंने तुकबंदी में एक बे सिर पैर की कविता लिख कर दे दी जिसे संपादक महोदय ने सहर्ष यह कहते हुए कि बच्चे ने लिखा है छपेगा ज़रूर कह कर छाप भी दिया (इसकी प्रति शीघ्र ही पापा के ब्लॉग कलम कुदाल पर उपलब्ध होगी).बस फिर क्या था अखबार में अपना नाम और कविता देख कर तो लिखने का ऐसा चस्का लगा जो अब तक ज़ारी है.

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इतना सब के बावजूद मेरा लेखन ,मेरी कवितायेँ और मेरे लेख मेरे हम उम्र साथियों के समान उच्च स्तर के नहीं है फिर भी यह मेरा सौभाग्य है कि आत्मसंतुष्टि की मेरी इस अभिव्यक्ति को आप विद्वतजन पसंद करते हैं.

जब मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया तब यह नहीं पता था कि हिंदी ब्लॉग जगत काफी विस्तृत है बहुत से लोग ब्लॉग लिखते हैं और उन पर टिप्पणियों के रूप में प्रतिक्रियाएं भी दी जाती हैं.मैंने शुरू में अपनी डायरी में लिखी हुई कविताओं को ब्लॉग पर डालना शुरू किया (हाँ जो मेरा मन कहे शीर्षक से लिखी गयी इस ब्लॉग की सर्वप्रथम कविता मैंने ब्लॉग बनाने के तुरंत बाद लिखी थी.) अब डायरी में लिखी सभी कवितायेँ यहाँ आ चुकी हैं और अब आप मेरी बिलकुल नयी रचनाएं पढ़ रहे हैं जो अधिकतर उसी समय लिख कर पब्लिश की जाती हैं.

जून में ब्लॉग शुरू हुआ और पहला कमेन्ट आदरणीया वीना जी ने लिखा मेरी पोस्ट स्वार्थ पर सितम्बर में .यह मेरे लिये अभी भी एक रहस्य ही है कि उन्हें मेरे ब्लॉग के बारे में कैसे पता चला? उस पोस्ट पर सुरेन्द्र भाम्बू जी,श्री के आर जोशी जी,अजय कुमार जी एवं आनंद पांडे जी के ब्लॉग जगत में स्वागत के भी कमेंट्स मुझे मिले.तब यह एहसास हुआ कि मेरा ब्लॉग भी पढ़ा और देखा जाता है.कमेंट्स करने वालों के प्रोफाइल्स से मुझे उनके तथा उनपर की गयी टिप्पणियों से अन्य ब्लोग्स के बारे में पता चलता गया. 

मैंने जो ब्लोग्स फौलो कर रखे हैं.उन में बच्चों के सभी ब्लोग्स (जिनके बारे में मैं अभी तक जानता हूँ)अनुष्का,पाखी,चैतन्य,रिमझिम,माधव ,लविज़ा ,पंखुरी ,कुहू ,नन्ही परी और हेमाभ के ब्लोग्स मुझे एक अलग ही दुनिया की सैर करा देते हैं.इन बच्चों का उत्साह,इनकी शैतानियाँ,डांस और ड्राइंग्स सभी कुछ बेहतरीन है और इनके मम्मी-पापा और संपादक मंडल को मैं तहे दिल से धन्यवाद देता हूँ इतने अच्छे ब्लोग्स के लिये और इन नन्हे मुन्नों की गतिविधियां हम सब से शेयर करने के लिये.

जहाँ तक बड़ों के ब्लोग्स की बात है तो आदरणीय/आदरणीया प्रमोद जोशी जी,वीना जी,रश्मि जी,अनुपमा पाठक जी,अपर्णा मनोज जी,मोनिका जी,अल्पना वर्मा जी,ज़ाकिर अली जी,प्रमोद ताम्बट जी ,मनोज जी,वंदना जी, आशीष जी, इन्द्रनील जी ,डॉक्टर शरद सिंह जी,तृप्ति जी, निवेदिता जी, मीनाक्षी जी ,अपर्णा त्रिपाठी जी, कैलाश शर्मा जी, माहेश्वरी जी, अनीता जी,अनुपमा सुकृति जी,सत्यम शिवम जी,अंजलि माहिल जी, ज्योति जी,और सुषमा जी के ब्लोग्स एवं लेखन शैली से मैं सर्वाधिक प्रभावित हूँ.इनके ब्लोग्स को पढ़ कर काफी कुछ जानने ,सीखने और समझने को मिलता है.और मेरी भी कोशिश रहती है कि इन्हें पढ़ कर मैं भी अपना स्तर सुधारूं.

