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13 March 2015

ज़मीन और आसमां-3

कभी कभी
सोचता हूँ
क्या रिश्ता है
आसमान
और ज़मीन का ?
रिश्ता है भी
या नहीं
है तो
दूर का
या
पास का  ?

कभी देखता हूँ
इन दोनों को
लंबे विछोह के बाद 
क्षितिज पर
मिलते हुए
और 
कभी देखता हूँ
एक दूसरे को
अपलक ताकते हुए
बारिश की बूंदों सा
बरसते हुए
आंसुओं को
पीते हुए
सृष्टि चक्र के 
गहन पाश में
जकड़े हुए
युगों युगों तक
यूं ही जीते हुए
ज़मीन और
आसमान का
मौन -
अलिखित रिश्ता
मोहताज नहीं है
किसी परिभाषा का।

~यशवन्त यश©


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22 November 2011

ज़मीन जैसा हूँ......

आईने मे आज फिर
अपना चेहरा देखा
कल किसी ने
इसे बेदाग कहा था
और मुझे घेर दिया था
गहरी सोच मे
क्या यह सचमुच बेदाग है?
क्या बदलते वक़्त के साथ
बीतती उम्र के साथ
वही कोमलता बाकी है?
नहीं!
नहीं हूँ मैं बे दाग
तमाम चोटों के
खरोचों के निशान
इसकी गवाही दे रहे हैं ।

खुद को ज़मीन जैसा पाता हूँ मैं
अपने पैरों तले
जिसे कुचल कर
चोटें दे देकर
वक़्त बढ़ता चला जा रहा है
चलता चला जा रहा है
अपनी राह

उम्र के बढ्ने के साथ
पुराने होते चोटों के निशान
अब भी दिख रहे हैं
आईने मे
और आने वाली चोटें
तलाश रही हैं अपनी जगह
मेरे चेहरे पर !

09 June 2011

तुम आसमां हो

तुम जैसा
बनने की कोशिश
करता हूँ
कभी कभी
तुम जैसा
उठने की कोशिश
करता हूँ कभी कभी

मैं तुम को
पाना चाहता हूँ
छूना चाहता हूँ
जितनी कोशिश करता हूँ
तुम और ऊंचे उठ जाते हो
हो जाते हो
मेरी पहुँच से
बहुत दूर

ताकते रह जाना है
तुम को
यूँ ही
हमेशा
क्योंकि -
मैं ज़मीं
और तुम आसमां हो .
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