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18 February 2013

उन्हें कुछ नहीं पता.....

उन्हें कुछ नहीं पता
क्या धर्म
क्या जात की ऊंच नीच
क्या गोरा क्या काला
अमीर या गरीब
उन्हें मतलब नहीं
भाषा या देश से
संस्कृति और परिवेश से
न राग से न द्वेष से  
उनका मन सिर्फ
उनका ही मन है
खुद में ही मस्त है
खुद मे ही मगन है
उन्हें लोटना है ज़मीन पर
तुतलाना है , ठुमकना है
अपनी ही दुनिया मे जीना
बच्चों का बचपना है
कभी था यह सब
खुद की हकीकत
अब यह सब  एक सपना है !

©यशवन्त माथुर©

28 January 2013

बदतमीज़ सपने

बदतमीज़ सपने 
रोज़ रात को 
चले आते हैं 
सीना तान कर 
और सुबह होते ही 
निकल लेते हैं 
मूंह चिढ़ा कर 
क्योंकि 
बंद मुट्ठी का 
छोटा सा कमरा 
कमतर है 
बड़े सपनों की 
हैसियत के सामने।
  
©यशवन्त माथुर©
 

18 January 2013

'इनके' 'उनके' सपने.............

(चित्र आदरणीय अफलातून जी की फेसबुक वॉल से )
सपने 'ये' भी देखते हैं
सपने 'वो' भी देखते हैं 

'ये' इस उमर में कमाते हैं
दो जून की रोटी जुटाते हैं 
जुत जुत कर रोज़
कोल्हू के बैल की तरह 
'उनको' निहार कर 
'ये' बस मुस्कुराते हैं 

'इनको' पता है कि दुनिया 
असल में होती क्या है 
रंगीन तस्वीरें हैं 
मगर अक्स स्याह है 

'इनके' सपनों की दुनिया में 
'उनकी' बे परवाह मस्ती है 
'ये' दर्द को पीते हैं 
और 'उनकी' आह निकलती है 

सपने 'ये' भी देखते हैं 
सपने 'वो' भी देखते हैं 
बस 'ये' ज़मीं पे चलते हैं 
और 'वो' आसमां में उड़ते हैं।    

©यशवन्त माथुर©

17 January 2013

उल्लू जैसे सपने

दिन के उजाले में
सो जाते हैं सपने
रात के अंधेरे में
जाग जाते हैं सपने

अपने से लगते हैं
कभी पराए से लगते हैं
रोते हैं खौफ से
कभी बिंदास हँसते हैं

रंग बदलते हैं सपने
यूं तो गिरगिट की तरह
नीरस स्वाद की तरह
खुद को दोहराते हैं सपने

मतलबी बन कर
तो कभी बेमतलब ही सही
ख्यालों की शाख पे 
उल्लू जैसे नज़र आते हैं सपने।  

©यशवन्त माथुर©

16 January 2013

सपने

सपने
ईश्वर का वरदान हैंमानव को
क्योंकि सपने
भूत की प्रेरणा से
वर्तमान मे
आधार बुनते हैं
सुनहरे भविष्य का।

©यशवन्त माथुर©

15 January 2013

सपने सिर्फ सपने ही नहीं होते

सपने
सिर्फ सपने ही नहीं होते
कभी कभी
वास्तविकता का आभास बन कर
खींच देते हैं चित्र भविष्य का।
चित्र जिसमें
अनेकों रंगों के साथ
मिलती जुलती कालिख
कराती है पूर्णता का एहसास
बनाती है खास
चित्र के चरित्र को ।
सपने सिर्फ सपने ही नहीं होते
कभी कभी
मन के कैनवास पर बिखर कर
करा देते हैं संगम
भूत,वर्तमान और भविष्य का। 

©यशवन्त माथुर©

13 January 2013

अगर जीवन सपना होता......

सपनों की रंगीन
चित्ताकर्षक
मनमोहक
और अपनी मनचाही
दुनिया में घूमते हुए
मैं अक्सर सोचता हूँ
यह जीवन भी
होता अगर
ऐसे ही किसी
सुखांत सपने की तरह
तब शायद
एक बार खिल उठने के बाद
कोई फूल
न कभी मुरझाता 
और न ही कर पाता
नव जीवन का एहसास !

    
©यशवन्त माथुर©
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