बहरहाल आप सभी के स्नेह और आशीर्वाद से इस 203वीं पोस्ट और 87 चाहने वालों के साथ इस ब्लॉग ने एक साल का सफर तय कर लिया है.कल क्या लिखूंगा,कब तक लिखूंगा कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं है बस इस ब्लॉग के नाम को सार्थक करने की कोशिश ज़ारी है.

[विशेष-आज पापा के ब्लॉग का भी एक वर्ष पूरा हो गया है]

28 May 2011

वाई.नेट कम्प्यूटर्स का एक वर्ष


---विजय  माथुर 

 आज 'वाई. नेट कम्प्यूटर्स ' ने दुसरे वर्ष में प्रवेश कर लिया है.यशवन्त ने गत वर्ष आज ही के दिन अपने व्यवसाय का शुभारम्भ  किया था.वह जब छोटा था अक्सर मेरे साथ बाजार वगैरह चला जाता था.एक बार होम्योपैथिक चिकित्सक डा.खेम चन्द्र खत्री ने उसे देख कर कहा था कि यह बच्चा आपकी तरह नौकरी नहीं करेगा यह अपना बिजनेस करेगा.मैं डा.साहब की दूकान से ही होम्योपैथी दवाएं खरीदता था.वह मुझे अच्छे तरीके से जानते थे. फिर भी कहा कि यह बिजनेस करेगा तो मैं समझा शायद डा. साहब ने व्यंग्य किया होगा.परन्तु उन्होंने कहा कि वह इन्ट्यूशन के आधार पर कह रहे हैं और उनके इन्ट्यूशन कभी गलत नहीं होते हैं.हालांकि उसकी जन्म-कुंडली के हिसाब से भी उसके लिए व्यवसाय ही बनता था परन्तु व्यवहारिक परिस्थितियें विपरीत थीं.

सन२००५ ई. में यशवन्त ने बी.काम.कर लिया परन्तु आर्थिक कारणों से उसे एम्.काम. या दूसरी कोई शिक्षा नहीं दिला सके.सन २००६ ई. में आगरा में पेंटालून का बिग बाजार खुल रहा था उसका विज्ञापन देख कर उसने अपने एक परिचित के कहने पर एप्लाई कर दिया. मैं सेल्स में नहीं भेजना चाहता था उसी लड़के ने मुझ से कहा अंकल यह घूमने  का जाब नहीं है,करने दें.इत्तिफाक से बगैर किसी सिफारिश के उसका सिलेक्शन भी हो गया अतः ज्वाइन न करने देने का कोई मतलब नहीं था.०१ .०६ २००६ से ज्वाइन करने के बाद १२ तक आगरा में ट्रेनिंग चली और १३ ता. को लखनऊ के लिए बस से स्टाफ को भेजा जहाँ १४ ता. से १५ दिन की ट्रेनिंग होनी थी.परन्तु किन्हीं कारणों से यह ट्रेनिंग सितम्बर के पहले हफ्ते तक लखनऊ में चली.

ढाई माह लखनऊ रहने पर यशवन्त को वह इतना भा गया कि मुझ से कहा आगरा का मकान बेच कर लखनऊ चलिए जो आपका अपना जन्म-स्थान भी है.मैंने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जबकि लखनऊ का आकर्षण भी था.जब जूलाई २००७ में  मेरठ में बिग बाजार की ब्रांच  खुली तो उसने वहां अपना ट्रांसफर करा लिया.वह मुझ से लगातार लखनऊ शिफ्ट करने को कहता रहा.मई २००९ में कानपुर में बिग बाजार की दूसरी ब्रांच खुलने पर वह ट्रांसफर लेकर ०४ जून २००९ को   वहां आ गया और कहा अब लखनऊ के नजदीक आ गए हैं अब तो आप लखनऊ आ जाएँ.

३१ जूलाई से आगरा का मकान बेचने की प्रक्रिया प्रारंभ करके सितम्बर में उसकी रजिस्टरी कर दी और ०९ अक्टूबर को लखनऊ आ गए और नवम्बर में अपना मकान लेकर उसमें शिफ्ट हो गए.लखनऊ में बिग बाजार की तीसरी ब्रांच खुलने पर उसने फिर ट्रांसफर माँगा जहाँ कानपूर और इलाहाबाद के लोगों तक को भेज दिया गया परन्तु उसकी जरूरत कानपूर में है कह कर रोक लिया गया जिसके जवाब में मैंने उससे वहां से रेजिग्नेशन दिलवा दिया.

