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26 September 2015

सब चारण तैयार हैं......

इधर भी खड़े
कुछ उधर भी खड़े
चरणों में लिपटे पड़े
सब चारण तैयार हैं.... ।

हाथों में स्मृति चिह्न लिए
मुद्रा-प्रशस्ति गिन लिए
गुण, गुड़ शक्कर हो लिए
अंग वस्त्र धारण सरकार हैं .... ।

सब चारण तैयार हैं......

मौन व्रत स्वाभाविक है
अच्छा बुरा मन माफिक है
जो अपने खुद का मालिक है
उस साधारण पर वार हैं .... ।

सब चारण तैयार हैं......।


~यशवन्त यश©

20 November 2013

श्री तेंदुलकराय नम: !

बहुत गहरी नींद में अचानक उपजी इन पंक्तियों को रात 1:30 से 02:15 तक मन से कागज़ पर उतारता चला गया। सचिन साहब से अग्रिम माफी के साथ अब इस सुबह अपने ब्लॉग पर भी सहेज ले रहा हूँ-

भारत रतन ! भारत रतन !
सोना कहाँ,चाँदी कहाँ 
गरीब के बच्चे को रोज़ ही 
रोना यहाँ,दूध पीना कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नम: !

महंगाई यहाँ,मंदी यहाँ 
गर्मी यहाँ,ठंडी यहाँ 
उन्हें क्या पता ऐ सी में 
ऐसी तेसी होती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

मच्छर यहाँ,मक्खी यहाँ 
मोटी रोटी पचती यहाँ 
उनका गैस का चूल्हा है 
मिट्टी लिपी भट्टी कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

माँस नहीं,हड्डी यहाँ 
खोखो यहाँ,कबड्डी यहाँ 
उनकी तो कोका कोला है 
चुल्लू कहाँ,टुल्लू कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

सूखा यहाँ,बारिश यहाँ 
रोज़ मरते लावारिस यहाँ 
उनकी वसीयत में अरबों हैं 
सैकड़ा -हज़ार क्या करते वहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः!

गिल्ली यहाँ,डंडा यहाँ 
साँसों का हर हथकंडा यहाँ 
उनकी किस्मत में 'किरकट' है 
आसमान वहाँ,धरती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

भारत रतन ! भारत रतन !
हीरा कहाँ,मोती कहाँ 
यह तो बस अपनी भक्ति है 
भजन नहीं,आरती कहाँ ?
श्री तेंदुलकराय नमः !

~यशवन्त यश©

 

07 July 2013

कविता और कवि ...

'जहां न पहुंचे रवि
वहाँ पहुंचे कवि '
जो कह न सके कभी
वही कह देता अभी

कविता और कवि ......।

न ज्ञान व्याकरण का
न भाषा का, शुद्धता का
हर कोई है 'बच्चन','पंत'
महा भक्त 'निराला' का

न कॉमा, विराम कभी
न छंद,अलंकार कभी
उसके कुतर्क ही सही
'दिनकर' वही, 'कबीर','सूर' वही

हर गली दिखता वही
अभी यहाँ,फिर वहाँ कभी
कुकुरमुत्ते की सी छवि
डूबती कविता,उतराता कवि

खुद के लिखे को कभी
किताब बना छपवाता कवि
कीमत डेढ़ सौ,मुफ्त बाँट पाँच सौ
मुस्कुराता- इतराता कवि

कविता और कवि.....। 


 ~यशवन्त माथुर©

28 June 2013

देख नहीं सकता

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
चार दीवारी की बंधी पट्टी के उस पार
देख नहीं सकता।

मैं महफूज हूँ अपनी ही चादर में सिमट कर
बाहर निकल कर खुले जिस्मों को
देख नहीं सकता।

नीरो की तरह बांसुरी बजा कर अपनी मस्ती में
मुर्दानि में झूमता हूँ किसी को रोता
देख नहीं सकता।

ऊपर वाले की नेमत से मिली हैं दो आँखें
इंसान के लबादे में इंसा को
देख नहीं सकता।  

~यशवन्त माथुर©
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