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14 June 2019

आम व खास की खाई चौड़ी करती अर्बन प्लानिंग-माशा

हाल ही मुंबई में डॉ. पायल तड़वी की मौत के बाद किसी ने टिप्पणी की कि शहरों में दलित-आदिवासी बसते तो हैं, लेकिन उनके बाशिंदे नहीं बन पाते। वहां दलित-सवर्ण खाई साफ नजर आती है। वैसे, यह खाई अमीर-गरीब के बीच भी दिखती है। दुनिया के हर कोने में। अब अर्बन प्लानिंग ही इस तरह की जा रही है कि यह अलगाव अधिकाधिक स्पष्ट होता जाता है। पिछले महीने लंदन के ‘इंडिपेंडेंट’ अखबार में खबर थी कि लंदन में रियल एस्टेट डिवेलपर्स एक ही सोसायटी में अमीर और गरीब निवासियों के साथ भेदभाव करते हैं। हाउसिंग सोसायटी को दो खंडों में बनाया जाता है- लग्जरी होम्स और सोशल हाउसिंग। लग्जरी होम्स वाले सेक्शन में बगीचे और खेल के मैदान भी होते हैं। व्यवस्था यह होती है कि उनमें दूसरे सेक्शन वाले लोग नहीं जा सकते। सोशल हाउसिंग वाले सेक्शन के लिए अलग से छोटा गेट बनाया जाता है। 

ये खास तरह का सेग्रगेशन यानी अलगाव दुनिया के हर देश की सचाई है। सत्तर के दशक में अमेरिकी शहरों में गेटेड सोसायटी की शुरुआत हुई तो अमीर-गरीब वर्गों के बीच का फर्क दिखाई देने लगा। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर में श्वेत-अश्वेत लोग अलग-अलग हिस्सों में रहते थे। ग्लासगो विश्वविद्यालय (यूके) में रिसर्च असोसिएट बिल्ज सेरिन का शोध बताता है कि शहरी स्पेस में अमीर-गरीब का और जातियों का विभाजन तेजी से बढ़ रहा है। सार्वजनिक सुविधाएं और सेवाएं भी अमीर-गरीब के हिसाब से तय की जा रही हैं। हमारा देश भी इस रवैये से अलग नहीं है। दिल्ली से सटे गुड़गांव की हाउसिंग सोसायटियों में काम करने वाली बाइयों को लिफ्ट वगैरह के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है।

दुनिया के हर देश के बड़े शहरों में ऐसी गेटेड सोसायटी मौजूद हैं। यहां दुनिया भर के ऐशो आराम हैं। बस, उनकी कीमत चुकानी होती है। वियतनाम की राजधानी हनोई में इलीट सोसायटी में रहवासियों के लिए शुद्ध हवा, टेनिस गार्डन, ब्यूटी सैलून, पोस्ट ऑफिस सब कुछ है। कनाडा के टोरंटो में विदेशी निवेशकों को आलीशान कॉन्डो मतलब फैंसी अपार्टमेंट खरीदने का मौका मिल रहा है। नाइजीरिया के लागोस में समुद्र को पाटकर प्राइवेट सिटी इको एटलांटिक प्रॉजेक्ट बनाया जा रहा है।

ऐसे लग्जरी अपार्टमेंट्स ने बुनियादी सुविधाओं को कमोडिटी बनाने का काम किया है। साफ हवा, शुद्ध पानी, साफ-सफाई आदि के लिए किसी को पैसे देने पड़ें तो जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनका क्या होगा/ होगा यही कि वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित होते जाएंगे। लग्जरी अपार्टमेंट्स और सोसायटी के ट्रेंड ने ऐसा ही किया है। इसने प्रशासन की जवाबदेही कम की है और लोगों के कहीं भी बसने के अधिकार का उल्लंघन किया है। हर इनसान को यह हक है कि वह अपने देश के किसी भी कोने में बस सकता है। उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी प्रशासन की है। यह प्रवृत्ति उनका यह हक छीन रही है।

अस्सी के दशक में मुंबई की पत्रकार ओल्गा टेलिस ने बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के खिलाफ एक मामला दायर किया कि वह बारिश के मौसम में फुटपाथ पर रहने वालों को वहां से खदेड़ रही है। ओल्गा का कहना था कि लोग बड़े शहरों में रोजगार की तलाश में आते हैं। यह सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता है कि उन्हें अपने इलाकों में रोजगार उपलब्ध नहीं हो पाता और बड़े शहरों में आना पड़ता है। 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने ओल्गा की याचिका मंजूर की और कहा कि लोगों को वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराए बिना, उनके मौजूदा घरों को तोड़ने या उन्हें किसी इलाके से खदेड़ने का अधिकार प्रशासन को नहीं है।

सेग्रगेशन प्रक्रिया में हालांकि किसी को जबरन खदेड़ा नहीं जाता, लेकिन धीरे-धीरे बुनियादी सुविधाओं से बेदखल कर दिया जाता है। नतीजा वही होता है। शहर की आबादी के एक हिस्से की कीमत पर दूसरा हिस्सा चमकता है और उसे हम शहरी विकास का नाम देते हैं।

-साभार -नवभारत टाइम्स-13/जून/2019- 

01 June 2019

लाइन में रहते थे मगर साथ-साथ-विजय गोयल

कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। मैं कहता हूं, घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे! ऑनलाइन शॉपिंग ने आज लोगों को अपने तक सिमटाकर रख दिया है 

ऑनलाइन शॉपिंग बेहद सुविधाजनक है। बस आपको घर बैठे-बैठे फोन पर उंगलियां घुमानी हैं। अगले ही दिन सामान आ जाएगा। आपको सामान पसंद नहीं आए तो आप उसे बिना अपना नुकसान किए वापस भी कर सकते हैं। अब शायद ही ऐसी कोई चीज है, जिसे घर बैठे आप मंगवा न सकते हों। आप ऑर्डर करें और सामान आने के बाद उसके पैसे दें। इस व्यापार में कहीं कोई बड़ी धांधली भी नहीं है। ऑनलाइन शॉपिंग के जमाने में, यानी आजकल कपल्स के लिए ‘वी टाइम’ यानी दोनों को अकेले में बतियाने के लिए समय निकालना बहुत मुश्किल है। पूरा दिन काम में निकल जाता है। शाम को घर पहुंचकर हम टीवी देखते हैं और सो जाते हैं। ऐसे में अगर शॉपिंग भी लैपटॉप या मोबाइल से होगी तो आपस में जान-पहचान कब होगी/ 

किसी जमाने में जरूरत की हर चीज लेने के लिए अलग-अलग लाइनें लगती थीं और आदमी घंटों कतार में खड़ा रहता था। मुझे याद है, जब दिल्ली मिल्क स्कीम की बोतलें आती थीं, तब हम उसे लेने के लिए सवेरे-सवेरे लाइनों में लगते ताकि स्कूल जाने के समय से पहले ही दूध घर में आ जाए। सभी भाइयों को अलग-अलग दिन लाइनों में लगना होता था। कई बार तो हम थैले में पत्थर रखकर लाइन में लगा आते थे। भैंस का दूध लेने के लिए भी लाइन लगती थी। हम हर समय अपनी आंखें बाल्टी में गड़ाए रहते थे क्योंकि देखना चाहते थे कि दूधवाला कब दूध में पानी मिलाता है। वह भैंस के थन धोता तो भी हमें लगता कि कहीं वह पानी तो नहीं मिला रहा। पर उसको हमारी इन हरकतों पर कभी गुस्सा नहीं आता था। 

मिट्टी के तेल की लाइन तो बहुत ही मशहूर थी। उस समय मिट्टी के तेल से स्टोव जलाया जाता था और मिट्टी का तेल तब राशन में मिला करता था। मिट्टी का तेल पा लेने का मतलब था बहुत बड़ी उपलब्धि प्राप्त करना। स्टोव से पहले अंगीठी पर खाना बना करता था तो घर में कोयला और लकड़ी दोनों आती थी। कोयले की भी लाइन हुआ करती थी। पुराने अखबार और कागजों को जला कर अंगीठी सवेरे-सवेरे जलाते थे। जब तक वह बुझ न जाए, तब तक मां की कोशिश रहती थी कि उस पर एक-एक भगोना नहाने के लिए पानी भी गर्म हो जाए और स्कूल जाने से पहले बच्चों के लिए खाना भी बन जाए। सारे घर में इस अंगीठी का धुआं ही धुआं हो जाता था।

राशन की दुकान पर तो सबसे ज्यादा लाइनें थी। हम पांच भाई-बहन थे। कोई एक लाइन में लगता तो कोई दूसरी लाइन में लगता। दिक्कत तो उनको थी, जिनके घर बच्चे नहीं थे। उन्हें चारों तरफ खुद भागना पड़ता था। उन दिनों नौकर भी नहीं हुआ करते थे और खर्चा भी बड़े संयम से किया जाता था। आजकल के बच्चों को यह जानकर बड़ा ताज्जुब होगा कि टेलीफोन, बिजली और पानी के बिल जमा करने के लिए भी लाइनें थीं। सुपर बाजार में सामान खरीदने के लिए भी लाइनें थीं और बसों के लिए भी। 

पिछले दिनों मैंने किसी से पूछा कि अब बस की लाइनें नहीं लगती हैं क्या, तो उसने तपाक से कहा, बसें ही अब कहां हैं जो लाइनें लगेंगी। आपको याद होगा कि घरों में गेहूं को खुद ही साफ करके चक्की पर पिसवाने ले जाया करते थे। हम खुद पीपा उठाकर चक्की तक जाते थे और वहां पर भी लाइन लगी होती थी। वहां देखते थे कि कहीं हमारे बढ़िया गेहूं से पिसते आटे में उसने अपना आटा तो नहीं मिला दिया, या आटा कम तो नहीं दिया/ 

तब लोग खूब मोल-भाव करके खरीदारी करते थे। महिलाएं सब्जी खरीदते हुए जब तक मुफ्त में धनिया और मिर्च न डलवा लें, तब तक उन्हें संतोष नहीं होता था। ये लाइनें बड़ा संयम सिखाती थीं। गर्मी-सर्दी का कोई असर न था। पता नहीं, अब लाइनों का वह समय कहां जा रहा है। ऐसा तो नहीं लगता कि इन लाइनों का समय बचा कर हम बहुत बड़े तीर मार रहे हों। बाहर की लाइनें तो खत्म हुई, पर मन के भीतर की लाइनें लंबी हैं। 

हमारी चाहतें बहुत बढ़ गई हैं लेकिन मन अशांत है। तब लंबी-लंबी कतारों के बावजूद तन और मन दोनों शांत थे। आज ऑनलाइन ने अड़ोस-पड़ोस तो खत्म कर ही दिया है, रिश्तेदारी भी खत्म कर दी। खुद वस्तुएं देखकर खरीदने का जो सुख था, वह भी खत्म हो गया। ऐसा लगता है कि लेने के लिए चीजें ली जा रही हैं, चाहे उनकी जरूरत भी न हो। मुझे याद है कि पहले पूरा परिवार मिलकर शॉपिंग करने जाता था। पर अब कोई भी अपने बंद कमरे में बैठकर किसी भी चीज का ऑनलाइन ऑर्डर कर देता है, घर में किसी दूसरे को पता भी नहीं चलता। आप मोबाइल पर ऑनलाइन काम कर रहे हैं। आपको कोई चीज दिखाई देती है, आपको जरूरत न हो तो भी आप बटन दबाकर उस चीज का ऑर्डर कर देते हैं। 

तब जिंदगी अच्छी-खासी लाइन में गुजर जाती थी, पर कतारों के भी बड़े फायदे थे। इसमें खड़े-खड़े दुनिया भर की बातें होती थीं। पता चल जाता था कि पास-पड़ोस में क्या चल रहा है। एक तरह से इन लाइनों के कारण समाज में सब जुड़े हुए थे। इन्हीं लाइनों में तकरारें, झगड़े भी हो जाते थे, पर उनमें भी एक मिठास थी। और इन्हीं लाइनों में प्रेम-मोहब्बत के किस्से भी हो जाते थे। आज सारा देश, खास तौर से नई पीढ़ी ऑनलाइन की लाइन में लग गई है। लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग ने इंसान को इंसान से काट दिया है। कुछ लोग कहते हैं कि टाइम नहीं है, इसलिए ऑनलाइन सामान मंगवाते हैं। पर मैं कहता हूं कि घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो समाज को क्या जानोगे, देश की समस्याओं को क्या पहचानोगे! 