२८ मई २०१० को यशवन्त की अपनी कुछ बचत और कुछ अपने पास से मदद करके उसके लिए 'वाई.नेट कम्प्यूटर्स' खुलवा दिया. इस एक वर्ष में ज्वलनशील लोगों,रिश्तेदारों के प्रकोप के कारण यद्यपि आर्थिक रूप से इस संस्थान से लाभ नहीं हुआ.परन्तु यशवन्त के सभी ब्लाग्स के अलावा मेरे भी सभी ब्लाग्स इसी संस्थान के माध्यम से चल रहे हैं. हम लोगों को जो सम्मान और प्रशंसा ब्लॉग जगत में मिली है उसका पूरा श्रेय यशवन्त के 'वाई .नेट कम्प्यूटर्स' को जाता है.पूनम और  मैं यशवन्त और उसके संस्थान के उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं.

[यह आलेख  क्रान्तिस्वर पर भी उपलब्ध है]

20 March 2011

एक पत्र

माई डियर मैं,
कहीं तुम तो बौराये हुए नहीं हो?मुझे कुछ शक है वो इसलिए कि इस बार आम यूँ तो देर से बौराया है लेकिन अपने से श्रेष्ठ खास लोगों की तरह कहीं तुम जैसा आम न बौरा गया हो इस होली पर.वैसे एक बात तो है तुम आम हो ही नहीं सकते क्यों कि देखने में तुम सूखी पतली सी  डंडी को भी पीछे छोड़  देते हो ; खाने पीने की तुम्हें कोई कमी नहीं है पर तुम तो यार बस तुम ही हो. तुम खास भी  नहीं हो सकते जो भी लिखते हो ,बोलते हो सिरे से बकवास है हाँ तुम्हारी किस्मत कुछ  खास है कि इतने अच्छे अच्छे लोग  तुम्हारे साथ हैं.लेकिन मेरी भी खासियत देखो मुझे लगता है मैं तुम्हारी खिंचाई कुछ अच्छी तरह से कर सकता हूँ.

और बताओ क्या हो रहा है? मैं जानता हूँ तुम यही कहोगे कुछ खास नहीं.हाँ जो खास नहीं वो खास कर भी कैसे सकता है.और हाँ कभी अपने को खास समझने की गलती करना भी मत देख रहे हो न भारत की करकट;ओह्ह माफ करना क्रिकेट टीम को .दुनिया की सबसे खास बैटिंग टिकी हुई है सिर्फ दो खास पर सचिन और सहवाग पर और साढे ग्यारह (सारे ग्यारह)अपने को पूरे बारह समझने लग रहे हैं.कहीं तुम यही न कर बैठना .दो बकवास में एक खास के आनुपातिक समीकरण से लिखते चलते हो और समझते हो अपने को राजा.जबकि असलियत में तुम अपना ही बाजा बजा रहे होते हो.अरे राजा समझना ही है तो ए राजा को समझो और सीखो .लेकिन सब बेकार है तुम्हारे आगे-एक कार तो है नहीं तुम्हारे पास.

खैर मैं अब तुम को और नहीं झेलाउँगा.एक काम करो यहाँ से निकल चलो .कहीं ऐसा न हो इस होली पर रंग के बजाये तुम को सड़े टमाटर ईमेल और टिप्पणी से भेजे जाएँ और तुम गाने लगो -
मैंने सोचा न था ...मैंने सोचा न था ...

अपना ख्याल रखना.

होली की शुभ कामनाओं के साथ -
तुम्हारा अपना
मैं

19 February 2011

चुनाव आयोग को एक सुझाव

बढते इंटरनेट के प्रयोग के इस दौर में अब चुनाव आयोग को ऑनलाइन वोटिंग के विकल्प पर भी विचार करना चाहिए.
इस सम्बन्ध में मेरा एक आलेख 'हिन्दुस्तान' दिल्ली के पूर्व सीनीयर रेजिडेंट एडिटर एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रमोद जोशी जी के ब्लॉग पर आज प्रकाशित है.
उनके  ब्लॉग का लिंक है ---http://pramathesh.blogspot.com/2011/02/blog-post_19.html आप चाहें तो मेरे लेख को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं एवं अपने बहुमूल्य विचार दे सकते हैं.

