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13 December 2018

अरे अब तो बुझ जाऊँ मैं......

इससे पहले कि शमा बुझे
खुद ही बुझ जाऊँ मैं।
मन की सुनसान राहों पर
उड़ूँ और बिखर जाऊँ मैं।

अब तक तो ये न सोचा था
क्या फलसफे होंगे कल के।
बस आज में जीते हुए ही
बुनता सपने अपने मन के।

इससे पहले कि उलझन सुलझे
खुद को ही सुलझाऊँ मैं।
आखिर कब तक जलता रहूँगा
अरे अब तो बुझ जाऊँ मैं।

-यश©
12/दिसंबर/2018 

12 December 2018

वक़्त के कत्लखाने में -15

यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
देखता रहता हूँ
आवाजाही को
दिन और रात को
कल और आज को ।
यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
सुनता हूँ
आवाज़ें
जो निकलती हैं
बंद पलकों के पर्दे पर
चल रहे
चलचित्र के
गुमनाम-
अनजान
पात्रों से।
यूँ ही
कभी-कभी
बैठा हुआ कहीं
रखता हूँ
बस यही उम्मीद
कि एक दिन
आ मिलेगी
मुझ से
मेरी परछाई
जो साथ छोड़ कर
जा पहुँची है
कहीं दूर
वक़्त के
किसी कत्लखाने में।
.
-यश ©
12/दिसंबर/2018 

07 December 2018

घूरता जाता हूँ.........

जिन्हें कभी लिखता हूँ, कभी लिख कर मिटाता हूँ बस एकटक उन्हीं शब्दों को,कभी घूरता जाता हूँ। चरित्र के प्रमाण की मुझको कोई ज़रूरत नहीं सच का चेहरा ले कर ही ,आता और जाता हूँ। जवाब क्या दूँ उनको, जिनको कुछ पल की पता है भलाई करना ही इस दौर की सबसे बड़ी खता है। माना कि पत्थर हूँ, पर चोटें मैं भी खाता हूँ खुद पर उभरी खरोचों को ही घूरता जाता हूँ । - यश© 07/दिसंबर/2018

06 December 2018

कैसे खुशी की बात करूँ?

दिन-रात अंधेरे ही अंधेरे
कब उजाले से मुलाक़ात करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

कहीं उम्मीद की आस नहीं
खुद को ही सिर्फ निराश करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

कई अजूबों की इस बस्ती में
क्यूँ झूठी मस्ती को आबाद करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

खून से रंगे हुए इन चौराहों पर 
मन के मत-भेद सरे-आम करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

दिन-रात अंधेरे ही अंधेरे
जाती साँसों पर विश्वास करूँ
कैसे खुशी की बात करूँ?

-यश©
06/12/2018

05 December 2018

आखिर क्यूँ ?

चित्र सौजन्य-The Eyes of Children around the World
आखिर क्यूँ ये दहशत, क्यूँ आँखों में सूनापन है ?
क्यूँ डरा सा, सहमा सा ,क्यूँ काँटों सा बचपन है ?

यौवन की देहरी आने में, समय बहुत सा बाकी है । 
झूलों में, मैदानों में, खेलने की उमर  भी बाकी है ।  

फिर क्यूँ गुम हुआ चहकना,गया कहाँ वह सच्चापन है ?
मन की अपने जो था करता ,कहाँ गया वह बच्चापन  है?

–यश ©
05/12/2018
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