(लेखकराज्यसभा सांसद हैं)

साभार -नवभारत टाइम्स-01/06/2019 

23 March 2019

मैं नास्तिक क्यों हूँ?............भगत सिंह

यह लेख भगत सिंह ने जेल में रहते हुए लिखा था और यह 27 सितम्बर 1931 को लाहौर के अखबार “ द पीपल “ में प्रकाशित हुआ । इस लेख में भगतसिंह ने ईश्वर कि उपस्थिति पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किये हैं और इस संसार के निर्माण , मनुष्य के जन्म , मनुष्य के मन में ईश्वर की कल्पना के साथ साथ संसार में मनुष्य की दीनता , उसके शोषण , दुनिया में व्याप्त अराजकता और और वर्गभेद की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है । यह भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित हिस्सों में रहा है।
स्वतन्त्रता सेनानी बाबा रणधीर सिंह 1930-31के बीच लाहौर के सेन्ट्रल जेल में कैद थे। वे एक धार्मिक व्यक्ति थे जिन्हें यह जान कर बहुत कष्ट हुआ कि भगतसिंह का ईश्वर पर विश्वास नहीं है। वे किसी तरह भगत सिंह की कालकोठरी में पहुँचने में सफल हुए और उन्हें ईश्वर के अस्तित्व पर यकीन दिलाने की कोशिश की। असफल होने पर बाबा ने नाराज होकर कहा, “प्रसिद्धि से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है और तुम अहंकारी बन गए हो जो कि एक काले पर्दे के तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ी है। इस टिप्पणी के जवाब में ही भगतसिंह ने यह लेख लिखा।

एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मैं किसी अहंकार के कारण सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी तथा सर्वज्ञानी ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास नहीं करता हूँ? मेरे कुछ दोस्त – शायद ऐसा कहकर मैं उन पर बहुत अधिकार नहीं जमा रहा हूँ – मेरे साथ अपने थोड़े से सम्पर्क में इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये उत्सुक हैं कि मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकार कर कुछ ज़रूरत से ज़्यादा आगे जा रहा हूँ और मेरे घमण्ड ने कुछ हद तक मुझे इस अविश्वास के लिये उकसाया है। मैं ऐसी कोई शेखी नहीं बघारता कि मैं मानवीय कमज़ोरियों से बहुत ऊपर हूँ। मैं एक मनुष्य हूँ, और इससे अधिक कुछ नहीं। कोई भी इससे अधिक होने का दावा नहीं कर सकता। यह कमज़ोरी मेरे अन्दर भी है। अहंकार भी मेरे स्वभाव का अंग है। अपने कामरेडो के बीच मुझे निरंकुश कहा जाता था। यहाँ तक कि मेरे दोस्त श्री बटुकेश्वर कुमार दत्त भी मुझे कभी-कभी ऐसा कहते थे। कई मौकों पर स्वेच्छाचारी कह मेरी निन्दा भी की गयी। कुछ दोस्तों को शिकायत है, और गम्भीर रूप से है कि मैं अनचाहे ही अपने विचार, उन पर थोपता हूँ और अपने प्रस्तावों को मनवा लेता हूँ। यह बात कुछ हद तक सही है। इससे मैं इनकार नहीं करता। इसे अहंकार कहा जा सकता है। जहाँ तक अन्य प्रचलित मतों के मुकाबले हमारे अपने मत का सवाल है। मुझे निश्चय ही अपने मत पर गर्व है। लेकिन यह व्यक्तिगत नहीं है। ऐसा हो सकता है कि यह केवल अपने विश्वास के प्रति न्यायोचित गर्व हो और इसको घमण्ड नहीं कहा जा सकता। घमण्ड तो स्वयं के प्रति अनुचित गर्व की अधिकता है। क्या यह अनुचित गर्व है, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया? अथवा इस विषय का खूब सावधानी से अध्ययन करने और उस पर खूब विचार करने के बाद मैंने ईश्वर पर अविश्वास किया?
मैं यह समझने में पूरी तरह से असफल रहा हूँ कि अनुचित गर्व या वृथाभिमान किस तरह किसी व्यक्ति के ईश्वर में विश्वास करने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है? किसी वास्तव में महान व्यक्ति की महानता को मैं मान्यता न दूँ – यह तभी हो सकता है, जब मुझे भी थोड़ा ऐसा यश प्राप्त हो गया हो जिसके या तो मैं योग्य नहीं हूँ या मेरे अन्दर वे गुण नहीं हैं, जो इसके लिये आवश्यक हैं। यहाँ तक तो समझ में आता है। लेकिन यह कैसे हो सकता है कि एक व्यक्ति, जो ईश्वर में विश्वास रखता हो, सहसा अपने व्यक्तिगत अहंकार के कारण उसमें विश्वास करना बन्द कर दे? दो ही रास्ते सम्भव हैं। या तो मनुष्य अपने को ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी समझने लगे या वह स्वयं को ही ईश्वर मानना शुरू कर दे। इन दोनो ही अवस्थाओं में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता। पहली अवस्था में तो वह अपने प्रतिद्वन्द्वी के अस्तित्व को नकारता ही नहीं है। दूसरी अवस्था में भी वह एक ऐसी चेतना के अस्तित्व को मानता है, जो पर्दे के पीछे से प्रकृति की सभी गतिविधियों का संचालन करती है। मैं तो उस सर्वशक्तिमान परम आत्मा के अस्तित्व से ही इनकार करता हूँ। यह अहंकार नहीं है, जिसने मुझे नास्तिकता के सिद्धान्त को ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया। मैं न तो एक प्रतिद्वन्द्वी हूँ, न ही एक अवतार और न ही स्वयं परमात्मा। इस अभियोग को अस्वीकार करने के लिये आइए तथ्यों पर गौर करें। मेरे इन दोस्तों के अनुसार, दिल्ली बम केस और लाहौर षडयन्त्र केस के दौरान मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ।
मेरा नास्तिकतावाद कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब मैं एक अप्रसिद्ध नौजवान था। कम से कम एक कालेज का विद्यार्थी तो ऐसे किसी अनुचित अहंकार को नहीं पाल-पोस सकता, जो उसे नास्तिकता की ओर ले जाये। यद्यपि मैं कुछ अध्यापकों का चहेता था तथा कुछ अन्य को मैं अच्छा नहीं लगता था। पर मैं कभी भी बहुत मेहनती अथवा पढ़ाकू विद्यार्थी नहीं रहा। अहंकार जैसी भावना में फँसने का कोई मौका ही न मिल सका। मैं तो एक बहुत लज्जालु स्वभाव का लड़का था, जिसकी भविष्य के बारे में कुछ निराशावादी प्रकृति थी। मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डी0 ए0 वी0 स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त में घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिये अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ। असहयोग आन्दोलन के दिनों में राष्ट्रीय कालेज में प्रवेश लिया। यहाँ आकर ही मैंने सारी धार्मिक समस्याओं – यहाँ तक कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में उदारतापूर्वक सोचना, विचारना तथा उसकी आलोचना करना शुरू किया। पर अभी भी मैं पक्का आस्तिक था। उस समय तक मैं अपने लम्बे बाल रखता था। यद्यपि मुझे कभी-भी सिक्ख या अन्य धर्मों की पौराणिकता और सिद्धान्तों में विश्वास न हो सका था। किन्तु मेरी ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ निष्ठा थी। बाद में मैं क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। वहाँ जिस पहले नेता से मेरा सम्पर्क हुआ वे तो पक्का विश्वास न होते हुए भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस ही नहीं कर सकते थे। ईश्वर के बारे में मेरे हठ पूर्वक पूछते रहने पर वे कहते, ‘'जब इच्छा हो, तब पूजा कर लिया करो।'’ यह नास्तिकता है, जिसमें साहस का अभाव है। दूसरे नेता, जिनके मैं सम्पर्क में आया, पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल आजकल काकोरी षडयन्त्र केस के सिलसिले में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी पुस्तक ‘बन्दी जीवन’ ईश्वर की महिमा का ज़ोर-शोर से गान है। उन्होंने उसमें ईश्वर के ऊपर प्रशंसा के पुष्प रहस्यात्मक वेदान्त के कारण बरसाये हैं। 28 जनवरी, 1925 को पूरे भारत में जो ‘दि रिवोल्यूशनरी’ (क्रान्तिकारी) पर्चा बाँटा गया था, वह उन्हीं के बौद्धिक श्रम का परिणाम है। उसमें सर्वशक्तिमान और उसकी लीला एवं कार्यों की प्रशंसा की गयी है। मेरा ईश्वर के प्रति अविश्वास का भाव क्रान्तिकारी दल में भी प्रस्फुटित नहीं हुआ था। काकोरी के सभी चार शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन-प्रार्थना में गुजारे थे। राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ एक रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। समाजवाद तथा साम्यवाद में अपने वृहद अध्ययन के बावजूद राजेन लाहड़ी उपनिषद एवं गीता के श्लोकों के उच्चारण की अपनी अभिलाषा को दबा न सके। मैंने उन सब मे सिर्फ एक ही व्यक्ति को देखा, जो कभी प्रार्थना नहीं करता था और कहता था, ‘'दर्शन शास्त्र मनुष्य की दुर्बलता अथवा ज्ञान के सीमित होने के कारण उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है। परन्तु उसने भी ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की कभी हिम्मत नहीं की।
इस समय तक मैं केवल एक रोमान्टिक आदर्शवादी क्रान्तिकारी था। अब तक हम दूसरों का अनुसरण करते थे। अब अपने कन्धों पर ज़िम्मेदारी उठाने का समय आया था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था। ‘अध्ययन’ की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँज रही थी – विरोधियों द्वारा रखे गये तर्कों का सामना करने योग्य बनने के लिये अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने के लिये सक्षम होने के वास्ते पढ़ो। मैंने पढ़ना शुरू कर दिया। इससे मेरे पुराने विचार व विश्वास अद्भुत रूप से परिष्कृत हुए। रोमांस की जगह गम्भीर विचारों ने ली ली। न और अधिक रहस्यवाद, न ही अन्धविश्वास। यथार्थवाद हमारा आधार बना। मुझे विश्वक्रान्ति के अनेक आदर्शों के बारे में पढ़ने का खूब मौका मिला। मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा, कुछ साम्यवाद के पिता माक्र्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढ़ा, जो अपने देश में सफलतापूर्वक क्रान्ति लाये थे। ये सभी नास्तिक थे। बाद में मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान परम आत्मा की बात, जिसने ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन और संचालन किया, एक कोरी बकवास है। मैंने अपने इस अविश्वास को प्रदर्शित किया। मैंने इस विषय पर अपने दोस्तों से बहस की। मैं एक घोषित नास्तिक हो चुका था।
मई 1927 में मैं लाहौर में गिरफ़्तार हुआ। रेलवे पुलिस हवालात में मुझे एक महीना काटना पड़ा। पुलिस अफ़सरों ने मुझे बताया कि मैं लखनऊ में था, जब वहाँ काकोरी दल का मुकदमा चल रहा था, कि मैंने उन्हें छुड़ाने की किसी योजना पर बात की थी, कि उनकी सहमति पाने के बाद हमने कुछ बम प्राप्त किये थे, कि 1927 में दशहरा के अवसर पर उन बमों में से एक परीक्षण के लिये भीड़ पर फेंका गया, कि यदि मैं क्रान्तिकारी दल की गतिविधियों पर प्रकाश डालने वाला एक वक्तव्य दे दूँ, तो मुझे गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा और इसके विपरीत मुझे अदालत में मुखबिर की तरह पेश किये बेगैर रिहा कर दिया जायेगा और इनाम दिया जायेगा। मैं इस प्रस्ताव पर हँसा। यह सब बेकार की बात थी। हम लोगों की भाँति विचार रखने वाले अपनी निर्दोष जनता पर बम नहीं फेंका करते। एक दिन सुबह सी0 आई0 डी0 के वरिष्ठ अधीक्षक श्री न्यूमन ने कहा कि यदि मैंने वैसा वक्तव्य नहीं दिया, तो मुझ पर काकोरी केस से सम्बन्धित विद्रोह छेड़ने के षडयन्त्र तथा दशहरा उपद्रव में क्रूर हत्याओं के लिये मुकदमा चलाने पर बाध्य होंगे और कि उनके पास मुझे सजा दिलाने व फाँसी पर लटकवाने के लिये उचित प्रमाण हैं। उसी दिन से कुछ पुलिस अफ़सरों ने मुझे नियम से दोनो समय ईश्वर की स्तुति करने के लिये फुसलाना शुरू किया। पर अब मैं एक नास्तिक था। मैं स्वयं के लिये यह बात तय करना चाहता था कि क्या शान्ति और आनन्द के दिनों में ही मैं नास्तिक होने का दम्भ भरता हूँ या ऐसे कठिन समय में भी मैं उन सिद्धान्तों पर अडिग रह सकता हूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने निश्चय किया कि किसी भी तरह ईश्वर पर विश्वास तथा प्रार्थना मैं नहीं कर सकता। नहीं, मैंने एक क्षण के लिये भी नहीं की। यही असली परीक्षण था और मैं सफल रहा। अब मैं एक पक्का अविश्वासी था और तब से लगातार हूँ। इस परीक्षण पर खरा उतरना आसान काम न था। ‘विश्वास’ कष्टों को हलका कर देता है। यहाँ तक कि उन्हें सुखकर बना सकता है। ईश्वर में मनुष्य को अत्यधिक सान्त्वना देने वाला एक आधार मिल सकता है। उसके बिना मनुष्य को अपने ऊपर निर्भर करना पड़ता है। तूफ़ान और झंझावात के बीच अपने पाँवों पर खड़ा रहना कोई बच्चों का खेल नहीं है। परीक्षा की इन घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जाता है और मनुष्य अपने विश्वास को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता। यदि ऐसा करता है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं वरन् कोई अन्य शक्ति है। आज बिलकुल वैसी ही स्थिति है। निर्णय का पूरा-पूरा पता है। एक सप्ताह के अन्दर ही यह घोषित हो जायेगा कि मैं अपना जीवन एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ। इस विचार के अतिरिक्त और क्या सान्त्वना हो सकती है? ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग में व्याप्त समृद्धि के आनन्द की तथा अपने कष्टों और बलिदान के लिये पुरस्कार की कल्पना कर सकता है। किन्तु मैं क्या आशा करूँ? मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था। जिस दिन हमें इस मनोवृत्ति के बहुत-से पुरुष और महिलाएँ मिल जायेंगे, जो अपने जीवन को मनुष्य की सेवा और पीड़ित मानवता के उद्धार के अतिरिक्त कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, उसी दिन मुक्ति के युग का शुभारम्भ होगा। वे शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को चुनौती देने के लिये उत्प्रेरित होंगे। इस लिये नहीं कि उन्हें राजा बनना है या कोई अन्य पुरस्कार प्राप्त करना है यहाँ या अगले जन्म में या मृत्योपरान्त स्वर्ग में। उन्हें तो मानवता की गर्दन से दासता का जुआ उतार फेंकने और मुक्ति एवं शान्ति स्थापित करने के लिये इस मार्ग को अपनाना होगा। क्या वे उस रास्ते पर चलेंगे जो उनके अपने लिये ख़तरनाक किन्तु उनकी महान आत्मा के लिये एक मात्र कल्पनीय रास्ता है। क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को अहंकार कहकर उसका गलत अर्थ लगाया जायेगा? कौन इस प्रकार के घृणित विशेषण बोलने का साहस करेगा? या तो वह मूर्ख है या धूर्त। हमें चाहिए कि उसे क्षमा कर दें, क्योंकि वह उस हृदय में उद्वेलित उच्च विचारों, भावनाओं, आवेगों तथा उनकी गहराई को महसूस नहीं कर सकता। उसका हृदय मांस के एक टुकड़े की तरह मृत है। उसकी आँखों पर अन्य स्वार्थों के प्रेतों की छाया पड़ने से वे कमज़ोर हो गयी हैं। स्वयं पर भरोसा रखने के गुण को सदैव अहंकार की संज्ञा दी जा सकती है। यह दुखपूर्ण और कष्टप्रद है, पर चारा ही क्या है?
आलोचना और स्वतन्त्र विचार एक क्रान्तिकारी के दोनो अनिवार्य गुण हैं। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने किसी परम आत्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। अतः कोई भी व्यक्ति जो उस विश्वास को सत्यता या उस परम आत्मा के अस्तित्व को ही चुनौती दे, उसको विधर्मी, विश्वासघाती कहा जायेगा। यदि उसके तर्क इतने अकाट्य हैं कि उनका खण्डन वितर्क द्वारा नहीं हो सकता और उसकी आस्था इतनी प्रबल है कि उसे ईश्वर के प्रकोप से होने वाली विपत्तियों का भय दिखा कर दबाया नहीं जा सकता तो उसकी यह कह कर निन्दा की जायेगी कि वह वृथाभिमानी है। यह मेरा अहंकार नहीं था, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मेरे तर्क का तरीका संतोषप्रद सिद्ध होता है या नहीं इसका निर्णय मेरे पाठकों को करना है, मुझे नहीं। मैं जानता हूँ कि ईश्वर पर विश्वास ने आज मेरा जीवन आसान और मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर मेरे अविश्वास ने सारे वातावरण को अत्यन्त शुष्क बना दिया है। थोड़ा-सा रहस्यवाद इसे कवित्वमय बना सकता है। किन्तु मेरे भाग्य को किसी उन्माद का सहारा नहीं चाहिए। मैं यथार्थवादी हूँ। मैं अन्तः प्रकृति पर विवेक की सहायता से विजय चाहता हूँ। इस ध्येय में मैं सदैव सफल नहीं हुआ हूँ। प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है। कोई भी मनुष्य, जिसमें तनिक भी विवेक शक्ति है, वह अपने वातावरण को तार्किक रूप से समझना चाहेगा। जहाँ सीधा प्रमाण नहीं है, वहाँ दर्शन शास्त्र का महत्व है। जब हमारे पूर्वजों ने फुरसत के समय विश्व के रहस्य को, इसके भूत, वर्तमान एवं भविष्य को, इसके क्यों और कहाँ से को समझने का प्रयास किया तो सीधे परिणामों के कठिन अभाव में हर व्यक्ति ने इन प्रश्नों को अपने ढ़ंग से हल किया। यही कारण है कि विभिन्न धार्मिक मतों में हमको इतना अन्तर मिलता है, जो कभी-कभी वैमनस्य तथा झगड़े का रूप ले लेता है। न केवल पूर्व और पश्चिम के दर्शनों में मतभेद है, बल्कि प्रत्येक गोलार्ध के अपने विभिन्न मतों में आपस में अन्तर है। पूर्व के धर्मों में, इस्लाम तथा हिन्दू धर्म में ज़रा भी अनुरूपता नहीं है। भारत में ही बौद्ध तथा जैन धर्म उस ब्राह्मणवाद से बहुत अलग है, जिसमें स्वयं आर्यसमाज व सनातन धर्म जैसे विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय का एक स्वतन्त्र विचारक चार्वाक है। उसने ईश्वर को पुराने समय में ही चुनौती दी थी। हर व्यक्ति अपने को सही मानता है। दुर्भाग्य की बात है कि बजाय पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को भविष्य में अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई का आधार बनाने के हम आलसियों की तरह, जो हम सिद्ध हो चुके हैं, उनके कथन में अविचल एवं संशयहीन विश्वास की चीख पुकार करते रहते हैं और इस प्रकार मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
सिर्फ विश्वास और अन्ध विश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी। प्रचलित मतों को तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि वे तर्क का प्रहार न सह सके, तो टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़ेगा। तब नये दर्शन की स्थापना के लिये उनको पूरा धराशायी करकेे जगह साफ करना और पुराने विश्वासों की कुछ बातों का प्रयोग करके पुनर्निमाण करना। मैं प्राचीन विश्वासांे के ठोसपन पर प्रश्न करने के सम्बन्ध में आश्वस्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन एवं संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है। हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और समस्त प्रगतिशील आन्दोलन का ध्येय मनुष्य द्वारा अपनी सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है। यही हमारा दर्शन है। हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।
यदि आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने विश्व की रचना की, तो कृपा करके मुझे यह बतायें कि उसने यह रचना क्यों की? कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया – असंख्य दुखों के शाश्वत अनन्त गठबन्धनों से ग्रसित! एक भी व्यक्ति तो पूरी तरह संतृष्ट नही है। कृपया यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बँधा है तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। वह भी हमारी ही तरह नियमों का दास है। कृपा करके यह भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है। नीरो ने बस एक रोम जलाया था। उसने बहुत थोड़ी संख्या में लोगांें की हत्या की थी। उसने तो बहुत थोड़ा दुख पैदा किया, अपने पूर्ण मनोरंजन के लिये। और उसका इतिहास में क्या स्थान है? उसे इतिहासकार किस नाम से बुलाते हैं? सभी विषैले विशेषण उस पर बरसाये जाते हैं। पन्ने उसकी निन्दा के वाक्यों से काले पुते हैं, भत्र्सना करते हैं – नीरो एक हृदयहीन, निर्दयी, दुष्ट। एक चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये कुछ हजार जानें ले लीं और आज हम उसके नाम से घृणा करते हैं। तब किस प्रकार तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? उस शाश्वत नीरो को, जो हर दिन, हर घण्टे ओर हर मिनट असंख्य दुख देता रहा, और अभी भी दे रहा है। फिर तुम कैसे उसके दुष्कर्मों का पक्ष लेने की सोचते हो, जो चंगेज खाँ से प्रत्येक क्षण अधिक है? क्या यह सब बाद में इन निर्दोष कष्ट सहने वालों को पुरस्कार और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है। तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव करने का साहस इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा? ग्लैडिएटर संस्था के व्यवस्थापक कहाँ तक उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो कि, यदि वह उससे जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी? इसलिये मैं पूछता हूँ कि उस चेतन परम आत्मा ने इस विश्व और उसमें मनुष्यों की रचना क्यों की? आनन्द लूटने के लिये? तब उसमें और नीरो में क्या फर्क है?
तुम मुसलमानो और ईसाइयो! तुम तो पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तुम तो हिन्दुओं की तरह यह तर्क पेश नहीं कर सकते कि प्रत्यक्षतः निर्दोष व्यक्तियों के कष्ट उनके पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि उस सर्वशक्तिशाली ने शब्द द्वारा विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन तक क्यों परिश्रम किया? और प्रत्येक दिन वह क्यों कहता है कि सब ठीक है? बुलाओ उसे आज। उसे पिछला इतिहास दिखाओ। उसे आज की परिस्थितियों का अध्ययन करने दो। हम देखेंगे कि क्या वह कहने का साहस करता है कि सब ठीक है। कारावास की काल-कोठरियों से लेकर झोपड़ियों की बस्तियों तक भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से लेकर उन शोषित मज़दूरों से लेकर जो पूँजीवादी पिशाच द्वारा खून चूसने की क्रिया को धैर्यपूर्वक निरुत्साह से देख रहे हैं तथा उस मानवशक्ति की बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति, जिसे तनिक भी सहज ज्ञान है, भय से सिहर उठेगा, और अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने से लेकर राजाआंे के उन महलों तक जिनकी नींव मानव की हड्डियों पर पड़ी है- उसको यह सब देखने दो और फिर कहे – सब कुछ ठीक है! क्यों और कहाँ से? यही मेरा प्रश्न है। तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।
और तुम हिन्दुओ, तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, ये पूर्वजन्म के पापी हैं और आज के उत्पीड़क पिछले जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः वे सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं। मुझे यह मानना पड़ता है कि आपके पूर्वज बहुत चालाक व्यक्ति थे। उन्होंने ऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के सभी प्रयासों को विफल करने की काफ़ी ताकत है। न्यायशास्त्र के अनुसार दण्ड को अपराधी पर पड़ने वाले असर के आधार पर केवल तीन कारणों से उचित ठहराया जा सकता है। वे हैं – प्रतिकार, भय तथा सुधार। आज सभी प्रगतिशील विचारकों द्वारा प्रतिकार के सिद्धान्त की निन्दा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। सुधार करने का सिद्धान्त ही केवल आवश्यक है और मानवता की प्रगति के लिये अनिवार्य है। इसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक के रूप में समाज को लौटाना है। किन्तु यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान भी लें, तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है? तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्डों को गिनाते हो। मैं पूछता हूँ कि मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है? तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे? एक भी नहीं? अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक कथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। और फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है। मैं पूछता हूँ कि दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो अनिवार्यतः मनुष्य को और अधिक अपराध करने को बाध्य करे? क्या तुम्हारे ईश्वर ने यह नहीं सोचा था या उसको भी ये सारी बातें मानवता द्वारा अकथनीय कष्टों के झेलने की कीमत पर अनुभव से सीखनी थीं? तुम क्या सोचते हो, किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे एक चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का क्या भाग्य होगा? चूँकि वह गरीब है, इसलिये पढ़ाई नहीं कर सकता। वह अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण अपने को ऊँचा समझते हैं। उसका अज्ञान, उसकी गरीबी तथा उससे किया गया व्यवहार उसके हृदय को समाज के प्रति निष्ठुर बना देते हैं। यदि वह कोई पाप करता है तो उसका फल कौन भोेगेगा? ईष्वर, वह स्वयं या समाज के मनीषी? और उन लोगों के दण्ड के बारे में क्या होगा, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा तथा जिनको तुम्हारी ज्ञान की पवित्र पुस्तकों – वेदों के कुछ वाक्य सुन लेने के कारण कान में पिघले सीसे की धारा सहन करने की सजा भुगतनी पड़ती थी? यदि वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा? और उनका प्रहार कौन सहेगा? मेरे प्रिय दोस्तों! ये सिद्धान्त विशेषाधिकार युक्त लोगों के आविष्कार हैं। ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहराते हैं। अपटान सिंक्लेयर ने लिखा था कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो और उसके बाद उसकी सारी सम्पत्ति लूट लो। वह बगैर बड़बड़ाये इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा। धर्म के उपदेशकों तथा सत्ता के स्वामियों के गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और ये सिद्धान्त उपजते हैं।
मैं पूछता हूँ तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर हर व्यक्ति को क्यों नहीं उस समय रोकता है जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है? यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है। उसने क्यों नहीं लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया और इस प्रकार विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से उसे बचाया? उसने अंग्रेजों के मस्तिष्क में भारत को मुक्त कर देने की भावना क्यों नहीं पैदा की? वह क्यों नहीं पूँजीपतियों के हृदय में यह परोपकारी उत्साह भर देता कि वे उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार त्याग दें और इस प्रकार केवल सम्पूर्ण श्रमिक समुदाय, वरन समस्त मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें? आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। मैं इसे आपके सर्वशक्तिमान पर छोड़ देता हूँ कि वह लागू करे। जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। वे इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर इसका विरोध करते हैं। परमात्मा को आने दो और वह चीज को सही तरीके से कर दे। अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं है कि ईश्वर चाहता है बल्कि इसलिये कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं। वे हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं, बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध – एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचार पूर्ण शोषण – सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो, एक चंगेज, उसका नाश हो!
क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ। चाल्र्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी। कब? इतिहास देखो। इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ‘जीव की उत्पत्ति’ पढ़ो। और तदुपरान्त सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ। यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है। अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो। यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे? मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है। जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे। अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है और दर्शन अत्यन्त विकसित। इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के अस्तित्व का उपदेश देकर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे तथा उनसे अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे। सभी धर्म, समप्रदाय, पन्थ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक संस्थाओं, व्यक्तियों तथा वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह हर धर्म में सदैव ही पाप रहा है।
मनुष्य की सीमाओं को पहचानने पर, उसकी दुर्बलता व दोष को समझने के बाद परीक्षा की घड़ियों में मनुष्य को बहादुरी से सामना करने के लिये उत्साहित करने, सभी ख़तरों को पुरुषत्व के साथ झेलने तथा सम्पन्नता एवं ऐश्वर्य में उसके विस्फोट को बाँधने के लिये ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। अपने व्यक्तिगत नियमों तथा अभिभावकीय उदारता से पूर्ण ईश्वर की बढ़ा-चढ़ा कर कल्पना एवं चित्रण किया गया। जब उसकी उग्रता तथा व्यक्तिगत नियमों की चर्चा होती है, तो उसका उपयोग एक भय दिखाने वाले के रूप में किया जाता है। ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। जब उसके अभिभावक गुणों की व्याख्या होती ह,ै तो उसका उपयोग एक पिता, माता, भाई, बहन, दोस्त तथा सहायक की तरह किया जाता है। जब मनुष्य अपने सभी दोस्तों द्वारा विश्वासघात तथा त्याग देने से अत्यन्त क्लेष में हो, तब उसे इस विचार से सान्त्वना मिल सकती हे कि एक सदा सच्चा दोस्त उसकी सहायता करने को है, उसको सहारा देगा तथा वह सर्वशक्तिमान है और कुछ भी कर सकता है। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है। समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा। मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है, तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए और उन सभी कष्टों, परेशानियों का पुरुषत्व के साथ सामना करना चाहिए, जिनमें परिस्थितियाँ उसे पटक सकती हैं। यही आज मेरी स्थिति है। यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त! यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
हमें देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ। मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी तो उसने कहा, ‘'अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे।'’ मैंने कहा, ‘'नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।'’ पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है? अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।

Date Written: 1931
Author: Bhagat Singh
Title: Why I Am An Atheist (Main nastik kyon hoon)
First Published: Baba Randhir Singh, a freedom fighter, was in Lahore Central Jail in 1930-31. He was a God-fearing religious man. It pained him to learn that Bhagat Singh was a non-believer. He somehow managed to see Bhagat Singh in the condemned cell and tried to convince him about the existence of God, but failed. Baba lost his temper and said tauntingly: “You are giddy with fame and have developed and ago which is standing like a black curtain between you and the God.” It was in reply to that remark that Bhagat Singh wrote this article. First appeared in The People, Lahore on September 27, 1931.