12 February 2011

ब्लॉग स्पोट की साइट्स नहीं खुल रही हैं

कल से एक विचित्र समस्या का सामना कर रहा हूँ.मेरे पास एयरटेल का कनेक्शन है सारी साइट्स खुल रही हैं,ब्लॉगर डैश  बोर्ड भी खुल रहा है लेकिन उसके आगे ब्लागस्पाट का कोई भी ब्लॉग खुल नहीं रहा है.यहाँ तक की मेरा और पापा का भी कोई ब्लॉग नहीं खुल पा रहा है.ये पोस्ट लिख रहा हूँ लेकिन मैं अपनी ही लिखी इस पोस्ट को नहीं पढ़ पाऊंगा.एयरटेल का कहना है कि उनके स्तर से कोई प्रॉब्लम नहीं है क्योंकि यदि उनके यहाँ से कोई प्रोब्लम होती तो नेट ही कनेक्ट नहीं होता.खैर अभी  इंतज़ार है इस समस्या के दूर होने का.
यदि मैं आपके ब्लॉग पर नियमित आता हूँ लेकिन अगर अभी न आ सका तो उसके पीछे इसी प्रोब्लम को समझें.अगर आपमें से कोई इस समस्या के निदान हेतु मेरा मार्ग दर्शन कर सकें तो मेरा सौभाग्य होगा.आपकी टिप्पणी मुझे मेल पर मिल जाएगी.

02 February 2011

बहुत बहुत धन्यवाद रवीश कुमार जी को

आज के दैनिक 'हिन्दुस्तान' में पापा के ब्लॉग को 'ब्लॉग वार्ता' में शामिल करने के लिए रवीश कुमार जी को बहुत बहुत धन्यवाद.





 संस्मरणों का ये सिलसिला अभी जारी है.

01 February 2011

'भारत' बनाम 'इण्डिया'



बहुत दिनों से ये बात मन में थी;मन में क्या थी सच कहूँ तो पापा से इस पर डिस्कशन कई बार किया है और उन्होंने सहमति ही जतायी है मेरी बात से.

अक्सर ये बात मन में कौंधती है कि अमरीका को अमरीका ही कहा जाता है,इंग्लॅण्ड को इंग्लॅण्ड,ब्रिटेन असल में भी ब्रिटेन ही है और फ्रांस,फ्रांस ही कहलाता है.नजदीक की बात करें तो पाकिस्तान को पाकिस्तान,नेपाल को नेपाल,भूटान को भूटान और चाइना को चाइना के नाम से सारी दुनिया जानती है.दुनिया का हर देश अपने मूल नाम से ही जाना जाता है; पर भारत या हिन्दुस्तान को इंडिया कहा जाता है.क्यों?

हमारे देश की आत्मा भारत में बसती है.ओबामा भारत आकर नमस्ते बोल सकते हैं,होली को स्पष्ट रूप से होली कह सकते हैं तो भारत शब्द को बोलने में उन्हें या किसी भी राष्ट्राध्यक्ष को कोई दिक्कत नहीं होगी यह भी तय है.

बहुत से लोग ज्योतिष या अंक शास्त्र को नहीं मानते लेकिन इसकी कसौटी पर भी भारत इण्डिया से कहीं बेहतर है.

बात बात पर हल्ला मचाने वाले,हड़ताल और आन्दोलन करने वाले,पृथक नए  राज्यों की वकालत करने वाले क्या कुछ करेंगे?

हमें गर्व है अपने गौरवशाली इतिहास पर,अनमोल विरासतों पर और प्राणोत्सर्ग करने वाले वीर महापुरुषों पर तो अपने देश के मूल नाम पर गर्व क्यों नहीं कर सकते?
क्या वैश्विक स्तर पर रुपये के चिह्न के बाद भारत शब्द को प्रचलन में लाया जा सकता है? और क्या हम इण्डिया को त्याग सकते हैं?

23 January 2011

क्या आज क़े नौजवान नेताजी का पुनर्मूल्यांकन करवा सकेंगे?

नेता जी सुभाष चन्द्र बोस को कौन नहीं जानता.आज उनके जन्म दिवस पर प्रस्तुत है मेरे पिताजी श्री विजय माथुर का यह महत्वपूर्ण आलेख जो "स्वतंत्रता दिलाने में नेताजी का योगदान-(जन्म दिवस पर एक स्मरण)" शीर्षक से उनके ब्लॉग पर भी उपलब्ध है.जिसे यहाँ क्लिक करके भी देखा जा सकता है.
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'नेताजी' का मतलब सुभाष चन्द्र बोस से होता था.(आज तो लल्लू-पंजू ,टुटपूंजियों क़े गली-कूंचे क़े दलाल भी खुद को नेताजी कहला रहे हैं) स्वतन्त्रता -आन्दोलन में भाग ले रहे महान नेताओं को छोड़ कर केवल सुभाष -बाबू को ही यह खिताब दिया गया था और वह इसके सच्चे अधिकारी भी थे.जनता सुभाष बाबू की तकरीरें सुनने क़े लिये बेकरार रहती थी.उनका एक-एक शब्द गूढ़ अर्थ लिये होता था.जब उन्होंने कहा "तुम मुझे खून दो ,मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा" तब साधारण जनता की तो बात ही नहीं ब्रिटिश फ़ौज में अपने परिवार का पालन करने हेतु शामिल हुए वीर सैनिकों ने भी उनके आह्वान  पर सरकारी फ़ौज छोड़ कर नेताजी का साथ दिया था. जिस समय सुभाष चन्द्र बोस ने लन्दन जाकर I .C .S .की परीक्षा पास की ,वह युवा थे और चाहते तो नौकरी में बने रह कर नाम और दाम कम सकते थे.किन्तु उन्होंने देश-बन्धु चितरंजन दास क़े कहने पर आई.सी.एस.से इस्तीफा  दे दिया तथा स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े.  जब चितरंजन दास कलकत्ता नगर निगम क़े मेयर बने तो उन्होंने सुभाष बाबू को उसका E .O .(कार्यपालक अधिकारी )नियुक्त किया था और उन्होंने पूरे कौशल से कलकत्ता नगर निगम की व्यवस्था सम्हाली थी.




वैचारिक दृष्टि से सुभाष बाबू वामपंथी थे.उन पर रूस की साम्यवादी क्रांति का व्यापक प्रभाव था. वह आज़ादी क़े बाद भारत में समता मूलक समाज की स्थापना क़े पक्षधर थे.१९३६ में लखनऊ में जब आल इण्डिया स्टुडेंट्स फेडरशन की स्थापना हुई तो जवाहर लाल नेहरु क़े साथ ही सुभाष बाबू भी इसमें शामिल हुये थे.१९२५ में गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उस समय कांग्रेस क़े भीतर रह कर अपना कार्य करती थी.नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ,जवाहर लाल नेहरु तथा जय प्रकाश नारायण मिल कर कांग्रेस को सम्माजिक सुधार तथा धर्म-निरपेक्षता की ओर ले जाना चाहते थे.१९३८ में कांग्रेस क़े अध्यक्षीय चुनाव में वामपंथियों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को खड़ा किया था और गांधी जी ने उनके विरुद्ध पट्टाभि सीतारमय्या को चुनाव लड़ाया था. नेताजी की जीत को गांधी जी ने अपनी हार बताया था और उनकी कार्यकारिणी का बहिष्कार करने को कहा था.तेज बुखार से तप रहे नेताजी का साथ उस समय जवाहर लाल नेहरु ने भी नहीं दिया.अंत में भारी बहुमत से जीते हुये (बोस को १५७५ मत मिले थे एवं सीतारमय्या को केवल १३२५ )नेताजी ने पद एवं कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया और अग्र-गामी दल
(फॉरवर्ड ब्लाक) का गठन कर लिया.ब्रिटिश सरकार ने नेताजी को नज़रबंद कर दिया.क्रांतिवीर विनायक दामोदर सावरकर क़े कहने पर नेताजी ने गुप-चुप देश छोड़ दिया और काबुल होते हुये जर्मनी पहुंचे जहाँ एडोल्फ हिटलर ने उन्हें पूर्ण समर्थन दिया. विश्वयुद्ध क़े दौरान दिस.१९४२ में जब नाजियों ने सोवियत यूनियन पर चर्चिल क़े कुचक्र में फंस कर आक्रमण कर दिया तो "हिटलर-स्टालिन "समझौता टूट गया.भारतीय कम्युनिस्टों ने इस समय एक गलत कदम उठाया नेताजी का विरोध करके ;हालांकि अब उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि यह भारी गलती थी और आज उन्होंने नेताताजी क़े योगदान को महत्त्व देना शुरू कर दिया है.हिटलर की पराजय क़े बाद नेताजी एक सुरक्षित पनडुब्बी से जापान पहुंचे एवं उनके सहयोग से रास बिहारी बोस द्वारा स्थापित आज़ाद हिंद फ़ौज (I .N .A .) का नेतृत्व सम्हाल लिया.कैप्टन लक्ष्मी सहगल को रानी लक्ष्मी बाई रेजीमेंट का कमांडर बनाया गया था. कैप्टन ढिल्लों एवं कैप्टन शाहनवाज़ नेताजी क़े अन्य विश्वस्त सहयोगी थे.