20 May 2017

दक्षिण की एक फिल्म से क्यों थर्रा गया बॉलीवुड-सुनील मिश्र, फिल्म समीक्षक

हिंदुस्तान-19/मई/2017
तीन सप्ताह से दिलचस्प तमाशा देखने में आ रहा है।  दक्षिण से दो-तीन साल पहले बनकर आई फिल्म बाहुबली  ने जैसे बॉलीवुड की सारी प्रतिभाओं और क्षमताओं पर तुषारापात करके रख दिया था। बॉलीवुड के ही बरसों से खाली बैठे एक निर्माता उसके वितरक बन बैठे और इतना धन अर्जित किया, जितना यदि वह खुद कोई फिल्म बनाते तो भी न अर्जित कर पाते। केवल डिस्ट्रीब्यूशन से उनके चेहरे पर आर्थिक सफलता की वह मुस्कान तिर गई कि उनको बैठे-बिठाए यही लाभ का धंधा नजर आया। जबकि उनकी पहचान एक ऐसे युवा फिल्मकार के रूप में बनी हुई है, जो नए जमाने के समझ-बूझ वाले सिनेमा का जानकार है और उसकी नब्ज भी समझता है। ऐसा निर्माता एक वितरक के रूप में अपनी कमाई पर गर्व कर तो रहा था, लेकिन शायद वह यह समझने को तैयार नहीं था कि यह धंधा ही उसके परंपरागत कारोबार के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। 
बाहुबली का निर्माण और उसके पहले संस्करण की सफलता दरअसल मुंबइया सिनेमा को आईना दिखाने वाली बड़ी घटना थी। भारतीय सिनेमा में, सिनेमा के प्रति प्रतिबद्धता, समर्पण, सिनेमा को एक बड़ा और सबसे ज्यादा सांस्कृतिक रूप से संप्रेषणीय आयाम मानकर तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम में बनने वाली अनूठी व असाधारण फिल्मों की एक परंपरा रही है। आज भी दक्षिण की ही फिल्मों को सबसे ज्यादा श्रेणियों में नेशनल अवॉर्ड मिलता है, तो इसकी वजह ही यह है कि वे सिनेमा को अपनी संस्कृति और परंपरा के विस्तार का अविभाज्य अंग मानते हैं। हिंदी सिनेमा में मुंबइया सिनेमा के साथ-साथ बरसों तक दक्षिण का पारिवारिक व सामाजिक सिनेमा चला है, जिसमें जेमिनी व प्रसाद प्रोडक्शंस जैसे घरानों के योगदान को नहीं भुला सकते।
बॉलीवुड के कलाकार 30 साल से ज्यादा समय से अपनी सुरक्षित और व्यावसायिकता की आदर्श शर्तों से भरी रोजी-रोटी दक्षिण के सिनेमा से प्राप्त करते रहे हैं। बॉलीवुड भले बहुत उदार न रहा हो, लेकिन दक्षिण के सिनेमा में बॉलीवुड के सितारों को बहुत उदारतापूर्वक अपनाया गया है। लगभग इतने ही समय से दक्षिण भाषायी फिल्मों का हिंदी में भी निर्माण होता आ रहा है, पिछले एक दशक में यह और अधिक बढ़ गया है। दक्षिण में सिनेमा के 50 दिन चलने पर निर्माता फिर से उसके हजारों-लाखों पोस्टर लगवाकर जश्न मनाता है और दर्शकों का उपकार मानता है, जब सौ दिन या सिल्वर जुबली होती है, तब तो बात अलग ही होती है। सलमान खान को भी दक्षिण से अच्छी स्क्रिप्ट की तलाश रहती है और अक्षय कुमार को भी दक्षिण से प्रेरित कहानियों ने सितारा बनाने में योगदान किया है।
ऐसे केंद्र से बाहुबली का प्रदर्शित होना सब तरफ चमत्कार की तरह प्रचारित कर दिया गया है। बाहुबली का प्रथम प्रदर्शन व उससे जुड़े कौतुहलपूर्ण प्रश्नों को देखते हुए शोले का समय याद आ गया, जिसके संवाद आज भी भुलाए नहीं जा सके हैं। पहले बाहुबली से उपजे प्रश्न का समाधान हमारे देश को इस बाहुबली में जाकर जितनी आसानी से मिल गया, वह कम हास्यास्पद नहीं है, पर यह भी उल्लेखनीय है कि दक्षिण की फिल्म निर्माण संस्थाएं व लोग सस्पेंस, रहस्य व गोपनीयता को आखिरी समय तक जाहिर नहीं होने देते। उन्हें यदि दर्शकों को अचंभित करना है, तो उसकी पूरी तैयारी होती है।
बाहुबली के दूसरे भाग के लिए पूरे देश के सिनेमाघर पूरी तरह शरणागत होकर रह गए। निर्माता, निर्देशक और सितारों ने अपना ध्यान खेल में लगाया और पलक-पांवड़े बिछाकर बाहुबली भाग-दो का स्वागत किया। सारे सिनेमाघर, सारे शो ऐसे इस फिल्म ने मुट्ठी में कर लिए जैसे दूसरी फिल्मों को देश-निकाला दे दिया गया हो। आत्महीनता और गिरे आत्मविश्वास की बात है कि इस तूफान से भयभीत दूसरे निर्माता पीठ करके खड़े हो गए। हाल यह है कि देश के हर सिनेमाघर, हर शो में सिर्फ बाहुबली। देखो तो बाहुबली, न देखो तो बाहुबली। वास्तव में यह दयनीय स्थिति है सिनेमा के लोकतंत्र के लिए, सिनेमा की संस्कृति के लिए। कहना मुश्किल है कि इसमें कितना बाहुबली का अपना बल था और कितना दूसरों की भुजाओं को काठ मार जाना।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-19/मई/2017

01 February 2016

मुझे रंजीत कात्याल ने नहीं बचाया था----विजू चेरियन, असिस्टेंट एडिटर, हिन्दुस्तान टाइम्स



साल 1990 में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया था, तो वहां से मुझे भारत सरकार ने एयरलिफ्ट किया था, और दो महीने के उस घटनाक्रम की जो यादें मेरे जेहन में हैं, वे अक्षय कुमार की फिल्म एयरलिफ्ट  से बिल्कुल मेल नहीं खातीं। यह फिल्म अभी-अभी बॉक्स ऑफिस पर आई है।
फिल्म में भारत सरकार को संवेदनहीन व अक्षम दिखाया गया है। मगर इस फिल्म को लेकर मेरा अनुभव यही है कि यह सच के कहीं आस-पास भी नहीं है। वास्तव में वह अतिसंवेदनशील बच्चा आज भी दिल से भारत का आभारी है, जिसे उस संकटग्रस्त जगह से निकाला गया था। यह जरूर है कि देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत यह फिल्म गणतंत्र दिवस पर हमारे अंदर राष्ट्रभक्ति का जज्बा बढ़ाती है। मगर मुझे दिक्कत है, तो मुख्य नायक कारोबारी रंजीत कात्याल की भूमिका से, जिन्हें फिल्म में सारा श्रेय दे दिया गया है।
एयरलिफ्ट  फिल्म मैं इसलिए देखने गया था, ताकि अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचक घटना को फिर से जी सकूं। जब तत्कालीन इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने अपनी ताकत दिखाने का फैसला किया, तब मैं कुवैत में एक स्कूली छात्र था। हमले के बाद मैं और मेरा परिवार कई हफ्तों तक उस मुल्क में रहे, जहां कोई कामकाजी सरकार नहीं थी और सेना की वर्दी में इराकी नौजवान मशीनगनों के साथ सड़कों पर घूमा करते थे। हमें बस में लाद दिया गया, जो रेगिस्तानी इलाके में सर्पीली सड़कों से गुजरती हुई एक रिफ्यूजी कैंप पर रुकी। यह कैंप नो-मैंस लैंड में बनाया गया था, जो इराक और जॉर्डन के बीच का रेगिस्तानी हिस्सा है। मुझे उम्मीद थी कि एयरलिफ्ट  फिल्म में इस तरह के दृश्य होंगे और मैं कह सकूंगा कि हां, मुझे वह घटना याद है या यह वाकई वैसी ही जगह है, जहां मैं रुका था। मगर अफसोस, फिल्म देखने के बाद मुझे उस डिस्क्लैमर का महत्व समझ में आया, जिसमें यह कहा गया है- इस फिल्म के सभी पात्र व घटनाएं काल्पनिक हैं। अगर किसी भी मृत अथवा जीवित व्यक्ति या स्थान के साथ इनका कोई संबंध पाया जाता है, तो यह महज संयोग है।
फिल्म में अक्षय कुमार रंजीत कात्याल की भूमिका में हैं। कुवैत पर इराकी हमले के बाद उन्हें कथित तौर पर लगभग 1.70 लाख भारतीयों (साथ में एक कुवैती और उनकी बेटी) को इराक और जॉर्डन से होते हुए कुवैत से मुंबई (तब बंबई) लाते दिखाया गया है। जैसा कि फिल्म के निर्माता भी मानते हैं कि अक्षय कुमार की भूमिका दो कारोबारी सनी मैथ्यू और एचएस वेदी के जीवन से प्रेरित है, जिन्होंने वहां से भारतीयों को निकालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। मगर निर्देशक राजा कृष्ण मेनन ने कात्याल का ऐसा चित्रण किया है, मानो वह कोई पैगंबर हों, जो रेगिस्तान से भारतीयों को 10 बसों और 15 कारों से निकालते हैं। यह फिल्म में तथ्यों से खिलवाड़ का एक उदाहरण-भर है। 1.70 लाख भारतीयों को महज 10 बसों व 15 कारों से एक ही बार में निकालना क्या संभव है? वह बचाव अभियान कई हफ्तों तक चला था, और जैसा कि मुझे याद है, मेरे कुवैत से निकलने से पहले और बाद में भी लोग वहां से निकाले जाते रहे।
इसी तरह, 1.70 लाख भारतीयों का जो आंकड़ा दिखाया गया है, वह भी अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है। रिपोर्ट बताती है कि यह आंकड़ा करीब 1.20 लाख ही था।
इराक ने दो अगस्त, 1990 को कुवैत पर हमला बोला था। वह जुमेरात का दिन था, और स्कूल में छुट्टी थी। स्कूली सत्र का अंतिम दिन था वह। हम खाली जगहों और बाजारों में देर तक साइकिल नहीं चला सकते थे। यहां तक कि अपने घर के नजदीक मैदान में फुटबॉल भी नहीं खेल सकते थे। हमें समुद्र के किनारे भी जाने से रोका गया था, क्योंकि ऐसी खबरें आई थीं कि सद्दाम के लड़ाकों ने उसे खोद डाला है। मगर परिवार के बड़े लोगों और बुजुर्गों का जीवन सामान्य ही था। वे गाड़ी चलाते थे और अपने ऑफिस जाते थे। मैं यहां इराक-भारत संबंधों की सराहना जरूर करूंगा कि जो गाडि़यां भारतीय चलाया करते थे, उन्हें रोका नहीं जाता था। बेशक तब खाने-पीने की चीजों का संकट हो गया था, मगर इसमें भी भारतीयों को अपनी पसंद की जगह से खाना खरीदने की अनुमति थी।
हमने 19 या 20 सितंबर को कुवैत छोड़ा। पहले हम बस से इराक के बसरा गए, जहां हमने रात के कुछ घंटे बिताए। वहां से हमें बगदाद पहुंचाया गया, जहां हमने अपनी बसें बदलीं। अगली रात हमने रेगिस्तान के बीच में बने एक कैंप में गुजारी। वहां रात में रेत की आंधी चली, जिससे सब कुछ रेत से ढक गया था; यहां तक कि टेंट और बसें भी। अगली सुबह हम नो-मैंस लैंड पहुंचे, जहां अगले दस दिनों तक के लिए टेंट नंबर ए-87 हमारा घर था। वहां संयुक्त राष्ट्र की तरफ से हमें चादर और कंबल मुहैया कराए गए, क्योंकि रेगिस्तान की रातें काफी ठंडी हो सकती थीं। ट्रकों से खाना भी बंटता था, जिसकी व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र ने ही करवाई थी। वहां रेड क्रॉस की तरफ से चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध कराई गई थी। वहां से हम अम्मान के लिए रवाना हुए और वहां करीब पूरे दिन लाइन में लगने के बाद हमें मुंबई का टिकट मिला।
मुझे इस बात से ज्यादा ऐतराज नहीं है कि एयरलिफ्ट फिल्म में कुवैत से हुए बचाव अभियान की कहानी जिस तरह परोसी गई है, वह मेरी यादों से मेल नहीं खाती। मुझे दिक्कत इससे ज्यादा है कि इसमें तथ्यों से खिलवाड़ किया गया है। इसमें अपनी सुविधा के अनुसार घटनाओं को नए सिरे से गढ़ा गया है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस फिल्म के निर्माता नया इतिहास गढ़ रहे हैं। नाटकीयता की छौंक लगाने के चक्कर में इस पटकथा की कुछ घटनाओं को बढ़ाया गया है और नई दिल्ली की भूमिका को भी बुरी तरह से अपमानित किया गया है। आम लोगों के मन में भारतीय नेताओं और नौकरशाहों के प्रति जो आज नाराजगी है, यह फिल्म उसे बड़ी चालाकी से भुनाती है। कुवैत से भारतीयों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करने में नई दिल्ली के प्रयास को यह खारिज करती है। मगर तथ्य यही है कि तत्कालीन विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल खुद इस बचाव अभियान के लिए सद्दाम हुसैन से मिले थे। इस ऑपरेशन के लिए तकलीफ और जोखिम उठाने के बावजूद उनकी चौतरफा आलोचना भी हुई, क्योंकि एक फोटो में वे दोनों एक-दूसरे के साथ गर्मजोशी से गले मिल रहे थे। बहरहाल, एयरलिफ्ट जैसी फिल्म एक उदाहरण है कि जब कोई सरकार अपनी उपलब्धियों को आम लोगों तक पहुंचाने में विफल हो जाती है और फिल्म-निर्माताओं को एक ऐतिहासिक घटना पर जनमत बनाने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है, तो फिर क्या होता है? हालांकि एक ऐसे देश में, जहां अपनी आस्तीन पर देशभक्ति चढ़ाना जरूरी बनता जा रहा है, वहां देशभक्ति से भरपूर दृश्यों वाली एयरलिफ्ट फिल्म आपकी उत्तेजना बढ़ाने की सही खुराक है।

साभार-'हिंदुस्तान'-01/02/2016

30 January 2016

'भारत मे लोकतन्त्र का भविष्य' -डॉ भीम राव अंबेडकर




'भारत मे लोकतन्त्र का भविष्य' शीर्षक से प्रकाशित डॉ भीम राव अंबेडकर के भाषण के अंश 26 जनवरी के 'हिंदुस्तान' से साभार प्रस्तुत हैं।
आज के समय की राजनीति का उनका सटीक पूर्वानुमान गौर करने लायक है।
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ब्बीस जनवरी, 1950 को देश सही अर्थों में आजाद हो जाएगा। उसकी आजादी का क्या होगा? क्या वह अपनी आजादी बरकरार रख पाएगा या उसे खो देगा। यह पहला विचार है, जो मेरे दिमाग में आता है। ऐसा नहीं है कि भारत कभी आजाद नहीं रहा, मुद्दा यह है कि पहले भी वह अपनी आजादी खो चुका है।
क्या यह फिर अपनी आजादी खो देगा? यह ऐसा विचार है, जो मुझे भविष्य को लेकर चिंतित कर देता है। जो चीज मुझे सबसे ज्यादा परेशान करती है, वह यह है कि भारत न सिर्फ एक बार पहले भी अपनी आजादी खो चुका है, बल्कि यह इसलिए हुआ कि इसके अपने ही कुछ लोगों ने गद्दारी की। जब मुहम्मद बिन कासिम की सेना ने हमला किया था, तो उसने धार के कुछ सेनापतियों को घूस दी थी। इन सेनापतियों ने बाद में धार के राजा की तरफ से लड़ने से इनकार कर दिया था।
एक जयचंद था, जिसने पृथ्वीराज से लड़ने के लिए मुहम्मद गोरी को आमंत्रित किया था। जब शिवाजी आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे, तो कई राजाओं ने मुगल सम्राट का साथ दिया था। जब ब्रिटिश सिख शासकों को परास्त करने की कोशिश कर रहे थे, तब प्रमुख सेनापति गुलाब सिंह चुप बैठ गया था, उस कठिन वक्त में उसने अपने राज्य की कोई मदद नहीं की।
ये विचार मुझे इसलिए भी परेशान कर रहे हैं कि जाति और तरह-तरह के विश्वासों जैसे हमारे पुराने दुश्मन तो हैं ही, साथ ही हमारे यहां अब बहुत सारे राजनीतिक दल भी होंगे, जिनका नजरिया हर मुद्दे पर एक-दूसरे का विरोधी हो सकता है। क्या भारतीय अपने देश को इन विश्वासों और मतभेदों से ऊपर रख सकेंगे? मुझे नहीं पता, लेकिन अगर पार्टियां अपने विचार को अपने देश से ऊपर रखेंगी, तो हमारी आजादी हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। हमें इस खतरे से देश को बचाना होगा। हमें यह प्रण लेना चाहिए कि हम अपनी आजादी की रक्षा अपने खून की अंतिम बूंद तक करेंगे।
26 जनवरी,1950 से भारत एक लोकतांत्रिक देश होगा, इस अर्थ में कि यहां जनता की सरकार होगी, जनता के द्वारा होगी और जनता के लिए होगी। फिर वही विचार मेरे दिमाग में आता है कि क्या भारत अपने लोकतांत्रिक संविधान की रक्षा कर पाएगा? क्या वह इसे बरकरार रख पाएगा या खो देगा? यह दूसरा विचार मुझे और भी ज्यादा चिंतित करता है। भारत में पहले भी लोकतंत्र जैसी व्यवस्था वाले गणराज्य रहे हैं, संसदीय व्यवस्था और संसदीय परंपराएं दिखती रही हैं। लेकिन उन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को भारत ने खो दिया। क्या वह फिर इन्हें खो देगा? भारत जैसे देश में खतरा यह भी है कि यहां कहीं लोकतंत्र ही तानाशाही का मार्ग न प्रशस्त कर दे। किसी नए लोकतंत्र के लिए यह बहुत संभव है कि वह अपना रूप तो बरकरार रखे, लेकिन वास्तव में उसकी जगह तानाशाही स्थापित हो जाए। अगर किसी जगह पर भूस्खलन होता है, तो अगली बार उसी जगह पर भूस्खलन का खतरा सबसे ज्यादा होता है।
अगर हम लोकतंत्र के रूप को ही नहीं, इसकी अंतर्वस्तु को भी बचाना चाहते है, तो हमें क्या करना चाहिए? सबसे पहला तरीका तो मेरी समझ से यह है कि हमें सांविधानिक तरीकों का इस्तेमाल सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों तक पहुंचने के लिए करना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें खूनी क्रांति को छोड़ देना चाहिए। इसका यह भी अर्थ है कि हमें सिविल नाफरमानी, असहयोग और सत्याग्रह जैसी चीजों को भी छोड़ देना चाहिए। जब सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य हासिल करने के लिए कोई सांविधानिक रास्ता न हो, तो ऐसे तरीकों को जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन जब संविधान का रास्ता सबके लिए खुला है, तो गैर-सांविधानिक तरीकों का इस्तेमाल जायज नहीं कहा जा सकता। ये तरीके अराजकता का व्याकरण रचने के अलावा कुछ नहीं करेंगे, इनको जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए, उतना ही अच्छा है।
दूसरी चीज जो मेरे दिमाग में आ रही है, वह है जॉन स्टुअर्ट मिल की चेतावनी। यह उन लोगों के लिए है, जो लोकतंत्र को बरकरार रखना चाहते हैं। वह कहते हैं कि अपनी स्वतंत्रताओं को किसी भी शख्स, चाहे वह कितना भी महान क्यों न हो, के चरणों में कभी समर्पित न करें, उस पर विश्वास करके उसे ऐसी शक्तियां कभी न दें, जो लोकतंत्र की संस्थाओं को नीचा करती हों। किसी महान व्यक्ति ने अगर देश की बड़ी सेवा की है, तो उसके प्रति शुक्रगुजार होने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन इसकी भी एक हद होती है। आइरिश देशभक्त डेनियल ओकोनेल के शब्दों में कहा जाए, तो कोई व्यक्ति अपने सम्मान की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकता, कोई महिला अपनी मर्यादा की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकती और कोई मुल्क अपनी आजादी की कीमत पर शुक्रगुजार नहीं हो सकता।
दूसरे देशों के मुकाबले भारत के लिए यह ज्यादा जरूरी है। यहां राजनीति में भी जिस तरह की भक्ति दिखाई देती है, वैसी दुनिया में और कहीं नहीं दिखाई देती। धर्म के मामले में भक्ति मुक्ति की राह हो सकती है, लेकिन राजनीति में भक्ति निश्चित तौर पर तानाशाही का रास्ता ही खोलेगी।
तीसरी चीज यह है कि हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र बनाना चाहिए। अगर हमने सामाजिक लोकतंत्र का आधार नहीं तैयार किया, तो राजनीतिक लोकतंत्र ज्यादा नहीं चलेगा। सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है एक ऐसी जीवन शैली, जो स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के मूल्यों को मान्यता देती है। इन तीनों मूल्यों को अलग-अलग नहीं देखना होगा, इन तीनों की त्रिमूर्ति है और इनमें से एक को भी अलग कर देने का अर्थ है, लोकतंत्र के मकसद को ही पीछे छोड़ देना। स्वतंत्रता को आप बराबरी से अलग नहीं कर सकते, बराबरी स्वतंत्रता से अलग नहीं की जा सकती। इसी तरह, आप स्वतंत्रता और बराबरी को भाईचारे से अलग नहीं कर सकते। अगर बराबरी और स्वतंत्रता नहीं होगी, तो कुछ लोग बाकी पर शासन करने लगेंगे। अभी तक भारत एक ऐसा समाज है, जिसमें श्रेणीगत गैर-बराबरी है। इसलिए ऐसे कुछ लोग हैं, जिनके पास अथाह दौलत है और दूसरी तरफ ऐसे लोग हैं, जो पूरी तरह दरिद्रता में जी रहे हैं।
26 जनवरी, 1950 को हम विसंगतियों से भरे जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में हमारे यहां समता होगी, आर्थिक जीवन में विषमता होगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट की समान अहमियत के सिद्धांत को मान्यता देंगे। लेकिन हमारी जो सामाजिक और आर्थिक संरचना है, उसके चलते हम हर व्यक्ति की समान अहमियत के सिद्धांत से दूर ही रहेंगे। अगर यह लंबे समय तक चला, तो हमारा राजनीतिक लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए जितनी जल्दी हो सके, हमें गैर-बराबरी को खत्म करना होगा।
आजादी निश्चित तौर पर खुशी का कारण होती है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी ने हमें बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी है। आजादी का अर्थ है उस मौके को खो देना, जब हर गलत चीज की जिम्मेदारी ब्रिटिश शासकों पर थोपी जा सकती थी। अगर अब कुछ गलत होता है, तो उसके लिए कोई और नहीं, हम खुद जिम्मेदार होंगे। अब गलत होने का खतरा बहुत बड़ा है।

(संविधान सभा के समापन भाषण का संपादित अंश)

साभार-'हिंदुस्तान'-26/01/2016

~यशवन्त यश©

16 January 2016

मोबाइल और मेल का मायाजाल-पीटर फ्लेमिंग, प्रोफेसर, सिटी यूनिवर्सिटी लंदन

काम करने की लत का सबसे बुरा उदाहरण क्या हो सकता है, यह मुझे मैनेजमेंट के पूर्व सलाहकार ने बताया। उनकी टीम के एक सदस्य गैरी पर कंपनी ने दबाव डाला कि वह छुट्टी मनाने जाएं। कंपनी को उनके 'बर्नआउट' होने, यानी लगतार काम के दबाव से क्षमता चुक जाने का खतरा दिखाई दे रहा था।

यह एक ऐसी समस्या है, जो मौजूदा अर्थव्यवस्था की बड़ी बीमारी है, जिसकी भारी कीमत कंपनियों को चुकानी पड़ती है। नतीजा यह हुआ कि गैरी अपनी गर्लफ्रेंड के साथ दो हफ्ते की छुट्टी पर रवाना हो गए। जब वह छुट्टी मना रहे थे, तो कंपनी ने देखा कि उनकी ई-मेल हर 20 मिनट के अंतराल पर लगातार आ-जा रही हैं। वापस आने पर जब गैरी से इसका कारण पूछा गया, तो पता चला कि हालांकि वह एक समुद्र तट पर छुट्टियां मना रहे थे, लेकिन वह उस समुद्र तट की खूबसूरती में रमकर बैठे नहीं रह सकते थे। कुछ था, जो उनके अंदर लगातार कुलबुलाता रहता था। वह अपने साथ अपना स्मार्टफोन ले गए थे और हर कुछ समय बाद वह टॉयलेट में जाकर ई-मेल देखने और भेजने का काम करते थे। गैरी के सहयोगियों ने इस वाकये का काफी   मजा लिया, लेकिन कुछ लोगों को इस पर चिंता भी हुई।

यह कहना मुश्किल है कि ऑफिस तकनीक का यह रूप अचानक ही परेशानी, तनाव व काम का बोझ कब बन गया? जब  इसकी शुरुआत हुई, तो इसे आजादी का औजार माना जा रहा था। तब ये सोचा गया था कि चलो, सुस्त रफ्तार से आने वाले भारी-भरकम संदेशों से नाता छूटा। पर अब एक औसत कर्मचारी को लगता है कि यह एक अजीबोगरीब-सी निरंकुशता है, जिसकी लत लग जाती है। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि इससे पीछा छुड़ाना कितना मुश्किल है, तो शहर के किसी भी कर्मचारी से कहिए कि वह लंच टाइम में अपना मोबाइल बंद कर दे, फिर पता चलेगा कि इससे कितनी तरह की परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।