नेताजी ने बर्मा पर कब्ज़ा कर लिया था.आसाम में चटगांव क़े पास तक उनकी फौजें पहुँच गईं थीं."तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"नारा इसी समय नेताजी ने दिया था. नेताजी की अपील पर देश की महिलाओं ने सहर्ष अपने गहने आई.एन.ए.को दान दे दिये थे,जिससे नेताजी हथियार खरीद सकें.नेताजी की फौजें ब्रिटिश फ़ौज में अपने देशवासियों पर बम क़े गोले नहीं तोपों से पर्चे फेंक्तीं थीं जिनमें देशभक्ति की बातें लिखी होती थीं और उनका आह्वान  करती थीं कि वे भी नेताजी की फ़ौज में शामिल हो जाएँ.इस का व्यापक असर पड़ा और तमाम भारतीय फौजियों ने ब्रिटिश हुकूमत से बगावत करके आई .एन .ए.की तरफ से लडाई लड़ी.एयर फ़ोर्स तथा नेवी में भी बगावत हुई.ब्रिटिश साम्राज्यवाद  हिल गया और उसे सन १८५७ की भयावह स्मृति हो आई.अन्दर ही अन्दर विदेशी हुकूमत ने भारत छोड़ने का निश्चय कर लिया किन्तु दुर्भाग्य से जापान की पराजय हो गई और नेताजी को जापान छोड़ना पड़ा.जैसा कहा जाता है प्लेन क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई जिसे अभी भी संदेहास्पद माना जाता है. (यहाँ उस विवाद पर चर्चा नहीं करना चाहता ).

मूल बात यह है कि,१९४७ में प्राप्त हमारी आज़ादी केवल गांधी जी क़े अहिंसक आन्दोलन से ही नहीं वरन नेताजी की "आज़ाद हिंद फ़ौज " की कुर्बानियों,एयर फ़ोर्स तथा नेवी में उसके प्रभाव से बगावत क़े कारण मिल सकी है और अफ़सोस यह है कि इसका सही मूल्यांकन नहीं किया गया है.आज़ादी क़े बाद जापान सरकार ने नेताजी द्वारा एकत्रित स्वर्णाभूषण भारत लौटा दिये थे;ए.आई.सी.सी.सदस्य रहे सुमंगल प्रकाश ने धर्मयुग में लिखे अपने एक लेख में रहस्योदघाटन किया था कि वे जेवरात कलकत्ता बंदरगाह पर उतरने तक की खबर सबको है ,वहां से आनंद भवन कब और कैसे पहुंचे कोई नहीं जानता.आज आज़ादी की लडाई में दी गई नेताजी की कुर्बानी एवं योगदान को विस्मृत कर दिया गया है.क्या आज क़े नौजवान नेताजी का पुनर्मूल्यांकन करवा सकेंगे?उस समय नेताजी तथा अन्य बलिदानी क्रांतिकारी सभी नौजवान ही थे.यदि हाँ तभी प्रतिवर्ष २३ जनवरी को उनका जन्म-दिन मनाने की सार्थकता है,अन्यथा थोथी रस्म अदायगी का क्या फायदा ?


                                               -----------------विजय माथुर

16 November 2010

एक प्रश्न ......

क्या यही है हमारी  आधुनिक और रोजगार परक शिक्षा ?

साभार 'हिन्दुस्तान'-लखनऊ-16/11/2010 



आज बस इतना ही...

11 September 2010

भारत की महान न्याय प्रणाली ...

ये है हमारे देश भारत की महान न्याय प्रणाली!!!!आप क्या कहते हैं?
(जो मेरे मन ने कहा....)
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