पिछले 15 साल से 'हरदम काम पर' की जो संस्कृति चल पड़ी है, उसकी सबसे अच्छी अभिव्यक्ति मोबाइल फोन है। चार्टेड मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट का एक अध्ययन बताता है कि बहुत-से कर्मचारी न चाहते हुए भी अपनी सालाना छुट्टियां रद्द कर देते हैं और कार्यालय से आ जाने के बाद भी काम में लगे रहते हैं। अध्ययन बताता है कि इसी वजह से लोगों की क्षमताएं चुक रही हैं और स्वास्थ्य की समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।

लेकिन यहां अब एक दूसरा मुद्दा है। स्मार्टफोन में ऐसा कुछ नहीं है, जो लोेगों पर ऑफिस का समय समाप्त हो जाने के बाद भी ई-मेल भेजने का दबाव बनाता हो। यह तो बस सिलिकॉन और प्लास्टिक का छोटा-सा टुकड़ा भर है। अगर हम इसे बंद नहीं कर पाते, तो इसका अर्थ है कि इस दबाव का कारण कहीं और है। बेशक इसका एक कारण यह हो सकता है कि कम लोगों से ज्यादा काम लिया जा रहा है। लागत में कटौती के दौर में कई जगह यह रोजगार नीति का स्थायी हिस्सा है। लेकिन इस बीच कई दूसरे बदलाव भी हुए हैं।

कुछ नव-उदारवादी अर्थशास्त्रियों के अनुसार, लोग अब अपने आप को इंसान मानने की बजाय 'मानव पूंजी' यानी 'ह्यूमन कैपिटल' मानने लग गए हैं। एक ऐसी पूंजी, जिसमें निवेश कभी नहीं रुकता। इसकी क्षमताएं, इसकी सोच और इसके रंग-रूप को हमेशा निखारा जा सकता है। इस पूंजी को बढ़ाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है काम करना। काम ही ऐसा तरीका है, जिससे इसका विकास परिभाषित होता है। यही वह बिंदु है, जहां रोजगार और जीवन धीरे-धीरे एक-दूसरे में इतना घुल-मिल जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है। अब काम का अर्थ वह नहीं रह गया है, जिसे हम किसी सामाजिक लक्ष्य को पाने के लिए करते हैं। अब यह ऐसी गतिविधि है, जिसके अपने अलग लक्ष्य हैं। अब काम का अर्थ है हर रोज 24 घंटे सक्रिय रहना। खुद अपना शोषण करना हमें निजी स्वतंत्रता की तरह लगता है।

व्यापक अर्थ में देखें, तो तकनीक ने मानव पूंजी के आर्थिक सिद्धांत को व्यावहारिक रूप में संभव बनाया है। इसलिए कोई हैरत नहीं कि कुछ लोगों को अब अपने फोन के साथ ही सोने की आदत पड़ गई है- अगर कोई जरूरी फोन आ ही गया तो? पहनी जा सकने वाली तकनीक, अपने ऊपर प्रशासन करने के एप और सोशल मीडिया, सब इस मानव पूंजी के हिसाब से ही बनाए जा रहे हैं। इस लिहाज से यह सोचना शायद गलत है कि औद्योगिक काल के बाद का काम अतीत में फैक्टरियों में होने वाले काम की तुलना में कम मेहनत वाला है। इसमें व्यक्तित्व पर नियंत्रण को जोड़ दिया गया है, और इससे जो स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं, वे बताती हैं कि हम अब भी भौतिक मेहनत वाले समाज में ही जी रहे हैं।

ऐसे हालात में हम क्या कर सकते हैं? डेविड कैमरन के सलाहकार रहे स्टीवन हिल्टन आजकल सिलिकॉन वैली में कारोबार करते हैं। वह बताते हैं कि पिछले एक साल से वह अपने पास फोन ही नहीं रख रहे। लेकिन यह तरीका एक वैकल्पिक जीवन शैली की तरह है और हर कोई इसे नहीं कर सकता। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे किसी आधुनिक थेरेपी या निजी आध्यात्मिक प्रयास से नहीं सुलझाया जा सकता। इसकी जड़ में आर्थिक व सामाजिक आग्रह हैं और इसे उसी स्तर पर सुलझाया जा सकता है। कुछ देशों ने ऐसे नियम-कायदे बनाए हैं, जिनमें कार्यालय की अवधि के बाद काम से संबंधित ई-मेल रोक दी गई है।
इसके पीछे का तर्क भी आर्थिक ही है, क्योंकि इसकी वजह से पैदा तनाव और बर्नआउट से उत्पादकता घटती है। कुछ कंपनियों ने यह प्रावधान किया है कि अगर कर्मचारी छुट्टी पर गया है, तो उसकी ई-मेल अपने आप डिलीट हो जाएंगी। छुट्टी से लौटने पर अगर आपको अपनी इनबॉक्स में ढेर सारी मेल दिखें, तो वे किसी मुसीबत से कम नहीं लगतीं। लेकिन यह समस्या तकनीक की पैदा की हुई नहीं है। स्मार्टफोन और ई-मेल से पैदा हुई परेशानियां दरअसल काम के प्रति हमारी उस सनक को दिखाती हैं, जहां हम सब मानव पूंजी हैं और इसे स्विच ऑफ नहीं किया जा सकता। इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है।

साभार- द गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


'हिंदुस्तान'-16/01/2016 संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित

06 January 2016

युद्ध् न होने देंगे भाई- रमेशराज

एटम का विस्फोट करेंगे
लेकिन गांधी बने रहेंगे
एक गाल पर थप्पड़ खाकर
दूजा गाल तुरत कर देंगे
भले भून डाले जनता को
आतंकी या आताताई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
दुश्मन कूटे-पीसे मारे
चिथड़े-चिथड़े करे हमारे
हम केवल खामोश रहेंगे
भले युद्ध् को वो ललकारे
खुश हो चखते सिर्फ रहेंगे
हम सत्ता की दूध्-मलाई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
कितने भी सैनिक शहीद हों
पाकिस्तान किन्तु जायेंगे
हम शरीफ के साथ बैठकर
अपनी फोटो खिंचवायेंगे
खाकर पाकिस्तानी चीनी
खत्म करें सारी कटुताई
युद्ध् न होने देंगे भाई।
अब हम को कुछ याद नहीं है
क्या थी धारा तीन सौ सत्तर
हम तो केवल इतना जानें
खून नहीं है खून का उत्तर
भगत सिंह, बिस्मिल को छोड़ो
हम गौतम-ईसा अनुयायी
युद्ध् न होने देंगे भाई।
दुश्मन आता है तो आये
हम अरि को घर आने देंगे
पार नियंत्रण रेखा के हम
सेना कभी न जाने देंगे
दुश्मन बचकर जाये हंसकर
हमने ऐसी नीति बनायी
युद्ध् न होने देंगे भाई!
यदि हम सबसे प्यार जताएं
हिंसा के बादल छंट जाएं
अपना है विश्वास इस तरह
सच्चे मनमोहन कहलाएं
भले कहो तुम हमको कायर
पाटें पाक-हिन्द की खाई
युद्ध् न होने देंगे भाई ।
 

-रमेशराज©
जनवादी लेखक संघ -फेसबुक ग्रुप से साभार

16 December 2015

आधे टिकट के सफर का खत्म होना -गिरिराज किशोर, वरिष्ठ साहित्यकार

रकार ने आधे टिकट की कहानी पर पूर्ण विराम लगा दिया है। बच्चों को अंग्रेजों के जमाने से मिलने वाला आधा टिकट अब रेलवे की टिकट खिड़की पर नहीं मिलेगा। क्या इससे रेलवे की आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद मिलेगी? कितने बच्चे रेलवे की इस सुविधा का लाभ उठाते हैं? अपने देश में लगभग 60 प्रतिशत बच्चे तो शायद ही रेल से यात्रा करते हों। हो सकता है, बहुत से उन बच्चों ने तो रेल देखी भी न हो, जो आदिवासी हैं या जो बहुत अंदर उन गांवों में रहते हैं, जहां से रेल गुजरती ही नहीं। झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले परिवार तो बच्चों को लेकर या स्वयं रेल से यात्रा करते ही नहीं। मध्य वर्ग के लोग भले ही दो-चार साल में ब्याह शादी में सपरिवार चले जाते हों। बंगाल, महाराष्ट्र और गुजरात में तो फिर भी अवकाश के दिनों में सपरिवार यात्रा पर निकलते हैं। हिंदी पट्टी में तो देशाटन की मानसिकता नहीं के बराबर है।

इसलिए मालूम नहीं कि कितना राजस्व इन बच्चों के टिकट निरस्त करके मिलेगा? सरकार कुछ बच्चों के इस अधिकार को क्यों समाप्त करना चाहती है, जिनके माता-पिता अपने बच्चों को देश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक पृष्ठभूमि से अवगत कराने के लिए इन स्थलों पर ले जाते हैं। मैं कई वर्ष पहले मंदाकिनी के किनारे एक केरलवासी से मिला। वह अपने दो बच्चों के साथ वहां बैठा उन्हें दिखा बता रहा था। उसकी गांव में साइकिल बनाने की दुकान थी। मैंने उससे पूछा, आप इतना पैसा खर्च करके इतनी दूर क्यों आए? वह बोला, हर तीन साल में अपने बच्चों को अलग-अलग दिशा में ले जाता हूं, जिससे बच्चे अपने देश के मुख्य स्थलों के बारे में सामान्य ज्ञान अर्जित करें। आज वह घटना शिद्दत से याद आ रही है।

रेलवे इन बच्चों के जीवन की इस एक संभावना को भी क्यों समाप्त करना चाहती है। आजादी के बाद से कितने सांसद और राज्यों में कितने विधायक अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। उन सब को जीवन भर के लिए मुफ्त पास मिले हुए हैं। रेलवे के अवकाश प्राप्त छोटे-बड़े कर्मचारियों को आजीवन पास दिए जाते हैं। क्या बच्चों का महत्व उन अवकाशित सांसदों और विधायकों जितना भी नहीं? अंग्रेज ने सोचा होगा कि देश के लोग घर घुसरू हैं, बाहर निकलने की आदत डालो।

शायद तभी बच्चों के लिए आधे टिकट का प्रावधान किया था। उस समय 12 साल तक के बच्चों का आधा टिकट लगता था। सरकार ने उम्र की इस सीमा को घटाते-घटाते आठ साल पर पहले ही पंहुचा दिया था, अब इसे पूरी तरह बंद किया जा रहा है। अंग्रेज सरकार ने इसे शुरू किया था और यह सरकार, जो अपनी है और विकासोन्मुखी है, उसने बच्चों की यात्रा के अवसर को समाप्त कर दिया। विकास क्या भौतिक क्षेत्र का ही होता है? क्या इस आर्थिक विकास का अर्थ यह है कि बच्चों का आंतरिक और मानसिक विकास बंद हो जाए? बुलेट ट्रेन के युग की नई सोच शायद यही है।

 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-16/12/2015

15 October 2015

ये तर्क नेताजी का अपमान करते हैं--राजीव शुक्ल ( पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद)

मैं यह बात कतई मानने को तैयार नहीं हूं कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस बीसों साल भारत में या दुनिया में कहीं भी रूप बदलकर, छिपकर जीवन गुजारते रहे। यह बात और यह सोच अपने आप में नेताजी जैसे महान क्रांतिकारी का बहुत बड़ा अपमान है। एक बेखौफ, जुझारू और वीर पुरुष भला इस तरह छिपकर अपनी जिंदगी क्यों गुजारना चाहेगा? जो लोग इस तरह की दलील देते हैं, लगता है कि उन्हें न तो सुभाष चंद्र बोस के स्वभाव के बारे में ठीक से पता है और न ही वे उनके अदम्य साहस को ही अच्छी तरह से पहचानते हैं।

मेरे लिहाज से नेताजी सुभाष चंद्र बोस का परिवार प्रधानमंत्री से मिलकर सिर्फ यह जानना चाहता है कि विमान हादसे में उनकी मृत्यु हुई थी या नहीं? यदि नहीं, तो फिर उसके बाद वह कहां थे? यह किसी भी परिवार के लिए लाजमी है कि वह अपने किसी पूर्वज के बारे में जानकारी मांगे।

मुझे शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जो तरह-तरह के इंटरव्यू और बयान देकर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अमुक व्यक्ति दरअसल नेताजी थे, जो साधु बनकर रहे, फलां व्यक्ति नेताजी थे, जो ताशकंद मैन बनकर     रूस में रहे। कोई कहता है कि सुभाष बाबू  करीब 30 साल तक गुमनाम बनकर अयोध्या में रहे, तो कोई यह कहता है कि वह पंजाब में रहे; कोई कहता है कि वह कई बरस तक बिहार में थे, तो कोई कहता है कि वह जर्मनी में रहे। दावे तो ऐसे भी किए गए कि एक बार बाबा जयगुरुदेव के समर्थकों ने उन्हें कानपुर के फूलबाग मैदान में सुभाष चंद्र बोस घोषित कर उनके प्रकट होने का नाटक कराया और उसके बाद वहां मौजूद लाखों लोगों ने बाबा के उन समर्थकों से जमकर मारपीट की।

आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक के सी सुदर्शन स्वयं इस बात पर हमेशा विश्वास करते रहे कि नेताजी नोएडा में रहते थे। और तो और, नेताजी के गृह प्रदेश की राजधानी कोलकाता में तो आज भी ऐसे तमाम बंगाली परिवार आपको मिल जाएंगे, जो यह मानते हैं कि 118 साल की उम्र में भी नेताजी जिंदा हैं, और कहीं पर छिपे हुए हैं, जिनको भारत सरकार जान-बूझकर नहीं खोज रही है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर नेताजी देश की आजादी के बाद भी वेश बदलकर  छिपकर  क्यों रहेंगे? ऐसा मानने वालों में कुछ लोगों का तर्क यह है कि क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में उन्होंने ब्रिटेन के नेतृत्व वाले एलाइड देशों का विरोध किया था, इसलिए वह  ब्रिटिश सरकार के कानून के अधीन युद्ध अपराधी घोषित थे और अगर वह सामने आ जाते, तो उन्हें ब्रिटिश सरकार गिरफ्तार कर सकती थी। इसी डर से वह वेश बदलकर, और छिपकर रहे। मगर यह तर्क अपने आप में बेहद हल्का और अपमानजनक है। गुलाम भारत में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए जो व्यक्ति ब्रिटिश सरकार की जेल से नहीं डरा और  गांधी के सिद्धांतों से असहमत होते हुए अपना सैनिक संगठन बनाकर लड़ाई के लिए तैयार था, वह आजाद भारत में, जहां अंग्रेजों का कुछ भी नहीं रह गया था, भला उनकी जेल से क्यों डरेगा? ऐसे लोगों का एक और तर्क हो सकता है कि आजादी के बाद भी ब्रिटिश सरकार भारत सरकार पर दबाव डालकर उन्हें इंग्लैंड ले जाती और उन्हें जेल में डाल देती।

ऐसे लोगों से पूछने लायक एक ही सवाल है कि आजाद भारत में किस सरकार की इतनी हिम्मत हो सकती थी कि वह नेताजी को ब्रिटिश सरकार को सौंप देती? फिर अगर कोई हिमाकत करने की कोशिश भी करता, तो करोड़ों भारतीय उसके विरोध में खड़े हो जाते और जन भावनाएं अगर इतने बड़े पैमाने पर हों, तो भला किसकी ऐसी हिम्मत पड़ सकती है? और तो और, इन भावनाओं को देखते हुए भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी उनको देश के बाहर ले जाने पर रोक लगा देता और  फिर ब्रिटिश सरकार सालोंसाल अंतरराष्ट्रीय अदालत में लड़ती रहती। वैसे भी, ब्रिटेन की कोई सरकार सुभाष चंद्र्र बोस को सौंपने की मांग करती ही नहीं। इतना तो शायद  

अंग्रेज भी जानते थे कि यह काम कतई संभव नहीं है। कई बार ब्रिटेन ने खुद ही दुनिया के ऐसे बड़े लोगों के खिलाफ केस वापस ले लिए थे। वैसे आज भी न जाने कितने भारतीय अपराधी मजे से इंग्लैंड में रह रहे हैं और भारत सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद वहां की छोटी-छोटी अदालतें उन्हें भारत सरकार को नहीं सौंप रही हैं। फिर भला भारत सरकार नेताजी सुभाष चंद्र्र बोस को अंग्रेजों के हवाले क्यों कर देती?

हाल ही में एक अभियान यह चला कि फैजाबाद के गुमनामी बाबा ही नेताजी थे। तमाम पत्रों का हवाला दिया गया, लेकिन कुछ साबित नहीं हो पाया। गुमनामी बाबा एक ऐसे साधु थे, जो परदे के  पीछे छिपकर रहते थे और किसी को अपना चेहरा नहीं दिखाते थे, इसलिए उन्हें नेताजी बताना लोगों को आसान लग रहा है। सवाल यह उठता है कि नेताजी भला फैजाबाद में क्यों रहेंगे? और फिर वह परदे के पीछे क्यों छिपेंगे? क्यों नहीं, उन्होंने कभी अपने भाई-भतीजे के परिवार से कोलकाता में मिलने की कोशिश की, उन्हें फोन क्यों नहीं किया, उन्हें पत्र क्यों नहीं लिखा? जर्मनी में अपनी पत्नी और बेटी से कभी संपर्क क्यों नहीं किया? यह सब एक इंसान के लिए कैसे संभव है? चलिए, हम यह मान भी लें, तो आजाद हिंद फौज में जो लोग उनसे सबसे करीबी थे, उन तक उन्होंने कोई सूचना नहीं दी।

सबसे बाद तक तो उनकी घनिष्ठ सहयोगी डॉक्टर लक्ष्मी सहगल जीवित रहीं और 98 वर्ष की उम्र में पिछले साल कानपुर में उनका निधन हुआ। उन्होंने भी कभी यह नहीं बताया कि नेताजी का कभी कोई संदेश उन्हें मिला।
मेरा मानना है कि देश को इस तरह के विवाद से ऊपर उठकर नेताजी की स्मृति को संजोए रखना चाहिए और उससे प्रेरणा लेकर कई और नेताजी पैदा करने चाहिए, जो देश के लिए उतने ही समर्पित बन सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

साभार-'हिंदुस्तान'-15/10/2015 

12 October 2015

ज़िंन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो.............

 बसता बिखरता हुआ सा कुछ

निदा फाजली लोकप्रिय हैं, लेकिन साहित्यिक गरिमा की कीमत पर नहीं। निदा का आत्मकथात्मक गद्य 'दीवारों के बीच' और 'दीवारों के बाहर' में संकलित है, जो अपनी निर्मम तटस्थता और संवेदनशीलता के लिए पठनीय है। 12 अक्तूबर को निदा फाजली के जन्मदिन पर 'दीवारों के बीच' से कुछ अंश और कुछ अशआर:


न फिल्मों में निर्माता जेठवाणी और गीतकार निदा और विट्ठल भाई होते हैं। इन चारों फिल्मों का सेंटूर होटल में मुहूर्त होता है। बाहरी गेट पर दो हाथी आने वाले मेहमानों को सूंड़ उठा-उठा कर हार पहनाते हैं। इस समारोह में पूरा फिल्म उद्योग शामिल होता है और रात को देर तक शराब, संगीत और छोटे-मोटे नशीले झगड़े वक्त को रोके रखते हैं। इन चारों चित्रों में से तीन एक-साथ शुरू की जाती हैं। चौथी में निर्माता एक नई अभिनेत्री को पेश करना चाहते हैं। इसके लिए किसी अच्छे हीरो की तलाश है। यह नई हीरोइन स्थानीय कॉलेज में उर्दू के एक प्रोफेसर की एक छोटी लड़की है। बाप की मर्जी के खिलाफ उसकी मां उसे हीरोइन बनाना चाहती है! लड़की कम उमर और खूबसूरत है। बम्बई में पढ़ी-लिखी है। इसलिए बाजार में खूबसूरती के प्रचलित भाव से वाकिफ भी है। लेकिन इस नए मैदान में जेठवाणी की नातजुरबेकारी खुद उसकी पारिवारिक जिन्दगी का संतुलन बिगाड़ देती है। उसका भाई, जो उसका पार्टनर भी है, उससे अलग हो जाता है। लेकिन निर्माता अपनी तन्हाइयों में लड़की का रोशन भविष्य बनाने-संवारने में खोया रहता है।

तीन फिल्मों की तिजारती नाकामी जब उसकी चौथी फिल्म के लिए हीरो की तलाश करने में नाकाम हुई तो हीरोइन खुद अपने तौर पर किसी मुनासिब हीरो की खोज में इधर-उधर घूमने-फिरने लगी। जेठवाणी ने इस तलाश की रोकथाम के लिए अपनी बची-खुची पूंजी भी दांव पर लगा दी। इस बार बड़े बजट की हिन्दी फिल्म बनाने के बजाय भोजपुरी भाषा में एक छोटी फिल्म बनाता है। इस फिल्म में यही लड़की हीरोइन होती है। यह फिल्म भी दूसरी फिल्मों की तरह निर्माता के साथ कुछ अच्छा सुलूक नहीं करती। अपने फिल्मी करियर से मायूस होकर लड़की अपनी मां की मरजी से कहीं शादी करके वक्त से पहले अपने पति को बाप का दरजा अता करके, इज्जत की घरेलू जिन्दगी गुजारती है और जेठवाणी बम्बई के समुन्दर को आखिरी सलाम करके फिर से अपनी बीवी के पति और बच्चों के बाप बन कर अपने पुराने धन्धे के बहीखातों को देखने में लीन हो जाते हैं।

इन तीन फिल्मों के नाम 'हरजाई', 'कन्हैया' तथा 'शायद' हैं। इन फिल्मों में निदा के नाम से जो गीत हैं, उनमें—
खुशबू हूं मैं फूल नहीं हूं जो मुरझाऊंगा
जब जब मौसम लहराएगा
मैं आ जाऊंगा....... (शायद)
दिन भर धूप का पर्वत काटा शाम को पीने निकले हम
जिन गलियों में मौत छुपी थी उनमें जीने निकले हम        (शायद)
तेरे लिए पलकों की झालर बनूं
कजरे सा आंखों में आंझे फिरूं
धूप लगे
जहां तुझे
छाया बनूं  (हरजाई)
कभी आंखों में आंसू हैं कभी लब पे शिकायत है
मगर ऐ जिन्दगी फिर भी मुझे तुझ से शिकायत है     
(हरजाई)

फिल्मी पत्रिकाओं में खासतौर से सराहे जाते हैं। इकबाल मसूद इनमें साहिर के बाद गीतों का नया ट्रेंड देखते हैं। लेकिन चित्रों की असफलता की वजह से बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ती। वैसे छोटी-बड़ी फिल्मों में गीत मिलते रहते हैं।
राजकपूर की 'बीवी ओ बीवी', कमाल अमरोही की 'रजिया सुल्तान', इस्माइल शिरोफ की 'आहिस्ता आहिस्ता' कई फिल्मों में से कुछ नाम हैं। पैसे भी बैंक में जमा होने लगे हैं। फिल्म की तिजारती सफलता ही फिल्म से संबंधित लोगों की कीमत और जरूरत का आईना है। इस संसार में योग्यता से अधिक इत्तिफाक का दखल है। ... विट्ठल भाई के सुझाव पर निदा खार के इलाके में एक निर्माणाधीन बिल्डिंग में कुछ डिपॉजिट देकर एक फ्लैट बुक कराता है। बिल्डिंग धीरे-धीरे तैयार होती है। इसकी किस्तें भी इसी हिसाब से जमा होती हैं। इन किस्तों ने निदा को ज्यादा ऐक्टिव और सामाजिक बना दिया है। खुले हाथ आप-ही-आप बन्द होने लगे हैं। पहले वह दूसरों की जरूरतों को अपनी जरूरत मानता था— अब सिर्फ अपने-आपको पहचानता है। शाम की देर तक चलने वाली महफिलें अब अपने कमरे से निकल कर दूसरों के घरों में सजने लगी हैं। यार-दोस्तों की नजर में अब वह प्रगतिशील से प्रतिक्रियावादी बन जाता है।

इन किस्तों की अदायगी के लिए वह मजबूरी से एक-दो ऐसी फिल्में भी ले लेता है, जिनमें निर्माता विट्ठल भाई के साथ में होने से इंकार करते हैं। यह चोपड़ा की 'नाखुदा' वह अकेला ही लिखता है। उसका एक गीत रेडियो पर काफी बजाया जाता है—
तुम्हारी पलकों की चिलमनों में
ये क्या छिपा है सितारे जैसा
हसीन है ये हमारे जैसा
शरीर है ये तुम्हारे जैसा
कंट्रैक्ट की खिलाफत विट्ठल भाई को नाराज कर देती है। उनकी नाराजगी कुछ संगीत-निर्देशकों को भी अपने साथ ले लेती है। काम की तलाश में अब ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है। हर दो-तीन महीने बाद एक बड़ी किस्त मुंह फाड़े इन्तजार करती है। संगीत निर्देशकों के साथ ज्यादा समय बिताना पड़ता है। उनकी बेसिर-पैर की बातों पर मुसकराना पड़ता है। अपने-आपको भुलाना पड़ता है। उनकी गालियों भरे डमी शब्दों को अपनी जहानत से बातहजीब बनाना पड़ता है।

मीरो गालिब के शेरों ने किसका साथ निभाया है
सस्ते गीतों को लिख लिखकर हमने हार बनवाया है।


निदा फाज़ली की कुछ गजलें और नज़्में

देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर व़क्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूं भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल-सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल-सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ

फुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ
धुंधली सी एक याद किसी कब्र का दिया
और मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ

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बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता

सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यों नहीं जाता

वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहां में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नहीं जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता

वो ख़्वाब जो बरसों से न चेहरा, न बदन है
वो ख़्वाब हवाओं में बिखर क्यों नहीं जाता

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धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िंन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूं ही आंखों में      
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं       
अपने घर की दर-ओ-दीवार सजा कर देखो

फासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
वो मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो

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कहीं छत थी दीवार-ओ-दर थे कहीं
मिला मुझको घर का पता देर से
दिया तो बहुत ज़िन्दगी ने मुझे
मगर जो दिया वो दिया देर से

हुआ न कोई काम मामूल से
गुज़ारे शब-ओ-रोज़ कुछ इस तरह
कभी चांद चमका ग़लत वक़्त पर
कभी घर में सूरज उगा देर से

कभी रुक गये राह में बेसबब
कभी वक़्त से पहले घिर आई शब
हुये बंद दरवाज़े खुल खुल के सब
जहां भी गया मैं गया देर से

ये सब इत्ति़फा़कात का खेल है
यही है जुदाई यही मेल है
मैं मुड़ मुड़ के देखा किया दूर तक
बनी वो ख़ामोशी सदा देर से
(वाणी प्रकाशन से साभार)

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साभार-'हिंदुस्तान'-11/10/2015 

09 October 2015

लखनऊ पुस्तक मेले में डॉ सूर्यकांत जी द्वारा स्वास्थ्य परामर्श

कल 08/10/2015 को लखनऊ पुस्तक मेले के मंच से किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ सूर्यकांत जी ने फेफड़े एवं श्वास रोगों से संबन्धित परिचर्चा के अंतर्गत स्वस्थ जीवन शैली हेतु कुछ महत्वपूर्ण बातें बतायीं उनका सारांश इस प्रकार है-
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  • 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के सभी व्यक्तियों को जिम जाने व ट्रेडमिल आदि के प्रयोग से बचना चाहिए। साइकलिंग एक्सरसाइज़ ज़्यादा बेहतर है। बल्कि सबसे अच्छा तो यह है कि अपनी आयु के (क्षमता से)सामान्य से अधिक तेज़ गति से चलने की आदत डालनी चाहिए। धीमे धीमे टहलने से कोई लाभ नहीं है।
  • fast food (कोल्ड ड्रिंक नूडल्स,चाउमीन ,बर्गर,पेटीज,चाट आदि) के प्रयोग से बचें। केले से बेहतर कोई fast food नहीं हो सकता। केला अपनी diet में ज़रूर शामिल करें।
  • मधुमेह (sugar)के रोगी भी रोज़ एक केला खा सकते हैं।
  • अपनी रसोई में refined oil /dalda आदि के खाना बनाने मे प्रयोग से बचें। यह स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। सबसे बेहतर सरसों का तेल है। सरसों के तेल में बना खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
  • चीनी का प्रयोग भी कम से कम करना चाहिये। यदि चीनी का प्रयोग करना ही है तो रसायनों से साफ की हुई अधिक सफ़ेद चीनी के बजाय कत्थई (brown) रंग की चीनी का प्रयोग करना चाहिए।
         वैसे मिठास के लिए गुड़ से बेहतर स्वास्थ्यवर्धक और कोई चीज़ नहीं है।
  • नमक का प्रयोग भी कम से कम और सिर्फ दैनिक भोजन मे ही करना चाहिए।( मूँगफली या खीरा अथवा भोजन के अतिरिक्त अन्य चीजों के साथ नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए। )
  • अपनी क्षमतानुसार कोई भी एक मौसमी फल नियमित लेना चाहिए।
  • सिगरेट/शराब इत्यादि के सेवन बिलकुल न करें।
  • 40 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के व्यक्तियों को पूर्ण शाकाहार अपनाना चाहिए,यद्यपि कई चिकित्सा शोधों से यह प्रमाणित हुआ है कि शाकाहार सभी आयु वर्ग के लिए पूर्ण एवं हानि रहित है।
  • जो रोग (जैसे एलर्जी/मधुमेह/अस्थमा आदि) हमारे साथ जीवन भर रहने हैं, उन से संबन्धित उपचार/दवाओं आदि को अपना दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त मानना चाहिए।

नियमित,संयमित एवं उचित जीवन शैली ही अच्छे स्वास्थ्य का मूल आधार है।

( जनहित में प्रस्तुतकर्ता -यशवन्त यश )

एक योजना का निराधार हो जाना--हरजिंदर, हेड-थॉट, हिन्दुस्तान

यूनीक आइडेंटिटी नंबर यानी आधार की राह कभी आसान नहीं थी। खासतौर पर आम लोगों ने इसके लिए काफी पापड़ बेले हैं। पांच साल पहले, जब कार्ड बनाने की शुरुआत हुई थी, तो इसका फॉर्म लेने के लिए ही लंबी लाइनें लगती थीं।

फिर उंगलियों के निशान और आंखों की पुतलियों का स्कैन दर्ज कराने के लिए हफ्तों बाद का समय मिलता था। इतने इंतजार के बाद नियत समय पर पहुंचने वालों को पता चलता था कि सारा काम समय से काफी पीछे चल रहा है और उन्हें अभी और इंतजार करना पड़ेगा। देश की तकरीबन 75 फीसदी आबादी के पास आधार कार्ड के लिए भटकने के ढेर सारे कड़वे और खट्टे-मीठे अनुभव हैं- कहीं विद्युत आपूर्ति रुकने की वजह से काम अटक गया, तो कहीं पर स्कैनर खराब हो गया, नया अब अगले सोमवार को ही आ पाएगा। इन सारी बाधाओं के बावजूद अगर 90 करोड़ से ज्यादा लोगों को आधार कार्ड मिल चुके हैं, तो यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।

यह संख्या यूरोप के 50 देशों की कुल आबादी से भी 18 फीसदी ज्यादा है। लेकिन इतनी बड़ी उपलब्धि अब अपना ज्यादातर महत्व खो चुकी है। यूनीक आइडेंटिटी नंबर की जो व्यवस्था पूरे देश की आबादी को एक बहुत बड़े सूचना तंत्र से जोड़ने की कल्पना के साथ रची गई थी, उसकी भूमिका अब किसी राशन कार्ड से ज्यादा नहीं रह गई। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब इसे सिर्फ सार्वजनिक वितरण प्रणाली में मिलने वाले अनाज, रसोई गैस और केरोसीन के लिए ही इस्तेमाल किया जा सकेगा। कहां तो योजना यह थी कि आधार कार्ड न सिर्फ प्रत्येक नागरिक की पहचान का सबसे बड़ा आधार बनेगा, बल्कि यह उसके बैंक खाते से भी जुड़ेगा और बहुत सारे भ्रष्टाचार पर लगाम लगा देगा। यह कहा जा रहा था कि इसके बाद सरकारी सब्सिडी ही नहीं, वृद्धा पेंशन तक सीधे लोगों के बैंक खाते में पहुंच जाया करेगी।

यह वादा भी था कि इससे कई तरह की धोखाधड़ी और घपलों पर भी रोक लग सकेगी। काले धन पर रोक के तर्क भी दिए जा रहे थे। शेयर बाजार में कारोबार के लिए इसे जरूरी बनाने पर भी विचार चल रहा था। सरकार के सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का कहना था कि इसकी मूल परिकल्पना सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से बनाई गई थी, बैंक खाते और आर्थिक लाभ जैसी चीजें इसमें बाद में जोड़ी गईं। लेकिन सर्वोच्च अदालत के ताजा फैसले के बाद फिलहाल इन सब वादों और इरादों का कोई अर्थ नहीं रहा। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले को एक सांविधानिक पीठ के हवाले करने की बात कही है, मगर अभी तो सारे भगीरथ प्रयत्न के बाद हमें जो जलधारा मिली है, उसे हम महानदी तो क्या नाला भी नहीं कह सकते।

आधार का पूरा मामला, दरअसल एक साथ हमारे तंत्र की खूबियों और खामियों को दिखाता है। खूबी इस मायने में कि हम इतनी बड़ी योजना न सिर्फ बना सकते हैं, बल्कि उसे काफी हद तक लागू भी कर सकते हैं। सवा अरब की आबादी वाले विशाल देश में अगर सरकार लोगों से संवाद कर ले, न केवल उन तक अपन संदेश पहुंचा दे, बल्कि उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित कर दे, तो यह कोई छोटी बात नहीं है। वैसे इसका मजाक उड़ाते हुए यह भी कहा जाता है कि जब फायदा मिलने की बात आती है, तो लोग अपने आप उमड़ पड़ते हैं। लेकिन यह भी सच है कि भ्रष्टाचार की हाय-तौबा वाले देश में लोग अब भी पूरी तरह निराश नहीं हैं और यह मानते हैं कि सरकार उन तक योजनाओं का लाभ पहुंचा सकती है।

लेकिन आधार यह भी बताता है कि हमारा तंत्र बिना बहुत ज्यादा विचार किए किसी वृहद् योजना पर काम शुरू कर सकता है। नौकरशाही की सुविधा का पूरा ख्याल रखा जाता है, लेकिन जनता पर पड़ने वाले दूरगामी असर को नजरअंदाज कर दिया जाता है। सबसे पहले तो आधार की पूरी योजना ही एक सरकारी आदेश पर शुरू कर दी गई, इसके लिए कानूनी और सांविधानिक प्रावधान करने की जरूरत भी नहीं समझी गई। बाद में जो प्रावधान किए गए, वे भी आधे-अधूरे ही थे। इनमें भी इन आंकड़ों के दुरुपयोग को रोकने और लोगों की निजता के उल्लंघन से निपटने की कोई सोच नहीं थी। ढेर सारी आलोचनाएं हुईं, कई खतरे भी गिनाए गए।

2011 की शुरुआत में जब यूनीक आइडेंटिटी नंबर अथॉरिटी के अध्यक्ष भाषण देने के लिए बेंगलुरु की इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में गए, तो वहां इसके खतरों पर उनका ध्यान खींचने के लिए कुछ लोगों ने बैनर लगा रखे थे, जिन पर लिखा था- हैप्पी न्यू फियर। लेकिन सरकारें आलोचनाओं पर न ध्यान देती हैं, न कान। आधार की हर आलोचना को सरकार की नीयत पर संदेह की तरह देखा गया। सब ठीक है- सब ठीक है वाले अंदाज में इसे बढ़ाते रहने की कोशिशें जारी रहीं।

आधार का मामला यह भी बताता है कि जब सरकारों के सामने आलोचनाओं का जवाब देने की मजबूरी आ जाती है, तो वे अक्सर बेतुकी हो जाती हैं और कुतर्क करने लगती हैं। अभी कुछ महीने पहले ही जब आधार पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा चल रही थी, तो सरकार ने तर्क दिया था कि निजता का अधिकार लोगों का मूल अधिकार नहीं है। बेशक, भारतीय संविधान की किताबी व्याख्याओं से इस तर्क को सही ठहराया जा सकता हो, लेकिन 21वीं सदी के इस सूचना युग में अगर कोई सरकार यह कहती है कि निजता का अधिकार कोई बड़ी चीज नहीं है, तो सचमुच लोगों को आने वाले खतरों के प्रति सचेत हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण बात कही थी, अदालत का कहना था कि किसी नागरिक को सिर्फ इसलिए उसके अधिकर से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके पास आधार कार्ड नहीं है। इस बात को और आगे ले जाएं, तो कई और तरह के खतरे भी देखे जा सकते हैं। तब हो सकता है कि बहुत ज्यादा जोर दिए जाने के कारण आधार की सुविधा असुविधा में बदलती दिखाई दे। जैसे किसी को सिर्फ इसलिए नागरिक मानने से इनकार कर जेल में डाल दिया जाए कि उसके पास आधार नहीं है। हमने आधार कार्ड के लिए लंबा-चौड़ा तंत्र तो बना दिया, लेकिन अभी तक इसके उपयोग-दुरुपयोग के लिए कोई एथिक्स या आचार संहिता बनाने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की?

सरकारी तंत्र की बेपरवाही के कारण आधार की योजना सुप्रीम कोर्ट पहंुचकर जनता के लिए निराधार हो गई। लेकिन अगर इसी रूप में यह सचमुच लागू हो जाती, तो हो सकता है कि जनता के लिए यह बंटाधार साबित होती। आधार के इस हश्र से क्या सरकार सचमुच कोई सबक लेगी? अभी तक के जो रिकॉर्ड हैं, उनसे तो कोई उम्मीद नहीं बनती।

साभार :-'हिंदुस्तान'-09/10/2015 

07 October 2015

जब कोई मच्छर वीआईपी हो जाए--सहीराम

डेंगू के मच्छर का पूरा अंदाज ही निराला है। वह सिर्फ साफ पानी में पनपता है। दूसरे मच्छरों की तरह वह गंदे पानी की तरफ देखता भी नहीं। इसीलिए बताते हैं कि वह वीआईपी इलाकों में ही ज्यादा पनपता है- राष्ट्रपति भवन से लेकर संसद तक। मंत्रियों के बंगलों से लेकर डॉक्टरों के घरों तक। वह गंदी बस्तियों का कतई मोहताज नहीं है। गरीबों को मारने के लिए दूसरी बहुत-सी बीमारियां हैं।

वह आरोप क्यों ले कि उसका जोर भी भगवान की तरह गरीबों पर ही चलता है? हो सकता है कि आने वाले दिनों में उसकी मांग यह हो जाए कि मेरे लिए फिल्टर वाटर या मिनरल वाटर का इंतजाम करो। बताते हैं कि डेंगू के मच्छर दिन में काटते हैं। उनकी ड्यूटी का समय तय है- सुबह नौ बजे तक और कुछ देर शाम के वक्त। हो सकता है कि दोपहर को एकाध झपकी भी ले लेता हो। दूसरे मच्छरों की तरह नहीं है कि रात भर भिनभिनाता रहे। वह कोई मजदूर नहीं है कि ओवरटाइम करे।

पता चला है कि मच्छर मारने वाले धुएं का उस पर कोई असर नहीं होता। वह बाबुओं की तरह बिल्कुल चिकना घड़ा हो गया है। यह धुआं उस धमकी की तरह है, जो छोटे कर्मचारियों पर असर दिखाता है, बाबुओं और नौकरशाहों पर इसका कोई असर नहीं होता। जैसे नौकरशाही व्यवस्था को अपनी तरह तोड़-मोड़ लेती है, डेंगू मच्छर भी इस मच्छर मार धुएं को अपनी खुराक बना लेता है, अपने लिए इस्तेमाल कर लेता है। कहा तो यह भी जाता है कि डेंगू का मच्छर बड़ा ही समाजवादी किस्म का जीव है, जबकि ऐसे जीव आजकल कम ही मिलते हैं। वह अमीरों-गरीबों में कोई भेद नहीं करता है।

वह वीआईपी लोगों और आम गरीब-गुरबे में कोई भेद नहीं करता है, वह समान भाव से अपना काम करता है। वह डॉक्टरों को सिर्र्फ  इसलिए नहीं बख्श देता कि उनका काम बीमार होना नहीं, इलाज करना है। वह वीआईपी लोगों को भी इसलिए नहीं बख्शता कि वे बस अमीरों वाली बीमारियों के लिए आरक्षित हैं। आजकल तो भेदभाव करने वाले लोग ही नहीं मिलते, और न ऐसे विचार ही मिलते हैं, मच्छर कहां मिलेंगे भला?

सहीराम

साभार-'हिंदुस्तान'- 07/10/2015
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